विषय

स्वर्ग कैसा है: बाइबल के अनुसार अनन्त जीवन का स्थान

परिचय

अस्पताल के कमरे में घड़ी की टिक-टिक बहुत ऊँची सुनाई देती है। बिस्तर पर लेटी माँ की साँस धीमी हो चुकी है, और आठ साल का पोता कोने में खड़ा पूछता है, "दादी अब कहाँ जाएँगी?" कमरे में मौजूद हर व्यक्ति के पास कोई न कोई जवाब है, कोई कहता है "बादलों के ऊपर", कोई कहता है "तारों में", कोई चुप रह जाता है। और सच यह है कि यह सवाल किसी बच्चे का नहीं, हम सबका है। हम सब किसी न किसी रात इसी सवाल के साथ छत को घूरते हुए जागे हैं।

बाइबल इस सवाल को टालती नहीं। वह स्वर्ग के बारे में अनुमान नहीं लगाती, बल्कि वादा करती है। इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि पवित्र शास्त्र स्वर्ग को किस रूप में चित्रित करता है, उत्पत्ति की वाटिका से लेकर प्रकाशितवाक्य के नये यरूशलेम तक, और यह भी कि यह आशा आपके आज के सोमवार को कैसे बदल देती है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

बहुत सारे लेख स्वर्ग को एक जगह की तरह समझाते हैं, सोने की गलियाँ, मोतियों के फाटक, अनन्त विश्राम। यह पृष्ठ एक अलग रास्ता लेता है। बाइबल के अनुसार स्वर्ग सबसे पहले एक व्यक्ति है, और उसके बाद एक स्थान। उसका केन्द्र संगमरमर नहीं, बल्कि मसीह का चेहरा है। और दूसरी बात, बाइबल की आखिरी आशा यह नहीं है कि हम ऊपर उठकर पृथ्वी से भाग जाएँ, बल्कि यह कि परमेश्वर नीचे उतरकर अपनी नयी सृष्टि में हमारे साथ बसें। इन दो बातों को पकड़ लीजिए, और स्वर्ग एक धुँधली कल्पना से निकलकर एक ठोस, हड्डियों तक उतरने वाली आशा बन जाता है।

बाइबल स्वर्ग के बारे में क्या कहती है?

पवित्र शास्त्र में "स्वर्ग" शब्द एक से अधिक अर्थों में आता है। कभी यह वह आकाश है जिसमें पक्षी उड़ते हैं, कभी वह तारों भरा विस्तार, और कभी वह वास्तविकता जिसमें परमेश्वर अपनी महिमा में विराजमान हैं। जब बाइबल विश्वासियों की अनन्त आशा की बात करती है, तो वह इस तीसरे अर्थ की ओर इशारा करती है, परमेश्वर की उपस्थिति का क्षेत्र। इसलिए सबसे सही उत्तर यह है, स्वर्ग वह स्थान है जहाँ परमेश्वर बिना पर्दे के, बिना दूरी के, अपने लोगों के बीच रहते हैं।

यीशु मसीह ने अपनी मृत्यु से पहले वाली रात यही बात अपने डरे हुए चेलों से कही। यूहन्ना 14:2-3 में वे कहते हैं, "मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं; यदि न होते तो मैं तुम से कह देता; क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूं। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूं, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहां ले जाऊंगा, कि जहां मैं रहूं वहां तुम भी रहो।" ध्यान दीजिए, वाक्य का जोर कमरों की गिनती पर नहीं है। जोर उस अन्तिम पंक्ति पर है, "जहां मैं रहूं वहां तुम भी रहो।" यीशु स्वर्ग की सजावट का वर्णन नहीं कर रहे, वे संगति का वादा कर रहे हैं। स्वर्ग का पता यह नहीं है कि वह कहाँ है, बल्कि यह है कि वह किसके साथ है।

