बाइबल व्याख्या

कुलुस्सियों 1:28

बाइबल
यह वचन POT – The Pentecostals of Trichy द्वारा समर्पित है

पाठ

पौलुस एक ही साँस में अपनी पूरी सेवा का सार दे देता है: हम मसीह का प्रचार करते हैं, हर एक मनुष्य को चेतावनी देते हुए, हर एक मनुष्य को सारे ज्ञान से सिखाते हुए, ताकि हम हर एक व्यक्ति को मसीह में सिद्ध करके उपस्थित कर सकें। तीन बार "हर एक" आता है, मानो वह कोई कील ठोक रहा हो। और अंत में एक अजीब सा क्रिया-शब्द: उपस्थित करना, किसी को किसी के सामने पेश करना।

मर्म

सुसमाचार का लक्ष्य सिर्फ़ निर्णय लेना नहीं, बल्कि व्यक्ति का पूरा होना है। "सिद्ध" यहाँ निर्दोषता नहीं, परिपक्वता है, वह वयस्कता जो मसीह में जड़ पकड़ चुकी है। और ध्यान दीजिए कि इस परिपक्वता तक पहुँचाने के दो औज़ार हैं: चेतावनी और शिक्षा। हम शिक्षा को पसंद करते हैं, चेतावनी को नहीं; पर पौलुस दोनों को एक ही वाक्य में रखता है, बिना क्षमा माँगे। साथ ही यह सब आत्मबल से नहीं होता, क्योंकि आधार पिछली आयत में पड़ चुका है: "मसीह जो महिमा की आशा है तुम में रहता है।" परिपक्वता उसी की उपस्थिति का फल है, हमारी मेहनत का उत्पाद नहीं।

मुख्य सूत्र

"उपस्थित करना" मंदिर की भाषा है। पुराने नियम में बलि परमेश्वर के सम्मुख लाई जाती थी, और वह निर्दोष होनी चाहिए थी; अब्राहम से भी कहा गया था कि वह परमेश्वर के सामने चले और सिद्ध बने। पौलुस उसी शब्दावली को उठाकर अन्यजातियों पर लगा देता है: जो कभी आँगन के बाहर खड़े थे, वे अब भेंट की तरह भीतर लाए जा रहे हैं। पर सूत्र यहीं मुड़ता है। आयत 22 में यह काम मसीह करते हैं, वे ही "पवित्र और निष्कलंक, और निर्दोष बनाकर उपस्थित" करते हैं। तो आयत 28 में पौलुस केवल उस पेशकश में शामिल हो रहा है जो क्रूस पर पहले ही सुनिश्चित हो चुकी।

दर्पण

यह पद हमारी दो चुपचाप पली हुई आदतों को उघाड़ता है। पहली, हम लोगों को श्रेणियों में बाँटते हैं: ये सिखाने लायक हैं, वे नहीं; इसमें निवेश करना सार्थक है, उसमें समय बर्बाद। कक्षा में, दफ़्तर में, रिश्तेदारी में हम यह छँटाई रोज़ करते हैं। दूसरी, हम चेतावनी से बचते हैं, इसलिए नहीं कि हम प्रेमी हैं, बल्कि इसलिए कि हमें रिश्ता टूटने का डर है। पौलुस का "हर एक मनुष्य" दोनों पर चोट करता है। आज ही एक काम कीजिए: उस व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसे आपने मन ही मन आध्यात्मिक रूप से बेकार मान लिया है, और उस नाम के साथ दो मिनट प्रार्थना कीजिए कि मसीह उसमें बसें।

अंतर्पाठ

तीन जगहें इस पद के साथ गूँजती हैं। पहली, इसी पत्री की आयत 22, जहाँ उपस्थित करनेवाले मसीह हैं; इससे साफ़ होता है कि पौलुस का परिश्रम मसीह के काम का प्रतिद्वंद्वी नहीं, उसकी छाया है। दूसरी, 2 कुरिन्थियों 11:2, जहाँ पौलुस स्वयं को उस मित्र की तरह देखता है जो दुल्हन को शुद्ध रूप में दूल्हे के सामने लाता है; वहाँ भी वही क्रिया, वही तड़प, और वही चिंता कि कोई दूसरी शिक्षा दुल्हन को भटका न दे। तीसरी, मत्ती 28 की महान आज्ञा, जहाँ प्रभु कहते हैं कि सब जातियों को सिखाओ। पौलुस उस आदेश को दोहरा नहीं रहा, वह उसे जी रहा है: सिखाना कोई वैकल्पिक सेवा नहीं, वह मिशन का ही शरीर है। तनाव भी दिखता है, क्योंकि यीशु ने कहा था कि तुम सिद्ध बनो, जैसे तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है; पौलुस उसी माँग को एक प्रक्रिया में बदल देता है, जिसमें कोई अकेला नहीं छोड़ा जाता।

