कुलुस्सियों की पत्री: मसीह की सर्वोच्चता और नया मसीही जीवन
परिचय
कल्पना कीजिए कि आपके पास एक चिट्ठी आती है, और लिखने वाला आपसे कभी मिला ही नहीं। वह जेल में है, उसके हाथ में जंजीर है, और फिर भी वह आपके शहर की छोटी-सी कलीसिया के लिए रात-रात भर प्रार्थना करता है। लुकुस नदी की घाटी में बसा कुलुस्से नगर कोई बड़ा व्यापारिक केंद्र नहीं था; वह अपने ऊन और रंगाई के काम के लिए जाना जाता था, और उसके बड़े पड़ोसी लौदीकिया के सामने वह फीका पड़ चुका था। वहाँ के विश्वासी किसी बड़े धर्मशास्त्रीय विवाद के केंद्र में नहीं थे। पर उनके बीच एक फुसफुसाहट घूम रही थी: "मसीह तो ठीक हैं, पर उनके साथ थोड़ा और कुछ चाहिए।"
उसी फुसफुसाहट का उत्तर है कुलुस्सियों की पत्री। इस पृष्ठ पर आप इस पत्री का लेखक, समय, पृष्ठभूमि, संरचना, मुख्य विषय और प्रमुख पद तो जानेंगे ही, पर उससे बढ़कर आप यह देखेंगे कि यह चार अध्यायों की छोटी-सी चिट्ठी आज भी हमारे भीतर के उस सवाल को कैसे चुप कराती है, जो बार-बार उठता है: क्या मसीह सचमुच काफ़ी हैं?
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
हम कुलुस्सियों की पत्री को "जोड़ के विरुद्ध लिखी गई पत्री" के रूप में पढ़ेंगे। कुलुस्से की समस्या मसीह का इनकार नहीं थी, बल्कि मसीह में कुछ जोड़ने की ललक थी: थोड़ा तत्व-ज्ञान, थोड़े नियम, थोड़े स्वर्गदूत, थोड़ा कठोर संयम। पौलुस इस जोड़ को काटते हैं और एक ही सच्चाई दोहराते हैं कि मसीह में परमेश्वर की सारी परिपूर्णता वास करती है, इसलिए विश्वासी में जोड़ने को कुछ नहीं बचा। यह दृष्टिकोण मायने रखता है, क्योंकि आज भी हमारी थकान का बड़ा कारण यही है कि हम अनुग्रह पर अपनी शर्तें चिपकाते रहते हैं और फिर उन्हें ढोते-ढोते टूट जाते हैं।
पत्री के पीछे की कहानी: लेखक, समय और कुलुस्से नगर
पत्री अपने पहले ही वाक्य में अपना परिचय देती है: "पौलुस की ओर से, जो परमेश्वर की इच्छा से मसीह यीशु का प्रेरित है, और भाई तीमुथियुस की ओर से।" अंत में पौलुस अपने हाथ से नमस्कार लिखते हैं और कहते हैं, "मेरी जंजीरों की सुधि रखना।" कलीसिया ने आरंभ से ही इसे पौलुस की पत्री माना है। आधुनिक समय में कुछ विद्वानों ने इसकी शब्दावली और लंबे वाक्यों के कारण प्रश्न उठाए हैं, पर जब हम याद रखते हैं कि पौलुस यहाँ एक विशेष भ्रांत शिक्षा का सामना कर रहे हैं और संभवतः उसी के शब्द उठाकर उन्हें मसीह से भर रहे हैं, तो यह शैली अजीब नहीं लगती। फिलेमोन की पत्री के साथ इसका गहरा जुड़ाव भी इसकी प्रामाणिकता को मज़बूत करता है: दोनों में इपफ्रास, अरिस्तर्खुस, मरकुस, लूका, देमास और उनेसिमुस के नाम आते हैं। ये दोनों चिट्ठियाँ एक ही डाक से, एक ही व्यक्ति के हाथों गई थीं।
पौलुस कैद में थे। परंपरागत रूप से इसे रोम की पहली कैद से जोड़ा जाता है, लगभग सन् 60 से 62 के बीच, जब वे अपने किराए के घर में दो वर्ष तक रहे और आने-जाने वालों का स्वागत करते रहे। कुछ विद्वान इफिसुस की किसी पहले की कैद का सुझाव देते हैं, क्योंकि कुलुस्से इफिसुस से बहुत निकट था और उनेसिमुस का भाग निकलना वहाँ अधिक स्वाभाविक लगता है; कुछ कैसरिया की ओर संकेत करते हैं। इतिहास बताता है कि लगभग सन् 60-61 में इस घाटी में भारी भूकंप आया था, जिसने लौदीकिया को तहस-नहस कर दिया; इसलिए कई लोग मानते हैं कि पत्री उससे कुछ पहले लिखी गई। तारीख चाहे जो हो, परिस्थिति साफ़ है: एक बंदी प्रेरित, एक छोटी कलीसिया, और एक बड़ा ख़तरा।
