एस्तेर का जीवन: अपने लोगों के लिए साहस दिखाने वाली रानी
परिचय
एक जवान लड़की महल के भीतर बैठी है। रेशम है, इत्र है, दासियाँ हैं, राजमुकुट है। और उसके सीने में एक राज़ दबा है: वह यहूदी है, बंधुआई में लाए गए एक कुचले हुए लोगों की बेटी, और महल में किसी को यह पता नहीं। बाहर के आँगन में उसका चचेरा भाई टाट पहनकर राख में बैठा रो रहा है, क्योंकि एक फरमान लिखा जा चुका है जो उसकी सारी जाति को मिटा देगा। और अब उसके पास दो ही रास्ते हैं: चुप रहकर सुरक्षित रहना, या बोलकर सब खो देना।
एस्तेर की कहानी यहीं से गरम होती है। इस पन्ने पर आप उसके जीवन को क्रम से देखेंगे: बंधुआई की एक अनाथ लड़की से लेकर फारस की रानी तक, उसके डर से लेकर उसके साहस तक, उसकी कमज़ोरियों से लेकर उस घड़ी तक जब उसने अपनी जान अपने लोगों के लिए दाँव पर लगा दी। और आप देखेंगे कि इस पूरी कहानी में परमेश्वर का नाम एक बार भी नहीं लिखा, फिर भी उनका हाथ हर पन्ने पर काम कर रहा है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
इस पन्ने का दृष्टिकोण एक शब्द पर टिका है: छिपाव। एस्तेर की पुस्तक में परमेश्वर अपना नाम छिपाते हैं, एस्तेर अपनी पहचान छिपाती है, हामान अपनी साज़िश छिपाता है, और चिट्ठी (पूर) डालकर भविष्य को संयोग के हवाले किया जाता है। यह किताब पूछती है: जब परमेश्वर चुप दिखें और विश्वासी को अपनी पहचान दबानी पड़े, तब क्या होता है? उत्तर एक ही घड़ी में आता है, जब एस्तेर कहती है "मेरे लोग" और छिपी हुई रानी प्रकट हो जाती है। ठीक उसी क्षण छिपे हुए परमेश्वर का हाथ भी दिखने लगता है। हम एस्तेर के जीवन को इसी धुरी पर पढ़ेंगे: छिपाव से प्रकटीकरण तक की यात्रा, जो अपनी पूर्णता मसीह में पाती है।
बाइबल एस्तेर के जीवन के बारे में क्या कहती है?
एस्तेर की कहानी यरूशलेम में नहीं, बल्कि शूशन में शुरू होती है, फारसी साम्राज्य की राजधानी में, राजा क्षयर्ष के दिनों में। वह वहाँ इसलिए है क्योंकि उसके पूर्वजों को बाबुल की बंधुआई में ले जाया गया था। बाइबल हमें बताती है कि वह मोर्दकै के चाचा अबीहैल की बेटी थी, और जब उसके माता-पिता मर गए तो मोर्दकै ने उसे अपनी बेटी करके पाला (एस्तेर 2:5-7)। यानी हमारी नायिका एक अनाथ है, एक अल्पसंख्यक समुदाय की बेटी, ऐसे देश में जो उसका देश नहीं है। उसका इब्रानी नाम हदस्सा था, और फारसी नाम एस्तेर।
पहला अध्याय एक ऐसी दुनिया दिखाता है जो चमक से भरी और नैतिकता से खाली है: छह महीने चलने वाली दावतें, शराब में डूबा एक राजा, और रानी वशती को केवल इसलिए हटा दिया जाता है कि उसने तमाशा बनने से इनकार किया। इसके बाद राज्य भर से सुंदर कुँवारियाँ इकट्ठी की जाती हैं। यह कोई रोमांटिक चुनाव नहीं था; यह एक ताकतवर राजा की सनक थी, और एस्तेर के पास इनकार का विकल्प था ही नहीं। इसी बिंदु पर पुस्तक हमें उसका पहला बड़ा फैसला बताती है, जो असल में मोर्दकै का निर्देश था: "एस्तेर ने अपनी जाति और कुल के लोगों का पता न दिया, क्योंकि मोर्दकै ने उसको चिताया था, कि इसे न बताना" (एस्तेर 2:10)। पहचान छिपा ली गई।
