बाइबल व्याख्या

यूहन्ना 3:17

बाइबल

पाठ

यीशु निकुदेमुस से बात करते हुए एक ऐसा वाक्य कहते हैं जो उस रात की पूरी बातचीत का रुख मोड़ देता है: परमेश्वर ने अपने पुत्र को इस जगत में इसलिए नहीं भेजा कि वे जगत पर दण्ड की आज्ञा सुनाएँ, बल्कि इसलिए कि जगत उनके द्वारा उद्धार पाए। पिछले पद में प्रेम की बात हुई थी, अब उस प्रेम का उद्देश्य साफ किया जाता है। भेजने के पीछे नीयत क्या थी, यही सवाल है। और उत्तर चौंकाने वाला है: नीयत बचाने की थी, तोड़ने की नहीं। जो परमेश्वर सबसे अधिक हक रखते हैं दोष लगाने का, वही सबसे पहले बचाने आते हैं।

मूल बात

यहाँ "जगत" शब्द को हल्के में मत लीजिए। यूहन्ना की भाषा में जगत वह मानवता है जो परमेश्वर से मुँह फेरे खड़ी है, वही जो आगे चलकर ज्योति से बैर रखती है। और इसी जगत के पास परमेश्वर अपना एकलौता पुत्र भेजते हैं, अदालत का सम्मन लेकर नहीं, बचाव का हाथ लेकर। यह पद दण्ड को मिटाता नहीं, पद 18 और 19 दण्ड की बात खुलकर करते हैं। पर यह पद उसका क्रम तय करता है: पहले उद्धार, फिर निर्णय, और निर्णय भी तब होता है जब मनुष्य खुद अंधकार को चुनता है। परमेश्वर की पहली हरकत आरोप नहीं, पहुँच है। यही सुसमाचार का स्वभाव है, और यही उन लोगों का भी स्वभाव बनना चाहिए जो उस पर विश्वास करते हैं।

सूत्र

इसी बातचीत में यीशु पहले ही एक चित्र दे चुके हैं: "जिस तरह से मूसा ने जंगल में साँप को ऊँचे पर चढ़ाया, उसी रीति से अवश्य है कि मनुष्य का पुत्र भी ऊँचे पर चढ़ाया जाए।" वह घटना गिनती 21 की है, जहाँ इस्राएल अपने ही विद्रोह का फल भुगत रहा था। परमेश्वर उस दण्ड के बीच में एक ऐसा चिन्ह खड़ा करते हैं जिसे देखकर मरता हुआ आदमी जी उठे। दण्ड की जगह पर बचाव का खंभा। यही पूरी बाइबल का सूत्र है: परमेश्वर न्याय को झुठलाते नहीं, वे उसे अपने ऊपर ले लेते हैं। क्रूस कोई अदालती फैसला सुनाने का मंच नहीं, वह ऊँचे पर चढ़ाया गया बचाव है, जिसकी ओर देखना ही जीवन है।

आईना

हममें से ज़्यादातर लोग परमेश्वर को जज मानकर जीते हैं और पड़ोसी के साथ खुद जज बनकर पेश आते हैं। दफ़्तर में जिस सहकर्मी ने गड़बड़ की, उसके बारे में आपके मन में फ़ाइल पहले से तैयार है। घर में जिस किशोर ने दोबारा वही गलती दोहराई, उसके लिए आपके पास वाक्य तैयार है, सुनने के लिए कान नहीं। जिस रिश्तेदार ने पैसा लौटाया नहीं, उसका नाम सुनते ही आपके भीतर सुनवाई शुरू हो जाती है। और दूसरी तरफ़ वही डर: हर बीमारी, हर नुकसान, हर असफलता को आप अपने ऊपर सुनाया गया फ़ैसला समझ बैठते हैं। यह पद दोनों को काटता है। परमेश्वर की पहली हरकत आप तक पहुँचना है; तो आपकी पहली हरकत आरोप क्यों हो?

आज उस एक व्यक्ति को, जिसे आप मन ही मन दोषी ठहरा चुके हैं, एक छोटा संदेश भेजिए जिसमें कोई सुधार, कोई इशारा और कोई "लेकिन" न हो। सिर्फ़ यह पूछिए कि वह कैसा है।

चिंतन

जिस व्यक्ति का नाम अभी आपके मन में आया, उसके साथ आपका पहला कदम पहुँचने का होगा या फ़ैसला सुनाने का?

पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें

आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।

स्वीकारोक्ति

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संत अगस्तीन

अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।

उद्देश्य भरा जीवन

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रिक वॉरेन

चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।

परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास

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भाई लॉरेन्स

रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।

जंगल का छिपने का स्थान

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कोरी टेन बूम

नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।

जीसस कॉलिंग

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सारा यंग

प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।

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John 3:17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यूहन्ना 3:17 का क्या अर्थ है?
यीशु निकुदेमुस से बात करते हुए एक ऐसा वाक्य कहते हैं जो उस रात की पूरी बातचीत का रुख मोड़ देता है: परमेश्वर ने अपने पुत्र को इस जगत में इसलिए नहीं भेजा कि वे जगत पर दण्ड की आज्ञा सुनाएँ, बल्कि इसलिए कि जगत उनके द्वारा उद्धार पाए। पिछले पद में प्रेम की बात हुई थी, अब उस प्रेम का उद्देश्य साफ किया जाता है। भेजने के पीछे नीयत क्या थी, यही सवाल है। और उत्तर चौंकाने वाला है: नीयत बचाने की थी, तोड़ने की नहीं। जो परमेश्वर सबसे अधिक हक रखते हैं दोष लगाने का, वही सबसे पहले बचाने आते हैं।
यूहन्ना 3:17 किस विषय में है?
यहाँ "जगत" शब्द को हल्के में मत लीजिए। यूहन्ना की भाषा में जगत वह मानवता है जो परमेश्वर से मुँह फेरे खड़ी है, वही जो आगे चलकर ज्योति से बैर रखती है। और इसी जगत के पास परमेश्वर अपना एकलौता पुत्र भेजते हैं, अदालत का सम्मन लेकर नहीं, बचाव का हाथ लेकर। यह पद दण्ड को मिटाता नहीं, पद 18 और 19 दण्ड की बात खुलकर करते हैं। पर यह पद उसका क्रम तय करता है: पहले उद्धार, फिर निर्णय, और निर्णय भी तब होता है जब मनुष्य खुद अंधकार को चुनता है। परमेश्वर की पहली हरकत आरोप नहीं, पहुँच है। यही सुसमाचार का स्वभाव है, और यही उन लोगों का भी स्वभाव बनना चाहिए जो उस पर विश्वास करते हैं।
यूहन्ना 3:17 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इसी बातचीत में यीशु पहले ही एक चित्र दे चुके हैं: "जिस तरह से मूसा ने जंगल में साँप को ऊँचे पर चढ़ाया, उसी रीति से अवश्य है कि मनुष्य का पुत्र भी ऊँचे पर चढ़ाया जाए।" वह घटना गिनती 21 की है, जहाँ इस्राएल अपने ही विद्रोह का फल भुगत रहा था। परमेश्वर उस दण्ड के बीच में एक ऐसा चिन्ह खड़ा करते हैं जिसे देखकर मरता हुआ आदमी जी उठे। दण्ड की जगह पर बचाव का खंभा। यही पूरी बाइबल का सूत्र है: परमेश्वर न्याय को झुठलाते नहीं, वे उसे अपने ऊपर ले लेते हैं। क्रूस कोई अदालती फैसला सुनाने का मंच नहीं, वह ऊँचे पर चढ़ाया गया बचाव है, जिसकी ओर देखना ही जीवन है।
यूहन्ना 3:17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
हममें से ज़्यादातर लोग परमेश्वर को जज मानकर जीते हैं और पड़ोसी के साथ खुद जज बनकर पेश आते हैं। दफ़्तर में जिस सहकर्मी ने गड़बड़ की, उसके बारे में आपके मन में फ़ाइल पहले से तैयार है। घर में जिस किशोर ने दोबारा वही गलती दोहराई, उसके लिए आपके पास वाक्य तैयार है, सुनने के लिए कान नहीं। जिस रिश्तेदार ने पैसा लौटाया नहीं, उसका नाम सुनते ही आपके भीतर सुनवाई शुरू हो जाती है। और दूसरी तरफ़ वही डर: हर बीमारी, हर नुकसान, हर असफ
यूहन्ना 3:17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आज उस एक व्यक्ति को, जिसे आप मन ही मन दोषी ठहरा चुके हैं, एक छोटा संदेश भेजिए जिसमें कोई सुधार, कोई इशारा और कोई "लेकिन" न हो। सिर्फ़ यह पूछिए कि वह कैसा है।
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John 3 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 19

मनुष्यों ने अंधकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उनके काम बुरे थे।" ध्यान दे, यहाँ समस्या यह नहीं कि ज्योति नहीं मिली। ज्योति आई, पर हमने उसे प्रिय नहीं जाना। दोष समझ की कमी का नहीं, प्रेम के चुनाव का है। आज खुद से पूछ: कौन सा कोना है जिसे मैं जानबूझकर अँधेरे में रखता हूँ, इसलिए कि रोशनी में वह बहुत साफ दिखेगा?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

नीकुदेमुस रात में आया। शायद डर था, शायद इज्ज़त का सवाल था। फिर भी वह आया। और उसने कहा, "हे रब्बी, हम जानते हैं कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है।" वह बहुत कुछ जानता था, पर यीशु को नहीं जानता था। तुम भी क्या सिर्फ़ जानकारी लेकर आए हो, या नया जन्म पाने? अंधेरे में आना भी ठीक है। बस आ जाओ।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 8

पिता, हवा की तरह तेरा काम भी मेरी समझ से बड़ा है। मैं सब कुछ जानना चाहता हूँ, हर कदम पहले से देख लेना चाहता हूँ, पर तू मुझे भरोसे में चलना सिखा रहा है। जहाँ तेरा आत्मा ले जाए, मैं वहाँ चलने को तैयार हूँ। मुझे थामे रखना।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 11

नीकुदेमुस के पास ज्ञान की कमी नहीं थी, फिर भी यीशु कहते हैं, "हम जो जानते हैं, वह कहते हैं, और जो हम ने देखा है उसकी गवाही देते हैं, और तुम हमारी गवाही ग्रहण नहीं करते।" दुख यह नहीं था कि सबूत कम था, दुख यह था कि दिल बंद था। कहीं तू भी परमेश्वर की बातें सुनकर सिर हिलाता है, पर भीतर उन्हें जगह नहीं देता?

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