बाइबल पात्र

लाजर कौन था: कब्र से बुलाए गए मित्र की कहानी

परिचय

यरूशलेम से लगभग तीन किलोमीटर दूर, जैतून पहाड़ की ढलान पर बसा एक छोटा-सा गाँव था, बैतनिय्याह। वहाँ एक घर था जिसमें दो बहनें और एक भाई रहते थे, और उस घर की चौखट यीशु के लिए हमेशा खुली रहती थी। फिर एक दिन उस घर में बीमारी आई। एक संदेश भेजा गया। और उत्तर में, कुछ नहीं आया। दो दिन तक कुछ नहीं। भाई मर गया, कफन में लपेटा गया, कब्र में रखा गया, और उस कब्र पर पत्थर लुढ़का दिया गया।

चार दिन बाद एक आवाज़ उस पत्थर के पार पहुँची: "हे लाजर, निकल आ।"

इस पृष्ठ पर आप लाजर के पूरे जीवन से होकर गुज़रेंगे: उसकी बीमारी, उसकी मृत्यु, उसका जी उठना, और उसके बाद का वह खतरनाक जीवन जो उसे मिला। और आप देखेंगे कि यह कहानी सिर्फ़ एक चमत्कार नहीं है, बल्कि वह मोड़ है जहाँ से यीशु का रास्ता सीधा क्रूस की ओर मुड़ जाता है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

हम लाजर को "उस आदमी" के रूप में नहीं देखेंगे जो चार दिन कब्र में रहा और लौट आया। हम उसे दो बातों के आईने में देखेंगे। पहली: लाजर पूरे सुसमाचार में एक शब्द भी नहीं बोलता। उसकी कोई प्रार्थना, कोई गवाही, कोई उपदेश दर्ज नहीं है। उसके पास सिर्फ़ एक "योग्यता" है, वह यह कि यीशु उससे प्रेम करते थे। दूसरी: जिस दिन लाजर कब्र से बाहर आया, उसी दिन यीशु की मृत्यु का फ़ैसला हुआ। लाजर का जीवन मुफ़्त था, पर मुफ़्त नहीं था; उसकी कीमत किसी और ने चुकाई। यही इस पूरे पृष्ठ का सूत्र है: एक कब्र खुली, ताकि दूसरी भरी जाए।

बाइबल लाजर के बारे में क्या कहती है?

लाजर का परिचय किसी वीरगाथा से नहीं, बल्कि एक बीमारी से शुरू होता है। यूहन्ना 11:1-3 कहता है: "मरियम और उसकी बहन मार्था के गाँव बैतनिय्याह का लाजर नाम एक मनुष्य बीमार था। यह वही मरियम थी जिस ने प्रभु पर इत्र डालकर उसके पाँवों को अपने बालों से पोंछा था, इसी का भाई लाजर बीमार था। सो उस की बहनों ने उसे कहला भेजा, कि हे प्रभु, देख, जिस से तू प्रीति रखता है, वह बीमार है।"

इन तीन पदों में ही लाजर का पूरा परिचय छिपा है। उसका नाम इब्रानी "एलिआज़ार" का छोटा रूप है, जिसका अर्थ है "परमेश्वर सहायता करते हैं।" उसका गाँव छोटा है, उसका परिवार दो बहनों का है, और उसकी पहचान किसी पद या उपलब्धि से नहीं बनती। बहनें संदेश में यह नहीं कहतीं, "जो आपसे प्रेम करता है," बल्कि "जिस से तू प्रीति रखता है।" यह बहुत महीन बात है, पर बहुत बड़ी है। वे अपने भाई की भक्ति का हवाला नहीं देतीं, वे यीशु के स्नेह का हवाला देती हैं। प्रार्थना की यह शैली आज भी सबसे ईमानदार शैली है: हम अपनी योग्यता नहीं, परमेश्वर का प्रेम सामने रखते हैं।

फिर वह होता है जो समझ से परे है। यीशु यह सुनकर दौड़ते नहीं। वे कहते हैं कि यह बीमारी मृत्यु की नहीं, परन्तु परमेश्वर की महिमा के लिये है, और फिर जहाँ थे वहीं दो दिन और ठहर जाते हैं (यूहन्ना 11:4-6)। यूहन्ना इस देरी को सीधे प्रेम से जोड़ता है, मानो कह रहा हो कि यह देरी उपेक्षा नहीं, गहरे प्रेम का हिस्सा है। हमारे लिए यह सबसे कड़वा हिस्सा है। हम देरी को इनकार समझ लेते हैं। बहनों ने भी यही समझा होगा, क्योंकि दोनों अलग-अलग मौकों पर वही एक वाक्य कहती हैं: हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई न मरता।

