बाइबल व्याख्या

मत्ती 5:11

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पाठ

आठ बार यीशु ने "धन्य हैं वे" कहा था, दूर से, जैसे कोई सूची पढ़ रहा हो। अब अचानक उँगली मुड़कर सुननेवालों की ओर आती है: "धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें और सताएँ और झूठ बोल बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें।" तीन क्रियाएँ: मुँह पर अपमान, हाथों से सताव, और पीठ पीछे गढ़े हुए झूठ। और इन तीनों का कारण कोई नैतिक श्रेष्ठता नहीं, बल्कि एक व्यक्ति है: "मेरे कारण"।

मर्म

दसवें वचन में कारण था "धार्मिकता", ग्यारहवें में वही कारण बनकर यीशु स्वयं खड़े हो जाते हैं। यह अदला-बदली छोटी नहीं है। पुराने नियम में धार्मिकता परमेश्वर की व्यवस्था के प्रति निष्ठा थी; यहाँ वह निष्ठा एक गलील के शिक्षक के व्यक्ति से बँध जाती है। यीशु अपने आप को उस स्थान पर रख रहे हैं जहाँ इस्राएल ने सदा परमेश्वर को रखा था। इसलिए यह वचन सिर्फ़ धैर्य की सलाह नहीं, बल्कि एक छिपा हुआ दावा है कि मसीह के साथ जुड़ना ही अब धार्मिकता का माप है। धन्यता परिस्थिति से नहीं, उस बंधन से आती है जिसके कारण दुनिया तुम्हें ठुकराती है।

सूत्र

अगला वचन स्वयं तार जोड़ देता है: "उन्होंने उन भविष्यद्वक्ताओं को जो तुम से पहले थे इसी रीति से सताया था।" यीशु अपने चेलों को इस्राएल के उस लम्बे जुलूस में खड़ा कर देते हैं जिसमें यिर्मयाह गड्ढे में उतारा गया और एलिय्याह जंगल में भागा। परमेश्वर का वचन बोलनेवाले पर पत्थर पड़ना कोई नई बात नहीं। परंतु सूत्र आगे बढ़ता है: जो भविष्यद्वक्ताओं के साथ हुआ, वह मसीह के साथ चरम पर हुआ, और उनकी देह होने के नाते कलीसिया के साथ होता रहेगा। प्रेरितों के काम 5:41 में शिष्य कोड़े खाकर आनन्दित होते हैं कि वे उस नाम के लिये अपमान सहने के योग्य गिने गए। वहाँ लूका दिखाता है कि यह वचन केवल आदर्श नहीं रहा, वह जीया गया।

दर्पण

यहाँ ईमानदार होना ज़रूरी है। हममें से अधिकांश की आलोचना मसीह के कारण नहीं होती। दफ़्तर में जो कड़वाहट हमारे विरुद्ध उठती है, वह अक्सर हमारे रूखेपन या अहंकार का फल है, और उसे "सताव" कहकर हम अपने आप को शहीद बना लेते हैं। यीशु का "मेरे कारण" एक छलनी है। दूसरी ओर एक और डर है: वह चुप्पी जो हम रिश्तेदारों के बीच, कक्षा में, व्हाट्सएप के समूह में ओढ़ लेते हैं, ताकि कोई असहज सवाल न पूछे। हम अपमान से नहीं, हास्यास्पद लगने से डरते हैं। यह वचन उस डर को नाम देता है और फिर उसके बदले कुछ अजीब देता है: धन्यता, अभी, बीच मँझधार में।

