थके मन के लिए परमेश्वर का बल
बल और भरोसा
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए फिलिप्पियों 4:13, नीतिवचन 12:25, यिर्मयाह 17:9-10 and भजन संहिता 27:1.
☀ सुबह का पल
जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।
फिलिप्पियों 4:13
पौलुस ये शब्द किसी आरामदायक मेज़ पर बैठकर नहीं लिखता, बल्कि एक जेल की सीलन भरी कोठरी से, जहाँ उसके हाथ-पैर जंजीरों से बंधे हैं और आगे का रास्ता अनिश्चित है। फिर भी वह शिकायत नहीं करता, वह एक भरोसे की बात कहता है जो उसकी परिस्थिति से कहीं बड़ा है।
तुम्हारा सोमवार शायद जंजीरों जैसा न लगे, पर उसका अपना ही भार है। अनसुलझे काम, ऑफिस की मीटिंग, बच्चों की तैयारी, या बस थकान जो रविवार की छुट्टी के बाद भी नहीं गई। मन कहता है, इतना सब कैसे होगा।
पौलुस का भरोसा उसकी अपनी काबिलियत में नहीं था। वह कहता है, मसीह के द्वारा। यानी उसकी शक्ति उधार की है, हर सुबह नए सिरे से दी हुई। यही आज तुम्हारे लिए भी सच है।
यीशु तुम्हारे साथ इस दिन में चलता है। जो काम असंभव लगता है, वह उसमें अकेले नहीं करना। उसकी ताकत तुम्हारी कमज़ोरी में पूरी होती है, यह सिर्फ एक अच्छी बात नहीं, बल्कि आज का सहारा है।
Today
आज सुबह घर से निकलने से पहले, एक पल रुककर ज़ोर से कहो, मसीह के द्वारा मैं आज का सबसे कठिन काम कर सकता हूँ। इसे मन में मत रखो, इसे शब्दों में बोलो, ताकि यह भरोसा तुम्हारे कानों तक भी पहुँचे।
✦ दोपहर का पल
उदास मन दब जाता है, परन्तु भली बात से वह आनन्दित होता है।
नीतिवचन 12:25
ध्यान दो, इस वचन में चिंता पहले आती है, शब्द बाद में। लेखक यह नहीं कहता कि पहले मन का बोझ हटाओ, फिर कोई भला शब्द बोलो। नहीं, बोझ वहीं रहता है, दिल में दबा हुआ, और फिर भी एक शब्द उसे हल्का कर सकता है। यह क्रम ही चौंकाता है।
दोपहर के इस पल में शायद तुम्हारे मन में भी कुछ दबा हुआ है, वह रिपोर्ट जो अभी पूरी नहीं हुई, वह मीटिंग जो कुछ देर में शुरू होगी, वह जवाब जो अभी तक किसी ईमेल का नहीं आया। मन बोझिल है, और घड़ी की सुई नहीं रुकती।
पर वचन कहता है कि एक भला शब्द, चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, उस बोझ के भीतर भी खुशी ला सकता है। शब्द बोझ को उठाता नहीं, पर दिल को सांस लेने देता है। इतना बड़ा काम, इतने छोटे शब्द से।
सोचो, तुम्हारे आस पास कौन आज ऐसा बोझ लिए बैठा है। शायद बगल की मेज़ पर बैठा साथी, शायद वह जिसने आज सुबह जल्दी में कुछ नहीं कहा।
Today
अभी, इसी दोपहर के भोजन के बीच, एक साथी को एक संदेश भेजो, बस एक भला वाक्य, धन्यवाद या हौसला बढ़ाने का। भेज दो, अभी।
◐ दोपहर का पल
मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है? “मैं यहोवा मन को खोजता और हृदय को जाँचता हूँ ताकि प्रत्येक जन को उसकी चाल-चलन के अनुसार अर्थात् उसके कामों का फल दूँ।” (1 पत. 1:17, प्रका. 2:23, प्रका. 20:12,13, प्रका. 22:12)
यिर्मयाह 17:9-10
धोखेबाज़.
