बाइबल व्याख्या

मत्ती 5:5

बाइबल

पाठ

पहाड़ पर बैठे यीशु अपने चेलों से कहते हैं: “धन्य हैं वे, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे।” एक ही साँस में दो बातें कही गई हैं जो सामान्य समझ में एक साथ नहीं चलतीं: वह स्वभाव जो धक्का नहीं देता, अपनी जगह के लिए लड़ता नहीं, अपमान पर पलटकर वार नहीं करता, और वह परिणाम जो सारी पृथ्वी का उत्तराधिकार है। यीशु यह नहीं कहते कि नम्र लोग स्वर्ग में किसी कोने में सांत्वना पा लेंगे; वे कहते हैं कि ज़मीन, असली ज़मीन, अंततः उन्हीं के हाथ में सौंपी जाएगी। जो आज दूसरों को आगे निकलने देते हैं, उन्हीं के नाम पर अंत में सब कुछ लिखा जाएगा।

मर्म

यह वचन परमेश्वर के राज्य के अर्थशास्त्र को उलट देता है। दुनिया में ज़मीन उसे मिलती है जो उसे छीन सकता है: सबसे तेज़ आवाज़, सबसे मोटी जेब, सबसे सख़्त कोहनी। यीशु कहते हैं कि अंतिम बँटवारा किसी और तालिका से होगा, क्योंकि पृथ्वी किसी की जीती हुई संपत्ति नहीं, परमेश्वर की देन है, और देन विरासत के रूप में मिलती है, कब्ज़े के रूप में नहीं। नम्रता यहाँ कमज़ोरी नहीं, बल्कि वह भरोसा है जो अपने अधिकार की रक्षा स्वयं करना छोड़ देता है क्योंकि न्यायी परमेश्वर पर उसे विश्वास है। यही मसीह का अपना रास्ता था। और इसका सीधा नतीजा यह है कि आपके दफ़्तर की राजनीति, आपके परिवार की बहस, आपके पैसे का हिसाब, ये सब अब किसी और नियम से खेले जाने हैं।

जोड़ने वाला सूत्र

यीशु यहाँ कुछ नया नहीं गढ़ रहे; वे भजन 37 को दोहरा रहे हैं, वह भजन जो एक बूढ़े आदमी की तरह बोलता है जिसने दुष्टों को फलते-फूलते देखा है और फिर उन्हें सूखते हुए भी देखा है। पूरे पुराने नियम में ज़मीन का वादा उसी धागे पर टँगा है: अब्राहम को देश दिया गया, इस्राएल को कनान मिला, और हर बार शर्त यह रही कि ज़मीन कब्ज़े से नहीं, भरोसे से थामी जाती है। जब इस्राएल ने ज़मीन को अपनी उपलब्धि समझा, उसने ज़मीन खो दी। मसीह उस टूटे वादे को अपने शरीर में उठाते हैं: गधे पर बैठा राजा, जो तलवार से नहीं, क्रूस से सिंहासन तक पहुँचता है, और जिसे अंत में स्वर्ग और पृथ्वी दोनों का अधिकार सौंपा जाता है। नम्र लोगों की विरासत उसी राजा की विरासत का हिस्सा है।

दर्पण

आप जानते हैं वह पल: मीटिंग में किसी ने आपके काम का श्रेय ले लिया, और आपके भीतर एक पूरा भाषण तैयार हो जाता है। या घर में वह पुराना झगड़ा, जिसमें आप सचमुच सही हैं, और इसी "सचमुच सही" ने पिछले तीन साल से रिश्ते को जमा रखा है। या पैतृक ज़मीन का वह हिस्सा, वह बैंक बैलेंस, वह वसीयत, जिसके पीछे भाई-बहन अजनबी बन गए। नम्रता का इम्तिहान वहाँ नहीं होता जहाँ आप ग़लत हैं; वहाँ तो झुकना मजबूरी है। इम्तिहान वहाँ है जहाँ आपका दावा जायज़ है और फिर भी आप उसे परमेश्वर के हाथ में छोड़ देते हैं। यीशु कह रहे हैं कि अपने हक़ की वकालत छोड़ देना आत्मघात नहीं, विरासत में निवेश है।

आज: उस एक बहस को चुनिए जिसमें आप सही हैं, और उस व्यक्ति को एक छोटा संदेश भेजिए जिसमें आप आख़िरी शब्द का अपना अधिकार छोड़ दें, बिना सफ़ाई और बिना "लेकिन"।