कब्र के रास्ते में यीशु मार्था से वह बात कहते हैं जो इस पूरे अध्याय का हृदय है। यूहन्ना 11:25-26: "यीशु ने उस से कहा, पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा। और जो कोई जीवित है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा। क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?" मार्था अंतिम दिन के पुनरुत्थान में विश्वास करती थी, जैसे उस समय के बहुत से यहूदी करते थे। यीशु उस विश्वास को सुधारते नहीं, उसे अपने ऊपर केंद्रित कर देते हैं। पुनरुत्थान कोई तारीख़ नहीं है, वह एक व्यक्ति हैं। जीवन कोई वस्तु नहीं है जो परमेश्वर बाँटते हैं, वह स्वयं मसीह में है।

और फिर, कब्र के सामने, पूरे बाइबल का सबसे छोटा पद आता है। यूहन्ना 11:35: "यीशु के आँसू बहने लगे।" वे जानते थे कि पाँच मिनट बाद क्या होने वाला है, फिर भी वे रोए। परमेश्वर का पुत्र मृत्यु को ठंडे दिल से नहीं देखते। वे उस पर क्रुद्ध होते हैं, उससे दुखी होते हैं, और उसके सामने रोते हैं।

फिर आदेश आता है। यूहन्ना 11:43-44: "यह कहकर उस ने बड़े शब्द से पुकारा, कि हे लाजर, निकल आ। जो मर गया था, वह कफन से हाथ पाँव बन्धे हुए निकल आया और उसका मुँह अँगोछे से लिपटा हुआ था। यीशु ने उन से कहा, उसे खोलकर जाने दो।" ध्यान दीजिए कि क्या नहीं है। कोई मंत्र नहीं, कोई अनुष्ठान नहीं, कोई लंबी प्रार्थना नहीं। सिर्फ़ एक नाम और दो शब्द। और ध्यान दीजिए कि नाम पुकारा गया। यदि यीशु सिर्फ़ "निकल आ" कहते, तो शायद हर कब्र खाली हो जाती। वह आवाज़ नाम लेकर बुलाती है, क्योंकि वह चरवाहे की आवाज़ है जो अपनी भेड़ों को नाम लेकर बुलाता है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

लाजर की कहानी आसमान से नहीं टपकती। पुराने नियम में परमेश्वर ने बार-बार संकेत छोड़े थे कि मृत्यु उनके लिए आख़िरी दीवार नहीं है। एलिय्याह ने सारपत की विधवा के बेटे के लिए प्रार्थना की और वह लड़का जी उठा (1 राजा 17)। एलीशा ने शूनेमिन स्त्री के बेटे पर अपने आपको पसारा और बालक ने छींका और आँखें खोलीं (2 राजा 4)। और 2 राजा 13:21 में तो एक मरा हुआ आदमी एलीशा की हड्डियों से छू जाने भर से जी उठा। ये घटनाएँ बिखरी हुई चिंगारियाँ हैं, पर उनका संदेश एक ही है: इस्राएल का परमेश्वर जीवन देनेवाला परमेश्वर हैं।

दुःख के बीच से यह आशा और गहरी होती है। अय्यूब अपनी राख पर बैठा कहता है: "मुझे तो निश्चय है, कि मेरा छुड़ानेवाला जीवित है, और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा" (अय्यूब 19:25)। यहेजकेल को सूखी हड्डियों की घाटी दिखाई जाती है, और जब उससे पूछा जाता है कि क्या ये हड्डियाँ जी सकती हैं, तो वह कहता है, "हे प्रभु यहोवा, तू ही जानता है" (यहेजकेल 37:3)। दानिय्येल 12:2 में वादा और भी स्पष्ट हो जाता है कि भूमि के नीचे सोए हुए लोगों में से बहुत से जाग उठेंगे।

