लूका 1:38
पाठ
स्वर्गदूत ने जो कहा, वह मरियम के पूरे भविष्य को उलट देने वाला था: एक कुँवारी गर्भवती होगी, और उस बेटे का राज्य कभी समाप्त न होगा। मरियम तर्क नहीं करती, सौदेबाज़ी नहीं करती, समय नहीं माँगती। वह बस अपनी जगह बताती है और अपना द्वार खोल देती है: "देख, मैं प्रभु की दासी हूँ, तेरे वचन के अनुसार मेरे साथ ऐसा हो।" इसके बाद कुछ नहीं होता, कोई चिन्ह नहीं, कोई चमक नहीं; सिर्फ़ यह कि स्वर्गदूत चला जाता है और मरियम नासरत के अपने साधारण कमरे में अकेली रह जाती है, एक अविवाहित गर्भवती लड़की, जिसके पास परमेश्वर के वचन के सिवा कोई प्रमाण नहीं।
मर्म
ध्यान दीजिए, मरियम यह नहीं कहती कि "मैं यह कर दूँगी।" वह कहती है, "तेरे वचन के अनुसार मेरे साथ ऐसा हो।" यह कर्ता का वाक्य नहीं, ग्रहण करने वाले का वाक्य है। उद्धार यहाँ मनुष्य की पहल से नहीं, परमेश्वर के वचन से जन्म लेता है, और मनुष्य का हिस्सा है उस वचन के आगे खुल जाना। जकर्याह ने मन्दिर में, पवित्र स्थान में, प्रमाण माँगा था; मरियम गलील के एक मामूली गाँव में बिना प्रमाण के विश्वास करती है। अनुग्रह यही है: परमेश्वर पहले चुनते हैं, फिर मनुष्य उत्तर देता है। और यह उत्तर सस्ता नहीं था, इसकी कीमत उसकी प्रतिष्ठा, उसकी मंगनी और सम्भवतः उसका जीवन थी। आज्ञाकारिता यहाँ भावना नहीं, जोखिम है।
सूत्र
मरियम का यह वाक्य बाइबल में अकेला नहीं खड़ा है। सीनै पर्वत पर इस्राएल ने कहा था कि जो कुछ परमेश्वर ने कहा, हम करेंगे; और वह प्रतिज्ञा बार-बार टूटी। यहाँ नासरत की एक लड़की उलटा कहती है: तू कर, मैं ग्रहण करूँगी। और ठीक यही वाक्य उसके पुत्र के मुँह में एक बाग़ में लौटेगा, जब वह लहू पसीने के साथ कहेगा कि मेरी नहीं, पर आपकी इच्छा पूरी हो (लूका 22:42)। माँ का "ऐसा हो" बेटे के "ऐसा हो" की पहली आहट है, और दोनों के बीच का रास्ता क्रूस तक जाता है। इसलिए यह पद केवल एक धर्मपरायण स्त्री की भक्ति का उदाहरण नहीं है; यह उस समर्पण का आरम्भ-बिन्दु है जिससे उद्धार देह धारण करता है। परमेश्वर का वचन गर्भ में उतरता है क्योंकि कोई उसे रोकता नहीं।
दर्पण
हम में से अधिकांश परमेश्वर से बात करते समय जकर्याह जैसे होते हैं, मरियम जैसे नहीं। हम प्रमाण चाहते हैं: नौकरी छोड़ने से पहले अगली नौकरी, बीमारी में इलाज का भरोसा, बच्चे के भटकने पर कोई संकेत कि वह लौटेगा। हमारी "हाँ" अक्सर शर्तों के साथ आती है, और हम उसे विवेक कहते हैं। मरियम के पास कुछ नहीं था, सिवाय एक वचन के, और उस वचन की कीमत उसे गाँव की फुसफुसाहट, यूसुफ की आँखों का सवाल और अपने पिता के घर की लज्जा के रूप में चुकानी थी। यह पद पूछता है कि आप परमेश्वर के साथ किस बात पर अब तक मोलभाव कर रहे हैं। आज, एक कागज़ पर वह एक बात लिखिए जिसे आप अब तक परमेश्वर के हाथ में देने से बच रहे हैं, और उस लिखी हुई बात के ऊपर ऊँची आवाज़ में ये शब्द बोलिए: "तेरे वचन के अनुसार मेरे साथ ऐसा हो।"
एक बारीकी
"दासी" शब्द पर रुकिए। मूल यूनानी शब्द दूले है, जिसका अर्थ नौकरानी नहीं, दासी है, वह स्त्री जिसका अपने शरीर, समय और भविष्य पर कोई अधिकार नहीं। यह विनम्रता का अलंकार नहीं, क़ानूनी हैसियत की भाषा है। और यही शब्द कुछ ही पंक्तियों बाद उसके गीत में लौटता है, जब वह कहती है कि परमेश्वर ने "अपनी दासी की दीनता पर दृष्टि की है।" जिसका कोई अधिकार नहीं, उसी पर परमेश्वर की दृष्टि पड़ती है। और आगे चलकर वही पुत्र, जो इस दासी से जन्मेगा, स्वयं दास का रूप धारण करेगा और कहेगा कि वह सेवा करवाने नहीं, सेवा करने आया है। माँ का यह शब्द बेटे की पूरी जीवनशैली का बीज है।