प्रसंग

यह गलील है, पहली सदी का, और यहाँ ज़मीन कोई आध्यात्मिक रूपक नहीं थी। रोमी कब्ज़ा था, हेरोदेस का कर था, मंदिर का कर था, और क़र्ज़ में डूबे छोटे किसान अपनी पुश्तैनी ज़मीन बड़े ज़मींदारों के हाथ बेचकर बटाईदार बन रहे थे। जो लोग पहाड़ पर यीशु के सामने बैठे थे, उनमें से बहुतों के पिता की ज़मीन किसी और के नाम चढ़ चुकी थी। उसी माहौल में ज़ेलोत यह प्रचार कर रहे थे कि ज़मीन तलवार से वापस मिलेगी। और उसी माहौल में यीशु बैठकर, यानी रब्बी की आधिकारिक मुद्रा में, कहते हैं कि पृथ्वी के अधिकारी वे होंगे जो नम्र हैं। यह भावुक उपदेश नहीं था; यह एक राजनीतिक विकल्प था, और उस समय का सबसे ख़तरनाक विकल्प।

एक बारीकी

जिस शब्द का अनुवाद "नम्र" हुआ है, वह यूनानी में प्राऊस है, और उसका इस्तेमाल उस घोड़े के लिए भी होता था जिसे साधा जा चुका हो। ऐसा घोड़ा कमज़ोर नहीं होता; उसकी ताक़त ज़रा भी कम नहीं हुई, बस अब वह लगाम मानता है। यही फ़र्क़ नम्रता और दब्बूपन के बीच है। दब्बू आदमी इसलिए चुप रहता है क्योंकि उसके पास जवाब नहीं; नम्र आदमी इसलिए चुप रहता है क्योंकि उसने जवाब देने का अधिकार किसी और को सौंप दिया है। मूसा को शास्त्र सबसे नम्र कहता है, और वही मूसा फ़िरौन के सामने खड़ा हुआ। तो नम्रता रीढ़विहीनता नहीं, लगाम में बँधी ताक़त है, और लगाम परमेश्वर के हाथ में है।

मुख्य पात्र

इस वचन का असली नमूना बोलने वाला ख़ुद है। यीशु के पास सारी शक्ति थी और उन्होंने उसका इस्तेमाल कभी अपने बचाव में नहीं किया। जब उन्हें थप्पड़ मारा गया, उन्होंने वही किया जो वे इसी उपदेश में आगे सिखाते हैं: "जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे।" उनके पास न घर था, न ज़मीन, न क़ब्र भी अपनी नहीं; मरते समय उनके कपड़े तक बाँट लिए गए। और यही आदमी अब स्वर्ग और पृथ्वी का उत्तराधिकारी है। यह संयोग नहीं, यही क्रम है। यीशु नम्रता को एक अच्छे स्वभाव की तरह पेश नहीं करते, बल्कि उस रास्ते की तरह जिस पर वे स्वयं चले, और जिस पर चलने के लिए वे हमें बुलाते हैं, यह जानते हुए कि रास्ता किधर से गुज़रता है।

अन्तर्पाठ

भजन 37 इस वचन का घर है। वह पूरा भजन एक ही सलाह के इर्द-गिर्द घूमता है: कुकर्मियों को देखकर जलो मत, क्रोध छोड़ो, प्रभु की बाट जोहो, क्योंकि थोड़े ही समय में दुष्ट न रहेगा और नम्र लोग देश के अधिकारी होंगे। यीशु उस प्राचीन धैर्य को उठाकर अपने राज्य के दरवाज़े पर टाँग देते हैं। और इसी उपदेश में आगे वे बताते हैं कि यह धैर्य दिखता कैसा है, बिलकुल व्यावहारिक भाषा में: "जो कोई तुझे कोस भर बेगार में ले जाए तो उसके साथ दो कोस चला जा।" रोमी सिपाही को कानूनन एक कोस बोझ ढुलवाने का हक़ था। दूसरा कोस किसी क़ानून में नहीं लिखा था; वह नम्रता का वह हिस्सा है जो स्वेच्छा से दिया जाता है और इसीलिए ग़ुलामी नहीं, स्वतंत्रता है।