फिर नया नियम आता है और चिंगारियाँ आग बन जाती हैं। यीशु याईर की बेटी का हाथ पकड़कर उसे उठाते हैं। वे नाईन के फाटक पर एक विधवा के इकलौते बेटे की अर्थी छूते हैं और लड़का बैठ जाता है। और बैतनिय्याह में, एक चार दिन पुरानी कब्र के सामने, वे वह करते हैं जो किसी भविष्यद्वक्ता ने नहीं किया था। मार्था का अपना यथार्थवादी विरोध इसे रेखांकित करता है: उसमें से अब तो दुर्गन्ध आती है, क्योंकि उसे चार दिन हो गए (यूहन्ना 11:39)। यहूदी परंपरा मानती थी कि चौथे दिन तक शरीर पहचान से बाहर हो जाता है और लौटने की कोई संभावना नहीं बचती। यीशु ठीक उसी बिंदु पर पहुँचते हैं जहाँ आशा का आख़िरी धागा भी टूट चुका होता है।

लेकिन यह सूत्र लाजर पर खत्म नहीं होता, क्योंकि लाजर दोबारा मरा। उसकी कब्र दूसरी बार भरी गई। असली अंत वहाँ है जहाँ पौलुस हमें ले जाता है: "परन्तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं, उन में पहिला फल हुआ" (1 कुरिन्थियों 15:20)। "पहिला फल" खेत का वह पहला गट्ठा था जिसे इस्राएली परमेश्वर के सामने लहराते थे, इस भरोसे के साथ कि पूरी फ़सल आ रही है। लाजर पहला फल नहीं था; वह बस एक उधार लिया हुआ दिन था। मसीह पहले फल हैं, क्योंकि वे फिर कभी नहीं मरे। बैतनिय्याह में मृत्यु एक कदम पीछे हटी; यरूशलेम के बाहर की कब्र में वह हार गई।

उसके जीवन का सार

लाजर के जीवन में तीन क्षण ऐसे हैं जिनके इर्द-गिर्द बाकी सब घूमता है, और तीनों में वह कुछ "करता" नहीं है। तीनों में उसके साथ कुछ "किया जाता" है।

पहला क्षण: मित्रता और बीमारी। बैतनिय्याह का घर यीशु के लिए यरूशलेम की भीड़ और विवाद से बचने की जगह था। वहाँ वे मेहमान थे, और वहाँ उन्होंने भोजन किया, विश्राम किया, बातें कीं। लाजर कोई शिष्य-दल का सदस्य नहीं था, कोई प्रेरित नहीं था। वह बस वह आदमी था जिसके घर में प्रभु सहज थे। और फिर वही आदमी बीमार पड़ा। यह बात हमें चुभनी चाहिए: मसीह का घनिष्ठ मित्र होना उसे बीमारी से नहीं बचा सका। सुसमाचार कहीं यह नहीं कहता कि लाजर असाधारण रूप से धर्मी था, या कि उसने कोई विशेष सेवा की थी। बाइबल उसके बारे में जो एकमात्र बड़ी बात कहती है, वह उसके बारे में नहीं, यीशु के बारे में है: "जिस से तू प्रीति रखता है।"

दूसरा क्षण: कब्र से पुकारा जाना। यूहन्ना 11:43-44 में जो हुआ वह लाजर की उपलब्धि नहीं थी। उसने विश्वास नहीं किया, उसने प्रार्थना नहीं की, उसने पश्चाताप नहीं किया, क्योंकि मुर्दे ये चीज़ें नहीं करते। वह सिर्फ़ सुना गया और निकल आया। और जब वह निकला, तब भी वह कफ़न में बँधा हुआ था, चलने में असमर्थ, देखने में असमर्थ। जीवन मिल चुका था, पर आज़ादी अभी पूरी नहीं हुई थी। इसलिए यीशु समुदाय को काम देते हैं: "उसे खोलकर जाने दो।" जीवन सिर्फ़ मसीह दे सकते हैं; पट्टियाँ खोलने का काम वे अक्सर कलीसिया को सौंपते हैं।

तीसरा क्षण: मेज़ पर बैठना और निशाना बन जाना। यूहन्ना 12:1-2 में दृश्य बदल जाता है: "फिर यीशु फसह से छ: दिन पहले बैतनिय्याह में आया, जहाँ लाजर था; जिसे यीशु ने मरे हुओं में से जिलाया था। वहाँ उन्होंने उसके लिये भोजन तैयार किया, और मार्था सेवा कर रही थी, और लाजर उनमें से एक था, जो उसके साथ भोजन करने के लिये बैठे थे।" कोई चमत्कारी आभा नहीं, कोई मंच नहीं। जिलाया गया आदमी बस मेज़ पर, अपने प्रभु के साथ, रोटी तोड़ रहा है। लेकिन उसी जीवित देह ने धार्मिक नेताओं की नींद उड़ा दी। यूहन्ना 12:10-11 कहता है: "तब महायाजकों ने लाजर को भी मार डालने की सम्मति की। क्योंकि उसके कारण बहुत से यहूदी चले गए, और यीशु पर विश्वास किया।"

