व्यर्थता के बीच सच्ची तृप्ति
सच्ची तृप्ति
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए रोमियों 8:28, यूहन्ना 6:35, सभोपदेशक 2:11 and लूका 24:29.
☀ सुबह का पल
और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।
रोमियों 8:28
आज का दिन तुम्हारी योजना के अनुसार नहीं चलेगा।
यह कोई निराशा की बात नहीं, बस एक सच्चाई है। कोई ई-मेल देर से आएगा, कोई बच्चा जिद करेगा, कोई काम अटक जाएगा। और तुम सोचोगे, आज फिर सब गड़बड़ हो गया। ठीक इसी जगह पौलुस का यह वचन खड़ा होता है, चुपचाप पर दृढ़ता से।
यह नहीं कहता कि हर बात अच्छी है। यह कहता है कि परमेश्वर हर बात को, अच्छी और बुरी दोनों को, अपने हाथ में लेकर भलाई की ओर मोड़ देता है। यह उसका काम है, तुम्हारा नहीं। तुम्हें बस देर से आया ई-मेल संभालना है, वह इतिहास के बड़े धागे संभालता है।
मंगलवार की सुबह अक्सर सबसे भारी होती है, सोमवार की थकान अभी उतरी नहीं और बाकी हफ्ता सामने पड़ा है। पर याद रखो, जिस परमेश्वर ने बुलाया है, वही आज के हर मोड़ में भी काम कर रहा है, चाहे वह मोड़ अभी उलझा हुआ ही क्यों न लगे।
आज
घर से निकलने से पहले एक कागज़ के छोटे टुकड़े पर आज की सबसे बड़ी चिंता लिखो, और उसके नीचे लिखो रोमियों 8:28। उस कागज़ को अपनी जेब या बैग में रख लो और दिन में जब भी हाथ लगे, बस इतना याद कर लो, यह भी भले के लिए बदला जा रहा है।
✦ दोपहर का पल
यीशु ने उनसे कहा, “जीवन की रोटी मैं हूँ: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी प्यासा न होगा।
यूहन्ना 6:35
रोटी का एक टुकड़ा, टिफिन से निकालकर हाथ में लिया गया, कुछ मिनटों में गायब हो जाता है। पेट भरता है, पर शाम तक फिर भूख लौट आती है। यही तो जीवन की हर चीज़ का हाल है, हर भोजन, हर तनख्वाह, हर छुट्टी, कुछ देर के लिए भरती है, फिर खाली हो जाती है।
यीशु ने यह बात दोपहर के भोजन की चिंता में नहीं कही थी, बल्कि उन लोगों से कही जो कल की रोटी का हिसाब लगा रहे थे। उन्होंने कहा कि वे स्वयं वह रोटी हैं जो कभी खत्म नहीं होती। यह भूख मिटाने की बात है, पर उस भूख की जो केवल पेट में नहीं, आत्मा में भी होती है।
दफ्तर की मेज पर बैठे, फाइलों के बीच, यह याद रखना अच्छा है कि आज का काम, आज की सफलता, आज की थकान, ये सब अस्थायी रोटी हैं। असली भरण-पोषण किसी और जगह से आता है।
यह विश्वास एक बार का सौदा नहीं, बल्कि रोज़ का आना है। जैसे भूख रोज़ लगती है, वैसे ही उसके पास आना भी रोज़ की बात है।
आज
आज दोपहर के भोजन से पहले फोन को मेज़ पर उलटा रख दो, और चुपचाप कहो, "प्रभु, आप ही मेरी असली रोटी हैं।" फिर बिना जल्दबाज़ी के, ध्यान से अपना खाना खाओ।
◐ दोपहर का पल
तब मैंने फिर से अपने हाथों के सब कामों को, और अपने सब परिश्रम को देखा, तो क्या देखा कि सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है, और सूर्य के नीचे कोई लाभ नहीं।
सभोपदेशक 2:11
राजा सुलैमान ने महल बनवाए, बाग लगाए, नहरें खुदवाई, सोना-चांदी जोड़ा, हर सुख जो हाथ में समा सके वह जोड़ लिया। और फिर एक दिन वह रुका, अपने ही बनाए काम को देखा, और बोला, यह सब तो हवा है।