पौलुस भी इसी दिशा में बोलते हैं, पर वे शरीर की भाषा उठाते हैं। 2 कुरिन्थियों 5:1 कहता है, "क्योंकि हम जानते हैं, कि जब हमारा पृथ्वी पर का डेरा सरीखा घर गिराया जाएगा तो हमें परमेश्वर की ओर से स्वर्ग पर एक ऐसा भवन मिलेगा, जो हाथों से बनाया हुआ नहीं, परन्तु सदा के लिये है।" पौलुस तम्बू बनाने वाला कारीगर था, और वह जानता था कि तम्बू और मकान में क्या फर्क होता है। तम्बू हवा में काँपता है, उसकी रस्सियाँ ढीली पड़ती हैं, बारिश में वह टपकता है। हमारा शरीर वैसा ही है, थकता है, बीमार पड़ता है, बूढ़ा होता है। पर परमेश्वर के पास हमारे लिए एक भवन तैयार है, नींव वाला, स्थायी, अनन्त। यह पद स्वर्ग को कोई भाप जैसी अवस्था नहीं बताता, बल्कि एक ठोस, टिकाऊ वास्तविकता।

फिलिप्पियों 3:20 इसी आशा को नागरिकता की भाषा में रखता है, "पर हमारा स्वदेश स्वर्ग में है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहां से आने की बाट जोहते हैं।" फिलिप्पी शहर के लोग रोमी नागरिकता पर गर्व करते थे, चाहे उन्होंने रोम कभी देखा भी न हो। पौलुस कहते हैं, तुम्हारा असली नागरिक अधिकार कहीं और दर्ज है। और यहाँ भी वाक्य का अन्त एक जगह पर नहीं, एक व्यक्ति पर होता है, "प्रभु यीशु मसीह के वहां से आने की बाट जोहते हैं।" यह पद बताता है कि विश्वासी की आशा दो तरफा है, हम वहाँ के हैं, और वे यहाँ आ रहे हैं।

फिर एक ईमानदार सीमा भी है। 1 कुरिन्थियों 2:9 लिखता है, "परन्तु जैसा लिखा है, कि जो जो बातें आँख ने नहीं देखीं, और कान ने नहीं सुनीं, और जो जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिये तैयार की हैं।" यह पद हमें कल्पना करने से रोकता नहीं, पर घमंड से रोकता है। हम जो कुछ जानते हैं वह सच है, पर पूरा नहीं। परमेश्वर ने जो तैयार किया है वह हमारी सबसे सुन्दर कल्पना से भी बड़ा है, इसलिए स्वर्ग के बारे में हमारी सबसे बड़ी गलती यह नहीं होगी कि हमने बहुत ज्यादा सोच लिया, बल्कि यह कि हमने बहुत कम सोचा।

स्वर्ग का पता एक जगह नहीं, एक चेहरा है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

बाइबल की पहली किताब एक बगीचे से शुरू होती है जहाँ परमेश्वर दिन के ठंडे समय अपने लोगों के बीच चलते हैं। उत्पत्ति में स्वर्ग और पृथ्वी के बीच कोई दीवार नहीं है, आदम और हव्वा परमेश्वर की उपस्थिति में जीते हैं। पाप के बाद जो टूटता है वह मुख्य रूप से भूगोल नहीं, संगति है। मनुष्य वाटिका से बाहर निकाला जाता है, और उस दिन से पूरी बाइबल एक ही दिशा में बहती है, वापस उपस्थिति की ओर।

इसलिए परमेश्वर इस्राएल को निर्गमन में एक तम्बू बनाने को कहते हैं, और उसका उद्देश्य साफ है, वे उनके बीच वास करना चाहते हैं। मिलापवाले तम्बू का पर्दा, याजक, बलिदान, यह सब एक ही सच्चाई की ओर इशारा करते हैं, परमेश्वर पास आना चाहते हैं, पर पाप बीच में खड़ा है। सुलैमान का मन्दिर उसी विचार का पत्थरों में ढला रूप था, एक जगह जहाँ आकाश और धरती छू जाते हैं। भजनकार की प्यास इसी से जन्मी, भजन संहिता 73:25 में वह कहता है, "स्वर्ग में मेरा और कौन है? तेरे संग रहते हुए मैं पृथ्वी पर और कुछ नहीं चाहता।" पुराने नियम का भक्त स्वर्ग की सुविधाओं का सपना नहीं देखता, वह परमेश्वर के लिए तरसता है।