सबसे मार्मिक बात यह है कि पौलुस कभी कुलुस्से गए ही नहीं थे। वे स्वयं लिखते हैं कि वे उनके लिए और लौदीकिया वालों के लिए, और उन सब के लिए जिन्होंने उनका मुँह कभी नहीं देखा, कैसा परिश्रम करते हैं। यह कलीसिया उनके तीसरे मिशनरी दौरे के फल के रूप में जन्मी थी, जब वे इफिसुस में दो साल सिखाते रहे और आसिया प्रांत के सब निवासियों ने वचन सुना। वहीं से इपफ्रास नामक एक स्थानीय व्यक्ति सुसमाचार लेकर अपनी घाटी लौटा। पौलुस उसे "हमारा प्रिय सहकर्मी" और "मसीह का विश्वासयोग्य सेवक" कहते हैं। यही इपफ्रास अब पौलुस के पास आया था, कुछ अच्छी ख़बरें लेकर और कुछ चिंताजनक।
अच्छी ख़बर यह थी कि कुलुस्से के लोगों में विश्वास और प्रेम जीवित था। चिंता यह थी कि कोई उन्हें "अहेर" करने की ताक में था। पौलुस का शब्द-चित्र भयानक है: जैसे कोई शिकारी किसी को बहकाकर गुलाम बनाकर ले जाए। यह ख़तरा खुली नास्तिकता नहीं था, बल्कि एक आकर्षक मिश्रण था: यहूदी पर्वों और भोजन-नियमों का पालन, स्वर्गदूतों की आराधना, दर्शनों की डींग, शरीर को कष्ट देने वाला कठोर संयम, और एक गुप्त "ऊँचे ज्ञान" का वादा। यह सब मसीह के विरुद्ध नहीं, मसीह के ऊपर जोड़कर परोसा जा रहा था। और यही इसे ख़तरनाक बनाता था।
बाइबल कुलुस्सियों की पत्री के बारे में क्या कहती है?
पत्री का हृदय उसका पहला अध्याय है, जहाँ पौलुस एक ऐसी स्तुति गाते हैं जिसे कलीसिया आज तक गाती आई है। कुलुस्सियों 1:15-17 कहता है: "वह तो अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप और सारी सृष्टि में पहिलौठा है। क्योंकि उसी में सारी वस्तुओं की सृष्टि हुई, स्वर्ग की हो अथवा पृथ्वी की, देखी या अनदेखी, क्या सिंहासन, क्या प्रभुताएँ, क्या प्रधानताएँ, क्या अधिकार, सारी वस्तुएँ उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं। और वही सब वस्तुओं में प्रथम है, और सब वस्तुएँ उसी में स्थिर रहती हैं।"
ध्यान दीजिए कि यह उत्तर कितना सीधा है। कुलुस्से में लोग स्वर्गदूतों और अदृश्य शक्तियों से डरते थे, उन्हें मनाने के तरीके खोजते थे। पौलुस कहते हैं कि वे सिंहासन, प्रभुताएँ, प्रधानताएँ और अधिकार स्वयं मसीह के द्वारा और मसीह के लिए ही बनाए गए हैं। जिस व्यक्ति के लिए सारी सृष्टि बनी, उसके साथ किसी और को जोड़ने का कोई अर्थ नहीं। "पहिलौठा" शब्द यहाँ समय का नहीं, पद का सूचक है; बाइबल में पहिलौठे का अर्थ है उत्तराधिकारी, सर्वोच्च स्थान पाने वाला। और "सब वस्तुएँ उसी में स्थिर रहती हैं" का अर्थ है कि यह ब्रह्मांड किसी अंधे नियम से नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की सामर्थ्य से टिका है जिसके हाथों में कीलों के निशान हैं।
इसी तर्क को पौलुस दूसरे अध्याय में निर्णायक रूप देते हैं: "क्योंकि उसमें ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है। और तुम उसी में भरपूर हो गए हो।" यह पत्री का केंद्रीय समीकरण है। परिपूर्णता मसीह में है; विश्वासी मसीह में है; इसलिए विश्वासी की झोली में कोई कमी नहीं जिसे किसी अनुष्ठान से भरना पड़े।
मसीह में जो भरपूर है, उसे पूरक की ज़रूरत नहीं।
इसीलिए कुलुस्सियों 2:8 की चेतावनी इतनी तीखी है: "चौकस रहो कि कोई तुम्हें उस तत्व-ज्ञान और व्यर्थ धोखे के द्वारा अहेर न कर ले, जो मनुष्यों की परम्पराओं और संसार की आदि शिक्षा के अनुसार हैं, पर मसीह के अनुसार नहीं।" पौलुस यहाँ सोचने-समझने के विरुद्ध नहीं बोल रहे; वे स्वयं तर्क करते हैं, समझाते हैं, सिखाते हैं। वे उस व्यवस्था के विरुद्ध बोल रहे हैं जो सुनने में गहरी लगती है पर जिसका माप मसीह नहीं है। कसौटी यही है: क्या यह शिक्षा मुझे मसीह के पास ले जाती है, या मसीह के अलावा किसी और चीज़ पर निर्भर बनाती है?