यह सबसे अजीब सत्य है। जिसे मसीह ने जिलाया, उसके सिर पर मृत्यु का वारंट लगा। और इससे भी बड़ा सत्य यह है कि यूहन्ना 11:53 के अनुसार उसी दिन से नेताओं ने यीशु को मार डालने की सम्मति करनी शुरू की। लाजर की ज़िंदगी शाब्दिक अर्थ में यीशु की जान के बदले आई। एक आवाज़ ने उसे जिलाया, उसी आवाज़ ने अपनी कब्र खोदी।

लाजर से हम क्या सीखते हैं

पहला पाठ: जीवन हमेशा दिया जाता है, कमाया नहीं जाता। यदि आप पूरे सुसमाचार में लाजर का एक भी वाक्य खोजेंगे, आपको नहीं मिलेगा। वह चुप है, और यह चुप्पी धर्मशास्त्रीय है। जिस आदमी के पास देने को कुछ नहीं था, उसे सब कुछ मिला। पौलुस बाद में लिखता है कि हम अपने अपराधों और पापों में मरे हुए थे, और मरे हुए लोग अपनी ओर से एक कदम भी नहीं उठा सकते। लाजर अनुग्रह का जीवित, चलता-फिरता चित्र है: बुलाया गया, उठाया गया, खोला गया। हमारे भीतर का धार्मिक आदमी हमेशा यह जानना चाहता है कि उसने ऐसा क्या किया कि परमेश्वर ने उसे चुना। बैतनिय्याह का उत्तर यह है कि उसने कुछ नहीं किया। उसे प्रेम किया गया, बस इतना।

दूसरा पाठ: प्रभु की देरी उनकी उपेक्षा नहीं है। यीशु दो दिन जानबूझकर रुके, और उस देरी ने दो बहनों को तोड़ दिया। लेकिन उसी देरी ने एक ऐसा चमत्कार संभव किया जो किसी भी बीमार-चंगाई से बड़ा था। यदि यीशु समय पर पहुँच जाते, तो हमें एक चंगा हुआ आदमी मिलता; क्योंकि वे देर से पहुँचे, हमें "पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ" मिला। इसका मतलब यह नहीं कि हर देरी के पीछे हमें तुरंत कारण दिख जाएगा। मार्था और मरियम को कारण तब दिखा जब सब खत्म हो चुका था। पर यह भरोसा हमें मिलता है कि जो प्रभु हमारी कब्र के सामने खड़े होकर रोते हैं, वे हमारे दुःख के प्रति उदासीन नहीं हैं।

तीसरा पाठ: जिलाया गया जीवन ख़तरनाक जीवन होता है। लाजर ने कोई उपदेश नहीं दिया, फिर भी लोग उसके कारण विश्वास करने लगे, और इसीलिए उसकी जान को ख़तरा हुआ। गवाही हमेशा शब्दों से शुरू नहीं होती; कभी-कभी आपका बदला हुआ जीवन ही वह सबूत है जिसे दुनिया मिटाना चाहती है। जो व्यक्ति सचमुच अनुग्रह से जिलाया गया है, वह अपने दफ़्तर में, अपने परिवार में, अपने मोहल्ले में एक असुविधाजनक सवाल बन जाता है। और लाजर हमें यह भी याद दिलाता है कि वह दोबारा मरा। उसका चमत्कार अस्थायी था। हमारी अंतिम आशा लाजर जैसी वापसी नहीं, मसीह जैसा पुनरुत्थान है, जिसका पहला फल पहले ही लहराया जा चुका है।

दर्पण

आप शायद इस पृष्ठ पर इसलिए आए हैं क्योंकि कहीं कोई संदेश भेजा जा चुका है और जवाब नहीं आया। रिपोर्ट आ चुकी है। नौकरी जा चुकी है। रिश्ता उस जगह पहुँच चुका है जहाँ से बातचीत भी नहीं बचती। आपने प्रार्थना की, और फिर दोबारा की, और फिर चुप हो गए, क्योंकि चुप रहना कम दर्द देता है।