और फिर वह घड़ी आती है जिसे बाइबल शांत शब्दों में दर्ज करती है: "और राजा एस्तेर से सब स्त्रियों से अधिक प्रीति करने लगा, और उस पर उन सब कुँवारियों से अधिक अनुग्रह और कृपा हुई, अतः उसने उसके सिर पर राजमुकुट रख कर उसे वशती के स्थान पर रानी बना लिया" (एस्तेर 2:17)। ध्यान दीजिए, यहाँ "अनुग्रह और कृपा" शब्द बार-बार लौटते हैं। पुस्तक कहीं नहीं कहती कि परमेश्वर ने ऐसा किया, पर पढ़ने वाला जानता है कि ऐसा अनुग्रह ऊपर से ही आता है। जो लड़की किसी की नज़र में कुछ नहीं थी, वह साम्राज्य के सिंहासन के सबसे पास पहुँच जाती है, और तब भी उसकी असली पहचान गुप्त रहती है।
समय बीतता है। मोर्दकै राजा के विरुद्ध एक साज़िश पकड़कर उसकी जान बचाता है, और यह बात राजा के इतिवृत्त में लिख दी जाती है, पर उसे कोई इनाम नहीं मिलता (एस्तेर 2:21-23)। यह छोटा-सा ब्यौरा बाद में पूरी कहानी का ताला खोलेगा। इसी बीच हामान ऊपर उठता है, मोर्दकै उसके सामने झुकने से इनकार करता है, और हामान का अहंकार एक आदमी से बदला लेने तक नहीं रुकता; वह पूरी जाति के नाश का फरमान निकलवा लेता है और तारीख तय करने के लिए चिट्ठी डालता है (एस्तेर 3:7)। संयोग के पासे फेंके जाते हैं, और आगे हम देखेंगे कि उन पासों पर भी किसी और का हाथ था।
अब कहानी उस मोड़ पर आती है जहाँ छिपाव अब काम नहीं करेगा। मोर्दकै एस्तेर को खबर भेजता है, और एस्तेर पहले हिचकती है: नियम यह था कि जो कोई बिन बुलाए राजा के भीतरी आँगन में जाए, वह मारा जाए, और उसे तीस दिन से राजा ने नहीं बुलाया था (एस्तेर 4:11)। तब मोर्दकै का वह उत्तर आता है जो सदियों से विश्वासियों को हिलाता है: "क्योंकि जो तू इस समय चुपचाप रहे, तो यहूदियों को और किसी न किसी उपाय से सहायता और छुटकारा तो मिलेगा, परन्तु तू अपने पिता के घराने समेत नाश होगी। फिर क्या जाने तू ऐसे ही कठिन समय के लिये राजपद को प्राप्त हुई हो?" (एस्तेर 4:14)।
यह वाक्य दो बातें एक साथ कहता है। पहली, परमेश्वर का उद्धार एस्तेर पर निर्भर नहीं है; छुटकारा किसी और उपाय से भी आएगा। दूसरी, एस्तेर का पद संयोग नहीं है; वह इस घड़ी के लिए वहाँ रखी गई है। यहीं वह तय करती है कि छिपे रहने से बेहतर है प्रकट होकर मर जाना। उसका उत्तर पुस्तक का दिल है: "तू जाकर शूशन के सब यहूदियों को इकट्ठा कर, और तुम मेरे निमित्त उपवास करो, तीन दिन तक न कुछ खाओ न कुछ पीओ, न रात को न दिन को; और मैं भी अपनी सहेलियों समेत उपवास करूँगी। और ऐसी ही दशा में मैं नियम के विरुद्ध राजा के पास भीतर जाऊँगी; और यदि नाश हो गई तो हो जाऊँगी" (एस्तेर 4:16)।
छिपी हुई रानी अब खुलकर सामने आ जाती है।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
एस्तेर की पुस्तक अकेली नहीं खड़ी है। वह पुराने नियम की एक लंबी कहानी का हिस्सा है, और उसका सूत्र सीधे मसीह तक जाता है।
पीछे देखें तो व्यवस्थाविवरण में परमेश्वर ने चेतावनी दी थी कि अगर उनके लोग उन्हें त्यागेंगे तो वे अपना मुख छिपा लेंगे (व्यवस्थाविवरण 31:17-18)। एस्तेर की पुस्तक उसी छिपे मुख के युग में लिखी गई है। मंदिर तो फिर से बन रहा था, पर बहुत से यहूदी लौटे नहीं; वे साम्राज्य में बसे रहे, फारसी नामों के साथ, फारसी महलों के साये में। यहाँ न आकाशवाणी है, न भविष्यद्वक्ता, न आग का खंभा। इसीलिए यह किताब उन सब की किताब है जो कहते हैं, "परमेश्वर चुप क्यों हैं?"