अब्राहम का उदाहरण इससे भी आगे जाता है। इब्रानियों 11:10 उसके बारे में कहता है, "क्योंकि वह उस स्थिर नेव वाले नगर की बाट जोहता था, जिसका रचनेवाला और बनानेवाला परमेश्वर है।" अब्राहम को कनान की भूमि का वादा मिला था, पर उसकी आँखें उससे भी बड़ी किसी चीज पर लगी थीं, एक नगर, एक स्थायी घर। भविष्यद्वक्ता यशायाह इसी आशा को खोलते हैं जब वे नये आकाश और नयी पृथ्वी की बात करते हैं, जहाँ रोना और चिल्लाना फिर सुनाई नहीं देगा।

फिर सूत्र मसीह में आकर बँध जाता है। यूहन्ना अपने सुसमाचार में लिखता है कि वचन देहधारी हुआ और हमारे बीच डेरा किया। यीशु मसीह स्वयं चलता-फिरता मन्दिर हैं, स्वर्ग जो धरती पर उतर आया। क्रूस पर वह पर्दा फट जाता है जो लोगों को परमेश्वर से अलग रखता था, और उसी क्रूस पर लटके एक डाकू से यीशु कहते हैं, "मैं तुझ से सच कहता हूं कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।" कोई अनुष्ठान नहीं, कोई प्रतीक्षा-सूची नहीं, केवल मसीह के साथ होना।

और बाइबल का अन्त उस बगीचे को लौटा देता है, पर अब वह एक नगर भी है। प्रकाशितवाक्य 22:1-5 में यूहन्ना लिखते हैं, "फिर उस ने मुझे बिल्लौर की सी झलकती हुई जीवन के जल की एक नदी दिखाई, जो परमेश्वर और मेम्ने के सिंहासन से निकलकर उस नगर की सड़क के बीच में बहती थी। और नदी के इस पार और उस पार जीवन का पेड़ था; उन में बारहों महीने फल लगते थे, और हर महीने में उनका फल लगता था: और उस पेड़ के पत्तों से जाति जाति के लोग चंगे होते थे। और फिर श्राप न होगा, और परमेश्वर और मेम्ने का सिंहासन उस नगर में होगा और उसके दास उसकी सेवा करेंगे। और वे उसका मुंह देखेंगे, और उसका नाम उनके माथों पर लिखा हुआ होगा। और फिर रात न होगी, और उन्हें दीपक और सूर्य के उजियाले की आवश्यकता न होगी, क्योंकि प्रभु परमेश्वर उन्हें उजियाला देगा, और वे युगानुयुग राज्य करेंगे।" जीवन का पेड़ लौट आया, श्राप हट गया, और उस पूरे वर्णन का शिखर वह छोटा वाक्य है, "और वे उसका मुंह देखेंगे।" जो आदम ने वाटिका में खोया था, वह मेम्ने के लहू से वापस मिलता है, और उससे भी बढ़कर मिलता है।

आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रांति यह है कि स्वर्ग बादलों पर बैठकर वीणा बजाने का अनन्त कार्यक्रम है, सुन्दर तो है पर ऊबाऊ। यह तस्वीर कहीं भी पवित्र शास्त्र से नहीं आती, वह मध्ययुगीन चित्रकारी और आधुनिक कार्टूनों से आती है। बाइबल जो चित्र देती है वह एक नगर का है, एक नदी का, फल देते पेड़ों का, चंगाई का, और सेवा का। प्रकाशितवाक्य 22:1-5 साफ कहता है कि "उसके दास उसकी सेवा करेंगे" और "वे युगानुयुग राज्य करेंगे।" वहाँ काम है, पर बिना श्राप वाला काम। वहाँ रचनात्मकता है, बिना थकान वाली। जिसे हम ऊब कहते हैं वह पाप की छाया है, न कि परमेश्वर की उपस्थिति की।

दूसरी भ्रांति यह है कि स्वर्ग एक इनाम है जो अच्छे लोगों को उनके कर्मों के बदले मिलता है, एक तराजू जिसमें अच्छाई बुराई से भारी पड़नी चाहिए। यह सोच स्वाभाविक है, पर सुसमाचार के ठीक विपरीत है। यीशु मसीह ने कहा था कि वे जगह तैयार करने जा रहे हैं, यह जिम्मेदारी उन्होंने अपने ऊपर ली, हमारे ऊपर नहीं। 2 कुरिन्थियों 5:1 में वह भवन "हाथों से बनाया हुआ नहीं" है, और वे हाथ पहले हमारे ही हैं। अनन्त जीवन कमाई नहीं, दान है। क्रूस पर लटका डाकू इसका सबसे स्पष्ट सबूत है, उसके पास पश्चाताप के लिए समय था, पर पुण्य के लिए एक घंटा भी नहीं।