मार्था का वाक्य आपका वाक्य है: यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई न मरता। यह शिकायत बाइबल ने सेंसर नहीं की। यीशु ने उसे डाँटा नहीं। उन्होंने उसके साथ कब्र तक चलकर, उसके आँसुओं के बीच खड़े होकर, अपने आँसू बहाए। यदि आपको लगता है कि परमेश्वर आपके दुःख को दूर से देखते हैं, तो यूहन्ना 11:35 आपके लिए लिखा गया है।

पर दर्पण का दूसरा हिस्सा ज़्यादा चुभता है। हममें से बहुत लोग अपने जीवन को ऐसे जीते हैं मानो हमें अभी भी जीवन कमाना है। आप ज़्यादा घंटे काम करते हैं ताकि कोई कह दे कि आप काफ़ी हैं। आप अपने शरीर को, अपने बैंक बैलेंस को, अपनी सेवा की सूची को उस पत्थर की तरह इस्तेमाल करते हैं जो आपकी असुरक्षा को ढँके रहे। और इसी बीच आप वह आवाज़ अनसुनी कर देते हैं जो आपका नाम लेकर बुला रही है।

लाजर के पास देने को कुछ नहीं था। उसके पास सिर्फ़ एक मुर्दा शरीर और एक ऐसा मित्र था जिसने उससे प्रेम किया। आपके पास भी, अंत में, यही है। अगर आज आपकी थकान यह कह रही है कि आप पर्याप्त नहीं हैं, तो वह सही कह रही है, और यही सुसमाचार की शुरुआत है।

और यदि आप जिलाए जा चुके हैं, तो एक और सवाल है। आपके आसपास कौन अभी भी कफ़न में बँधा खड़ा है, जिसे किसी के हाथों की ज़रूरत है? मसीह जीवन देते हैं, पर पट्टियाँ खोलने का काम उन्होंने आपको सौंपा है।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को लाजर की कहानी सुनाना आसान है, क्योंकि इसमें वह सब है जो बच्चों का मन पकड़ लेता है: एक बीमार दोस्त, दो उदास बहनें, एक बड़ा पत्थर, और एक ज़ोरदार आवाज़। पर इसे सुनाते समय एक बात का ध्यान रखना ज़रूरी है। बच्चों के मन में मृत्यु को लेकर सचमुच के डर होते हैं, और यह कहानी उन डरों को छूती है। इसलिए कहानी को चमत्कार के तमाशे की तरह नहीं, बल्कि दोस्ती की तरह सुनाइए।

सबसे सरल रूप यह है: यीशु का एक दोस्त था जिसका नाम लाजर था। लाजर बहुत बीमार हो गया और मर गया, और उसकी बहनें बहुत रोईं। जब यीशु आए, तो वे भी रोए, क्योंकि वे अपने दोस्त से बहुत प्यार करते थे। फिर उन्होंने ज़ोर से पुकारा, "लाजर, बाहर आ जाओ," और लाजर ज़िंदा होकर बाहर आ गया। यीशु मृत्यु से भी बड़े हैं।

इसके बाद बच्चों से दो सवाल पूछे जा सकते हैं: यीशु क्यों रोए, और यीशु ने लाजर का नाम लेकर क्यों पुकारा। इन सवालों से बातचीत अपने आप खुल जाती है, और आप बता सकते हैं कि यीशु हमें भी नाम लेकर जानते हैं।

Faith.network पर इस कहानी की अलग-अलग उम्र के लिए तैयार व्याख्याएँ भी उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों (3 से 6 साल) के लिए चित्र और सरल वाक्यों में, स्कूल जाने वाले बच्चों (7 से 12 साल) के लिए सवाल-जवाब के साथ, और किशोरों (12 साल से ऊपर) के लिए उन गहरे सवालों के साथ जो वे सचमुच पूछते हैं, जैसे परमेश्वर देर क्यों करते हैं और मरने के बाद क्या होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लाजर कौन था और वह यीशु का मित्र कैसे बना?

लाजर बैतनिय्याह गाँव का एक साधारण आदमी था, मार्था और मरियम का भाई, और यूहन्ना 11:1-3 के अनुसार वह वही था "जिस से तू प्रीति रखता है।" बाइबल यह नहीं बताती कि यह मित्रता कब और कैसे शुरू हुई। बैतनिय्याह यरूशलेम के बहुत पास था, और लूका 10:38-42 से लगता है कि यह घर यीशु के लिए ठहरने की जानी-पहचानी जगह बन गया था। लाजर प्रेरित नहीं था, उसका कोई पद नहीं था; उसकी पहचान पूरी तरह इस बात पर टिकी है कि प्रभु उससे प्रेम करते थे।

यीशु ने लाजर को चार दिन बाद ही क्यों जिलाया?

