प्यास केवल परमेश्वर में बुझती है
सच्ची तृप्ति की खोज
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए भजन संहिता 63:1, नीतिवचन 21:5, यशायाह 55:2 and भजन संहिता 3:3-4.
☀ सुबह का पल
हे परमेश्वर, तू मेरा परमेश्वर है, मैं तुझे यत्न से ढूँढ़ूगा; सूखी और निर्जल ऊसर भूमि पर, मेरा मन तेरा प्यासा है, मेरा शरीर तेरा अति अभिलाषी है।
भजन संहिता 63:1
दाऊद यहूदा के सूखे जंगल में भाग रहा था, गला प्यास से सूख रहा था, धरती चटक रही थी और आस-पास कहीं पानी नहीं था। ऐसी हालत में भी उसके मुँह से पहला शब्द शिकायत नहीं, पुकार था, हे परमेश्वर, आप मेरे परमेश्वर हैं।
आज की सुबह भी शायद वैसी ही सूखी लग रही हो। रात ठीक से सोए नहीं, दिन का बोझ अभी से महसूस होने लगा है, दफ्तर या घर की ज़िम्मेदारियाँ सामने खड़ी हैं। दाऊद की तरह आपके अंदर भी कोई प्यास है, किसी बड़े सहारे की, किसी शांति की, जो आस-पास की चीज़ों से नहीं मिटती।
दाऊद ने उस प्यास को छुपाया नहीं, उसने उसे परमेश्वर की ओर मोड़ दिया। उसकी परिस्थिति नहीं बदली, पर उसकी नज़र बदल गई। वह जंगल अब सिर्फ खतरे की जगह नहीं रहा, वह मुलाक़ात की जगह बन गया।
यही सच आपके लिए भी है। जिस दिन की शुरुआत सूखी लग रही है, वहीं परमेश्वर आपसे मिलने के लिए तैयार बैठे हैं। आपको सब कुछ ठीक करके नहीं जाना, बस प्यासी आत्मा लेकर उनके सामने आना है।
आज
आज सुबह पानी पीने से पहले एक पल रुकें और धीरे से बोलें, हे परमेश्वर, आप मेरे परमेश्वर हैं, मैं आपको खोजता हूँ। फिर वह पानी पिएं और दिन शुरू करें।
✦ दोपहर का पल
कामकाजी की कल्पनाओं से केवल लाभ होता है, परन्तु उतावली करनेवाले को केवल घटती होती है।
नीतिवचन 21:5
थाली अभी-अभी सामने रखी गई है, पर हाथ पहले से मोबाइल की ओर बढ़ रहा है। मन अभी भी सुबह की मीटिंग में अटका है, अगली ईमेल पर कूद रहा है। शरीर बैठा है, पर मन दौड़ रहा है।
यही वह घड़ी है जिसमें नीतिवचन की यह बात ठहरकर सुनने लायक है। जल्दबाजी को अक्सर हम मेहनत समझ लेते हैं, मानो तेज़ चलना ही आगे बढ़ना है। पर वचन कुछ और कहता है, परिश्रम और जल्दबाजी एक चीज़ नहीं। परिश्रम सोचकर, टिककर, योजना बनाकर चलता है। जल्दबाजी बस भागती है, बिना यह जाने कि कहाँ पहुँचना है।
दोपहर का यह ब्रेक भागने से रुकने का मौका है। पाँच मिनट रुककर पूछना, आज बाकी बचा समय मैं किस दिशा में लगाना चाहता हूँ, यह जल्दबाजी नहीं, यह बुद्धि है। परमेश्वर बुद्धि को उतना ही आशीष देते हैं जितना परिश्रम को।
अगले घंटों में जो काम बाकी है, उसे अंधाधुंध पकड़ने से पहले एक साँस लेना, एक क्षण सोचना, यही आज का निमंत्रण है।
आज
अभी, थाली के पास ही, एक कागज़ या मोबाइल की नोट में लिख लें कि दोपहर के बाद आपका सबसे ज़रूरी एक काम कौन-सा है। बस एक पंक्ति, फिर उसी के साथ वापस काम पर लौटें।
◐ दोपहर का पल
जो भोजनवस्तु नहीं है, उसके लिये तुम क्यों रुपया लगाते हो, और जिससे पेट नहीं भरता उसके लिये क्यों परिश्रम करते हो? मेरी ओर मन लगाकर सुनो, तब उत्तम वस्तुएँ खाने पाओगे और चिकनी-चिकनी वस्तुएँ खाकर सन्तुष्ट हो जाओगे।
यशायाह 55:2
दोपहर के इस समय पर हम मान लेते हैं कि थकान का हल है एक कप चाय, फोन पर पाँच मिनट, या कुछ मीठा खा लेना। यह हमारी संस्कृति की मूल धारणा है, कुछ भी लो, बस भरा हुआ महसूस करो। यह वचन इस धारणा में एक दरार डाल देता है और पूछता है, तुम जो खरीद रहे हो, जो कमा रहे हो, वह वास्तव में तुम्हें भरता है या तुम्हें फिर खाली छोड़ देता है?