यह शब्द किसी दूसरे के लिए नहीं, अपने ही मन के लिए लिखा गया है। हम सोचते हैं कि हम अपने मन को जानते हैं, कि हम अपने इरादों को अच्छी तरह परख सकते हैं। पर यिर्मयाह कहता है कि यही मन है जो हमें सबसे ज़्यादा धोखा दे सकता है।
सोमवार की दोपहर में, जब काम की थकान उतरने लगती है, मन तरह-तरह के तर्क गढ़ने लगता है, मैंने ठीक ही किया, मेरी वजह नहीं थी, मैं तो बस थका हूं। ये सब सच जैसे लगते हैं, पर पद कहता है कि मन इतना उलझा हुआ है कि उसे कोई पूरी तरह समझ नहीं सकता, हम खुद भी नहीं।
पर यह पद सिर्फ चेतावनी नहीं है। इसमें एक राहत भी छिपी है, यहोवा मन को छानता है, वह हृदय को परखता है। इसका मतलब है कि हमें खुद अपने बारे में अंतिम फैसला नहीं देना है। हम जज नहीं हैं, वह हैं। सुनने में यह कठोर लगता है, पर असल में यह एक बोझ उतार देता है।
फिर भी सवाल रह जाता है, अगर मेरा अपना मन मुझे धोखा दे सकता है, तो मैं आज किस बात पर भरोसा करूं। शायद इसका जवाब तुरंत नहीं मिलेगा, और शायद इसे यूं ही खुला छोड़ना ही ईमानदारी होगी।
Today
आज दोपहर एक कागज़ पर वह एक बहाना लिखो जो तुमने आज खुद को दिया है, कोई एक वाक्य जिससे तुमने अपने किसी काम या शब्द को सही ठहराया। उसे लिखकर चुपचाप परमेश्वर के सामने रख दो, बिना उसे तुरंत सही या गलत ठहराए।
☾ संध्या का क्षण
यहोवा मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है; मैं किस से डरूँ? यहोवा मेरे जीवन का दृढ़ गढ़ ठहरा है, मैं किसका भय खाऊँ?
भजन संहिता 27:1
दिन ढलते ही अनिश्चितता बढ़ती है, ऐसा हम मान लेते हैं। कल का काम कैसा होगा, कोई फैसला सही निकलेगा या नहीं, रिश्ता संभलेगा या टूट जाएगा, ये सवाल शाम के धुंधलके में और भारी लगने लगते हैं। अंधेरा जैसे डर को बुलावा देता है।
पर यह पद इस मान्यता में एक दरार डालता है। यहोवा मेरी ज्योति है, यह लिखा है, अंधेरा उतरने से पहले नहीं बल्कि उसके बावजूद। जिस परमेश्वर की बात यहां हो रही है, वह दिन की रोशनी में ही नहीं, रात के सन्नाटे में भी उतना ही निकट है।
सोमवार का दिन जैसा भी बीता हो, काम का बोझ हो या थकान का अहसास, यह पद किसी हालात के बदलने का वादा नहीं करता। यह एक व्यक्ति की ओर इशारा करता है। मुझे किस से डरना है, जब मेरा उद्धार, मेरा गढ़ खुद परमेश्वर है।
डर पूरी तरह मिट नहीं जाता बस इसलिए कि हमने यह पद पढ़ लिया। पर आज रात, उस डर को नाम देना और उसे इस ज्योति के सामने रखना, यही असली विश्राम है।
Today
आज रात बत्ती बुझाने से पहले, कमरे में अकेले खड़े हो जा और धीरे से बोल, यहोवा मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है, मैं किस से डरूं। इसे तीन बार दोहरा, फिर चैन से सो जा।
इन अंशों को IRV Hindi 2019 में पढ़ें
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13जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।
25उदास मन दब जाता है, परन्तु भली बात से वह आनन्दित होता है।
9मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?
10“मैं यहोवा मन को खोजता और हृदय को जाँचता हूँ ताकि प्रत्येक जन को उसकी चाल-चलन के अनुसार अर्थात् उसके कामों का फल दूँ।” (1 पत. 1:17, प्रका. 2:23, प्रका. 20:12,13, प्रका. 22:12)
1यहोवा मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है; मैं किस से डरूँ? यहोवा मेरे जीवन का दृढ़ गढ़ ठहरा है, मैं किसका भय खाऊँ?
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