यशायाह 40:1
पाठ
यह पद एक आज्ञा है, सान्त्वना का कोमल सुझाव नहीं। परमेश्वर अपने दूतों को, स्वर्गीय सभा को, भविष्यद्वक्ताओं को आदेश देते हैं: "मेरी प्रजा को शान्ति दो, शान्ति दो!" शब्द दो बार दोहराया गया है, जैसे कोई माँ रोते बच्चे के कान में एक ही वाक्य बार-बार कहती है जब तक रोना थम न जाए। और इसके साथ परमेश्वर स्वयं को फिर से उनका परमेश्वर कहते हैं: "तुम्हारा परमेश्वर यह कहता है।" उनतालीस अध्यायों तक यशायाह की पुस्तक में न्याय, चेतावनी और विनाश की भाषा चली है। अब, अचानक, स्वर बदल जाता है। वही आवाज़ जिसने दण्ड सुनाया था, अब सान्त्वना का आदेश देती है, और वह भी दोहराकर।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि यहाँ किसी को शान्ति महसूस करने को नहीं कहा गया; किसी को शान्ति देने को कहा गया है। सान्त्वना मनोदशा नहीं, घोषणा है। और उसका आधार अगली पंक्ति में है: "मेरी प्रजा"। होशे की पुस्तक में परमेश्वर ने एक बच्चे का नाम रखवाया था "लो-अम्मी", अर्थात् "मेरी प्रजा नहीं", क्योंकि वाचा टूट चुकी थी। यहाँ वह नाम उलट दिया जाता है। निर्वासन ने यह साबित कर दिया था कि इस्राएल ने अपना दावा खो दिया है, पर परमेश्वर अपना दावा नहीं छोड़ते। भजन 85:8 में भी यही ढाँचा दिखता है: भक्त सुनता है कि यहोवा अपनी प्रजा से शान्ति की बात करेंगे। यही सुसमाचार का बीज है, अनुग्रह अपराधी की योग्यता पर नहीं, परमेश्वर की ज़िद पर टिका है।
सूत्र
इस अध्याय की आवाज़ चार सौ साल बाद यरदन के किनारे फिर गूँजती है। चारों सुसमाचार यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का परिचय इसी अध्याय की तीसरी आयत से कराते हैं: "जंगल में यहोवा का मार्ग सुधारो"। यह संयोग नहीं। सुसमाचार लेखक कह रहे हैं कि निर्वासन अभी सचमुच समाप्त नहीं हुआ था; बेबीलोन से लौटे लोग देश में तो थे, पर रोम के अधीन थे, और असली घर-वापसी अभी बाकी थी। जिस सान्त्वना का आदेश यहाँ दिया गया, उसका पूरा उत्तर एक व्यक्ति है। लूका बताता है कि शमौन नाम का बूढ़ा "इस्राएल की शान्ति" की प्रतीक्षा करता था, और जब उसने शिशु यीशु को गोद में लिया, तब उसकी प्रतीक्षा पूरी हुई। पद 11 का चरवाहा, जो मेमनों को अँकवार में लिए चलता है, और पद 10 का सामर्थी प्रभु एक ही देह में आते हैं।
दर्पण
आप जानते हैं वह असहज क्षण, जब किसी मित्र का बेटा नहीं रहा, या पड़ोसी की नौकरी चली गई, और आप शब्द खोजते हैं। हम आमतौर पर व्याख्या देते हैं: ऐसा क्यों हुआ, इससे क्या सीख मिलेगी, परमेश्वर की कोई योजना होगी। यह पद हमें वहाँ से हटाता है। सान्त्वना यहाँ कारण बताना नहीं, एक सच्चाई सुनाना है: तुम परमेश्वर के हो, उनका दावा तुम पर कायम है। यह उस व्यक्ति पर निर्भर नहीं कि वह इस समय विश्वास कर पा रहा है या नहीं। और ध्यान दीजिए, यह काम सौंपा गया है, स्वेच्छा पर नहीं छोड़ा गया। पौलुस भी यही कहता है कि हमें सान्त्वना इसलिए मिलती है कि हम दूसरों को दे सकें।