यशायाह का यह सवाल तीखा है क्योंकि यह हमारी दिनचर्या पर सीधा उंगली रखता है। हम काम में मेहनत करते हैं, दौड़ते रहते हैं, और शाम को फिर वही खालीपन पाते हैं। परमेश्वर यह नहीं कहते कि मेहनत बुरी है। वह पूछते हैं कि हमारी मेहनत किस चीज़ के लिए लगी है, रोटी के लिए या धुंध के लिए।
यह अजीब है कि परमेश्वर स्वयं बुलाते हैं, सुनो, खाओ, आनन्द लो। यह आदेश नहीं बल्कि निमंत्रण है, पर इसमें एक चुनौती छिपी है, क्या हम रुककर सुनने को तैयार हैं, या फिर अगली चीज़ की तरफ भाग जाएँगे?
यह सवाल आज हल नहीं होगा, न ही होना चाहिए। पर यह दोपहर पूछने का अच्छा समय है।
आज
अगले दस मिनट में, जो भी काम या स्क्रीन तुम्हारे सामने है उसे थोड़ी देर के लिए रोक दो और एक कागज़ पर लिखो, 'आज मैं किस भूख को मिटाने की कोशिश कर रहा हूँ?' उस उत्तर को परमेश्वर के सामने ज़ोर से बोल दो।
☾ संध्या का क्षण
परन्तु हे यहोवा, तू तो मेरे चारों ओर मेरी ढाल है, तू मेरी महिमा और मेरे मस्तक का ऊँचा करनेवाला है। मैं ऊँचे शब्द से यहोवा को पुकारता हूँ, और वह अपने पवित्र पर्वत पर से मुझे उत्तर देता है। (सेला)
भजन संहिता 3:3-4
पहाड़ की चोटी से आवाज़ लौटती है, धीमी, पर बिल्कुल साफ़। दाऊद उस समय वहाँ खड़ा नहीं था, वह तो भागा हुआ, थका हुआ, दुश्मनों से घिरा हुआ था, फिर भी वह जानता था कि उसकी पुकार वहाँ तक पहुँचती है।
अपने सिर के बारे में सोचिए, आज पूरे दिन कितना झुका रहा। फैसले, बातचीत, छोटी-छोटी माँगें, ये सब धीरे-धीरे उसका वज़न बढ़ाती रही हैं। दाऊद कहता है कि यहोवा वही है जो सिर को फिर से ऊँचा कर देता है, वह उसकी ढाल है, उसकी महिमा है।
यह कोई मजबूरी का सहारा नहीं, बल्कि एक विशेषाधिकार है। बुधवार की इस शाम काम पूरा हुआ हो या अधूरा छूट गया हो, पुकार अब भी सुनी जाती है, चाहे आवाज़ कितनी भी थकी हुई क्यों न हो।
सोचिए, पहाड़ी की चोटी से आती वह प्रतिध्वनि आज आपके कमरे तक भी पहुँच सकती है। भार वहीं छोड़ा जा सकता है, जहाँ से जवाब आता है।
आज
अभी, ठीक इस पल, अपनी कुर्सी पर सीधे बैठिए, अपना सिर धीरे से ऊपर उठाइए और भजन 3:3 के शब्द ऊँची आवाज़ में बोलिए, यहोवा मेरी ढाल है, मेरी महिमा है, मेरा सिर उठाने वाला है। इसे तीन बार दोहराइए, धीरे धीरे, जैसे सिर सचमुच उठ रहा हो।
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1हे परमेश्वर, तू मेरा परमेश्वर है, मैं तुझे यत्न से ढूँढ़ूगा; सूखी और निर्जल ऊसर भूमि पर, मेरा मन तेरा प्यासा है, मेरा शरीर तेरा अति अभिलाषी है।
5कामकाजी की कल्पनाओं से केवल लाभ होता है, परन्तु उतावली करनेवाले को केवल घटती होती है।
2जो भोजनवस्तु नहीं है, उसके लिये तुम क्यों रुपया लगाते हो, और जिससे पेट नहीं भरता उसके लिये क्यों परिश्रम करते हो? मेरी ओर मन लगाकर सुनो, तब उत्तम वस्तुएँ खाने पाओगे और चिकनी-चिकनी वस्तुएँ खाकर सन्तुष्ट हो जाओगे।
3परन्तु हे यहोवा, तू तो मेरे चारों ओर मेरी ढाल है, तू मेरी महिमा और मेरे मस्तक का ऊँचा करनेवाला है।
4मैं ऊँचे शब्द से यहोवा को पुकारता हूँ, और वह अपने पवित्र पर्वत पर से मुझे उत्तर देता है। (सेला)
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