पर चुप्पी का मतलब अनुपस्थिति नहीं। यहाँ नीतिवचन 21:1 पूरी कहानी की व्याख्या बन जाता है: "राजा का मन जल की धाराओं के समान यहोवा के हाथ में रहता है, वह उसको जिधर चाहता उधर फेर देता है।" क्षयर्ष एक ऐसा राजा है जो शराब, गुस्से और चापलूसी से चलता है, फिर भी उसका मन ठीक उस दिशा में मुड़ता है जिस दिशा में परमेश्वर के लोगों की रक्षा है। उसकी नींद ठीक उसी रात उड़ जाती है, और ठीक वही पन्ना पढ़ा जाता है जिसमें मोर्दकै का नाम था (एस्तेर 6:1)। हामान की चिट्ठी ठीक ऐसी तारीख निकालती है जो यहूदियों को महीनों की मोहलत दे देती है। संयोग नहीं, प्रबंध।
यही सूत्र यूसुफ की कहानी में मिलता है, जिसने कहा कि भाइयों ने जो बुराई सोची, परमेश्वर ने उसे भलाई के लिए ठहराया (उत्पत्ति 50:20)। यही सूत्र रूत में है, जहाँ एक साधारण खेत की बालियाँ दाऊद के वंश की भूमिका बन जाती हैं। और यही सूत्र नए नियम में रोमियों 8:28 में साफ बोल दिया जाता है: परमेश्वर सब बातों में अपने लोगों की भलाई के लिए काम करते हैं।
लेकिन सबसे गहरी रेखा यह है। एस्तेर एक मध्यस्थ बनती है जो अपनी जान जोखिम में डालकर सिंहासन के सामने खड़ी होती है, ताकि मौत का फरमान पलटा जा सके। वह कहती है, "यदि नाश हो गई तो हो जाऊँगी।" पर वह नाश नहीं हुई; राजा ने सोने का राजदंड बढ़ा दिया (एस्तेर 5:2)। एक और मध्यस्थ आया जिसने वही कदम उठाया और वाकई नाश हो गया। यीशु मसीह ने अपनी महिमा छिपाकर हमारी देह धारण की, हमारे लोगों में गिने गए, और सिंहासन के सामने नहीं बल्कि क्रूस पर खड़े हुए। जो एस्तेर के लिए संभावना थी, वह मसीह के लिए वास्तविकता बनी। और उनके कारण अब हमें बिन बुलाए मरने का डर नहीं; इब्रानियों 4:16 हमें बुलाता है कि हम हियाव बाँधकर अनुग्रह के सिंहासन के निकट जाएँ। छिपा हुआ परमेश्वर मसीह में पूरी तरह प्रकट हो गया।
उसके जीवन का सार
एस्तेर के जीवन में तीन घड़ियाँ हैं जिनके इर्द-गिर्द बाकी सब घूमता है।
पहली घड़ी: मुकुट, जो चुनाव नहीं था। एस्तेर 2:17 में वह रानी बनती है, पर हम ईमानदार रहें: यह उसकी महत्वाकांक्षा की जीत नहीं थी। वह एक ऐसे हरम में ले जाई गई जहाँ सहमति का सवाल ही नहीं उठता था, और उसने अपनी जाति और अपने परमेश्वर की पहचान छिपाकर रखी। बाइबल इस पर न वाह-वाह करती है और न दोष लगाती है; वह केवल दर्ज करती है। यह हमें एक बहुत ज़रूरी बात सिखाता है: परमेश्वर उन जगहों में भी काम करते हैं जहाँ सब कुछ साफ-सुथरा नहीं है, और वे उन लोगों को भी इस्तेमाल करते हैं जिनकी परिस्थितियाँ उन्होंने खुद नहीं चुनीं। एस्तेर का मुकुट उसके गुण का पुरस्कार नहीं, आने वाले संकट के लिए परमेश्वर की तैयारी था।