यूहन्ना 11:4-6 साफ़ कहता है कि यीशु ने संदेश सुनने के बाद जानबूझकर दो दिन और ठहरने का फ़ैसला किया, और यूहन्ना इसे उनके प्रेम से जोड़ता है, न कि लापरवाही से। उस समय की यहूदी सोच में चौथे दिन तक शरीर पहचान से परे हो जाता था, इसलिए किसी भी तरह की "शायद वह बेहोश था" जैसी व्याख्या की गुंजाइश नहीं बचती। देरी का मक़सद यह था कि मार्था, मरियम और शिष्य देखें कि यीशु सिर्फ़ चंगा करनेवाले नहीं, बल्कि स्वयं पुनरुत्थान और जीवन हैं।

क्या लाजर और लूका 16 वाला भिखारी लाजर एक ही व्यक्ति हैं?

नहीं, ये दो अलग व्यक्ति हैं। लूका 16:19-31 में यीशु एक दृष्टांत सुनाते हैं जिसमें एक धनवान और लाजर नाम का एक भिखारी आता है; वह कहानी शिक्षा देने के लिए कही गई है, और उसका अंत इस चेतावनी से होता है कि यदि लोग मूसा और भविष्यद्वक्ताओं की नहीं सुनते, तो मरे हुओं में से कोई जी उठे तो भी वे नहीं मानेंगे। बैतनिय्याह का लाजर एक वास्तविक व्यक्ति है जिसे यूहन्ना नाम, गाँव और परिवार के साथ दर्ज करता है। दिलचस्प बात यह है कि दृष्टांत की चेतावनी यूहन्ना 12:10-11 में अक्षरशः सच हुई।

यीशु क्यों रोए जबकि वे जानते थे कि लाजर जी उठेगा?

यूहन्ना 11:35 का "यीशु के आँसू बहने लगे" दिखाता है कि परमेश्वर का पुत्र मृत्यु को तटस्थ भाव से नहीं देखते। मूल पाठ में उनके भीतर क्रोध और गहरी व्यथा दोनों का संकेत है; वे उस सब पर क्रुद्ध हैं जो पाप ने परमेश्वर की सृष्टि के साथ किया। साथ ही वे अपने मित्रों के साथ सचमुच रो रहे हैं। यह हमें सिखाता है कि शोक अविश्वास नहीं है। भविष्य का सुखद अंत जानना वर्तमान के दर्द को झूठा नहीं बनाता, और आपका प्रभु आपके आँसुओं से शर्मिंदा नहीं होते।

लाजर के जी उठने और यीशु के जी उठने में क्या अंतर है?

लाजर का उठना "पुनर्जीवन" था, यानी उसी नश्वर शरीर में वापसी; वह आगे चलकर दोबारा मरा और उसकी कब्र फिर भरी गई। यीशु का पुनरुत्थान बिल्कुल अलग है: वे महिमामय, अविनाशी शरीर में उठे और फिर कभी मृत्यु के अधीन नहीं हुए। इसी कारण 1 कुरिन्थियों 15:20 कहता है, "परन्तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं, उन में पहिला फल हुआ।" लाजर एक उधार लिया हुआ दिन था; मसीह उस पूरी फ़सल की पहली बाली हैं जो सब विश्वासियों के लिए आ रही है।

लाजर ने मृत्यु के बाद क्या देखा, क्या उसने कुछ बताया?

बाइबल इस बारे में पूरी तरह चुप है, और यह चुप्पी जानबूझकर है। लाजर सुसमाचार में एक भी शब्द नहीं बोलता, न अनुभव सुनाता है, न कोई दर्शन बताता है। यदि परमेश्वर चाहते कि हम परलोक का नक्शा जानें, तो यह सबसे अच्छा मौका था। इसके बजाय पूरा ध्यान उस व्यक्ति पर रखा गया है जिसने पुकारा। मृत्यु के बाद के अनुभवों की आधुनिक कहानियों को इसलिए हमेशा पवित्रशास्त्र की कसौटी पर परखना चाहिए, न कि पवित्रशास्त्र को उन कहानियों से भरना चाहिए।

"पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ" का असली अर्थ क्या है?

