इफिसियों 4:25
पाठ
पौलुस एक बहुत ठोस आदेश देता है: "इस कारण झूठ बोलना छोड़कर, हर एक अपने पड़ोसी से सच बोले, क्योंकि हम आपस में एक दूसरे के अंग हैं।" पुराने मनुष्यत्व को उतारने और नये को पहनने की बात (पद 22-24) के तुरन्त बाद यह पहला व्यावहारिक उदाहरण आता है। और उसका कारण नैतिक नहीं, शारीरिक है: हम एक ही देह के अंग हैं, इसलिए झूठ अपने ही शरीर को धोखा देना है।
मूल बात
यहाँ सच बोलना कोई सामान्य सद्गुण नहीं, बल्कि नई सृष्टि का चिह्न है। पद 24 कहता है कि नया मनुष्यत्व "सत्य की धार्मिकता, और पवित्रता में सृजा गया है" – यानी परमेश्वर का अपना स्वभाव उसमें ढाला गया है। परमेश्वर वह हैं जो अपनी बात नहीं बदलते; उनकी वाचा इसीलिए भरोसे लायक है। झूठ बोलना इसलिए सिर्फ नियम तोड़ना नहीं, बल्कि उस परमेश्वर की छवि को विकृत करना है जिसके स्वरूप में हमें फिर से गढ़ा गया है। और ध्यान दीजिए, पौलुस व्यक्तिगत पवित्रता से नहीं, समुदाय से तर्क करता है। सच वह गोंद है जो देह को जोड़े रखता है। जहाँ झूठ चलता है, वहाँ शरीर के अंग एक-दूसरे को संकेत भेजना बन्द कर देते हैं, और देह लकवाग्रस्त हो जाती है।
जोड़ने वाला सूत्र
पौलुस यहाँ जकर्याह की गूँज दोहरा रहा है, जहाँ निर्वासन से लौटी हुई प्रजा से कहा गया था कि हर एक अपने पड़ोसी से सच बोले। वह वचन पुनर्निर्माण के बीच में दिया गया था: टूटी दीवारें, बिखरा हुआ समाज, और परमेश्वर का वादा कि वे फिर बीच में बसेंगे। पौलुस उसी वचन को उठाकर एक ऐसे समुदाय पर लागू करता है जहाँ यहूदी और अन्यजाति एक ही मेज पर बैठ गए हैं। मसीह ने अपनी देह में दीवार गिराई; अब उस देह के भीतर वाणी को भी वही काम करना है। जो मुँह मसीह को सिर मानकर "प्रेम में सच" बोलता है (पद 15), वही मुँह देह को बढ़ाता है।
दर्पण
आप शायद खुले झूठ नहीं बोलते। पर सोचिए: वह ईमेल जिसमें आपने अपनी गलती को "परिस्थितियों" के पीछे छिपा दिया। वह चुप्पी जब कोई भाई अपने पैसे के फैसले के बारे में आपकी राय पूछता है और आप जानते हैं कि सच बोलने पर रिश्ता ठंडा पड़ जाएगा। घर पर वह मुस्कान जिसके पीछे तीन दिन से जमा हुई कड़वाहट है। कलीसिया में वह "सब ठीक है" जो आप हर रविवार बोलते हैं जबकि कुछ भी ठीक नहीं। हम झूठ इसलिए नहीं बोलते कि हम दुष्ट हैं, बल्कि इसलिए कि हम डरते हैं: नौकरी का डर, अस्वीकार का डर, बेनकाब होने का डर। पौलुस इस डर को समझता है, पर वह उसे बहाना नहीं बनने देता। वह कहता है, तुम अंग हो, और अंग एक-दूसरे से जानकारी नहीं छिपाते।
एक बारीकी
"पड़ोसी" शब्द पर रुकिए। पौलुस "भाई" नहीं कहता, वह जकर्याह से लिया हुआ पुराना, मिट्टी से सना शब्द चुनता है। पहली सदी के इफिसुस में पड़ोसी कोई भावुक धारणा नहीं था। लोग तंग बहुमंजिला मकानों में रहते थे, दीवारें पतली, आँगन साझा, और नीचे गली में धुआँ, मछली और पेशाब की गंध। आपका पड़ोसी वही आदमी था जिसके साथ आप पानी के लिए झगड़ते थे और जिससे आपको उधार लेना पड़ता था। ऐसे में सच बोलना खतरनाक था, क्योंकि पड़ोसी को आपकी कमजोरी पता चल जाती थी। पौलुस इसी आदमी की ओर इशारा करता है और कहता है: यही तुम्हारा अंग है। जिससे तुम सबसे ज्यादा बचकर बोलते हो, उसी से सच बोलो।
प्रश्न