आज ही उस एक व्यक्ति को, जिसका नाम अभी आपके मन में आया, एक छोटा संदेश भेजिए जिसमें आप केवल यह कहें कि वह परमेश्वर का है और आप उसके लिए प्रार्थना कर रहे हैं। कोई सलाह नहीं, कोई व्याख्या नहीं।
श्रोता
कल्पना कीजिए उन लोगों की जिनके दादा-दादी यरूशलेम से घसीटकर लाए गए थे। वे बेबीलोन में जन्मे, वहीं की भाषा बोलते, वहीं के बाज़ार में काम करते थे। उनके लिए सबसे कठिन बात मन्दिर का गिरना नहीं था, बल्कि यह निष्कर्ष था कि उनका परमेश्वर हार गया, या उन्हें भूल गया। पद 27 इसे खुलकर बोलता है: "मेरा मार्ग यहोवा से छिपा हुआ है"। उस माहौल में "तुम्हारा परमेश्वर" कहना एक राजनीतिक और धार्मिक धमाका था। बेबीलोन के देवता जुलूस में ढोए जाते थे, सोने से मढ़े जाते थे, और पद 19-20 उनका मज़ाक उड़ाते हैं। सुननेवालों के कानों में यह पहला वाक्य एक नई राजघोषणा जैसा पड़ा: असली राजा ने चुप्पी तोड़ दी है।
एक बारीकी
जो शब्द यहाँ दोहराया गया है, इब्रानी में वह है नःहमू, "सान्त्वना दो"। यही क्रिया तब भी आती है जब परमेश्वर अपने ठाने हुए दण्ड से पलट जाते हैं, जैसे जलप्रलय के बाद, या मूसा की विनती पर। यानी इस शब्द में केवल दिलासा नहीं, मुड़ने की हलचल है, गहरी साँस लेकर रुख बदलना। और यह आदेश बहुवचन में है, किसी एक भविष्यद्वक्ता को नहीं, एक अनाम भीड़ को। परमेश्वर ने सान्त्वना का काम आउटसोर्स कर दिया है। वे स्वयं निर्णय लेते हैं, पर उसे कहलवाते हैं मनुष्यों से, बार-बार, जब तक रोना थमे नहीं। जिस कलीसिया में यह आदेश अनसुना रहता है, वहाँ परमेश्वर की आवाज़ का एक हिस्सा गायब रहता है।
कठिन प्रश्न
सान्त्वना की यह घोषणा उन लोगों को दी गई जो अब भी बेबीलोन में थे। बाहर कुछ नहीं बदला था; न दीवारें खड़ी हुईं, न ज़ंजीरें टूटीं। और कई लोग इस वचन के पूरा होने से पहले ही मर गए। यिर्मयाह में राहेल अपने बच्चों के लिए रोती है और सान्त्वना पाने से इनकार कर देती है, और मत्ती उस पंक्ति को बैतलहम के मारे गए बच्चों पर लागू करता है। बाइबल स्वयं वह स्वर रखती है जो सान्त्वना को ठुकरा देता है। तो क्या यह आदेश समय से पहले बोला गया? मैं इसे सरल नहीं करूँगा। इतना ही कह सकता हूँ कि परमेश्वर वचन को परिस्थिति से पहले भेजते हैं, और पद 8 इसी पर टिका है: "हमारे परमेश्वर का वचन सदैव अटल रहेगा"। कभी-कभी यही अकेला सहारा बचता है, और वह पर्याप्त ठहरता है।
चिन्तन
आपके जीवन में वह कौन-सा क्षेत्र है जहाँ आप परमेश्वर से परिस्थिति बदलने की माँग कर रहे हैं, पर उनका वचन सुनने से कतरा रहे हैं?
जब आपने पिछली बार किसी दुखी व्यक्ति से बात की, तो आपने व्याख्या दी या घोषणा? दोनों में अन्तर आपको कहाँ खटकता है?
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Isaiah 40:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यशायाह 40:1 का क्या अर्थ है?
यशायाह 40:1 किस विषय में है?
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यशायाह 40:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Isaiah 40 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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