यूहन्ना 11:25-26 में यीशु मार्था के भविष्य-केंद्रित विश्वास को अपने व्यक्तित्व पर केंद्रित कर देते हैं। मार्था मानती थी कि अंतिम दिन पुनरुत्थान होगा; यीशु कहते हैं कि वह अंतिम दिन अभी उसके सामने खड़ा है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि अनंत जीवन मरने के बाद शुरू होनेवाली कोई चीज़ नहीं, बल्कि मसीह के साथ जुड़ाव है जो अभी शुरू होता है और जिसे मृत्यु तोड़ नहीं सकती। इसीलिए वे जोड़ते हैं, "क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?" यह सूचना नहीं, निमंत्रण है।

महायाजक लाजर को क्यों मार डालना चाहते थे?

यूहन्ना 12:10-11 कहता है: "तब महायाजकों ने लाजर को भी मार डालने की सम्मति की। क्योंकि उसके कारण बहुत से यहूदी चले गए, और यीशु पर विश्वास किया।" लाजर जीवित सबूत था, और सबूत को तर्क से काटना मुश्किल था, इसलिए उन्होंने सबूत को ही हटाने की सोची। इसमें मानव हृदय की कठोरता दिखती है: चमत्कार अपने आप विश्वास पैदा नहीं करता, वह केवल यह उजागर करता है कि दिल पहले से किस ओर झुका है। डर और सत्ता की रक्षा ने उन्हें एक ऐसे आदमी की हत्या की योजना तक पहुँचा दिया जिसका अपराध सिर्फ़ ज़िंदा होना था।

लाजर के साथ बाद में क्या हुआ, उसकी मृत्यु कैसे हुई?

बाइबल यूहन्ना 12 के भोजन के बाद लाजर के बारे में कुछ नहीं बताती। बाद की कलीसियाई परंपराओं में अलग-अलग कहानियाँ मिलती हैं, जैसे यह कि वह साइप्रस के किशन शहर का बिशप बना, या यह कि वह फ़्रांस के मार्सेल गया। ये परंपराएँ सदियों बाद की हैं और उन पर विश्वास-सिद्धांत नहीं टिकाया जा सकता। जो बात निश्चित है वह यह है कि लाजर दोबारा मरा, क्योंकि यीशु ने उसे अमरता नहीं, कुछ और वर्ष दिए थे। उसकी असली आशा भी वही है जो हमारी है: अंतिम दिन का पुनरुत्थान।

मार्था और मरियम की प्रतिक्रिया में क्या फ़र्क था?

दोनों बहनें यीशु से बिल्कुल एक ही वाक्य कहती हैं, कि यदि वे वहाँ होते तो उनका भाई न मरता, पर उनका ढंग अलग है। मार्था यीशु से मिलने दौड़कर बाहर जाती है और धर्मशास्त्रीय बातचीत करती है, और उसी बातचीत में उसे यूहन्ना 11:25-26 का वचन मिलता है। मरियम घर में बैठी रहती है और जब आती है तो उनके पाँवों पर गिरकर रोती है, और उसी रोने के जवाब में यीशु के आँसू निकलते हैं। परमेश्वर दोनों तरह के शोक से मिलते हैं, तर्क करने वाले से भी और टूटकर रोने वाले से भी।

क्या लाजर का जी उठना सचमुच इतिहास में हुआ, और बाकी सुसमाचार इसका ज़िक्र क्यों नहीं करते?

यूहन्ना इस घटना को समय, स्थान, नाम और गवाहों के साथ दर्ज करता है, और वह यह भी बताता है कि इसी घटना के बाद यीशु के विरुद्ध हत्या की योजना बनी (यूहन्ना 11:53), जो कथा की ऐतिहासिक कड़ी को मज़बूत करता है। मत्ती, मरकुस और लूका यीशु की गलील की सेवकाई पर अधिक केंद्रित हैं और सभी घटनाएँ दर्ज नहीं करते; कुछ विद्वान यह भी सुझाते हैं कि शुरुआती वर्षों में लाजर की सुरक्षा एक कारण रही होगी, क्योंकि उस पर जान का ख़तरा था। यूहन्ना सबसे बाद में लिखता है, जब यह ख़तरा बीत चुका था।

क्या परमेश्वर आज भी मरे हुओं को जिलाते हैं?