मुख्य पात्र

पौलुस यह जेल से लिख रहा है, एक ऐसी कलीसिया को जिसका मुँह उसने कभी नहीं देखा; उसे यह मसीह इपफ्रास के ज़रिए मिली है। फिर भी वह इन अजनबियों के लिए "तन मन लगाकर परिश्रम" करता है, और आयत 24 में अपने दुःखों में आनन्द तक करता है। यह आदमी थका हुआ है पर कड़वा नहीं। उसकी महत्वाकांक्षा भी ध्यान देने योग्य है: वह बड़ी भीड़ नहीं चाहता, वह चाहता है कि उपस्थिति के दिन एक-एक चेहरा मसीह में वयस्क होकर खड़ा हो। जो व्यक्ति दूसरों के परिपक्व होने में अपना सुख ढूँढ़ता है, वह स्वयं परिपक्व हो चुका है।

श्रोताओं की पहचान

कुलुस्से एक छोटा, ढलान पर आया हुआ शहर था, और वहाँ ऐसी शिक्षा घूम रही थी जो कुछ चुने हुए लोगों को ऊँचा ज्ञान, दर्शन और विशेष नियमों का वादा करती थी। ऐसे माहौल में "हर एक मनुष्य" तीन बार सुनना विस्फोट जैसा था। जो दास कमरे के पीछे खड़ा था, जो स्त्री शिक्षा से वंचित थी, जो अन्यजाति व्यक्ति कल तक "पराया" था, सबने सुना कि यह पूर्णता उनके लिए भी है। और "सारे ज्ञान से" सुनकर उन्हें समझ आया कि असली ज्ञान गुप्त सीढ़ी नहीं, खुला हुआ भेद है, जो अब प्रगट हो चुका।

मनन के प्रश्न

आपके जीवन में वह कौन है जिसे आपने चुपचाप "हर एक मनुष्य" की सूची से बाहर कर दिया है, और क्यों?

आप किसी को परिपक्व होते देखना चाहते हैं या केवल सहमत होते देखना चाहते हैं; इन दोनों में आपका व्यवहार कहाँ फ़र्क़ करता है?

Colossians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Colossians and Philemon

Dick Lucas

Christ above everything: fullness in him against every substitute.

Paul For Everyone: The Prison Letters

N.T. Wright

Ephesians, Philippians, Colossians and Philemon in short daily readings.

Colossians and Philemon: An Introduction and Commentary

N.T. Wright

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Colossians and Philemon

David Garland

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Colossians 1:28 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