जोड़ने की इस प्रवृत्ति का ठोस रूप पौलुस आगे खोलते हैं: खाने-पीने, पर्वों, नए चाँद और सब्त के विषय में दूसरों का फ़ैसला सुनना, स्वर्गदूतों की पूजा, दर्शनों की डींग, और "मत छूना, मत चखना, हाथ मत लगाना" जैसे नियम जो दिखने में तो भक्ति जैसे लगते हैं पर शरीर की लालसा रोकने में बिलकुल बेकार हैं। इन सब पर पौलुस का फ़ैसला एक पंक्ति में आता है: ये सब आने वाली बातों की छाया हैं, पर मूल वस्तु मसीह की है। जब सूरज निकल आया हो, तो कोई परछाईं से लिपटकर क्यों बैठे?
और फिर वह पद आता है जो पूरी पत्री का रहस्य खोल देता है। कुलुस्सियों 1:27 कहता है: "जिन पर परमेश्वर ने प्रगट करना चाहा कि उन्हें ज्ञात हो कि अन्यजातियों में उस भेद की महिमा का मूल्य क्या है, और वह यह है कि मसीह जो महिमा की आशा है तुम में रहता है।" झूठे शिक्षक गुप्त ज्ञान का वादा कर रहे थे। पौलुस कहते हैं कि परमेश्वर का असली भेद अब छिपा नहीं, खोल दिया गया है, और वह किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं बल्कि उन अन्यजातियों के लिए भी है जिन्हें कभी बाहर समझा जाता था। वह भेद कोई सिद्धांत नहीं, एक व्यक्ति है, जो आप में निवास करते हैं।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
कुलुस्सियों की पत्री आकाश से नहीं टपकी; वह पूरे पवित्रशास्त्र की धारा का मुहाना है। उत्पत्ति के पहले पन्ने पर परमेश्वर अपने स्वरूप में मनुष्य को बनाते हैं, और वह स्वरूप पाप के कारण धुँधला पड़ जाता है। पौलुस कहते हैं कि मसीह "अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप" हैं, और तीसरे अध्याय में वे जोड़ते हैं कि विश्वासी ने नया मनुष्यत्व पहन लिया है जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए नया बनता जाता है। जो आदम में बिगड़ा, वह मसीह में फिर से गढ़ा जा रहा है।
नीतिवचन के आठवें अध्याय में बुद्धि एक व्यक्ति की तरह बोलती है और कहती है कि वह सृष्टि के आरंभ में परमेश्वर के साथ थी। इस्राएल बुद्धि को खोजता रहा, व्यवस्था में, मंदिर में, शास्त्रियों की परंपरा में। कुलुस्सियों की पत्री उस खोज का उत्तर देती है: मसीह में ज्ञान और बुद्धि के सारे भंडार छिपे हुए हैं। जो कुलुस्से के शिक्षक गुप्त रीति से बेच रहे थे, वह मसीह में मुफ़्त और खुला हुआ है।
निर्गमन की कहानी भी यहाँ गूँजती है। जैसे परमेश्वर ने इस्राएल को मिस्र के अंधकार से निकालकर अपने राज्य में लाया, वैसे ही पौलुस लिखते हैं कि "उसी ने हमें अन्धकार के वश से छुड़ाकर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में प्रवेश कराया; जिसमें हमें छुटकारा अर्थात् पापों की क्षमा प्राप्त होती है।" एक छुटकारा लाल समुद्र पर हुआ था, दूसरा क्रूस पर। मिलापवाले तंबू और मंदिर में परमेश्वर की महिमा बसती थी; कुलुस्सियों कहती है कि अब वह परिपूर्णता किसी इमारत में नहीं, एक देह में वास करती है।
खतना, सब्त, पर्व और भोजन के नियम इस्राएल की पहचान थे। पौलुस उन्हें कूड़ा नहीं कहते, छाया कहते हैं। छाया झूठी नहीं होती; वह किसी असली वस्तु की ओर इशारा करती है। इसलिए वे लिखते हैं कि विश्वासियों का ऐसा खतना हुआ है जो हाथ से नहीं होता, क्योंकि बपतिस्मे में वे मसीह के साथ गाड़े गए और उसी के साथ जिलाए भी गए। यिर्मयाह और व्यवस्थाविवरण जिस "हृदय के खतने" की पुकार लगाते थे, वह मसीह में पूरा हुआ।
और दानिय्येल की पुस्तक में जो "भेद" परमेश्वर खोलते हैं, जो राज्य कभी नष्ट नहीं होगा, उसका केंद्र भी यहीं दिखता है। कुलुस्सियों 1:27 का भेद कोई नई धार्मिक खोज नहीं, वह पुराने नियम की सारी प्रतीक्षा का फल है: महिमा अब मंदिर के परदे के पीछे नहीं, बल्कि साधारण लोगों के भीतर निवास करती है। इसीलिए पौलुस अपनी सेवकाई का लक्ष्य यह बताते हैं कि "हम हर एक व्यक्ति को मसीह में सिद्ध करके उपस्थित करें।" पुराना नियम पूछता रहा कि परमेश्वर के साथ कौन खड़ा हो सकता है; कुलुस्सियों की पत्री उत्तर देती है कि जो मसीह में है, वह निर्दोष और निष्कलंक खड़ा किया जाएगा।
रचना और मुख्य विषय