दूसरी घड़ी: तीन दिन का उपवास और खुला जोखिम। एस्तेर 4:16 उस लड़की को दिखाता है जो हिचकिचाहट से निकलकर आगे बढ़ती है। पहले वह नियम गिनाती है, तीस दिन का हिसाब देती है, अपनी सीमा बताती है। यह कमज़ोरी थी और बाइबल इसे छिपाती नहीं। पर मोर्दकै के शब्दों के बाद वह वही आदेश देती है जो अब तक वह लेती आई थी। भूमिका पलट जाती है: पालक बेटी अब अपने लोगों की अगुवा है। और गौर करें कि उसका पहला कदम रणनीति नहीं, उपवास है। वह अपनी सुंदरता या रसूख पर भरोसा नहीं करती, बल्कि पहले खुद को खाली करती है। तीन दिन और तीन रात, जिसके बाद वह मौत के दरवाज़े से भीतर जाती है।
तीसरी घड़ी: वह वाक्य जिसमें उसने अपनी पहचान खोल दी। दूसरी दावत में, जब राजा फिर पूछता है कि तेरी क्या इच्छा है, तब वह बोलती है: "तब एस्तेर रानी ने उत्तर दिया, हे राजा, यदि मुझ पर तेरे अनुग्रह की दृष्टि हो, और राजा को यह अच्छा लगे, तो मेरा प्राण मेरी विनती सुनकर, और मेरे लोगों का प्राण मेरे निवेदन के अनुसार मुझे दिया जाए" (एस्तेर 7:3)। यह पुस्तक का सबसे बड़ा मोड़ है, और उसकी ताकत दो शब्दों में है: "मेरे लोग"। पाँच साल तक उसने यह बात दबाकर रखी थी। अब वह अपने प्राण और अपने लोगों के प्राण को एक ही साँस में जोड़ देती है। वह अपने आराम से हामान के फरमान के गलत पक्ष पर उतर आती है। कुछ ही पदों बाद वह और खुलकर कहती है कि वह अपने लोगों पर पड़ने वाली विपत्ति देखकर जी नहीं सकेगी (एस्तेर 8:6)।
पहचान छिपाना सुरक्षा देता है; पहचान अपनाना उद्धार लाता है।
एस्तेर से हम क्या सीखते हैं
पहला, परमेश्वर की चुप्पी उनकी निष्क्रियता नहीं है। एस्तेर की पुस्तक में कोई चमत्कार नहीं, कोई भविष्यद्वाणी नहीं, कोई स्वर्गदूत नहीं। बस राजा की उड़ी नींद, एक भूला हुआ रिकॉर्ड, एक गलत समय पर बोला गया घमंडी वाक्य, और सारा जाल उलट जाता है। आपकी ज़िंदगी में भी बहुत बार परमेश्वर ऐसे ही काम करेंगे: बादलों में लिखी इबारत से नहीं, बल्कि एक फोन कॉल, एक रद्द हुई फ्लाइट, एक ऐसे आदमी की मदद से जिसे आपने बरसों पहले भुला दिया था। नीतिवचन 21:1 का भरोसा यही है कि सत्ता के सबसे ऊँचे दिल भी परमेश्वर के हाथ में पानी की धारा जैसे हैं।
दूसरा, आपका पद आपकी सुरक्षा नहीं, आपकी ज़िम्मेदारी है। एस्तेर 4:14 का सवाल हर विश्वासी के सामने खड़ा है। जो पढ़ाई आपके पास है, जो नौकरी, जो भाषा, जो जान-पहचान, जो पैसा, जो आवाज़, वह सिर्फ आपके आराम के लिए नहीं दी गई। मोर्दकै ने बड़ी साफगोई से कहा कि परमेश्वर का काम एस्तेर के बिना भी हो जाएगा; सवाल यह नहीं था कि परमेश्वर को उसकी ज़रूरत है, सवाल यह था कि क्या वह उस विशेषाधिकार में हिस्सा लेगी जो उसे मिला है। जो पद हम पकड़कर बचाते हैं, वह अक्सर सड़ जाता है; जो पद हम दूसरों के लिए खोल देते हैं, वही फलता है।
