बाइबल व्याख्या

2 कुरिन्थियों 5:9

बाइबल
यह वचन POWER OF GOD FAITH MINISTRIES द्वारा समर्पित है

यह वचन

पौलुस अभी-अभी मृत्यु और जीवन, देह में रहने और देह से अलग होने की बात कर चुका है, और अब वह एक ही वाक्य में दोनों को एक कर देता है: "इस कारण हमारे मन की उमंग यह है, कि चाहे साथ रहें, चाहे अलग रहें पर हम उसे भाते रहें।" यानी यहाँ जीना हो या वहाँ पहुँच जाना, परिस्थिति चाहे जो हो, एक ही लक्ष्य बचता है। जो चीज़ पौलुस के पूरे अस्तित्व को दिशा देती है, वह जीवित रहना नहीं और मर जाना भी नहीं, बल्कि प्रभु को भाना है। दोनों दरवाज़ों के पार वही एक चेहरा खड़ा है, और उसी चेहरे की प्रसन्नता पौलुस की महत्वाकांक्षा बन गई है।

मूल बात

"भाते रहें" सुनते ही मन में डर जागता है कि कहीं यह परमेश्वर को खुश करने की मज़दूरी तो नहीं। पर ध्यान दीजिए कि पौलुस यह वाक्य कहाँ रखता है। चार पद पहले वह कह चुका है कि परमेश्वर ने ही "हमें बयाने में आत्मा भी दिया है" और बारह पद बाद वह पूरी बात खोल देगा: परमेश्वर ने मसीह में होकर अपने साथ संसार का मेल मिलाप कर लिया। अर्थात् सम्बन्ध पहले से बन चुका है, अनुग्रह से, वाचा के भीतर। भाने की चाह उस सम्बन्ध की कीमत नहीं, उसका फल है। यूनानी शब्द जो यहाँ है, फ़िलोतिमेओमाई, का अर्थ है "अपनी महत्वाकांक्षा बनाना", वही शब्द जो सम्मान और पद के लिए दौड़ते लोगों पर लगता था। पौलुस ने उस दौड़ का लक्ष्य बदल दिया है, दौड़ मिटाई नहीं। यही मसीही जीवन की अजीब गरिमा है: बचाया हुआ व्यक्ति निठल्ला नहीं बैठता, वह प्रेम से महत्वाकांक्षी हो जाता है।

सूत्र

पूरे बाइबल की कहानी में यह सवाल बार-बार लौटता है: परमेश्वर किससे प्रसन्न होते हैं? हाबिल की भेंट, नूह की बलि, मन्दिर की सुगन्ध, भविष्यद्वक्ताओं की वह कड़वी चेतावनी कि परमेश्वर को बलिदानों से नहीं, टूटे मन से प्रसन्नता होती है। मनुष्य की सबसे पुरानी प्यास यही है कि उसे स्वीकार किया जाए। और इसका उत्तर यरदन के किनारे आया, जब स्वर्ग से आवाज़ आई कि यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रसन्न हूँ। मसीह वह एक व्यक्ति हैं जिन्हें परमेश्वर की पूरी प्रसन्नता मिली, और पद 21 के अनुसार हम "उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन" जाते हैं। इसलिए पौलुस की महत्वाकांक्षा हवा में नहीं लटकी; वह उस स्वीकृति के भीतर खड़ी है जो पहले ही मसीह में हमें दी जा चुकी है। हम प्रसन्नता कमाने नहीं दौड़ते, हम उस प्रसन्नता के भीतर जीना सीखते हैं।

दर्पण

आपका दिन शायद इन्हीं सवालों पर टिका है: बॉस क्या कहेगा, माँ-बाप संतुष्ट हैं या नहीं, कलीसिया में लोग मुझे गम्भीरता से लेते हैं या नहीं। हम सब किसी न किसी दर्शक के लिए अभिनय करते हैं, और वह दर्शक कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं होता। पौलुस यह नहीं कहता कि दर्शकों की चिन्ता छोड़ दो; वह कहता है कि दर्शक बदल लो। और ध्यान दीजिए कि यह "चाहे साथ रहें, चाहे अलग रहें" वाली बात कैंसर की रिपोर्ट, नौकरी छूटने और बूढ़े होते शरीर को भी अपने भीतर समेट लेती है। अगर लक्ष्य केवल जीवित रहना है, तो हर बीमारी हार है। अगर लक्ष्य प्रभु को भाना है, तो अस्पताल का बिस्तर भी सेवा की जगह बन जाता है। आज एक काम कीजिए: अपने कल के कार्यक्रम पर नज़र डालिए, उसमें से एक काम चुनिए जो आप अब तक दूसरों की नज़र में अच्छा दिखने के लिए करते आए हैं, और उस काम के आगे लिख दीजिए, "यह प्रभु के लिए।"

