बाइबल व्याख्या

उत्पत्ति 1:5

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पाठ

परमेश्वर उजियाले को नाम देते हैं: "दिन।" और अंधियारे को भी नाम देते हैं: "रात।" दोनों को नाम मिलता है, दोनों उनके अधिकार में आ जाते हैं। फिर वह छोटा, शांत वाक्य जो पूरे अध्याय की धड़कन बन जाएगा: "साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।" सृष्टि की पहली रचना कोई पहाड़ या समुद्र नहीं, बल्कि समय है, नापा हुआ समय, जिसकी एक शुरुआत है और एक अंत। पद 2 का वह बेडौल, सुनसान, अंधियारा गहरा जल अब भी पूरी तरह गया नहीं है, पर उसे सीमा मिल गई है और सीमा का एक नाम मिल गया है।

मूल बात

प्राचीन पूर्व में नाम देना मालिक होने का काम था। पिता बच्चे का नाम रखता था, राजा जीते हुए नगर का। बाबेल और मिस्र के लोग जिस सूर्य और चंद्रमा के आगे सिर झुकाते थे, उन्हें यहाँ नाम मिलता है, जैसे मालिक अपने सेवक को पुकारता है। उजियाला देवता नहीं, प्राणी है। और अंधियारा भी शत्रु-देवता नहीं; परमेश्वर उसे मिटाते नहीं, उसे "रात" कहकर अपनी व्यवस्था में जगह देते हैं। यही इस पद का धार्मिक विस्फोट है: जिस अंधकार से आप डरते हैं, वह परमेश्वर के शब्दकोश में एक साधारण शब्द है। और साँझ से भोर तक का यह घेरा दिखाता है कि परमेश्वर का काम टुकड़ों में, धैर्य से, गिने हुए दिनों में होता है, एक ही झटके में नहीं।

सूत्र

बाइबल का दिन साँझ से शुरू होता है, और यह क्रम इस्राएल के जीवन में गड़ा रहा: सब्त का आरंभ सूरज ढलने पर, फसह की रात, मंदिर की शाम की बलि। यानी परमेश्वर का दिन अंधेरे से शुरू होकर उजियाले की ओर जाता है, उल्टा नहीं। यही लय पूरे छुटकारे के इतिहास पर छपी है: मिस्र की रात के बाद समुद्र पर भोर, बंधुआई के बाद घर वापसी, क्रूस के बाद तीसरे दिन का सवेरा। जब पौलुस 2 कुरिन्थियों 4:6 में सृष्टि के उस पहले आदेश को दोहराते हैं और कहते हैं कि वही परमेश्वर हमारे हृदयों में मसीह के चेहरे का उजियाला चमकाते हैं, तो वे कोई काव्य नहीं कर रहे; वे कह रहे हैं कि नई सृष्टि उसी आवाज़ से शुरू होती है जिससे पहला दिन शुरू हुआ था।

दर्पण

आपकी सबसे भारी घड़ी अक्सर साँझ की होती है। दिन के काम के बाद वह ठंडा हिसाब: आज फिर वह ईमेल नहीं भेजा गया, बच्चे के साथ फिर धैर्य टूटा, रिपोर्ट अधूरी, बीमारी का नतीजा अभी नहीं आया। अंधेरा वहीं बैठकर हमें बताता है कि हम पीछे छूट गए हैं। यह पद उस अंधेरे को झूठा नहीं कहता; वह उसे नाम देकर सीमित कर देता है। "रात" का मतलब है: यह हिस्सा है, पूरा नहीं। परमेश्वर ने अपना काम भी एक ही दिन में नहीं निपटाया, छह दिन गिने। तो आपके अधूरेपन को भी गिने हुए दिनों में रहने की छूट है।

आज सूरज ढलते समय दो मिनट रुकिए, ज़ोर से कहिए, "साँझ हुई फिर भोर हुआ," और उसके बाद उस एक अधूरे काम या डर का नाम लेकर कहिए कि वह आज की रात के हवाले है, कल की भोर परमेश्वर के।

अंतर-पाठ

भजन 74 में समुद्र और गहरे जल के राक्षसों को परमेश्वर कुचलते हैं, और उसी भजन में कहा जाता है कि दिन और रात दोनों उनके ही हैं। वहाँ जो युद्ध की भाषा है, उत्पत्ति 1 में वह शांत आदेश बन जाती है: कोई लड़ाई नहीं, बस एक शब्द और एक नाम। इसके ठीक उलट, प्रकाशितवाक्य 21 और 22 में नए यरूशलेम का वर्णन कहता है कि वहाँ रात नहीं होगी, न दीपक की न सूर्य की ज़रूरत। यानी रात परमेश्वर की व्यवस्था में जायज़ है, पर आखिरी नहीं। अभी वह अनुशासित है; अंत में वह अनावश्यक हो जाएगी। इन दोनों के बीच में हम जीते हैं, गिने हुए दिनों में, हर बार साँझ से भोर की ओर।

