2 कुरिन्थियों 12:9
पाठ
तीन बार पौलुस ने प्रार्थना की कि यह काँटा हट जाए। तीन बार। और उत्तर मिला, पर वह नहीं जो वह माँग रहा था: "मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है।" काँटा वहीं रहा, प्रार्थना का उत्तर बदल गया। और पौलुस, जो अभी-अभी तीसरे स्वर्ग तक उठाए जाने की बात कर रहा था, अब कहता है कि वह बड़े आनन्द से अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करेगा, इसलिए नहीं कि निर्बलता अपने आप में अच्छी है, बल्कि इसलिए कि "मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया करती रहे।" यह चंगाई की कहानी नहीं है। यह उस आदमी की कहानी है जिसने चंगाई माँगी और उसकी जगह परमेश्वर की उपस्थिति मिली, और जिसने इसे सौदा नहीं, लाभ माना।
मूल मर्म
यहाँ जो टूटता है वह हमारा यह छिपा हुआ विश्वास है कि परमेश्वर हमारी ताकत के रास्ते काम करते हैं और हमारी कमज़ोरी उनके काम में बाधा है। पौलुस कहता है, उल्टा सच है। "सिद्ध होती है" के लिए जो यूनानी शब्द है, तेलेइताई, का अर्थ है पूरी तरह अपने लक्ष्य तक पहुँचना, अपनी पूर्णता में प्रकट होना। परमेश्वर की सामर्थ्य कमज़ोरी के बावजूद नहीं, कमज़ोरी में अपने पूरे आकार में दिखती है। इसका व्यावहारिक अर्थ कठोर है: वह चीज़ जिसे आप अपने जीवन की सबसे बड़ी अयोग्यता मानते हैं, आपका स्वभाव, आपकी बीमारी, आपकी सीमित आमदनी, आपकी असफल परवरिश, वही जगह हो सकती है जहाँ मसीह सबसे साफ़ दिखाई देते हैं। और अनुग्रह यहाँ कोई भावना नहीं है; वह वह सामर्थ्य है जो टिकाए रखती है जब हटाई नहीं जाती।
सूत्र
यह वाक्य पौलुस ने अपने भीतर से नहीं गढ़ा; उसने इसे क्रूस से सीखा। परमेश्वर की सबसे बड़ी कार्रवाई इतिहास में एक कमज़ोर जगह पर हुई: एक विफल दिखते हुए यहूदी शिक्षक की सूली, जो न ताकत का प्रदर्शन थी न विजय का जुलूस। जो लोग रोमी साम्राज्य में शक्ति का व्याकरण जानते थे, उनके लिए यह मूर्खता थी। पर वहीं उद्धार हुआ। इसलिए जब पौलुस कहता है कि सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है, तो वह कोई मनोवैज्ञानिक तरकीब नहीं सिखा रहा, वह अपने प्रभु के तरीके को दोहरा रहा है। परमेश्वर पूरे बाइबल में इसी ढंग से काम करते हैं: बाँझ स्त्रियों से वंश, छोटे भाइयों से राजा, गुलाम जाति से एक राष्ट्र। अनुग्रह हमेशा नीचे से ऊपर की ओर काम करता है।
दर्पण
अब ईमानदारी से। आप शायद अपनी कमज़ोरी को ढाँपने में जितनी ऊर्जा लगाते हैं, उतनी काम में भी नहीं लगाते। दफ़्तर में आप वह नहीं कहते जो नहीं आता, क्योंकि कमज़ोर दिखना महँगा पड़ता है। घर में आप बच्चों के सामने कभी नहीं मानते कि आप डरे हुए हैं। पैसे की तंगी को आप त्योहार पर छिपा लेते हैं। बीमार शरीर के बारे में आप कलीसिया में कहते हैं "सब ठीक है", क्योंकि विश्वासी लोग शिकायत नहीं करते। पौलुस का रास्ता इससे उल्टा है: वह अपनी सीमा को छिपाता नहीं, उस पर घमण्ड करता है, क्योंकि वही जगह है जहाँ मसीह की छाया पड़ती है। यह आत्मदया नहीं, यह साहस है।
आज एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जिसे हटाने के लिए आपने बार-बार प्रार्थना की है, और उसके नीचे लिखिए: "मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है", फिर उसे ज़ोर से एक बार पढ़िए।