तीसरा, साहस डर की अनुपस्थिति नहीं, डर के बीच से चला गया कदम है। एस्तेर काँपती थी। उसने पहले बहाना बनाया। उसने उपवास माँगा, क्योंकि वह जानती थी कि अपने बल पर वह यह नहीं कर सकती। और उसने अपने भीतर की सारी अनिश्चितता के साथ कहा, "यदि नाश हो गई तो हो जाऊँगी।" यह भरोसे की भाषा है, गारंटी की नहीं। मसीही साहस भी ऐसा ही दिखता है: घुटनों पर झुककर, आँसुओं के साथ, नतीजा परमेश्वर के हाथ में छोड़कर, और फिर दरवाज़ा खोलकर भीतर चले जाना।
और एक चौथी बात, जिसे हम अनदेखा नहीं कर सकते। एस्तेर सिद्ध नहीं थी। उसने कई साल समझौते में बिताए, और नौवें अध्याय की खून-खराबी में हमें असहजता महसूस होती है। बाइबल अपने पात्रों को धोकर पेश नहीं करती। वह हमें बताती है कि परमेश्वर टूटे हुए इंसानों के ज़रिए, टूटी हुई दुनिया में, अपना पूरा उद्देश्य पूरा करते हैं।
दर्पण
अब सीधे आपसे। आप जानते हैं वह एहसास कैसा होता है जब कमरे में कुछ ऐसा कहा जाता है जिस पर बोलना चाहिए, और आप चुप रह जाते हैं। ऑफिस में जब किसी सहकर्मी का मज़ाक बनता है, या जब आपके धंधे में वह "छोटी-सी" बेईमानी सबको सामान्य लगती है। परिवार में जब सब मिलकर किसी एक कमज़ोर को दबा रहे होते हैं। कॉलेज में जब आपके विश्वास का नाम लेना आपको पिछड़ा साबित कर देगा। एस्तेर की तरह हमारे पास भी एक हुनर है: पहचान छिपाकर सुरक्षित रह जाना। हम इसे समझदारी कहते हैं। कई बार यह डर होता है।
एस्तेर 4:14 का सवाल आपके नाम के साथ पढ़िए: क्या जाने आप ठीक इस समय, ठीक इस टीम में, ठीक इस मोहल्ले में, ठीक इस परिवार में इसी घड़ी के लिए रखे गए हों? आपकी तनख़्वाह, आपका मोबाइल, आपकी सेहत, आपके खाली दो घंटे, आपकी पढ़ाई, आपका अकेलापन जिसने आपको लोगों के दर्द के प्रति संवेदनशील बनाया, इन सबको परमेश्वर बेकार नहीं जाने देना चाहते।
और अगर आप उस तरफ हैं जहाँ ज़िंदगी ने आपको वह जगह दी है जो आपने खुद नहीं चुनी, तो सुनिए: एस्तेर भी नहीं चुनी थी। एक अनाथ लड़की, एक पराए देश में, एक ऐसे महल में जहाँ उसकी मर्ज़ी नहीं पूछी गई। परमेश्वर ने उसकी कहानी को न्यायसंगत ठहराए बिना उसका इस्तेमाल किया, और उन्होंने उसे भूला नहीं। आपका बीता हुआ कल आपको उनके काम से बाहर नहीं करता।
आख़िरी बात। एस्तेर को अपनी जान दाँव पर लगाकर भीतर जाना पड़ा, क्योंकि उसे पता नहीं था कि राजदंड बढ़ेगा या नहीं। आपको वैसा डर नहीं ढोना है। जिस सिंहासन के सामने आप आते हैं, वहाँ बैठे प्रभु ने खुद अपना हाथ पहले बढ़ा दिया है, और उन्होंने आपके लिए मरने से भी इनकार नहीं किया। आपका मध्यस्थ पहले ही भीतर जा चुका है।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को एस्तेर की कहानी बहुत जल्दी पकड़ में आती है, क्योंकि इसमें एक राजा है, एक महल है, एक बहुत बुरा आदमी है, और एक बहादुर लड़की है। पर उन्हें सिर्फ रोमांच नहीं, एक सच भी मिलना चाहिए।