तीसरी भ्रांति यह है कि अनन्त जीवन में हम बिना शरीर की आत्माएँ बनकर तैरेंगे। बाइबल ऐसा नहीं सिखाती। मसीह कब्र से जिस शरीर में उठे उसमें उन्होंने भोजन किया और अपने घाव दिखाए। 1 कुरिन्थियों 15 में पौलुस बीज और पौधे का दृष्टान्त देकर समझाते हैं कि हमारा शरीर नाशवान बोया जाता है और अविनाशी उठाया जाता है। मरने के तुरन्त बाद विश्वासी मसीह के साथ होता है, और यही आराम की स्थिति है, पर बाइबल की अन्तिम आशा उससे भी बड़ी है, शरीर का पुनरुत्थान और नयी सृष्टि। इसलिए स्वर्ग की आशा शरीर को तुच्छ नहीं समझती, वह उसे छुड़ाती है।

चौथी भ्रांति यह है कि स्वर्ग पर ध्यान लगाने से लोग इस दुनिया के लिए बेकार हो जाते हैं। इतिहास इसका उल्टा गवाह है। जिन विश्वासियों ने अस्पताल खोले, गुलामी के विरुद्ध लड़े, अकाल में रोटी बाँटी, वे अक्सर वही लोग थे जिनकी आँखें अनन्तकाल पर टिकी थीं। कारण साफ है, प्रकाशितवाक्य 21:1-4 में परमेश्वर पृथ्वी को कूड़े की तरह फेंकते नहीं, वे उसे नया करते हैं। जो नयी पृथ्वी की प्रतीक्षा करता है वह इस पृथ्वी की धूल से नफरत नहीं करता, वह उसमें आने वाली सुबह के संकेत बोता है।

आज इसे जीवन में उतारना

एक माँ जिसने अपना बच्चा खोया है, उसे यह सुनकर सान्त्वना नहीं मिलती कि "वह अब बेहतर जगह पर है", जब तक उसे यह न बताया जाए कि वह जगह क्या है। प्रकाशितवाक्य 21:1-4 में लिखा है, "और उन की आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; क्योंकि पहिली बातें जाती रहीं।" ध्यान दीजिए, परमेश्वर आँसुओं को अनदेखा नहीं करते, वे उन्हें पोंछते हैं। इसका अर्थ है कि वहाँ तक आँसू सच्चे हैं, गिने हुए हैं, और किसी दिन एक हाथ उन्हें छूएगा। शोक करने वाले के लिए यह उपदेश नहीं, हाथ पकड़ने जैसा है। आप रोना बन्द करने के लिए मजबूर नहीं हैं, आप उस दिन की प्रतीक्षा में रो सकते हैं।

पैसे और सामान के मामले में यह आशा हमें उदार बनाती है। फिलिप्पियों 3:20 के अनुसार हमारा स्वदेश स्वर्ग में है, इसलिए यहाँ हम बसने वाले नहीं, बल्कि यात्रा करने वाले हैं। जो जानता है कि उसका असली घर आगे है, वह सामान हल्का रखता है। इसका मतलब बेपरवाही नहीं, बल्कि यह कि बैंक की शेष राशि हमारी पहचान नहीं बनती। जब पदोन्नति किसी और को मिल जाती है, जब पड़ोसी की गाड़ी बड़ी हो जाती है, तब अनन्तकाल का दृष्टिकोण हमारे दिल की धड़कन को सामान्य कर देता है।

बीमारी और बूढ़े होते शरीर के लिए 2 कुरिन्थियों 5:1 दवा की तरह काम करता है। जो व्यक्ति साल भर से दर्द के साथ जी रहा है, जिसकी रिपोर्ट हर बार कुछ नया बुरा लेकर आती है, उसके लिए यह जानना बहुत बड़ी बात है कि यह टपकता तम्बू आखिरी शब्द नहीं है। आपका शरीर बेकार नहीं है, वह अस्थायी है, और उसके लिए एक भवन तैयार है।