मुख्य पात्र
पौलुस यहाँ अजीब स्थिति में है। उसे कुरिन्थ की कलीसिया के सामने अपनी साख बचानी है, प्रतिद्वंद्वी शिक्षक उसे कमज़ोर और मामूली कह रहे हैं, और वह इस दबाव में "घमण्ड" तो करता है, पर उलटी दिशा में। जो आदमी तीसरे स्वर्ग तक उठाया गया, वह अपना सबसे बड़ा अनुभव तीसरे व्यक्ति में, दूरी बनाकर बताता है, और अपने नाम से केवल अपनी निर्बलताएँ जोड़ता है। यह विनम्रता की मुद्रा नहीं है, यह चुनी हुई रणनीति है: वह नहीं चाहता कि कोई उसे उससे बढ़कर समझे। और उस "आनन्द" को हल्के में न लें। यह किसी हारे हुए आदमी का समर्पण नहीं, बल्कि उस आदमी की स्वतंत्रता है जिसे अब अपनी छवि की रक्षा नहीं करनी।
कठिन प्रश्न
तो क्या परमेश्वर काँटे भेजते हैं? पाठ सीधा उत्तर नहीं देता। पौलुस कहता है यह "शैतान का एक दूत" है, पर वाक्य का ढाँचा बताता है कि वह चुभाया गया, यानी किसी ने इसकी अनुमति दी, और उसका उद्देश्य भी है: "कि मैं फूल न जाऊँ"। यह असहज है। इसका मतलब यह नहीं कि हर दर्द का कोई साफ़ मक़सद है जिसे हम पहचान सकते हैं, और न ही यह कि दुख को हटाने की प्रार्थना गलत है; पौलुस ने खुद तीन बार माँगा। खतरा यह है कि हम इस पद को लेकर दूसरों की पीड़ा को समझा दें। पौलुस अपने काँटे के बारे में यह कह रहा है, आपके पड़ोसी के काँटे के बारे में नहीं। यह गवाही है, सिद्धांत नहीं।
पहले सुननेवाले
कुरिन्थ एक ऐसा शहर था जहाँ वक्ता की ताकत उसकी उपस्थिति, आवाज़ और आत्मविश्वास से नापी जाती थी। वहाँ के लोग नई पीढ़ी के धर्मगुरुओं से प्रभावित थे जो प्रभावशाली दिखते थे और पैसे भी लेते थे। पौलुस उनके सामने बीमार, कमज़ोर बोलने वाला, हाथ से काम करके जीने वाला आदमी था। जब उन्होंने यह पत्र सुना, तो उन्हें सिर्फ़ आराम नहीं मिला, चोट लगी: उनका पूरा मूल्यांकन-तंत्र उलट दिया गया था। जिस चीज़ को वे प्रेरितीय अधिकार का प्रमाण मानते थे, पौलुस उसे संदेह की दृष्टि से देखता है, और जिसे वे शर्म मानते थे, उसे वह अपना गौरव कहता है। यही चुनौती हमारी कलीसियाओं के मंच पर आज भी खड़ी है।
चिंतन के प्रश्न
आपकी कौन-सी कमज़ोरी ऐसी है जिसे आप कलीसिया में सबसे ज़्यादा छिपाते हैं, और वह छिपाना आपको हर हफ़्ते कितना थकाता है?
अगर परमेश्वर आपकी सबसे बड़ी प्रार्थना का उत्तर "मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है" के रूप में दें, तो क्या आप इसे उत्तर मानेंगे या इनकार?
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2 Corinthians 12:9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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2 कुरिन्थियों 12:9 किस विषय में है?
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2 कुरिन्थियों 12:9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 कुरिन्थियों 12:9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Corinthians 12 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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