पृष्ठभूमि
यह हेरोदेस का समय है, रोमी सत्ता की छाया में जीता हुआ यहूदिया, और घटना यरूशलेम के मन्दिर में नहीं, गलील के नासरत में घटती है, एक ऐसा गाँव जिसका नाम पुराने नियम में कहीं नहीं आता। मरियम सम्भवतः तेरह-चौदह साल की है, यूसुफ से उसकी मंगनी हो चुकी है, और उस संस्कृति में मंगनी क़ानूनी विवाह थी; उसे तोड़ने के लिए तलाक़नामा चाहिए था, और उस दौरान गर्भवती होना व्यभिचार माना जाता, जिसकी सज़ा कम से कम सार्वजनिक अपमान और सबसे बुरी स्थिति में मृत्यु थी। मरियम यह सब जानती है। उसके पास कोई सुरक्षा नहीं, कोई ऊँचा पद नहीं, कोई रक्षक नहीं। परमेश्वर अपने राज्य की शुरुआत वहीं से करते हैं जहाँ मनुष्य की कोई ताक़त बीच में नहीं आ सकती।
श्रोता
लूका यह सब थियुफिलुस के लिए लिख रहा है, एक ऐसे पाठक के लिए जो रोमी दुनिया में रहता था, जहाँ "परमप्रधान का पुत्र" और "जिसके राज्य का अन्त न होगा" जैसे शब्द कैसर के लिए इस्तेमाल होते थे। उन कानों में मरियम का उत्तर राजनीतिक रूप से ख़तरनाक लगता था: असली सिंहासन किसी और का है, और उसकी घोषणा एक दासी के मुँह से होती है। जो पहली मंडलियाँ यह सुसमाचार सुन रही थीं, उनमें बहुत से लोग दास थे, बहुत सी स्त्रियाँ थीं, बहुत से ऐसे थे जिन्हें मसीह को अपनाने की कीमत परिवार और प्रतिष्ठा से चुकानी पड़ी थी। उन्होंने मरियम में अपने आपको पहचाना: बिना प्रमाण के, बिना सुरक्षा के, सिर्फ़ वचन के भरोसे "हाँ" कहने वाले लोग।
चिंतन
जकर्याह और मरियम, दोनों को एक ही स्वर्गदूत मिला; अंतर उनके प्रश्न में नहीं, उनके भरोसे में था। आपका अपना "यह कैसे होगा" इस समय किस बात को लेकर है?
यदि आपकी "हाँ" की कोई कीमत न हो, तो क्या वह सचमुच आज्ञाकारिता है, या केवल सहमति?
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Luke 1:38 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Luke 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
जकरयाह और इलीशिबा के बारे में लिखा है, "वे दोनों परमेश्वर के सामने धर्मी थे, और प्रभु की सारी आज्ञाओं और विधियों पर निर्दोष चलनेवाले थे।" और फिर अगली ही आयत कहती है कि उनके कोई सन्तान न थी। धर्मी होना हर दरवाज़ा नहीं खोलता। तुम्हारी वफ़ादारी के बदले भी शायद सन्नाटा ही मिला हो। पर परमेश्वर गिन रहा था, वर्षों तक, चुपचाप।
फिर जब उसकी सेवा के दिन पूरे हुए, तो वह अपने घर चला गया।" जकर्याह मंदिर में स्वर्गदूत से मिला, पर इसके बाद भी उसने अपनी बाकी सेवा के दिन पूरे किए, और फिर चुपचाप घर लौट गया। कोई भीड़ नहीं, कोई गवाही नहीं, बस एक गूँगा मुँह और भीतर छिपा हुआ वादा। क्या तुम भी परमेश्वर के किसी वादे को चुपचाप घर तक ले जा रहे हो? वह वहाँ भी काम करता है, जहाँ कोई देख नहीं रहा।
मरियम कहती है, "उसने अपना भुजबल दिखाया, और जो अपने मन में घमण्ड करते थे, उन्हें तितर-बितर किया।" ध्यान दे, घमंड कहाँ पकड़ा गया? मन में। बाहर से कोई कुछ नहीं देख पाता, पर परमेश्वर वहीं हाथ डालता है। शायद तेरे भीतर भी कोई चुपचाप बना हुआ सिंहासन है, जिसे तूने किसी को नहीं दिखाया। वह उसे जानता है, और उसे गिराना उसकी दया है, दंड नहीं।
पिता, इलीशिबा की तरह मुझे भी हिम्मत दे कि जब सब लोग कुछ और कहें, तब भी मैं तेरी बात पर टिकी रहूँ। मेरे डर को दूर कर, और मुझे भरोसा दे कि तेरा चुना हुआ रास्ता ही सबसे भला है। तू जो नाम मुझे देता है, वही मेरी पहचान हो।
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