भरोसा तब भी जब अंधेरा हो
अंधकार में भरोसा
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए रूत 1:20, उत्पत्ति 15:17, निर्गमन 25:15 and लूका 1:38.
☀ सुबह का पल
उसने उनसे कहा, “मुझे नाओमी न कहो, मुझे मारा कहो, क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मुझ को बड़ा दुःख दिया है।
रूत 1:20
नाओमी ने खुद को नया नाम दे दिया, क्योंकि पुराना नाम अब झूठ जैसा लगने लगा था।
नाओमी का अर्थ है मनोहर, सुखद, मीठी। यही नाम उसके माता-पिता ने उसे प्रेम से दिया होगा, शायद किसी शांत दिन पर। पर मोआब में उसने अपना पति खोया, फिर दोनों बेटे। जब वह बेथलेहेम लौटी, खाली हाथ, तब उसने कहा, मुझे मारा कहो, क्योंकि मारा का अर्थ है कड़वी। उसने अपने दुख पर पर्दा नहीं डाला।
ध्यान दो, वह यह बात किससे कहती है। वह कहती है कि सर्वशक्तिमान ने उसके साथ कड़वाहट से व्यवहार किया है। वह शिकायत भी परमेश्वर के सामने ही करती है, पीठ पीछे नहीं। यह निराशा नहीं, ईमानदारी है, और ईमानदारी भी एक तरह की भक्ति है।
आज रविवार है, कलीसिया का दिन, इकट्ठा होने का दिन। बहुत बार हम वहाँ नाओमी का चेहरा लेकर जाते हैं, जबकि भीतर मारा बैठी होती है। परमेश्वर के घर में अपना असली नाम छुपाना ज़रूरी नहीं। वह जानता है, और वह सुनता है।
आज
आज सुबह, चर्च के लिए निकलने से पहले, एक कागज़ के टुकड़े पर वह एक शब्द लिखो जो अभी तुम्हारे दिल की हालत बताता है, मीठा या कड़वा। उसे ज़ोर से परमेश्वर के सामने पढ़ो, और फिर उसे अपनी जेब में रखकर आराधना में जाओ।
✦ दोपहर का पल
और ऐसा हुआ कि जब सूर्य अस्त हो गया और घोर अंधकार छा गया, तब एक अँगीठी जिसमें से धुआँ उठता था और एक जलती हुई मशाल दिखाई दी जो उन टुकड़ों के बीच में से होकर निकल गई।
उत्पत्ति 15:17
धुआँ अंधेरे में उठ रहा है। ज़मीन पर जानवरों की लाशें दो-दो टुकड़ों में कटी पड़ी हैं, खून की गंध भारी है, और अब्राम गहरी नींद में पड़ा है। उसी सन्नाटे में एक धधकती मशाल, अकेली, उन टुकड़ों के बीच से निकलती है।
जिस शब्द का अनुवाद हम 'वाचा' करते हैं, उसका मूल अर्थ है काटना। वाचा बांधना नहीं, वाचा काटना। पुराने समय में दो पक्ष किसी समझौते पर यही करते थे, एक जानवर काटकर, टुकड़ों के बीच से दोनों चलते थे, मानो कह रहे हों, 'यदि मैं वचन तोड़ूं, तो मेरा हाल इस जानवर जैसा हो।' हमारी भाषा में सिर्फ 'वाचा' शब्द यह खून, यह गंभीरता, यह कीमत पूरी तरह नहीं दिखा पाता।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस दृश्य में अब्राम नहीं चलता, केवल परमेश्वर चलते हैं। अब्राम सोया रहता है। वाचा का भार अकेले उसी पर है जिसने वचन दिया।
यही शब्द आगे नूह के साथ, दाऊद के साथ, और अंततः उस मेज़ पर फिर सुनाई देता है जहाँ यीशु प्याला उठाकर कहते हैं, यह मेरी वाचा का लहू है। वही काटा जाना, वही कीमत, अब उन्हीं के शरीर में।
आज जब विश्वासी इकट्ठे होकर आराधना करते हैं, वे किसी अनुबंध को निभाने नहीं जुटते, बल्कि उस वाचा में खड़े होते हैं जो परमेश्वर ने अपने ही लहू से काटी है।
आज
आज दस मिनट अकेले बैठें, एक कागज़ पर लिखें, 'यह वाचा परमेश्वर ने काटी, मैंने नहीं।' फिर उसे अपनी बाइबल के भीतर रख दें, एक चिन्ह के रूप में।
◐ दोपहर का पल
वे डंडे सन्दूक के कड़ों में लगे रहें; और उससे अलग न किए जाएँ।
निर्गमन 25:15
कहाती वंश के लेवीय, जब भी छावनी उजड़ती और फिर कहीं और बसती, उन्हीं के कंधों पर यह पवित्र संदूक टिकता था। पर उन्हें कभी यह छूट नहीं थी कि डंडों को कड़ियों से निकाल कर अलग रख दें, संदूक को ज़मीन पर उतार कर चैन से सुस्ता लें। डंडे हमेशा अपनी जगह पर पड़े रहते, तैयार, स्थायी, भले ही संदूक महीनों एक ही जगह टिका रहे।
