स्थिर रहो · रविवार, अक्टूबर 11, 2026

डर के बीच परमेश्वर का भरोसा

भरोसा और समर्पण

आज 2 मिनट का पठन 4 बाइबिल के अंश

शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए लूका 12:6-7, यूहन्ना 20:13, एस्तेर 5:2 and लूका 22:42.

☀ सुबह का पल

क्या दो पैसे की पाँच गौरैयाँ नहीं बिकती? फिर भी परमेश्वर उनमें से एक को भी नहीं भूलता। वरन् तुम्हारे सिर के सब बाल भी गिने हुए हैं, अतः डरो नहीं, तुम बहुत गौरैयों से बढ़कर हो।

लूका 12:6-7

बिस्तर के किनारे बैठे हुए, फोन की स्क्रीन खाली है, कोई नया संदेश नहीं। घंटे भर में कलीसिया पहुँचना है, और मन में यह हल्का-सा विचार आता है कि आज भी बस एक और चेहरा होकर बैठ जाना है, भीड़ में एक और नाम।

गलील के बाज़ार में गौरैया सबसे सस्ता माँस थी। जो परिवार मेमना या कबूतर नहीं खरीद सकते थे, वे गौरैया लेते थे, दो के बदले एक छोटा सिक्का। लूका बताता है कि पाँच गौरैया दो सिक्कों में मिल जाती थीं, यानी एक मुफ्त, जैसे बेकार सामान का टुकड़ा जोड़ दिया गया हो। बाज़ार में उनकी कोई गिनती नहीं थी, उनका कोई मोल नहीं था।

फिर भी यीशु कहते हैं, उनमें से एक भी परमेश्वर के सामने भूली नहीं जाती। जिसे इंसानों ने तुच्छ ठहराया, उसे पिता गिनता है। और हमारे सिर के बाल तक गिने हुए हैं, यह कोई लापरवाह अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि यह दिखाने का तरीका है कि परमेश्वर की नज़र कितनी बारीक और कोमल है।

आज जब तुम औरों के साथ आराधना में बैठोगे, शायद फिर वही भाव आए कि तुम बस एक और सिर हो भीड़ में। पर बाज़ार का मोल और पिता की नज़र एक नहीं हैं। जिसे दुनिया गिनती में भी नहीं लेती, वह परमेश्वर के हाथ से छूटता नहीं।

आज
कलीसिया जाने से पहले किसी एक ऐसे व्यक्ति को याद करो जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाता है, और उसे एक छोटा संदेश भेजो, 'आज तुम्हारी याद आई, तुम भुलाए नहीं गए हो।'

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✦ दोपहर का पल

उन्होंने उससे कहा, “हे नारी, तू क्यों रोती है?” उसने उनसे कहा, “वे मेरे प्रभु को उठा ले गए और मैं नहीं जानती कि उसे कहाँ रखा है।”

यूहन्ना 20:13

आंसुओं को अक्सर एक समस्या माना जाता है, कुछ ऐसा जिसे जल्दी पोंछकर आगे बढ़ना चाहिए। खासकर जब अच्छी खबर पास ही खड़ी हो, तो रोना मानो व्यर्थ समझा जाता है। मगर कब्र के पास खड़े इस सवाल में ऐसी कोई जल्दबाज़ी नहीं है।

यूहन्ना के सुसमाचार में मरियम मगदलीनी भोर में कब्र के पास खड़ी रो रही है। कब्र खाली है, शरीर नहीं मिल रहा, और उसकी समझ में अभी कुछ नहीं आ रहा। तभी दो स्वर्गदूत, जहां यीशु का शरीर रखा गया था वहीं बैठे हुए, उससे पूछते हैं, 'हे नारी, तू क्यों रोती है।'

यह सवाल उसे चुप कराने के लिए नहीं पूछा गया। स्वर्गदूत उसे यह नहीं कहते कि रोने की कोई वजह नहीं बची, या कि वह जल्दी खुश हो जाए। वे बस पूछते हैं, और उसे अपने दुख को शब्दों में कहने की जगह देते हैं। मरियम जवाब देती है, उसका प्रभु ले जाया गया है, और वह नहीं जानती कि उसे कहां रखा गया है।

आज रविवार है, वह दिन जब विश्वासी एक साथ जुटते हैं, स्तुति करते हैं, विश्राम करते हैं। पर जमावड़े में हर कोई खुशी लेकर नहीं आता। किसी के भीतर अब भी वही सवाल गूंज रहा हो सकता है, किसी का दुख अभी पूरी तरह समझ में नहीं आया। यह सवाल आज भी उतनी ही कोमलता से पूछा जा सकता है।