पहले सुनने वाले

कुरिन्थुस की कलीसिया प्रदर्शन की दीवानी थी। वहाँ के लोग वक्ताओं की चमक, शरीर की मज़बूती और सामाजिक प्रतिष्ठा से प्रभावित होते थे, और पौलुस उनकी नज़र में कमज़ोर, पिटा हुआ, कम प्रभावशाली आदमी था। उसी संदर्भ में वह पद 12 में कहता है कि कुछ लोग "मन पर नहीं, वरन् दिखावटी बातों पर घमण्ड करते हैं।" ग्रीक-रोमी संस्कृति में महत्वाकांक्षा का अर्थ था नगर में नाम कमाना, शिलालेख पर अपना नाम खुदवाना। जब पौलुस उसी महत्वाकांक्षा वाले शब्द को उठाकर कहता है कि मेरी दौड़ केवल प्रभु को भाने की है, तो वह उनके पूरे सम्मान-तंत्र को उलट देता है। उन्होंने यह वाक्य ललकार की तरह सुना होगा, हमारी तरह मीठे भक्ति-वचन की तरह नहीं।

मुख्य पात्र

इस पद के पीछे का पौलुस कोई शान्त संत नहीं है। कुछ ही पंक्तियों पहले वह "कराहते" शब्द दो बार इस्तेमाल करता है, बोझ से दबा हुआ आदमी। वह मृत्यु से न इनकार करता है, न उसका महिमामंडन करता है; वह उसे सचाई से देखता है और फिर उससे ऊपर देखता है। उसकी आत्मिक दुनिया में तनाव है: शरीर थक चुका है, प्रभु से मिलने की तड़प है, और साथ ही कलीसियाओं की ज़िम्मेदारी उसे यहीं बाँधे रखती है। यह पद उसी तनाव का समाधान है, पलायन नहीं। जो व्यक्ति यह कह सकता है कि जीना और मरना दोनों मेरे लक्ष्य को नहीं बदलते, वह मुक्त आदमी है, क्योंकि अब उससे कुछ छीनकर उसे तोड़ा नहीं जा सकता।

कठिन सवाल

पर क्या हम सचमुच जान सकते हैं कि हम परमेश्वर को भा रहे हैं? अगला ही पद न्याय आसन की बात करता है, जहाँ "हर एक व्यक्ति अपने-अपने भले बुरे कामों का बदला" पाएगा। यह डरावना है, और पौलुस इसे मीठा बनाने की कोशिश नहीं करता। वह पद 11 में साफ़ कहता है कि वह "प्रभु का भय मानकर" काम करता है। यहाँ आसान उत्तर देना बेईमानी होगी। सच यह है कि हमारे पास कोई तराजू नहीं जिस पर हम अपनी आज्ञाकारिता तौल सकें। जो हमारे पास है, वह बयाने में दिया गया आत्मा है और वह मेल मिलाप जो परमेश्वर ने स्वयं कर लिया। भय और भरोसा दोनों साथ रहते हैं, और शायद इसी तनाव में विश्वास परिपक्व होता है।

मनन के लिए

अगर आज आपका शरीर, आपकी नौकरी और आपकी प्रतिष्ठा छिन जाए, तो क्या आपकी सबसे गहरी उमंग फिर भी जीवित रहेगी?

आप किसकी प्रसन्नता के लिए सबसे ज़्यादा मेहनत करते हैं, और उस चेहरे की जगह प्रभु का चेहरा रखने से कल का कौन-सा निर्णय बदल जाएगा?