यह वही घड़ी है जब दोपहर का काम भारी लगने लगता है। कंप्यूटर की स्क्रीन, फाइलों का ढेर, बच्चों का होमवर्क, दुकान का हिसाब, सब कुछ बार-बार वही, और मन पूछता है, इससे मिलता क्या है।
सुलैमान इसका सीधा जवाब नहीं देता। वह अपने ही निष्कर्ष के साथ बैठा रहता है, बेचैन। यह किताब हमें झूठी तसल्ली नहीं देती कि सब कुछ अभी ठीक हो जाएगा। यह सिर्फ इतना कहती है कि अगर तेरी मेहनत का पूरा अर्थ सूरज के नीचे ही ढूंढा जाए, तो वह हाथ से रेत जैसे फिसल जाएगा।
यह बात चुभती है, पर यहीं से सवाल उठता है, फिर मेहनत का अर्थ कहां है। बाइबल इसका जवाब बाद के अध्यायों में देती है, पर अभी सुलैमान के साथ उस खालीपन में ठहरना भी जरूरी है। हर काम को परिणाम से मापना बंद करना ही पहला कदम है।
आज
आज दोपहर अपने सबसे थकाने वाले काम को बीच में एक पल के लिए रोक दें। एक कागज पर उस काम का नाम लिख दें, और उसके नीचे लिखें, यह काम भी तेरी नज़र में है, प्रभु। फिर उसे अपनी मेज़ पर सामने रख दें और काम पर लौट जाएं।
☾ संध्या का क्षण
परन्तु उन्होंने यह कहकर उसे रोका, “हमारे साथ रह; क्योंकि संध्या हो चली है और दिन अब बहुत ढल गया है।” तब वह उनके साथ रहने के लिये भीतर गया।
लूका 24:29
रास्ते की धूल अभी भी उनके पांवों पर है। सूरज पेड़ों के पीछे झुक चुका है, और उस छोटे से गांव के घर की दहलीज़ पर दो थके हुए हाथ एक अजनबी की बांह पकड़ लेते हैं। वे उसे जाने नहीं देना चाहते। दिन भर की बातें, उलझनें, वह अजीब सी बेचैनी जो सुबह से पीछा कर रही थी, सब उस एक विनती में समा जाती है, "हमारे साथ रहो।"
यही तो शाम का असली स्वभाव है। दिन जो कुछ भी लेकर आया, अच्छा या कठिन, अब उसे थामे रखने की ज़रूरत नहीं। बस इतना कहना काफी है कि प्रभु आज रात मेरे साथ रहें।
एम्माऊस के उन दोनों को पता नहीं था कि जिसे वे रोक रहे हैं, वही उनके हृदय को जलाने वाला है। पर उन्होंने एक छोटा सा काम किया, उन्होंने बुलाया। दरवाज़ा बंद नहीं किया।
आज की शाम भी वैसी ही एक बुलाहट मांगती है। काम की थकान, बातचीत का शोर, सब कुछ पीछे छूट जाए, और भीतर एक सादी सी पुकार उठे, यीशु मेरे साथ रहिए।
यह किसी बड़े शब्दजाल की बात नहीं। बस दरवाज़ा खुला रखना है।
आज
आज रात भोजन से पहले एक दीपक या मोमबत्ती जलाएं और धीरे से ज़ोर से कहें, "प्रभु यीशु, आज की शाम मेरे साथ रहिए।" फिर चुपचाप उस दिन के दो पलों को याद करें जिनके लिए आप आभारी हैं।
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28और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।
35यीशु ने उनसे कहा, “जीवन की रोटी मैं हूँ: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी प्यासा न होगा।
11तब मैंने फिर से अपने हाथों के सब कामों को, और अपने सब परिश्रम को देखा, तो क्या देखा कि सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है, और सूर्य के नीचे कोई लाभ नहीं।
29परन्तु उन्होंने यह कहकर उसे रोका, “हमारे साथ रह; क्योंकि संध्या हो चली है और दिन अब बहुत ढल गया है।” तब वह उनके साथ रहने के लिये भीतर गया।
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