आज
आज आराधना में या उसके बाद किसी एक व्यक्ति के पास जाओ जो चुप या उदास दिखे, और धीरे से पूछो, 'क्या बात तुम्हें परेशान कर रही है।' फिर जवाब सुनने के लिए रुक जाओ, बिना तुरंत सांत्वना देने की जल्दी किए।

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◐ दोपहर का पल

और जब राजा ने एस्तेर रानी को आँगन में खड़ी हुई देखा, तब उससे प्रसन्न होकर सोने का राजदण्ड जो उसके हाथ में था उसकी ओर बढ़ाया। तब एस्तेर ने निकट जाकर राजदण्ड की नोक छुई।

एस्तेर 5:2

राजदंड की सुनहरी नोक हवा में हिलती है, स्थिर नहीं, क्योंकि राजा का हाथ अभी ऊपर उठा है। तीन दिन के उपवास के बाद एस्तेर के पैर भीतरी आँगन के संगमरमर पर टिके हैं, और पूरे दरबार में कोई आवाज़ नहीं। वह बिन बुलाए अंदर आई है।

फारस का नियम सीधा था, राजा के बिना बुलाए भीतरी आँगन में जाने वाला हर कोई मारा जाएगा, चाहे वह रानी ही क्यों न हो, जब तक राजा सोने का राजदंड बढ़ाकर जीवन न बख़्शे। एस्तेर यह जानती थी। इसीलिए उसने मोर्दकै से कहा था, यदि मैं नाश हुई तो नाश ही हुई। वह वाक्य उसने उपवास के बाद कहा, निर्णय ले लेने के बाद, पर उसे अब भी नहीं पता था कि राजदंड उठेगा या नहीं।

यही वह क्षण है जो उसकी पूरी कहानी को पकड़े हुए है। विश्वास यहाँ निश्चितता नहीं था। एस्तेर नहीं जानती थी कि आगे क्या होगा, वह सिर्फ आगे बढ़ी, उपवास और प्रार्थना के बाद, बिना किसी गारंटी के।

शायद तुम भी किसी दहलीज़ पर खड़े हो, कोई बातचीत जो डराती है, कोई सच्चाई जो कहनी है, कोई प्रार्थना जो महीनों से होंठों तक नहीं आई क्योंकि नतीजा मालूम नहीं। एस्तेर का रास्ता यह नहीं सिखाता कि डर खत्म हो जाएगा, बल्कि यह कि आगे बढ़ा जा सकता है जब डर अभी भी साथ हो।

आज
आज किसी एक डर या निर्णय को, जिसे तुमने लंबे समय से टाला है, कागज़ पर लिख लो, और उसे ज़ोर से एक प्रार्थना के रूप में परमेश्वर के सामने बोल दो।

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☾ संध्या का क्षण

“हे पिता यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले, फिर भी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो।”

लूका 22:42

आज रात तुमने किससे कहा, मैं नहीं चाहता जो होने वाला है? यह सवाल अंधेरे में अक्सर उठता है, जब दिन की थकान उतरती है और कल की चिंता भीतर घुसने लगती है।

यीशु ने यह प्रार्थना गतसमनी की वाटिका में की थी, जैतून के तेल निकालने की जगह, जहाँ फल को कुचलकर तेल निकाला जाता था। उसी रात उनकी अपनी आत्मा कुचली जा रही थी। शिष्य पास ही सो रहे थे, और वह अकेले परमेश्वर के सामने खड़े थे, मृत्यु के भय से कांपते हुए।

यह प्रार्थना साहसी है क्योंकि यह अपनी इच्छा छिपाती नहीं। यीशु पहले कहते हैं, यह कटोरा मुझसे हटा दे। वह झूठा समर्पण नहीं दिखाते, वह सच बोलते हैं। फिर वह आगे बढ़ते हैं, तेरी इच्छा पूरी हो। दोनों बातें एक ही सांस में कही जाती हैं, मांगना और सौंपना।

आज रविवार की शाम को, जब कलीसिया की आराधना की गूंज अभी भीतर बसी है, यही प्रार्थना तुम्हारे होंठों पर आ सकती है। तुम्हारी इच्छा और परमेश्वर की इच्छा के बीच जो तनाव है, उसे छिपाने की जरूरत नहीं। उसे शब्दों में कहो, जैसे यीशु ने कहा।

आज
आज रात सोने से पहले, वह एक बात जो तुम परमेश्वर को सौंपना नहीं चाहते, उसे ज़ोर से बोलो, और फिर कहो, तेरी इच्छा पूरी हो।

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