पत्री की बनावट बहुत सुंदर है और उसे समझ लेने पर पूरी चिट्ठी खुल जाती है। चार अध्याय दो बराबर हिस्सों में बँटे हैं: पहले दो अध्याय सिद्धांत हैं, आख़िरी दो व्यवहार। और दोनों के बीच का पुल कुलुस्सियों 2:6-7 है: "इसलिये जैसे तुम ने मसीह यीशु को प्रभु करके ग्रहण कर लिया है, वैसे ही उसी में चलते रहो। और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ; और जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्वास में दृढ़ होते जाओ, और अत्यन्त धन्यवाद करते रहो।" जैसे ग्रहण किया, वैसे ही चलो। जिस अनुग्रह से शुरुआत हुई, उसी अनुग्रह से आगे का रास्ता भी तय होगा।
पहला अध्याय धन्यवाद और प्रार्थना से खुलता है। पौलुस कुलुस्से वालों के विश्वास, प्रेम और आशा के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं, फिर प्रार्थना करते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा की पहचान में भर जाएँ और हर भले काम में फल लाएँ। इसके तुरंत बाद वह महान मसीह-स्तुति आती है, पद पंद्रह से बीस तक, जहाँ मसीह को सृष्टि का रचयिता और कलीसिया का सिर, दोनों रूपों में प्रस्तुत किया जाता है। "वही देह, अर्थात् कलीसिया का सिर है," और क्रूस पर बहे हुए लहू के द्वारा परमेश्वर ने सब वस्तुओं का अपने साथ मेल किया। अध्याय का अंत पौलुस की अपनी सेवकाई और दुखों के वर्णन में होता है।
दूसरा अध्याय लड़ाई का मैदान है। यहीं पौलुस उन सब "जोड़ों" का नाम लेकर खंडन करते हैं जो कुलुस्से की कलीसिया पर दबाव डाल रहे थे। वे याद दिलाते हैं कि विधियों का वह लेख जो हमारे विरुद्ध था, परमेश्वर ने मिटा डाला और उसे क्रूस पर कीलों से जड़कर सामने से हटा दिया। और उन्होंने प्रधानताओं और अधिकारों का खुल्लमखुल्ला तमाशा बनाकर क्रूस के कारण जय-जयकार की। यह विजय-जुलूस का चित्र है: जिन शक्तियों से कुलुस्से वाले डरते थे, वे मसीह के रथ के पीछे बँधी हुई चलती हैं।
तीसरा अध्याय उसी सच्चाई को ज़मीन पर उतारता है। चूँकि विश्वासी मसीह के साथ मरा और जिलाया गया, इसलिए अब वह पुराने स्वभाव के कपड़े उतारता है और नए स्वभाव के कपड़े पहनता है। क्रोध, कड़वाहट, गाली, झूठ, लोभ, व्यभिचार उतर जाते हैं; करुणा, भलाई, दीनता, नम्रता, सहनशीलता, क्षमा और प्रेम पहन लिए जाते हैं। इसी अध्याय में वह घोषणा आती है जो हर दीवार गिरा देती है: "केवल मसीह सब कुछ और सब में है।" फिर पौलुस घर की ओर मुड़ते हैं, पति-पत्नी, माता-पिता और संतान, स्वामी और दास, क्योंकि नया जीवन सबसे पहले रसोई और आँगन में परखा जाता है।
चौथा अध्याय प्रार्थना, बाहर वालों के साथ बुद्धिमानी भरे व्यवहार, और नामों की एक लंबी सूची के साथ बंद होता है। तुखिकुस और उनेसिमुस चिट्ठी लेकर जा रहे हैं, इपफ्रास उनके लिए प्रार्थना में जूझ रहा है, लूका और मरकुस नमस्कार भेजते हैं, और लौदीकिया की कलीसिया के साथ चिट्ठियाँ बदलने का निर्देश दिया जाता है। धर्मविज्ञान का यह शिखर अंत में असली नामों, असली घरों और असली प्रार्थना-सूचियों पर उतर आता है।
इस पुस्तक के मुख्य पद
कुलुस्सियों 1:27 पत्री का दिल है। पौलुस वहाँ कहते हैं कि भेद यह है, "कि मसीह जो महिमा की आशा है तुम में रहता है।" इस एक वाक्य में दो चमत्कार हैं। पहला, मसीह "तुम में" हैं; वे दूर स्वर्ग में बैठे दर्शक नहीं, आपके भीतर निवास करने वाले प्रभु हैं। दूसरा, वे "महिमा की आशा" हैं; आपका भविष्य आपके संघर्षों की गति पर नहीं, आपके भीतर रहने वाले व्यक्ति पर टिका है। कुलुस्से के शिक्षक कह रहे थे कि महिमा तक पहुँचने के लिए विशेष अनुभव और विशेष नियम चाहिए। पौलुस कहते हैं कि महिमा पहले से भीतर बीज की तरह पड़ी है। जोड़ने वाली हर शिक्षा इसी पद पर टूट जाती है।
कुलुस्सियों 3:1-3 पत्री की धुरी है: "सो जब तुम मसीह के साथ जिलाए गए, तो स्वर्गीय वस्तुओं की खोज में रहो, जहाँ मसीह वर्तमान है और परमेश्वर के दाहिनी ओर बैठा है। पृथ्वी पर की नहीं परन्तु स्वर्गीय वस्तुओं पर ध्यान लगाओ। क्योंकि तुम तो मर गए, और तुम्हारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है।" यहाँ आदेश "बनो" नहीं, "जो हो वही जियो" है। मसीही नैतिकता किसी पहचान को कमाने की कोशिश नहीं, मिली हुई पहचान को ओढ़ने का काम है। और "छिपा हुआ" शब्द उन लोगों के लिए बड़ी शांति लाता है जिनका जीवन बाहर से बहुत साधारण या बहुत उजड़ा हुआ दिखता है। आपकी असली ज़िंदगी अभी दुनिया की नज़रों के सामने नहीं है; वह सुरक्षित जगह पर रखी है।