काम की जगह पर यह आशा हमें धैर्य देती है। जो सेवा किसी ने नहीं देखी, जो ईमानदारी किसी ने नहीं गिनी, जो रातें आपने किसी बीमार माता-पिता के पास बिताईं, वे सब उस नगर में दर्ज हैं जहाँ परमेश्वर का सिंहासन है। और अकेलेपन में, जब त्योहार की शाम आपका फोन शान्त रहता है, यूहन्ना 14:2-3 का वादा आपके कान में फिर बजना चाहिए, "जहां मैं रहूं वहां तुम भी रहो।" आपके लिए एक जगह पहले से तैयार की जा रही है, और वह जगह किसी भीड़ में नहीं, मसीह के पास है।

दर्पण

अब कुछ देर के लिए पद और व्याख्या एक तरफ रख दीजिए, और अपने आप से पूछिए, क्या आप सचमुच स्वर्ग चाहते हैं, या आप केवल नरक से बचना चाहते हैं? यह सवाल चुभता है, क्योंकि बहुत से लोग परमेश्वर के बिना एक सुरक्षित अनन्तकाल चाहते हैं। अगर स्वर्ग में स्वास्थ्य, परिवार का मिलन और शान्ति होती पर मसीह नहीं होते, तो क्या आपको फर्क पड़ता? आपका ईमानदार जवाब आपको बता देगा कि आपकी आशा किस पर टिकी है।

अगर परमेश्वर की उपस्थिति यहाँ आपके लिए बोझ लगती है, प्रार्थना एक काम की तरह, वचन एक कर्तव्य की तरह, कलीसिया एक रस्म की तरह, तो वहाँ की अनन्त उपस्थिति आपको खींचेगी कैसे? यह डराने के लिए नहीं कहा जा रहा, यह जगाने के लिए कहा जा रहा है। जो आपको अनन्तकाल में सुख देगा, उसका स्वाद आज ही मिलना शुरू होता है।

और दूसरी तरफ, अगर आप वही हैं जिसके पास इस पृथ्वी पर बहुत कम बचा है, जिसका शरीर धोखा दे रहा है, जिसका बटुआ खाली है, जिसका घर सूना है, तो यह वादा आपके लिए किसी और के लिए नहीं, आपके लिए लिखा गया है। आपके आँसुओं की एक-एक बूँद उस हाथ का इन्तजार कर रही है जो उन्हें पोंछेगा। आपने जो त्याग बिना तालियों के किए, वे किसी रजिस्टर से नहीं छूटे।

आपका सबसे बुरा दिन आपका आखिरी अध्याय नहीं है।

तो आज एक छोटा कदम लीजिए। जिस चीज को आप कसकर पकड़े हुए हैं, कोई शिकायत, कोई पैसा, कोई प्रतिष्ठा, उसे थोड़ा ढीला छोड़िए। जो आपका है वह आपसे कहीं आगे आपका इन्तजार कर रहा है, और जो सच में आपका है उसे कोई चोर नहीं ले जा सकता।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को स्वर्ग समझाते समय सबसे बड़ी गलती यह होती है कि हम उन्हें बादल और पंख दे देते हैं, और फिर वे बड़े होकर उस तस्वीर को कहानी समझकर छोड़ देते हैं। इसके बजाय उन्हें वही दीजिए जो बाइबल देती है, एक घर और एक चेहरा। कहिए कि स्वर्ग वह जगह है जहाँ यीशु हैं, और जहाँ यीशु हैं वहाँ कोई डर नहीं, कोई दर्द नहीं, कोई विदाई नहीं। बच्चे "घर" शब्द को समझते हैं, और वे यह भी समझते हैं कि किसी प्रिय व्यक्ति के साथ रहना कैसा लगता है। यूहन्ना 14:2-3 का वादा इसीलिए बच्चों के लिए बहुत उपयुक्त है, यीशु कह रहे हैं कि वे जगह तैयार कर रहे हैं, ठीक जैसे माँ मेहमान के आने से पहले कमरा तैयार करती है।