कुलुस्सियों 1:28 का क्या अर्थ है?
पौलुस एक ही साँस में अपनी पूरी सेवा का सार दे देता है: हम मसीह का प्रचार करते हैं, हर एक मनुष्य को चेतावनी देते हुए, हर एक मनुष्य को सारे ज्ञान से सिखाते हुए, ताकि हम हर एक व्यक्ति को मसीह में सिद्ध करके उपस्थित कर सकें। तीन बार "हर एक" आता है, मानो वह कोई कील ठोक रहा हो। और अंत में एक अजीब सा क्रिया-शब्द: उपस्थित करना, किसी को किसी के सामने पेश करना।
कुलुस्सियों 1:28 किस विषय में है?
"उपस्थित करना" मंदिर की भाषा है। पुराने नियम में बलि परमेश्वर के सम्मुख लाई जाती थी, और वह निर्दोष होनी चाहिए थी; अब्राहम से भी कहा गया था कि वह परमेश्वर के सामने चले और सिद्ध बने। पौलुस उसी शब्दावली को उठाकर अन्यजातियों पर लगा देता है: जो कभी आँगन के बाहर खड़े थे, वे अब भेंट की तरह भीतर लाए जा रहे हैं। पर सूत्र यहीं मुड़ता है। आयत 22 में यह काम मसीह करते हैं, वे ही "पवित्र और निष्कलंक, और निर्दोष बनाकर उपस्थित" करते हैं। तो आयत 28 में पौलुस केवल उस पेशकश में शामिल हो रहा है जो क्रूस पर पहले ही सुनिश्चित हो चुकी।
कुलुस्सियों 1:28 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
तीन जगहें इस पद के साथ गूँजती हैं। पहली, इसी पत्री की आयत 22, जहाँ उपस्थित करनेवाले मसीह हैं; इससे साफ़ होता है कि पौलुस का परिश्रम मसीह के काम का प्रतिद्वंद्वी नहीं, उसकी छाया है। दूसरी, 2 कुरिन्थियों 11:2, जहाँ पौलुस स्वयं को उस मित्र की तरह देखता है जो दुल्हन को शुद्ध रूप में दूल्हे के सामने लाता है; वहाँ भी वही क्रिया, वही तड़प, और वही चिंता कि कोई दूसरी शिक्षा दुल्हन को भटका न दे। तीसरी, मत्ती 28 की महान आज्ञा, जहाँ प्रभु कहते हैं कि सब जातियों को सिखाओ। पौलुस उस आदेश को दोहरा नहीं रहा, वह उसे जी रहा है: सिखाना कोई वैकल्पिक सेवा नहीं, वह मिशन का ही शरीर है। तनाव भी दिखता है, क्योंकि यीशु ने कहा था कि तुम सिद्ध बनो, जैसे तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है; पौलुस उसी माँग को एक प्रक्रिया में बदल देता है, जिसमें कोई अकेला नहीं छोड़ा जाता।
कुलुस्सियों 1:28 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कुलुस्से एक छोटा, ढलान पर आया हुआ शहर था, और वहाँ ऐसी शिक्षा घूम रही थी जो कुछ चुने हुए लोगों को ऊँचा ज्ञान, दर्शन और विशेष नियमों का वादा करती थी। ऐसे माहौल में "हर एक मनुष्य" तीन बार सुनना विस्फोट जैसा था। जो दास कमरे के पीछे खड़ा था, जो स्त्री शिक्षा से वंचित थी, जो अन्यजाति व्यक्ति कल तक "पराया" था, सबने सुना कि यह पूर्णता उनके लिए भी है। और "सारे ज्ञान से" सुनकर उन्हें समझ आया कि असली ज्ञान गुप्त सीढ़ी नहीं, खुला हुआ भेद है, जो अब प्रगट हो चुका।
कुलुस्सियों 1:28 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आप किसी को परिपक्व होते देखना चाहते हैं या केवल सहमत होते देखना चाहते हैं; इन दोनों में आपका व्यवहार कहाँ फ़र्क़ करता है?
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Colossians 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 20

पिता, आपने अपने बेटे के क्रूस पर बहे लहू से हमें अपने साथ मिला लिया। जहाँ मेरे भीतर बेचैनी है, वहाँ आपकी शांति भर दीजिए। टूटे रिश्तों और टूटे मन को फिर से जोड़िए, और मुझे भी मेल कराने वाला बनाइए।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 19

पिता, धन्यवाद कि आपकी प्रसन्नता इसी में थी कि मसीह में सारी परिपूर्णता वास करे। मुझे कहीं और भटकना नहीं पड़ता, जो कुछ मुझे चाहिए वह सब यीशु में भरपूरी से मिलता है। धन्यवाद कि आपने उसे मुझसे दूर नहीं रखा।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 2

पिता, तेरा अनुग्रह और तेरी शांति आज मेरे मन में उतर आए। जहाँ बेचैनी है, वहाँ तू ठहराव दे। और जैसे तू मुझे अपना कहता है, वैसे ही मैं अपने आसपास के लोगों को भी अपने परिवार की तरह देख सकूँ। तेरी कृपा ही मेरा सहारा है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 5

पिता, धन्यवाद कि जो आशा तुमने मेरे लिये स्वर्ग में रख छोड़ी है, वह न मिटती है, न चुराई जा सकती है। धन्यवाद कि सुसमाचार के सत्य वचन के द्वारा मैंने उसे सुना और जाना। जब यहाँ सब कुछ हिलता है, तब भी वह आशा सुरक्षित है।

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