कुलुस्सियों 3:12-14 उस नए जीवन का कपड़ा दिखाता है: "इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो। और यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो। और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्ध है बाँध लो।" ध्यान दीजिए कि क्षमा का माप हमारी भावना नहीं, मसीह का व्यवहार है। और प्रेम को "कटिबन्ध" कहा गया है, वह पट्टा जो बाक़ी कपड़ों को जगह पर रोके रखता है। करुणा और नम्रता बिना प्रेम के बिखर जाती हैं।
और अंत में कुलुस्सियों 4:2, जो देखने में छोटा है पर पूरी पत्री को व्यवहार में बाँध देता है: "प्रार्थना में लगे रहो, और धन्यवाद के साथ उस में जागृत रहो।" जिस आदमी के पैरों में जंजीर है, वह लिखता है कि जागते रहो और धन्यवाद करो। जो मसीह की परिपूर्णता पर सचमुच विश्वास करता है, वह माँगना बंद नहीं करता, पर शिकायत करना छोड़ देता है।
दर्पण
अब चिट्ठी आपके हाथ में है। ईमानदारी से पूछिए: आपने मसीह में क्या जोड़ रखा है? शायद आपका जोड़ धार्मिक है, एक चुपचाप पलने वाली सोच कि अगर आपने नियमित उपवास नहीं रखा, या सुबह की प्रार्थना छूट गई, तो परमेश्वर का मुँह आपसे फिर गया। शायद आपका जोड़ दुनियावी है, यह भरोसा कि जब बैंक में इतना पैसा हो जाएगा, जब बच्चा उस नौकरी तक पहुँच जाएगा, जब रिश्ता सुधर जाएगा, तब जाकर आप चैन से साँस लेंगे। दोनों ही हालतों में आप यही कह रहे हैं कि मसीह काफ़ी नहीं हैं।
कुलुस्सियों की पत्री आपकी थकान की जड़ पर हाथ रखती है। आप इसलिए थके नहीं हैं कि आप बहुत काम करते हैं; आप इसलिए थके हैं कि आप ऐसी चीज़ कमाने की कोशिश कर रहे हैं जो आपको पहले ही मुफ़्त में दी जा चुकी है। "तुम उसी में भरपूर हो गए हो" का अर्थ है कि परमेश्वर के सामने आपकी स्वीकृति आज, इस हफ़्ते की विफलताओं के बाद भी, पूरी है।
और यही पत्री आपको एक दूसरी जगह भी चुभती है। यदि आपका जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा है, तो दफ़्तर में जो आपका नाम नहीं लेता, उससे आपकी कीमत तय नहीं होती। तो उस रिश्तेदार को माफ़ करने का सवाल टाला नहीं जा सकता, क्योंकि माप यह नहीं कि उसने क्या किया, बल्कि यह कि प्रभु ने आपके साथ क्या किया। तो आपके शरीर की ढलती ताक़त, आपका अकेलापन, आपके बचे हुए साल, ये सब उस व्यक्ति के हाथ में हैं जिसमें सब वस्तुएँ स्थिर रहती हैं।
इसलिए आज सबसे बड़ा काम कुछ और जोड़ना नहीं, कुछ घटाना है। उस डर को उतारिए जिसे आप भक्ति समझते रहे। उस सूची को नीचे रखिए जिससे आप अपने आप को तौलते हैं। और कुलुस्सियों 2:6-7 के अनुसार जड़ पकड़िए, क्योंकि पेड़ अपनी जड़ों से बढ़ता है, अपनी कोशिश से नहीं।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को कुलुस्सियों की पत्री समझाने का सबसे आसान रास्ता तुलना से होकर जाता है। उनसे पूछिए कि अगर घर में सूरज की रोशनी आ रही हो, तो क्या हमें मोमबत्ती जलाने की ज़रूरत है? कुलुस्से के लोगों से कुछ लोग कह रहे थे कि यीशु तो ठीक हैं, पर साथ में कुछ और मोमबत्तियाँ भी जला लो, कुछ ख़ास नियम, कुछ ख़ास तरीक़े, कुछ ख़ास बातें। पौलुस चाचा ने जेल से चिट्ठी लिखी और कहा कि यीशु सूरज हैं, और सूरज के रहते मोमबत्तियों की ज़रूरत नहीं।
छोटे बच्चों के लिए सृष्टि वाला हिस्सा सबसे रोमांचक होता है: तारे, समुद्र, हाथी, तितली, सब कुछ यीशु ने बनाया और सब कुछ आज भी वही सँभाले हुए हैं। बड़े बच्चों के साथ कपड़ों वाली तस्वीर काम करती है, कि हम हर सुबह कपड़े पहनते हैं, वैसे ही परमेश्वर कहते हैं कि दया, नम्रता और क्षमा को पहन लो, और सबसे ऊपर प्रेम की पेटी बाँध लो। किशोरों से आप उस सवाल पर बात कर सकते हैं जो उन्हें सचमुच घेरता है: क्या मैं काफ़ी हूँ? कुलुस्सियों का उत्तर यह है कि तुम्हारी कीमत तुम्हारे प्रदर्शन से नहीं, मसीह में तुम्हारी पहचान से तय होती है।
अलग-अलग उम्र के लिए अलग भाषा चाहिए, और हमारे पास इसी पत्री पर तीन स्तरों की विशेष व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के नन्हे बच्चों के लिए, सात से बारह साल के बच्चों के लिए, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए। परिवार की आराधना में इन्हें उठाकर इस्तेमाल कीजिए, और बच्चों को सवाल पूछने दीजिए; कुलुस्सियों की पत्री सवालों से नहीं डरती।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कुलुस्सियों की पत्री किसने लिखी?