अगर बच्चे ने किसी अपने को खोया है, तो बहुत ज्यादा समझाने की जल्दी न करें। उसके साथ बैठिए, उसका सवाल सुनिए, और यह मानने से न डरिए कि कुछ बातें हम नहीं जानते। 1 कुरिन्थियों 2:9 उन्हें सिखाता है कि परमेश्वर ने जो तैयार किया है वह हमारी सबसे मजेदार कल्पना से भी सुन्दर है, और यह सोच बच्चों को डर की जगह उत्सुकता देती है।

इस विषय पर हमारे पास अलग-अलग उम्र के लिए विशेष व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, छोटे बच्चों के लिए तीन से छह वर्ष तक, स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए सात से बारह वर्ष तक, और किशोरों के लिए बारह वर्ष से ऊपर। हर उम्र के सवाल अलग होते हैं, और हर उम्र को उसकी भाषा में उत्तर मिलना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्वर्ग कैसा दिखता है, बाइबल के अनुसार?

बाइबल स्वर्ग का वर्णन मुख्य रूप से प्रकाशितवाक्य 21 और 22 में करती है, और वहाँ वह चित्र एक नगर का है जिसमें जीवन के जल की नदी बहती है, जीवन का पेड़ हर महीने फल देता है, फाटक कभी बन्द नहीं होते, और रात कभी नहीं होती। पर उस पूरे वर्णन का केन्द्र इमारतें नहीं, बल्कि परमेश्वर और मेम्ने का सिंहासन है। सबसे ऊँची बात यह लिखी है कि "वे उसका मुंह देखेंगे।" इसलिए स्वर्ग की सबसे सही तस्वीर सजावट नहीं, उपस्थिति है।

क्या स्वर्ग में हम अपने प्रियजनों को पहचान पाएँगे?

पवित्र शास्त्र से इसका उत्तर हाँ की ओर झुकता है। पुनरुत्थान के बाद चेलों ने यीशु मसीह को पहचाना, और रूपान्तरण के पहाड़ पर मूसा और एलिय्याह पहचाने गए, हालाँकि वे सदियों पहले इस संसार से जा चुके थे। पौलुस थिस्सलुनीकियों को यह आशा देते हैं कि वे अपने मरे हुए विश्वासियों से फिर मिलेंगे, और यही उनका ढाढ़स बँधाने का आधार है। अनन्त जीवन पहचान मिटाता नहीं, उसे शुद्ध करता है। हम एक दूसरे को पहले से बेहतर जानेंगे, बिना गलतफहमी और बिना दूरी के।

मरने के तुरन्त बाद क्या होता है?

बाइबल सिखाती है कि जो व्यक्ति मसीह पर विश्वास करके मरता है, वह तुरन्त प्रभु के साथ होता है। क्रूस पर यीशु ने पश्चातापी डाकू से कहा, "मैं तुझ से सच कहता हूं कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।" पौलुस भी कहते हैं कि देह छोड़कर मसीह के पास रहना बहुत उत्तम है। पर यह अन्तिम अवस्था नहीं है। बाइबल की पूरी आशा शरीर का पुनरुत्थान और नयी सृष्टि है, जब आत्मा और शरीर दोनों महिमा में जोड़ दिए जाएँगे।

स्वर्ग और नयी पृथ्वी में क्या अन्तर है?

आज जब कोई विश्वासी मरता है, वह मसीह की उपस्थिति में जाता है, और इसे हम आमतौर पर स्वर्ग कहते हैं। पर प्रकाशितवाक्य 21:1-4 एक आगे का दृश्य दिखाता है, जहाँ नया आकाश और नयी पृथ्वी आते हैं और पवित्र नगर स्वर्ग से उतरता है, और परमेश्वर मनुष्यों के बीच डेरा करते हैं। यानी अन्त में हम ऊपर नहीं उठाए जाते, परमेश्वर नीचे उतरकर अपनी नयी सृष्टि में हमारे साथ बसते हैं। इसलिए स्वर्ग की आशा पृथ्वी से पलायन नहीं, पृथ्वी की चंगाई है।

क्या स्वर्ग में हमारे पास शरीर होगा?