श्रोता

कल्पना कीजिए उन लोगों की जिन्होंने यह पहली बार सुना: संभवतः बंधुआई के अनुभव से गुज़री एक पीढ़ी, या मिश्र और कनान की गंध में पली हुई। उनके चारों ओर के मंदिरों में सूर्य-देवता की मूर्ति के आगे धूप जलती थी, और रात में दुष्टात्माओं से बचने के लिए ताबीज़ बाँधे जाते थे। ज्योतिषी राजा के लिए दिन शुभ या अशुभ ठहराते थे। ऐसे कानों में यह वाक्य लगभग निर्भय लगता होगा: उजियाले और अंधियारे का नाम रखने वाला एक ही है, और उसने किसी से युद्ध नहीं किया, केवल बोला। जिस बड़े साम्राज्य ने उन्हें छोटा बना दिया था, उसके देवता यहाँ केवल घड़ी के काँटे हैं।

प्रश्न

फिर पद 2 का अंधियारा आया कहाँ से? पद 3 उजियाले की उत्पत्ति बताता है, पर अंधकार की नहीं। और अगर परमेश्वर ने उजियाले को ही "अच्छा" कहा, तो रात के बारे में उनका फैसला क्या है? पाठ चुप है, और यह चुप्पी ईमानदार है। बाइबल कहीं भी अंधकार को परमेश्वर का बराबर प्रतिद्वंद्वी नहीं मानती, पर वह उसे मासूम भी नहीं कहती। हमें इतना ही दिया गया है: अंधेरे का एक नाम है, एक सीमा है, और एक मालिक है जो उसमें भी काम करते हैं। जो लोग रातों में जागते हैं, बीमारी में, शोक में, चिंता में, उनके लिए यह कम है, लेकिन यह खोखला नहीं है। यह वादा नहीं करता कि रात छोटी होगी; यह कहता है कि रात आखिरी शब्द नहीं है।

चिंतन

आपके जीवन में वह कौन-सी "रात" है जिसे आप मिटाना चाहते हैं, जबकि परमेश्वर उसे अभी नाम देकर सीमित रखना चाहते हैं?

अगर आपका दिन साँझ से शुरू होता, अंधेरे से भोर की ओर, तो आपकी शामें कैसे बदलतीं?

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Genesis 1:5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

उत्पत्ति 1:5 का क्या अर्थ है?
परमेश्वर उजियाले को नाम देते हैं: "दिन।" और अंधियारे को भी नाम देते हैं: "रात।" दोनों को नाम मिलता है, दोनों उनके अधिकार में आ जाते हैं। फिर वह छोटा, शांत वाक्य जो पूरे अध्याय की धड़कन बन जाएगा: "साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।" सृष्टि की पहली रचना कोई पहाड़ या समुद्र नहीं, बल्कि समय है, नापा हुआ समय, जिसकी एक शुरुआत है और एक अंत। पद 2 का वह बेडौल, सुनसान, अंधियारा गहरा जल अब भी पूरी तरह गया नहीं है, पर उसे सीमा मिल गई है और सीमा का एक नाम मिल गया है।
उत्पत्ति 1:5 किस विषय में है?
बाइबल का दिन साँझ से शुरू होता है, और यह क्रम इस्राएल के जीवन में गड़ा रहा: सब्त का आरंभ सूरज ढलने पर, फसह की रात, मंदिर की शाम की बलि। यानी परमेश्वर का दिन अंधेरे से शुरू होकर उजियाले की ओर जाता है, उल्टा नहीं। यही लय पूरे छुटकारे के इतिहास पर छपी है: मिस्र की रात के बाद समुद्र पर भोर, बंधुआई के बाद घर वापसी, क्रूस के बाद तीसरे दिन का सवेरा। जब पौलुस 2 कुरिन्थियों 4:6 में सृष्टि के उस पहले आदेश को दोहराते हैं और कहते हैं कि वही परमेश्वर हमारे हृदयों में मसीह के चेहरे का उजियाला चमकाते हैं, तो वे कोई काव्य नहीं कर रहे; वे कह रहे हैं कि नई सृष्टि उसी आवाज़ से शुरू होती है जिससे पहला दिन शुरू हुआ था।
उत्पत्ति 1:5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज सूरज ढलते समय दो मिनट रुकिए, ज़ोर से कहिए, "साँझ हुई फिर भोर हुआ," और उसके बाद उस एक अधूरे काम या डर का नाम लेकर कहिए कि वह आज की रात के हवाले है, कल की भोर परमेश्वर के।
उत्पत्ति 1:5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कल्पना कीजिए उन लोगों की जिन्होंने यह पहली बार सुना: संभवतः बंधुआई के अनुभव से गुज़री एक पीढ़ी, या मिश्र और कनान की गंध में पली हुई। उनके चारों ओर के मंदिरों में सूर्य-देवता की मूर्ति के आगे धूप जलती थी, और रात में दुष्टात्माओं से बचने के लिए ताबीज़ बाँधे जाते थे। ज्योतिषी राजा के लिए दिन शुभ या अशुभ ठहराते थे। ऐसे कानों में यह वाक्य लगभग निर्भय लगता होगा: उजियाले और अंधियारे का नाम रखने वाला एक ही है, और उसने किसी से युद्ध नहीं किया, केवल बोला। जिस बड़े साम्राज्य ने उन्हें छोटा बना दिया था, उसके देवता यहाँ केवल घड़ी के काँटे हैं।
उत्पत्ति 1:5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन में वह कौन-सी "रात" है जिसे आप मिटाना चाहते हैं, जबकि परमेश्वर उसे अभी नाम देकर सीमित रखना चाहते हैं?

Genesis 1 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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