पत्री स्वयं कहती है कि वह पौलुस प्रेरित की ओर से है, और तीमुथियुस का नाम भी साथ जुड़ा है। अंत में पौलुस अपने हाथ से नमस्कार लिखते हैं और अपनी जंजीरों का उल्लेख करते हैं। आरंभिक कलीसिया ने सर्वसम्मति से इसे पौलुस की पत्री माना। कुछ आधुनिक विद्वान शैली के आधार पर प्रश्न उठाते हैं, पर फिलेमोन की पत्री के साथ इसके नामों और परिस्थितियों का गहरा मेल, तथा विषय-वस्तु की ज़रूरत के अनुसार बदली हुई भाषा, पारंपरिक मान्यता को मज़बूत करती है।
कुलुस्सियों की पत्री कब लिखी गई थी?
अधिकतर विद्वान इसे पौलुस की रोम वाली कैद से जोड़ते हैं, लगभग सन् 60 से 62 के बीच, जब वे दो वर्ष तक नज़रबंद रहे। कुछ इफिसुस में हुई किसी पहले की कैद का सुझाव देते हैं, जिससे यह तिथि पचास के दशक के मध्य तक खिसक जाती है, और कुछ कैसरिया की ओर संकेत करते हैं। लुकुस घाटी में लगभग सन् 60-61 में आए भूकंप के कारण कई लोग मानते हैं कि पत्री उससे पहले लिखी गई, क्योंकि उसका कोई ज़िक्र नहीं मिलता।
कुलुस्से नगर कहाँ था और वहाँ कलीसिया कैसे शुरू हुई?
कुलुस्से आज के तुर्की में, इफिसुस से लगभग एक सौ साठ किलोमीटर पूर्व में, लुकुस नदी की घाटी में बसा एक ढलता हुआ नगर था; लौदीकिया और हिरापोलिस उसके पड़ोसी थे। पौलुस स्वयं वहाँ कभी नहीं गए। कलीसिया इपफ्रास के द्वारा शुरू हुई, जो संभवतः इफिसुस में पौलुस की दो साल की शिक्षा के दौरान विश्वास में आया और सुसमाचार लेकर अपनी घाटी लौटा। पौलुस उसे विश्वासयोग्य सेवक कहते हैं और बताते हैं कि वह कुलुस्से वालों के लिए प्रार्थना में जूझता रहता है।
कुलुस्सियों की पत्री का मुख्य विषय क्या है?
इसका केंद्रीय विषय मसीह की सर्वोच्चता और पर्याप्तता है। मसीह सृष्टि के रचयिता और धारक हैं, कलीसिया के सिर हैं, और उनमें ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है। इसी से दूसरा विषय निकलता है: चूँकि विश्वासी मसीह में भरपूर हो चुके हैं, उन्हें किसी अतिरिक्त अनुष्ठान, गुप्त ज्ञान या कठोर नियम की आवश्यकता नहीं। और इसी से तीसरा विषय, नया मसीही जीवन, जन्म लेता है, जहाँ पुराना स्वभाव उतारा जाता है और करुणा, क्षमा तथा प्रेम पहना जाता है।
कुलुस्से की भ्रांत शिक्षा क्या थी?
पत्री से जो संकेत मिलते हैं, वे एक मिश्रण की ओर इशारा करते हैं: यहूदी पर्वों, नए चाँद, सब्त और भोजन-नियमों का पालन, स्वर्गदूतों की आराधना, दर्शनों की डींग, शरीर को कष्ट देने वाला कठोर संयम, और किसी ऊँचे गुप्त ज्ञान का दावा। यह शिक्षा मसीह को नकारती नहीं थी, बल्कि उन्हें अधूरा बताकर अपनी बातें ऊपर से जोड़ती थी। इसीलिए पौलुस का उत्तर कोई नया नियम नहीं, बल्कि मसीह की परिपूर्णता की घोषणा है।
कुलुस्सियों 1:15 में मसीह को "सारी सृष्टि में पहिलौठा" क्यों कहा गया है, क्या इसका अर्थ है कि वे सृजे गए थे?