पर क्या हर सच हर समय बोला जाना चाहिए? पाठ यह नहीं कहता। पौलुस झूठ के विरुद्ध बोलता है, हर विचार उगल देने के पक्ष में नहीं। चार पद बाद वह जोड़ता है कि मुँह से वही निकले "जो उन्नति के लिये उत्तम हो"। यानी सच का माप देह की उन्नति है, मेरी ईमानदारी का प्रदर्शन नहीं। फिर भी यह प्रश्न बना रहता है, और उसे चिकना कर देना बेईमानी होगी: कभी-कभी सच बोलने से रिश्ता सचमुच टूटता है, और चुप रहना कायरता भी हो सकती है और दया भी। पाठ हमें फार्मूला नहीं देता। वह हमें एक कसौटी देता है और फिर हमें उस असुविधाजनक विवेक के साथ छोड़ देता है जो केवल आत्मा के साथ चलते हुए ही पकता है।
संदर्भ
पौलुस यह पत्र बन्दी के रूप में लिखता है, जैसा वह पहले ही पद में कहता है। इफिसुस एशिया प्रान्त का सबसे बड़ा नगर था, अरतिमिस के विशाल मन्दिर, बन्दरगाह, व्यापारिक संघों और जादू-टोने के लिए मशहूर। वहाँ के व्यापार में झूठ जीविका का हिस्सा था: नाप-तौल में हेरफेर, संघों की राजनीति, संरक्षक-आश्रित रिश्तों में चापलूसी। और कलीसिया में एक ही कमरे में गुलाम और उसका मालिक, यहूदी और पूर्व मूर्तिपूजक साथ बैठते थे। गुलाम के लिए झूठ अक्सर जीवित रहने का एकमात्र हथियार था। इस भीड़, इस असमानता, इस पुराने अभ्यास के बीच पौलुस कहता है: अब तुम एक देह हो। यह आदेश आरामदायक नहीं था; यह सामाजिक क्रांति थी।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सा रिश्ता है जिसमें आप सच इसलिए नहीं बोलते क्योंकि उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी, और वह कीमत असल में क्या है?
यदि झूठ देह के एक अंग का दूसरे को धोखा देना है, तो पिछले महीने आपकी किस बात ने अपनी ही कलीसिया को कमजोर किया?
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Ephesians 4:25 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Ephesians 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हर एक अंग के ठीक-ठीक कार्य करने से" शरीर बढ़ता है। यानी जोड़ भी ज़रूरी है, वह हिस्सा जो दिखता नहीं, बस दो को थामे रखता है। शायद कलीसिया में तुम्हारा काम वही है, किसी को जोड़े रखना, थामे रखना। छोटा लगता है? पर तुम्हारे बिना देह वहीं रुक जाती है। और यह सब बढ़ोतरी एक ही दिशा में है, प्रेम में।
जीत के बाद राजा लूट का माल अपने लोगों में बाँटता था। मसीह भी ऊँचे पर चढ़ा, पर जीत अपने पास नहीं रखी: "वह ऊँचे पर चढ़ा और बन्धुवाई को बन्दी बनाकर ले गया, और मनुष्यों को दान दिए।" जो तुझे बाँधे रखता था, अब वही उसका बन्दी है। और तेरे भीतर जो वरदान है, वह उसी विजय का हिस्सा है। उसे दबाकर मत रख।
पिता, तूने हर एक को कुछ न कुछ देकर भेजा है। मुझे भी तैयार कर, ताकि जो सेवा मेरे हाथ में है उसे प्रेम से कर सकूँ। मेरे काम से तेरे लोग मज़बूत हों, और तेरी देह थोड़ी और पूरी होती जाए।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें एक दूसरे का अंग बनाया है। धन्यवाद कि झूठ की जगह अब हमें सच बोलने की आज़ादी मिली है, और आपस में भरोसे का रिश्ता। उन लोगों के लिए भी धन्यवाद जो हमसे सच कहते हैं, चाहे वह सुनने में कठिन ही क्यों न हो।
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