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2 Corinthians 5:9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 कुरिन्थियों 5:9 का क्या अर्थ है?
पौलुस अभी-अभी मृत्यु और जीवन, देह में रहने और देह से अलग होने की बात कर चुका है, और अब वह एक ही वाक्य में दोनों को एक कर देता है: "इस कारण हमारे मन की उमंग यह है, कि चाहे साथ रहें, चाहे अलग रहें पर हम उसे भाते रहें।" यानी यहाँ जीना हो या वहाँ पहुँच जाना, परिस्थिति चाहे जो हो, एक ही लक्ष्य बचता है। जो चीज़ पौलुस के पूरे अस्तित्व को दिशा देती है, वह जीवित रहना नहीं और मर जाना भी नहीं, बल्कि प्रभु को भाना है। दोनों दरवाज़ों के पार वही एक चेहरा खड़ा है, और उसी चेहरे की प्रसन्नता पौलुस की महत्वाकांक्षा बन गई है।
2 कुरिन्थियों 5:9 किस विषय में है?
पूरे बाइबल की कहानी में यह सवाल बार-बार लौटता है: परमेश्वर किससे प्रसन्न होते हैं? हाबिल की भेंट, नूह की बलि, मन्दिर की सुगन्ध, भविष्यद्वक्ताओं की वह कड़वी चेतावनी कि परमेश्वर को बलिदानों से नहीं, टूटे मन से प्रसन्नता होती है। मनुष्य की सबसे पुरानी प्यास यही है कि उसे स्वीकार किया जाए। और इसका उत्तर यरदन के किनारे आया, जब स्वर्ग से आवाज़ आई कि यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रसन्न हूँ। मसीह वह एक व्यक्ति हैं जिन्हें परमेश्वर की पूरी प्रसन्नता मिली, और पद 21 के अनुसार हम "उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन" जाते हैं। इसलिए पौलुस की महत्वाकांक्षा हवा में नहीं लटकी; वह उस स्वीकृति के भीतर खड़ी है जो पहले ही मसीह में हमें दी जा चुकी है। हम प्रसन्नता कमाने नहीं दौड़ते, हम उस प्रसन्नता के भीतर जीना सीखते हैं।
2 कुरिन्थियों 5:9 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
कुरिन्थुस की कलीसिया प्रदर्शन की दीवानी थी। वहाँ के लोग वक्ताओं की चमक, शरीर की मज़बूती और सामाजिक प्रतिष्ठा से प्रभावित होते थे, और पौलुस उनकी नज़र में कमज़ोर, पिटा हुआ, कम प्रभावशाली आदमी था। उसी संदर्भ में वह पद 12 में कहता है कि कुछ लोग "मन पर नहीं, वरन् दिखावटी बातों पर घमण्ड करते हैं।" ग्रीक-रोमी संस्कृति में महत्वाकांक्षा का अर्थ था नगर में नाम कमाना, शिलालेख पर अपना नाम खुदवाना। जब पौलुस उसी महत्वाकांक्षा वाले शब्द को उठाकर कहता है कि मेरी दौड़ केवल प्रभु को भाने की है, तो वह उनके पूरे सम्मान-तंत्र को उलट देता है। उन्होंने यह वाक्य ललकार की तरह सुना होगा, हमारी तरह मीठे भक्ति-वचन की तरह नहीं।
2 कुरिन्थियों 5:9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पर क्या हम सचमुच जान सकते हैं कि हम परमेश्वर को भा रहे हैं? अगला ही पद न्याय आसन की बात करता है, जहाँ "हर एक व्यक्ति अपने-अपने भले बुरे कामों का बदला" पाएगा। यह डरावना है, और पौलुस इसे मीठा बनाने की कोशिश नहीं करता। वह पद 11 में साफ़ कहता है कि वह "प्रभु का भय मानकर" काम करता है। यहाँ आसान उत्तर देना बेईमानी होगी। सच यह है कि हमारे पास कोई तराजू नहीं जिस पर हम अपनी आज्ञाकारिता तौल सकें। जो हमारे पास है, वह बयाने में दिया गया आत्मा है और वह मेल मिलाप जो परमेश्वर ने स्वयं कर लिया। भय और भरोसा दोनों साथ रहते हैं, और शायद इसी तनाव में विश्वास परिपक्व होता है।
2 कुरिन्थियों 5:9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आप किसकी प्रसन्नता के लिए सबसे ज़्यादा मेहनत करते हैं, और उस चेहरे की जगह प्रभु का चेहरा रखने से कल का कौन-सा निर्णय बदल जाएगा?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

2 Corinthians 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

पौलुस यह बात वहाँ कहता है जहाँ वह समझा रहा है कि अब वह किसी को शरीर के अनुसार नहीं पहचानता। "इसलिए यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब बातें नई हो गई हैं।" ध्यान दे, यह कल की आशा नहीं, बीता हुआ काम है। तो जिस इंसान को तू आज तक उसके पुराने रूप में देखता आया है, क्या तू उसे नई सृष्टि मान पाएगा?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

पौलुस कहता है, "यदि हम बेसुध हैं, तो परमेश्वर के लिये; और यदि चैतन्य हैं, तो तुम्हारे लिये हैं।" कुरिन्थ के लोग उस पर हँसते थे कि वह जुनूनी है, पागल है। पौलुस बचाव नहीं करता, बस इतना कहता है कि उसकी दीवानगी परमेश्वर के सामने है, और उसकी समझदारी उनकी भलाई के लिए।

सोचो, क्या तुम्हारा प्रेम भी ऐसा है? जो आँसू, जो प्रार्थनाएँ दुनिया को बेतुकी लगें, वे परमेश्वर के लिए हों; और जो शब्द तुम बोलते हो, वे दूसरे की भलाई के लिए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

पौलुस ने अभी अभी लिखा है कि हम शरीर में हों या शरीर से अलग, हमारी असली चाहत क्या है? यही, "हम यही लक्ष्य रखते हैं, कि चाहे साथ रहें, चाहे अलग रहें, हम उसे भाते रहें।"

सोचो, न स्वर्ग पाना लक्ष्य है, न दुख से बचना। बस उसे भाना। जैसे एक बच्चा दिनभर की छोटी छोटी बातों में पिता की मुस्कान ढूँढता है। आज तुम्हारा लक्ष्य क्या है?

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