नहीं। बाइबल में "पहिलौठा" मुख्यतः पद और अधिकार का शब्द है, जन्म के क्रम का नहीं; भजन संहिता में दाऊद को पहिलौठा कहा गया है जबकि वह अपने भाइयों में सबसे छोटा था। अगला ही पद इसे साफ़ कर देता है, क्योंकि वहाँ लिखा है कि "उसी में सारी वस्तुओं की सृष्टि हुई।" जो सब वस्तुओं का सृजनहार है, वह स्वयं सृष्ट वस्तु नहीं हो सकता। कुलुस्सियों 2:9 इसे और पक्का करता है, जहाँ ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता उनमें वास करती है।
कुलुस्सियों और इफिसियों की पत्री में क्या अंतर है?
दोनों पत्रियाँ एक ही समय, एक ही कैद से लिखी गईं और उनकी बहुत-सी बातें मिलती-जुलती हैं, जैसे नया मनुष्य पहनने की शिक्षा और घर-परिवार के निर्देश। अंतर ज़ोर का है। इफिसियों का केंद्र कलीसिया है, वह देह जिसका सिर मसीह है, और परमेश्वर की सनातन योजना। कुलुस्सियों का केंद्र स्वयं मसीह हैं, और वह एक ठोस ख़तरे के विरुद्ध लिखी गई है। इफिसियों शांत और चिंतनशील है; कुलुस्सियों सीधी और लड़ाकू।
कुलुस्सियों 2:8 में "तत्व-ज्ञान" से क्या अभिप्राय है, क्या बाइबल दर्शनशास्त्र के विरुद्ध है?
पौलुस सोचने-विचारने के विरुद्ध नहीं हैं; वे स्वयं तर्क करते हैं और सिखाते हैं। इस पद में वे एक विशेष शिक्षा-पद्धति की बात कर रहे हैं, जो "मनुष्यों की परम्पराओं और संसार की आदि शिक्षा के अनुसार" थी और जिसका माप मसीह नहीं था। कसौटी यही है कि कोई विचार-धारा मसीह के आधीन है या मसीह को किनारे करके स्वयं को आधार बनाती है। जो ज्ञान मसीह के पास ले जाए, वह वरदान है; जो उनसे दूर ले जाए, वह चाहे जितना गहरा लगे, धोखा है।
कुलुस्सियों 1:24 का क्या अर्थ है कि पौलुस मसीह के क्लेशों की घटी पूरी करते हैं?
इसका अर्थ यह नहीं कि क्रूस पर किया गया प्रायश्चित अधूरा था; पूरी पत्री क्रूस की पूर्णता की घोषणा है, जहाँ विधियों का लेख मिटा दिया गया और शक्तियों पर जय पाई गई। पौलुस अपनी सेवकाई के कष्टों की बात कर रहे हैं, उन दुखों की जो मसीह की देह, यानी कलीसिया, की सेवा में उठाए जाते हैं। मसीह अब स्वर्ग में हैं, पर उनका सुसमाचार पहुँचाने की कीमत उनके सेवक अपने शरीर में चुकाते हैं, और पौलुस उसमें आनंद करते हैं।
क्या कुलुस्सियों 2:16 के अनुसार मसीहियों को सब्त मानना चाहिए?
पौलुस साफ़ कहते हैं कि खाने-पीने, पर्व, नए चाँद या सब्त के विषय में कोई और आपका फ़ैसला न करे, क्योंकि ये सब आने वाली बातों की छाया हैं और मूल वस्तु मसीह की है। यानी विश्राम और आराधना का दिन मसीही के लिए मुक्ति की शर्त नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि विश्राम बेकार है; परमेश्वर की भलाई विश्राम में दिखती है और कलीसिया का साथ मिलकर आराधना करना आवश्यक है। पर इसे औरों पर न्याय का हथियार बनाना इसी पद का उल्लंघन है।
कुलुस्सियों 3:22 में दासों को आज्ञा मानने का आदेश क्यों दिया गया है?
पौलुस उस समय के समाज के भीतर खड़े होकर लिख रहे हैं, पर जो बीज वे बोते हैं वह अंततः दासता की जड़ काट देता है। वे दास को नैतिक रूप से उत्तरदायी व्यक्ति मानकर सीधे संबोधित करते हैं, जो उस युग में असाधारण था, और स्वामियों को याद दिलाते हैं कि स्वर्ग में उनका भी एक स्वामी है। इसी डाक से गई फिलेमोन की पत्री में वे उनेसिमुस को "प्रिय भाई" कहकर लौटाते हैं, और यही रिश्ता व्यवस्था को भीतर से बदल देता है।
कुलुस्सियों की पत्री आज हमारे लिए क्यों ज़रूरी है?