हाँ, और यही बाइबल की एक बहुत बड़ी आशा है। 2 कुरिन्थियों 5:1 हमारे वर्तमान शरीर को तम्बू कहता है और हमारे भविष्य के शरीर को परमेश्वर की ओर से मिला भवन, "जो हाथों से बनाया हुआ नहीं, परन्तु सदा के लिये है।" 1 कुरिन्थियों 15 में पौलुस समझाते हैं कि शरीर नाशवान बोया जाता है और अविनाशी उठाया जाता है। मसीह का जी उठा शरीर इसका नमूना है, वह छुआ जा सकता था और भोजन कर सकता था, फिर भी वह महिमामय था। अनन्त जीवन देहहीन नहीं, बल्कि पूर्ण रूप से देहधारी है।

क्या स्वर्ग में ऊब होगी?

यह डर हमारी थकी हुई कल्पना से आता है, बाइबल से नहीं। प्रकाशितवाक्य 22:1-5 कहता है कि परमेश्वर के दास उसकी सेवा करेंगे और युगानुयुग राज्य करेंगे, यानी वहाँ उद्देश्य है, काम है, जिम्मेदारी है, पर श्राप के बिना। जो चीजें अभी हमें थकाती हैं, प्रतिस्पर्धा, असफलता, ईर्ष्या, वे वहाँ नहीं होंगी। और चूँकि परमेश्वर अनन्त और अथाह हैं, उन्हें जानना कभी खत्म नहीं होगा। ऊब एक सीमित चीज को बहुत देर तक देखने से आती है, और परमेश्वर सीमित नहीं हैं।

क्या अच्छे कर्मों से स्वर्ग मिलता है?

नहीं, और यह सुसमाचार का मूल है। यीशु मसीह ने यूहन्ना 14:2-3 में कहा कि वे जगह तैयार करने जा रहे हैं और खुद आकर हमें ले जाएँगे, यह पूरा काम उनके हाथों में है। अनन्त जीवन अनुग्रह से, विश्वास के द्वारा मिलता है, कमाई से नहीं, वरना वह मजदूरी होती, दान नहीं। अच्छे काम इसके बाद आते हैं, कारण के रूप में नहीं बल्कि फल के रूप में। जो व्यक्ति अनुग्रह से क्षमा पा गया है, वह प्रेम से सेवा करता है, डर से हिसाब नहीं जोड़ता।

बाइबल में सोने की गलियाँ और मोतियों के फाटक का क्या अर्थ है?

प्रकाशितवाक्य में यूहन्ना वह चित्रित करते हैं जो उन्होंने दर्शन में देखा, और वह भाषा प्रतीकों से भरी है, पर खोखली नहीं। सोना और बहुमूल्य पत्थर उस नगर की महिमा, शुद्धता और स्थायित्व दिखाते हैं। मजे की बात यह है कि जिस चीज को हमारी दुनिया सबसे कीमती मानती है, सोना, वहाँ वह पैरों के नीचे सड़क बनने के काम आता है। यह हमें एक बात सिखाता है, जो यहाँ हमारा सपना है, वहाँ वह फर्श है, और असली खजाना परमेश्वर की उपस्थिति है।

क्या हम स्वर्ग में परमेश्वर को अपनी आँखों से देखेंगे?

बाइबल हाँ कहती है, और यह सबसे विस्मयकारी वादों में से एक है। प्रकाशितवाक्य 22:1-5 में लिखा है, "और वे उसका मुंह देखेंगे, और उसका नाम उनके माथों पर लिखा हुआ होगा।" पुराने नियम में मूसा को भी परमेश्वर का मुँह देखने की अनुमति नहीं मिली थी, क्योंकि पाप के कारण वह घातक होता। पर मेम्ने के लहू से शुद्ध किए हुए लोग बिना डर के उस चेहरे को देखेंगे। यही अनन्त जीवन का शिखर है, इनाम कोई वस्तु नहीं, स्वयं परमेश्वर हैं।

स्वर्ग में समय और उम्र कैसी होगी?