प्रश्न

पर क्या झूठी बदनामी सचमुच धन्यता है? जिस स्त्री का नाम गाँव में मिट्टी में मिला दिया गया, जिस युवक की नौकरी विश्वास के कारण गई, उससे कहना "आनन्दित और मगन होना" क्रूर लग सकता है। पाठ इस चुभन को नरम नहीं करता। वह दो सहारे देता है और तीसरा नहीं: पहला, स्वर्ग में बड़ा प्रतिफल; दूसरा, भविष्यद्वक्ताओं की संगति। जो सहारा वह नहीं देता, वह है इस जीवन में न्याय मिलने की गारंटी। पतरस अपनी पहली पत्री के चौथे अध्याय में यही बात दोहराता है, यह कहकर कि मसीह के नाम के कारण निन्दित होनेवालों पर महिमा का आत्मा ठहरता है। न्याय आएगा, पर शायद बाद में। यह रहस्य बना रहता है, और उसे भरना बेईमानी होगी।

श्रोता

पहाड़ पर बैठे लोग रोमी कब्ज़े में जीते किसान, मछुआरे और दिहाड़ी मज़दूर थे, जिनके लिये अपमान कोई सैद्धान्तिक बात नहीं थी। उस संस्कृति में इज़्ज़त पैसे से बड़ी पूँजी थी; बदनाम आदमी का बाज़ार में मोल गिर जाता था, बेटी का रिश्ता टूट जाता था, आराधनालय के दरवाज़े बंद हो जाते थे। "झूठ बोल बोलकर" शब्द इसी दुनिया की ओर इशारा करते हैं, जहाँ अफ़वाह हथियार थी। मत्ती जिन मसीही यहूदियों के लिये लिख रहा था, वे यह अनुभव कर चुके थे: अपने ही समाज से कटना, परिवार में गद्दार कहलाना। उनके कानों में यह वचन सांत्वना से ज़्यादा पहचान था, अपनी टूटी हुई स्थिति का नाम मसीह के मुँह से सुनना।

प्रसंग

यह उपदेश की शुरुआत है, भीड़ अभी-अभी जुटी है, चेले अभी बुलाए ही गए हैं। यीशु पहाड़ पर चढ़कर बैठते हैं, जैसे शिक्षक अधिकार के साथ बैठता है, और मूसा की तरह ऊँचाई से व्यवस्था नहीं, राज्य का चरित्र देते हैं। अभी क्रूस दूर है, अभी कोई सताया नहीं गया; फिर भी वे शुरुआत में ही बता देते हैं कि इस राह का अंत क्या होगा। यह भर्ती का विज्ञापन नहीं, चेतावनी के साथ दिया गया निमंत्रण है। और ठीक इसके बाद वे कहते हैं "तुम पृथ्वी के नमक हो", "तुम जगत की ज्योति हो"। जो दुनिया तुम्हें ठुकराएगी, उसी दुनिया के लिये तुम स्वाद और रोशनी हो।

चिंतन

मेरे जीवन में जो विरोध मैं सहता हूँ, क्या वह सचमुच "मेरे कारण" वाली श्रेणी में आता है, या मैं अपनी कठोरता को सताव का नाम दे रहा हूँ?

यदि इस जीवन में न्याय न मिले, तो क्या स्वर्ग में प्रतिफल और भविष्यद्वक्ताओं की संगति मेरे लिये पर्याप्त सहारा है?