सबसे छोटे बच्चों के लिए सबसे साफ बात यह है: एस्तेर बहुत डरी हुई थी, फिर भी उसने ठीक काम किया, क्योंकि उसे भरोसा था कि परमेश्वर उसके साथ हैं। आप उनसे पूछ सकते हैं कि उन्हें किस चीज़ से डर लगता है, और फिर बता सकते हैं कि बहादुरी का मतलब डर न लगना नहीं है, बल्कि डरते हुए भी सही काम करना है। बड़े बच्चों से आप एक कदम आगे बात कर सकते हैं: इस पूरी किताब में परमेश्वर का नाम एक बार भी नहीं आता, फिर भी वे हर पन्ने पर काम कर रहे हैं, जैसे किसी बच्चे को अंधेरे में पिता का हाथ दिखता नहीं पर महसूस होता है।
किशोरों के साथ आप वही सवाल उठा सकते हैं जिससे वे रोज़ जूझते हैं: दोस्तों के बीच अपनी पहचान छिपाना कब आसान लगता है, और उसकी कीमत क्या होती है। एस्तेर 4:14 इस उम्र के लिए बनाया गया पद लगता है।
हमारे यहाँ अलग-अलग उम्र के लिए एस्तेर की कहानी की खास व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए, सात से बारह साल के स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए, और बारह साल से बड़े किशोरों के लिए। आप अपने बच्चे की उम्र के अनुसार वही चुनें, और कहानी सुनाकर उसके साथ मिलकर प्रार्थना करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
एस्तेर कौन थी और वह किस समय में जीवित थी?
एस्तेर एक यहूदी लड़की थी जिसका इब्रानी नाम हदस्सा था। वह बंधुआई में लाए गए यहूदियों के परिवार से थी, अनाथ हुई, और उसके चचेरे भाई मोर्दकै ने उसे बेटी की तरह पाला। वह फारस के राजा क्षयर्ष के दिनों में जीवित थी, यानी करीब पाँचवीं सदी ईसा पूर्व में, जब यहूदियों का एक हिस्सा यरूशलेम लौट चुका था और बहुत से लोग साम्राज्य में ही बसे रहे। वह शूशन के महल में रानी बनी और अपने लोगों को पूरे विनाश से बचाने में परमेश्वर के हाथ का साधन बनी।
एस्तेर की पुस्तक में परमेश्वर का नाम एक बार भी क्यों नहीं आता?
यह बाइबल की सबसे उल्लेखनीय बात है, और यह जान-बूझकर की गई लगती है। पुस्तक ऐसे युग को दिखाती है जिसमें न भविष्यद्वक्ता बोलते हैं, न चमत्कार होते हैं, और परमेश्वर का मुख छिपा हुआ लगता है। लेकिन इतने सारे "संयोग" एक साथ जुड़ते हैं कि पाठक खुद निष्कर्ष निकालने के लिए मजबूर हो जाता है। नीतिवचन 21:1 की सच्चाई पूरी कहानी में काम कर रही है: राजा का मन परमेश्वर के हाथ में है। चुप्पी का मतलब अनुपस्थिति नहीं; परमेश्वर पर्दे के पीछे से भी राज करते हैं।
एस्तेर 4:14 का सही अर्थ क्या है?
इस पद में मोर्दकै दो बातें कहता है। पहली, अगर एस्तेर चुप रहेगी तो भी छुटकारा किसी और उपाय से आ जाएगा, क्योंकि परमेश्वर का उद्धार किसी एक इंसान पर निर्भर नहीं है। दूसरी, एस्तेर का रानी बनना कोई इत्तेफाक नहीं है; वह इसी कठिन घड़ी के लिए वहाँ पहुँचाई गई है। इसलिए यह पद हमें घमंड और आलस दोनों से बचाता है: परमेश्वर को हमारी ज़रूरत नहीं, पर वे बड़े अनुग्रह से हमें अपने काम में शामिल करते हैं, और उस बुलाहट से मुँह मोड़ना नुकसानदेह है।
क्या एस्तेर का राजा के हरम में जाना पाप था?