प्रकाशितवाक्य 22:1-5 कहता है, "और फिर रात न होगी, और उन्हें दीपक और सूर्य के उजियाले की आवश्यकता न होगी, क्योंकि प्रभु परमेश्वर उन्हें उजियाला देगा।" इससे यह समझ में आता है कि वहाँ अन्धकार, क्षय और अन्त की गिनती नहीं होगी। बाइबल हमारी भविष्य की उम्र या घड़ी का ब्यौरा नहीं देती, और 1 कुरिन्थियों 2:9 हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर ने जो तैयार किया है वह हमारी सोच से बड़ा है। जो निश्चित है वह यह है कि वहाँ बुढ़ापा, कमजोरी और विदाई का दुख नहीं होगा।

क्या छोटे बच्चे और वे लोग स्वर्ग जाएँगे जिन्होंने सुसमाचार कभी नहीं सुना?

बाइबल यह स्पष्ट सिखाती है कि उद्धार यीशु मसीह के द्वारा है, और वह यह भी सिखाती है कि परमेश्वर का न्याय सदा सच्चा और धर्मी है। दाऊद अपने मरे हुए बच्चे के बारे में कहता है कि वह उसके पास जाएगा, और यीशु ने बच्चों को अपने पास आने से नहीं रोका। जिन लोगों ने सुसमाचार नहीं सुना, उनके विषय में हम परमेश्वर की करुणा और न्याय दोनों पर भरोसा रखते हैं, बिना ऐसा कुछ दावा किए जो पवित्र शास्त्र नहीं कहता। और यही अनिश्चितता हमें प्रचार और प्रार्थना के लिए प्रेरित करनी चाहिए।

मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं स्वर्ग जाऊँगा?

यह निश्चयता भावनाओं से नहीं, वादे से आती है। फिलिप्पियों 3:20 कहता है, "पर हमारा स्वदेश स्वर्ग में है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहां से आने की बाट जोहते हैं।" अगर आपने अपने पाप स्वीकार करके मसीह के क्रूस पर भरोसा रखा है, तो आपकी नागरिकता उन्होंने दर्ज की है, आपके प्रदर्शन ने नहीं। पवित्र आत्मा हमारे भीतर इस बात की गवाही देते हैं कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं। संदेह के दिनों में अपनी भावनाओं से बहस मत कीजिए, उनके वादे को दोहराइए।

अंत में

स्वर्ग के बारे में सोचते समय हमारी सबसे बड़ी भूल यह नहीं होती कि हम बहुत ज्यादा कल्पना कर लेते हैं, बल्कि यह कि हम बहुत छोटी कल्पना करते हैं, और गलत जगह पर करते हैं। हम फर्नीचर के बारे में पूछते हैं, जबकि बाइबल हमें मेजबान दिखाती है। यीशु मसीह ने कमरों की सूची नहीं गिनाई, उन्होंने कहा, "जहां मैं रहूं वहां तुम भी रहो।" पौलुस ने वास्तुकला का वर्णन नहीं किया, उन्होंने एक स्थायी भवन और एक स्वदेश की बात की जहाँ से उद्धारकर्ता आ रहे हैं। और यूहन्ना ने अपने दर्शन का शिखर सोने की गलियों में नहीं रखा, बल्कि इन चार शब्दों में, वे उसका मुँह देखेंगे।

इसलिए आगे बढ़िए और इस आशा को खोदते रहिए। प्रकाशितवाक्य के आखिरी दो अध्याय धीरे-धीरे पढ़िए, फिर उत्पत्ति के पहले दो अध्यायों पर लौटिए, और देखिए कि परमेश्वर ने जो बगीचे में शुरू किया था उसे वे नगर में पूरा करते हैं। 1 कुरिन्थियों 2:9 को कंठस्थ कीजिए और अपने सबसे कठिन दिन में उसे दोहराइए। जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिए तैयार किया है, वह न आँख ने देखा, न कान ने सुना, और आपका नाम उस तैयारी में शामिल है।

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तो भी तुम मेरी ओर न फिरे," यहोवा की यह वाणी है। यही एक वाक्य अध्याय में बार-बार लौटता है,…

प्रार्थना संपादकीय पर भजन संहिता 12:4

पिता, कई बार मुझे लगता है कि मेरे शब्द मेरे अपने हैं और मैं जो चाहूँ कह सकता हूँ। पर…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर 2 राजाओं 20:19

यशायाह अभी अभी कह चुका था कि सब कुछ बाबेल ले जाया जाएगा, यहाँ तक कि तेरे बेटे भी। और…

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