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Matthew 5:11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 5:11 का क्या अर्थ है?
आठ बार यीशु ने "धन्य हैं वे" कहा था, दूर से, जैसे कोई सूची पढ़ रहा हो। अब अचानक उँगली मुड़कर सुननेवालों की ओर आती है: "धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें और सताएँ और झूठ बोल बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें।" तीन क्रियाएँ: मुँह पर अपमान, हाथों से सताव, और पीठ पीछे गढ़े हुए झूठ। और इन तीनों का कारण कोई नैतिक श्रेष्ठता नहीं, बल्कि एक व्यक्ति है: "मेरे कारण"।
मत्ती 5:11 किस विषय में है?
अगला वचन स्वयं तार जोड़ देता है: "उन्होंने उन भविष्यद्वक्ताओं को जो तुम से पहले थे इसी रीति से सताया था।" यीशु अपने चेलों को इस्राएल के उस लम्बे जुलूस में खड़ा कर देते हैं जिसमें यिर्मयाह गड्ढे में उतारा गया और एलिय्याह जंगल में भागा। परमेश्वर का वचन बोलनेवाले पर पत्थर पड़ना कोई नई बात नहीं। परंतु सूत्र आगे बढ़ता है: जो भविष्यद्वक्ताओं के साथ हुआ, वह मसीह के साथ चरम पर हुआ, और उनकी देह होने के नाते कलीसिया के साथ होता रहेगा। प्रेरितों के काम 5:41 में शिष्य कोड़े खाकर आनन्दित होते हैं कि वे उस नाम के लिये अपमान सहने के योग्य गिने गए। वहाँ लूका दिखाता है कि यह वचन केवल आदर्श नहीं रहा, वह जीया गया।
मत्ती 5:11 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पर क्या झूठी बदनामी सचमुच धन्यता है? जिस स्त्री का नाम गाँव में मिट्टी में मिला दिया गया, जिस युवक की नौकरी विश्वास के कारण गई, उससे कहना "आनन्दित और मगन होना" क्रूर लग सकता है। पाठ इस चुभन को नरम नहीं करता। वह दो सहारे देता है और तीसरा नहीं: पहला, स्वर्ग में बड़ा प्रतिफल; दूसरा, भविष्यद्वक्ताओं की संगति। जो सहारा वह नहीं देता, वह है इस जीवन में न्याय मिलने की गारंटी। पतरस अपनी पहली पत्री के चौथे अध्याय में यही बात दोहराता है, यह कहकर कि मसीह के नाम के कारण निन्दित होनेवालों पर महिमा का आत्मा ठहरता है। न्याय आएगा, पर शायद बाद में। यह रहस्य बना रहता है, और उसे भरना बेईमानी होगी।
मत्ती 5:11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यह उपदेश की शुरुआत है, भीड़ अभी-अभी जुटी है, चेले अभी बुलाए ही गए हैं। यीशु पहाड़ पर चढ़कर बैठते हैं, जैसे शिक्षक अधिकार के साथ बैठता है, और मूसा की तरह ऊँचाई से व्यवस्था नहीं, राज्य का चरित्र देते हैं। अभी क्रूस दूर है, अभी कोई सताया नहीं गया; फिर भी वे शुरुआत में ही बता देते हैं कि इस राह का अंत क्या होगा। यह भर्ती का विज्ञापन नहीं, चेतावनी के साथ दिया गया निमंत्रण है। और ठीक इसके बाद वे कहते हैं "तुम पृथ्वी के नमक हो", "तुम जगत की ज्योति हो"। जो दुनिया तुम्हें ठुकराएगी, उसी दुनिया के लिये तुम स्वाद और रोशनी हो।
मत्ती 5:11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि इस जीवन में न्याय न मिले, तो क्या स्वर्ग में प्रतिफल और भविष्यद्वक्ताओं की संगति मेरे लिये पर्याप्त सहारा है?
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Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय

What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 39

यीशु कहते हैं, "जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे।" दाहिने गाल पर थप्पड़ उल्टे हाथ से पड़ता है, उसमें चोट कम और अपमान ज़्यादा होता है। यीशु तुझसे कह रहे हैं कि अपमान करनेवाला यह तय न करे कि तू कौन बनेगा। बदला लौटाना आसान है, पर उस पल में शांत खड़े रहना असली ताक़त है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए न टलेगा।" सोचो, यीशु सबसे छोटी बिन्दु की भी चिंता करते हैं। जो परमेश्वर एक मात्रा को नहीं भूलता, क्या वह तेरी उस छोटी सी प्रार्थना को भूल जाएगा, जो तूने आँसुओं में फुसफुसाई थी? उसका वचन टलता नहीं, और न उसका प्रेम।

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