बाइबल इस पर कोई सीधा फैसला नहीं देती, और हमें उससे आगे बढ़ने में सावधानी चाहिए। पाठ यह साफ करता है कि लड़कियाँ "इकट्ठी की गईं"; यह प्रस्ताव नहीं, आदेश था, और एक अनाथ बंधुआ लड़की के पास इनकार का कोई असली रास्ता नहीं था। यह भी सच है कि एस्तेर के जीवन में समझौते दिखते हैं, जैसे अपनी पहचान छिपाना। बाइबल अपने पात्रों को आदर्श बनाकर पेश नहीं करती। वह हमें दिखाती है कि परमेश्वर टूटी हुई परिस्थितियों में भी अपना उद्देश्य पूरा करते हैं और ऐसे लोगों को इस्तेमाल करते हैं जिन्हें हालात मिले, चुने नहीं गए।
एस्तेर ने उपवास किया, पर प्रार्थना का ज़िक्र क्यों नहीं है?
एस्तेर 4:16 में तीन दिन के उपवास का आदेश है, पर प्रार्थना शब्द नहीं आता। यह उसी शैली का हिस्सा है जिसमें परमेश्वर का नाम भी छिपा है। फिर भी यहूदी संदर्भ में उपवास का अर्थ हमेशा परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन करना था; बिना परमेश्वर के उपवास का कोई मतलब नहीं बनता। एस्तेर अपनी सुंदरता, चतुराई या पद पर भरोसा करके भीतर नहीं जाती; वह पहले खुद को खाली करती है। पाठक को इशारा समझने के लिए बुलाया जाता है, बताया नहीं जाता।
हामान कौन था और वह यहूदियों से इतनी नफरत क्यों करता था?
हामान क्षयर्ष का सबसे ऊँचा अधिकारी था, और उसे अगागी कहा गया है, जो अमालेकियों की उस विरासत की याद दिलाता है जो शुरू से परमेश्वर के लोगों के दुश्मन थे। उसका गुस्सा एक इंसान से शुरू हुआ: मोर्दकै ने उसके आगे झुकने से इनकार किया। पर उसका अहंकार वहीं नहीं रुका; उसने पूरी जाति के नाश का फरमान निकलवाया। यह घमंड का असली चेहरा दिखाता है, जो अपमान को कभी छोटा नहीं रहने देता, और आखिर में उसी फाँसी पर चढ़ता है जो उसने दूसरे के लिए बनाई थी।
पूरीम का पर्व क्या है और यह एस्तेर से कैसे जुड़ा है?
पूरीम उस छुटकारे की सालाना याद है जो एस्तेर के दिनों में मिला। इसका नाम "पूर" यानी चिट्ठी से आया है, क्योंकि हामान ने यहूदियों के नाश का दिन चुनने के लिए चिट्ठी डाली थी। एस्तेर 9:22 इसका उद्देश्य बताता है: "क्योंकि उन दिनों में यहूदियों ने अपने शत्रुओं से चैन पाया, और उस महीने में उनका शोक आनन्द से और उनका विलाप छुट्टी के दिन से बदल गया था; इसलिये वे उनको जेवनार और आनन्द और एक दूसरे के पास भोजन सामग्री भेजने और कंगालों को दान देने के दिन मानें।" ध्यान दें, आनन्द का सबूत केवल दावत नहीं, देना भी है।
एस्तेर 8:16 में "उजियाला" का क्या अर्थ है?
एस्तेर 8:16 कहता है: "और यहूदियों को उजियाला और आनन्द, हर्ष और महिमा मिली।" यहाँ उजियाला किसी दीये की रोशनी नहीं, बल्कि उस अंधकार का अंत है जो मौत के फरमान ने फैलाया था। कुछ ही अध्याय पहले शहर में रोना और टाट था; अब चारों शब्द एक साथ चमकते हैं। बाइबल में उजियाला हमेशा उद्धार, जीवन और परमेश्वर की उपस्थिति का चित्र है। यह पद उस बड़ी सुबह की झलक है जो मसीह में आई, जिन्होंने अपने आप को जगत की ज्योति कहा।
एस्तेर 9 की हिंसा को हम कैसे समझें?
यह अध्याय हमें असहज करता है, और उसे सहज बनाने की कोशिश ईमानदारी नहीं होगी। कुछ बातें ध्यान देने योग्य हैं: फारसी कानून में पहला फरमान रद्द नहीं हो सकता था, इसलिए दूसरा फरमान यहूदियों को केवल आत्मरक्षा का अधिकार देता है। पाठ बार-बार यह भी दर्ज करता है कि यहूदियों ने लूट का माल नहीं छुआ, जो बताता है कि यह लालच नहीं था। फिर भी यह अध्याय हमें आदर्श नहीं दिया गया है, बल्कि बताया गया है। मसीही होकर हम अपने बैरियों से प्रेम करने की आज्ञा के अधीन जीते हैं।
एस्तेर 2:17 हमें परमेश्वर के अनुग्रह के बारे में क्या सिखाता है?