क्योंकि जोड़ने की ललक कभी नहीं मरी। आज वह सफलता के सुसमाचार, धार्मिक प्रदर्शन, भाग्य और अंकशास्त्र, या "मसीह के साथ थोड़ा और आध्यात्मिक अनुभव" के रूप में लौट आती है। कुलुस्सियों हर पीढ़ी से यही कहती है कि मसीह में ज्ञान और बुद्धि के सारे भंडार छिपे हैं और विश्वासी उन्हीं में भरपूर हो चुका है। साथ ही यह पत्री आस्था को हवा में नहीं छोड़ती; वह उसे घर, काम और बातचीत में उतारती है, जहाँ दया, क्षमा और धन्यवाद हमारी असली परीक्षा बनते हैं।
इस पत्री को पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका
सबसे पहले पूरी पत्री एक ही बैठक में पढ़िए। इसमें पंद्रह से बीस मिनट से अधिक नहीं लगेगा, और यही वह तरीका है जिससे कुलुस्से की कलीसिया ने इसे पहली बार सुना था, एक साथ, खड़े होकर, किसी के घर में। पढ़ते समय पेंसिल लेकर हर बार निशान लगाइए जहाँ "मसीह में", "उसी में" या "उसके साथ" जैसे शब्द आते हैं। आप चकित होंगे कि चार अध्यायों में यह सूत्र कितनी बार लौटता है। यही पत्री की रीढ़ है।
दूसरे सप्ताह में पहले अध्याय पर ठहरिए। पंद्रह से बीस पद को धीरे-धीरे, एक-एक वाक्यांश करके पढ़िए और प्रार्थना में उसे प्रभु को लौटाइए। पूछिए कि मेरे जीवन का कौन-सा हिस्सा है जिसे मैं अब भी मानता हूँ कि मसीह उसमें "प्रथम" नहीं हैं। फिर पहले अध्याय के नौ से बारह पद को लेकर अपने परिवार और कलीसिया के लिए वही प्रार्थना कीजिए जो पौलुस ने की थी। दूसरों के लिए पवित्रशास्त्र की प्रार्थनाएँ दोहराना प्रार्थना-जीवन को बदल देता है।
तीसरे सप्ताह में दूसरा अध्याय लीजिए और एक ईमानदार सूची बनाइए, काग़ज़ पर नहीं तो मन में, कि किन बातों को आप चुपचाप मसीह में जोड़ते आए हैं। फिर कुलुस्सियों 2:13-15 पढ़िए और उस लेख की तस्वीर देखिए जो क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया। यह अध्याय धीरे पढ़ने के लिए है, तेज़ नहीं।
चौथे सप्ताह में तीसरा और चौथा अध्याय लीजिए और इन्हें आईने की तरह इस्तेमाल कीजिए। कुलुस्सियों 3:12-14 को कंठस्थ कर लीजिए और हर सुबह उसे यूँ दोहराइए मानो कपड़े पहन रहे हों। फिर चौथे अध्याय के दो से छह पद के अनुसार एक छोटा-सा अभ्यास कीजिए: हर दिन एक व्यक्ति के लिए प्रार्थना कीजिए जो अभी मसीह को नहीं जानता, और उसी दिन उससे एक "सलोना" वाक्य कहिए।
यदि आप समूह में पढ़ रहे हैं, तो साथ में फिलेमोन की पत्री भी पढ़िए; वह ग्यारह पदों में दिखाती है कि कुलुस्सियों का धर्मविज्ञान एक असली रिश्ते में कैसा दिखता है। और यदि समय हो, तो इफिसियों के साथ तुलना कीजिए। एक ही कैदी, एक ही कलम, दो पूरक चिट्ठियाँ।
अंत में
कुलुस्सियों की पत्री का सबसे बड़ा उपहार यह नहीं है कि वह हमें कुछ नया देती है, बल्कि यह कि वह हमसे कुछ छीन लेती है: वे सारी बैसाखियाँ जिनके सहारे हम परमेश्वर तक पहुँचने की कोशिश करते हैं। एक बंदी प्रेरित, एक अनजान कलीसिया, और एक घोषणा जो बीस सदियों से गूँज रही है, कि मसीह में परमेश्वर की सारी परिपूर्णता वास करती है और उन्हीं में आप भरपूर हो गए हैं। सृष्टि उनके द्वारा बनी, क्रूस पर मेल उन्होंने कराया, शक्तियों पर जय उन्होंने पाई, और अब वही महिमा की आशा बनकर आपके भीतर रहते हैं।
इसलिए आगे की राह कोई नई तकनीक खोजना नहीं, बल्कि जड़ें गहरी करना है। अगली बार जब कोई आवाज़ आपसे कहे कि आपको कुछ और चाहिए, कुछ और करना है, कुछ और बनना है, तो दूसरे अध्याय पर लौट आइए। और जब मन करे कि यह सब सिद्धांत से आगे नहीं बढ़ता, तो तीसरे अध्याय पर जाइए, जहाँ यही सच्चाई करुणा, क्षमा और धन्यवाद बनकर रसोई, दफ़्तर और टूटे रिश्तों में उतरती है। पत्री उठाइए, धीरे पढ़िए, और प्रार्थना में लगे रहिए।