यह ऐसी जगह नहीं थी जो एक बार बस गई और फिर सजावट बन गई। उसकी उपस्थिति हमेशा यात्रा के लिए तैयार रखी जाती, विश्राम के बीच भी।
आज, रविवार को, हम इकट्ठा होते हैं, गाते हैं, जैसे विश्राम पूरा हो गया हो। पर क्या हमारा विश्वास भी उतना ही तैयार है, डंडे हमेशा कड़ियों में, कभी ज़मीन पर टिके नहीं? या हमने संदूक को उतार कर किसी कोने में रख दिया है, क्योंकि उठाना भारी लगता है।
परमेश्वर ने क्यों आदेश दिया कि डंडे कभी न निकाले जाएं, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया गया। शायद इसलिए कि उसकी उपस्थिति कभी स्थिर संपत्ति नहीं बननी थी, एक दीवार पर टंगी शोभा नहीं, बल्कि कुछ जो उठने और चलने के लिए हमेशा तैयार रहता है, जहां भी उसके लोग जाएं।
आज
आज चर्च जाते समय अपनी बाइबल बैग में मत रखो, उसे हाथ में उठाकर ले जाओ, और रास्ते भर उसका वज़न महसूस करो, यह याद करते हुए कि यह बोझ भी तैयार रखा जाना है, टिकाकर भूल जाने के लिए नहीं।
☾ संध्या का क्षण
मरियम ने कहा, “देख, मैं प्रभु की दासी हूँ, तेरे वचन के अनुसार मेरे साथ ऐसा हो।” तब स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।
लूका 1:38
परमेश्वर का सबसे बड़ा काम किसी मंदिर में नहीं, नासरत की एक छोटी गली में शुरू हुआ।
उस शाम से पहले मरियम का जीवन साधारण था। एक गाँव की युवती, यूसुफ से मंगनी हुई, आगे के दिनों की छोटी-छोटी योजनाएँ। नासरत गलील के उन गुमनाम कस्बों में से एक था जिसका यरूशलेम के धार्मिक जगत में कोई विशेष नाम तक नहीं था। कोई उम्मीद नहीं करता था कि ऐसी जगह से कुछ बड़ा निकलेगा।
फिर स्वर्गदूत आया। उसने कहा कि वह अनुग्रहित है, कि एक पुत्र जन्म लेगा जिसे यीशु कहा जाएगा, जो परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा। सवाल उठे, बातें समझ से परे थीं, पर अंत में मरियम के मुँह से वे शब्द निकले जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी।
"देख, मैं प्रभु की दासी हूँ।" यह किसी बड़ी योजना का उत्तर नहीं था, यह समर्पण था। उसी शांत रात से मुक्ति की कहानी एक नए मोड़ पर चल पड़ी, और वह मोड़ किसी विशाल घटना से नहीं, एक साधारण स्त्री के छोटे से हाँ से शुरू हुआ।
आज रविवार की यह शाम भी वैसी ही शांत हो सकती है। दिन भर की आराधना, मिलना-जुलना, सब कुछ अब विश्राम में बदल रहा है। जो कुछ आज तेरे मन में अनसुलझा रह गया है, उसे वही शब्द देकर परमेश्वर को सौंप दे जो मरियम ने कहे थे।
आज
आज रात सोने से पहले ऊँची आवाज़ में कह, "देख, मैं प्रभु का दास हूँ; मेरे साथ तेरे वचन के अनुसार हो," और उस एक बात का नाम ले जिसे तू आज परमेश्वर के हाथ में सौंपना चाहता है।
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20उसने उनसे कहा, “मुझे नाओमी न कहो, मुझे मारा कहो, क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मुझ को बड़ा दुःख दिया है।
17और ऐसा हुआ कि जब सूर्य अस्त हो गया और घोर अंधकार छा गया, तब एक अँगीठी जिसमें से धुआँ उठता था और एक जलती हुई मशाल दिखाई दी जो उन टुकड़ों के बीच में से होकर निकल गई।
15वे डंडे सन्दूक के कड़ों में लगे रहें; और उससे अलग न किए जाएँ।
38मरियम ने कहा, “देख, मैं प्रभु की दासी हूँ, तेरे वचन के अनुसार मेरे साथ ऐसा हो।” तब स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।
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