परमेश्वर की सामर्थ्य आज भी वैसी ही है, और उन्होंने अपने हाथ नहीं बाँध रखे हैं; बाइबल में प्रेरितों के द्वारा भी ऐसे चमत्कार हुए, जैसे तबीता और यूतुखुस के साथ। पर नया नियम हमें ऐसे चमत्कारों की अपेक्षा सामान्य नियम की तरह नहीं सिखाता, और यह याद रखना ज़रूरी है कि जिलाया गया हर व्यक्ति अंततः फिर मरा। मसीही आशा मृत्यु को टालने में नहीं, बल्कि उस दिन में है जब मसीह के पहिले फल के पीछे पूरी फ़सल उठाई जाएगी। सबसे बड़ा चमत्कार अब भी वही है जब आत्मिक रूप से मरा हुआ व्यक्ति मसीह की आवाज़ सुनकर जीवित होता है।

लाजर नाम का अर्थ क्या है और क्या वह महत्वपूर्ण है?

लाजर इब्रानी नाम "एलिआज़ार" का यूनानी रूप है, जिसका अर्थ है "परमेश्वर सहायता करते हैं" या "परमेश्वर ने सहायता की है।" उस घर में जहाँ चार दिन तक लगा कि परमेश्वर ने सहायता नहीं की, अंत में उस नाम का अर्थ ही पुकारा गया। यूहन्ना 11:43 में यीशु किसी सामान्य आदेश से नहीं, बल्कि नाम लेकर पुकारते हैं: "हे लाजर, निकल आ।" यह उसी चरवाहे की आवाज़ है जो अपनी भेड़ों को नाम से जानता है, और यही आश्वासन हर विश्वासी के लिए है कि हम भीड़ नहीं, नाम हैं।

अंत में

लाजर की कहानी को हम अक्सर चमत्कारों की सूची में डाल देते हैं, जैसे वह एक ताकत का प्रदर्शन हो। पर यूहन्ना इसे वहाँ नहीं रखता। वह इसे वह दरवाज़ा बनाता है जिससे होकर यीशु क्रूस में प्रवेश करते हैं। बैतनिय्याह में पत्थर हटा, एक आदमी बाहर आया, और उसी दिन से यरूशलेम में यीशु की मृत्यु का फ़ैसला होने लगा। जीवन मुफ़्त मिला, पर मुफ़्त था नहीं।

और उस पूरी कहानी के बीचों-बीच एक चुप आदमी खड़ा है जिसने कुछ नहीं कहा, कुछ नहीं किया, कुछ नहीं कमाया। वही सुसमाचार का सबसे साफ़ चित्र है। हम सब लाजर हैं: बुलाए गए, उठाए गए, और दूसरों के हाथों से खोले गए।

आगे पढ़ने के लिए यूहन्ना 11 को एक बैठक में, धीरे-धीरे, ज़ोर से पढ़िए, और हर बार रुक जाइए जहाँ कोई वाक्य आपके अपने हालात से टकराए। फिर 1 कुरिन्थियों 15 पूरा पढ़िए, क्योंकि वहीं बैतनिय्याह की अधूरी खुशी अपनी पूरी ऊँचाई पाती है। और आख़िर में एक सवाल अपने साथ ले जाइए, वही जो मार्था से पूछा गया था: क्या आप इस बात पर विश्वास करते हैं?

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अंतर्दृष्टियों की दीवार

पवित्रशास्त्र में आपको क्या स्पर्श करता है? हम किसके लिए प्रार्थना करें? हम परमेश्वर का किसके लिए धन्यवाद करें?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर यिर्मयाह 46:3

ढाल और फरी तैयार करके लड़ने को निकट चलो!" यह पुकार मिस्र की विशाल सेना को है, जो कुछ ही…

प्रार्थना संपादकीय पर न्यायियों 5:3

पिता, मेरा मन आज गाना चाहता है, चाहे आवाज़ कमज़ोर ही क्यों न हो। जो कुछ तूने किया है, उसे…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर श्रेष्ठगीत 4:12

मेरी बहन, मेरी दुल्हन, एक बन्द किया हुआ बाग़ है, वह ढका हुआ सोता और मुहरबन्द जल का सोता है।"…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर व्यवस्थाविवरण 13:7

प्रलोभन अजनबी के मुँह से नहीं आता। यह तेरे भाई, तेरी पत्नी, तेरे उस मित्र के होंठों से फुसफुसाता है…

धन्यवाद संपादकीय पर आमोस 2:7

धन्यवाद, प्रभु, कि आप कंगालों के सिर की धूल तक को देखते हैं और नम्र लोगों की आहें आपसे छिपी…

प्रार्थना संपादकीय पर 1 राजाओं 2:39

पिता, कितनी बार छोटी सी चीज़ खो जाने पर मैं वह सीमा लाँघ जाता हूँ जो आपने मेरे भले के…

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