एस्तेर 2:17 कहता है कि राजा ने एस्तेर से सब स्त्रियों से अधिक प्रीति की और उस पर अनुग्रह और कृपा हुई। कहानी में यह वह क्षण है जब एक अनाथ बंधुआ लड़की सिंहासन के सबसे पास पहुँचती है। पुस्तक श्रेय किसी को नहीं देती, पर बाइबल का पाठक जानता है कि ऐसा असामान्य अनुग्रह ऊपर से आता है, ठीक जैसे यूसुफ को फिरौन के दरबार में मिला था। यह हमें याद दिलाता है कि हमारे जीवन के दरवाज़े हमारी योजना से नहीं, परमेश्वर की समय-सारणी से खुलते हैं।
एस्तेर की कहानी यीशु मसीह की ओर कैसे इशारा करती है?
एस्तेर एक मध्यस्थ है जो अपने लोगों की जगह पर खड़ी होती है और कहती है कि अगर नाश हो गई तो हो जाऊँगी। मसीह वही कदम अंत तक चले गए: उन्होंने अपनी महिमा छिपाकर हमारी देह ली, स्वयं को पापियों के साथ गिनवाया, और क्रूस पर वाकई मर गए ताकि हमारे विरुद्ध लिखा फरमान रद्द हो सके। एस्तेर के लिए राजदंड बढ़ा और वह बच गई; मसीह के लिए कोई राजदंड नहीं बढ़ा, ताकि हमारे लिए अनुग्रह का सिंहासन हमेशा खुला रहे। इसलिए हम अब निडर होकर भीतर जा सकते हैं।
एस्तेर के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ कौन-सा पद है?
बहुत से लोग एस्तेर 4:14 चुनते हैं, और वह सही भी है, पर असली फैसला एस्तेर 7:3 में बोला जाता है। वहाँ वह राजा से कहती है कि उसका प्राण और उसके लोगों का प्राण उसे दिया जाए। इस एक वाक्य में उसने पाँच साल का छिपाव तोड़ दिया और खुलकर अपने आप को उस जाति के साथ जोड़ लिया जिसके नाश का फरमान लिखा गया था। सुरक्षा और अपनापन के बीच उसने अपनापन चुना, और वही चुनाव उद्धार का रास्ता बना।
अंत में
एस्तेर की कहानी छिपाव से शुरू होती है और प्रकटीकरण पर खत्म होती है। एक लड़की जिसका नाम, जाति और परमेश्वर छिपे हुए थे; एक किताब जिसमें परमेश्वर ने अपना नाम भी नहीं लिखा। और फिर एक घड़ी आती है जब वह कहती है "मेरे लोग", और उसी घड़ी में हम देखने लगते हैं कि जो हाथ पूरी कहानी चला रहा था, वह कभी अनुपस्थित नहीं था। राजा की उड़ी नींद, भूला हुआ रिकॉर्ड, चिट्ठी की तारीख, सब उसी एक प्रबंध का हिस्सा थे।
अगर आज आपकी ज़िंदगी में परमेश्वर चुप लगते हैं, तो एस्तेर की पुस्तक आपके हाथ की किताब है। उसे धीरे-धीरे पूरी पढ़िए, दस अध्याय ही हैं, और हर मोड़ पर पूछिए: यहाँ किसका हाथ काम कर रहा है? फिर नीतिवचन 21:1 पर रुकिए और उन सत्ताओं को याद कीजिए जो आपको डराती हैं। और अंत में इब्रानियों 4:16 पढ़कर उस सिंहासन के सामने आइए जिसका राजदंड आपके लिए पहले ही बढ़ चुका है। एस्तेर को भीतर जाते हुए नहीं पता था कि वह जिएगी या मरेगी। आपको पता है कि आपका मध्यस्थ मरा और जी उठा। इसी भरोसे से उठिए, और उस जगह में बोलिए जहाँ परमेश्वर ने आपको इस समय के लिए रखा है।