पहले श्रोता

पहाड़ पर बैठे लोगों ने "पृथ्वी के अधिकारी" सुनकर पहले कोई स्वर्गिक कल्पना नहीं की। उन्होंने अपने गाँव की वह मेड़ सोची जो अब किसी और की है। उन्होंने वह टैक्स कलेक्टर सोचा जो उनके नाम पर बही में लिखता है। उनके कानों में यह वाक्य एक भूमि-सुधार के वादे जैसा गूँजा, पर बिना बग़ावत के। उनके लिए यह राहत भी थी और चुनौती भी: राहत, क्योंकि हारने वालों को नाम से पुकारा जा रहा था; चुनौती, क्योंकि हथियार उठाने का जो रास्ता सबसे स्वाभाविक लगता था, वह बंद किया जा रहा था। बाद में मत्ती के पाठक, जिन्होंने यरूशलेम का विनाश देखा था, समझ गए कि तलवार का रास्ता किस अंजाम तक पहुँचा था, और नम्रता का वादा अभी भी खुला खड़ा था।

कठिन प्रश्न

तो क्या नम्रता का मतलब यह है कि जिस स्त्री को उसका पति पीटता है, वह चुप रहे? कि दलित मज़दूर अपने बकाए पर सवाल न उठाए? यह सवाल टालने लायक़ नहीं है, क्योंकि इस वचन का इस्तेमाल सचमुच कमज़ोरों को चुप कराने के लिए किया गया है। ध्यान दीजिए कि यीशु नम्रता किसे सिखा रहे हैं और किसके सामने। वे सत्ताधारियों से नहीं कह रहे कि सताए हुए लोग सब्र करें; वे सताए हुओं से कह रहे हैं कि उनका भविष्य पहले ही तय है। नम्रता अपने अधिकार को परमेश्वर के हाथ में सौंपना है, दूसरों के अधिकार को अत्याचारी के हाथ में छोड़ना नहीं। अपने लिए न लड़ना और दूसरे के लिए न लड़ना दो अलग चीज़ें हैं। फिर भी यह रेखा हमेशा साफ़ नहीं दिखती, और उस धुँधलेपन में जीना ही शिष्य होने की क़ीमत है।

चिंतन

आपके जीवन में इस समय वह कौन सा दावा है जिसमें आप सही हैं और जिसे थामे रहना आपको भीतर से कठोर कर रहा है?

आप नम्रता और दब्बूपन में फ़र्क़ कैसे करेंगे, जब अगली बार आपको चुप रहने का मन करे?

अगर आप सचमुच मानते कि अंत में सब कुछ आपको विरासत में मिलेगा, तो आज आपके पैसे और समय के फ़ैसलों में क्या बदलता?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

Michael Green

The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

Michael Wilkins

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

The Message of the Sermon on the Mount

John Stott

Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

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Matthew 5:5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 5:5 का क्या अर्थ है?
पहाड़ पर बैठे यीशु अपने चेलों से कहते हैं: “धन्य हैं वे, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे।” एक ही साँस में दो बातें कही गई हैं जो सामान्य समझ में एक साथ नहीं चलतीं: वह स्वभाव जो धक्का नहीं देता, अपनी जगह के लिए लड़ता नहीं, अपमान पर पलटकर वार नहीं करता, और वह परिणाम जो सारी पृथ्वी का उत्तराधिकार है। यीशु यह नहीं कहते कि नम्र लोग स्वर्ग में किसी कोने में सांत्वना पा लेंगे; वे कहते हैं कि ज़मीन, असली ज़मीन, अंततः उन्हीं के हाथ में सौंपी जाएगी। जो आज दूसरों को आगे निकलने देते हैं, उन्हीं के नाम पर अंत में सब कुछ लिखा जाएगा।
मत्ती 5:5 किस विषय में है?
आप जानते हैं वह पल: मीटिंग में किसी ने आपके काम का श्रेय ले लिया, और आपके भीतर एक पूरा भाषण तैयार हो जाता है। या घर में वह पुराना झगड़ा, जिसमें आप सचमुच सही हैं, और इसी "सचमुच सही" ने पिछले तीन साल से रिश्ते को जमा रखा है। या पैतृक ज़मीन का वह हिस्सा, वह बैंक बैलेंस, वह वसीयत, जिसके पीछे भाई-बहन अजनबी बन गए। नम्रता का इम्तिहान वहाँ नहीं होता जहाँ आप ग़लत हैं; वहाँ तो झुकना मजबूरी है। इम्तिहान वहाँ है जहाँ आपका दावा जायज़ है और फिर भी आप उसे परमेश्वर के हाथ में छोड़ देते हैं। यीशु कह रहे हैं कि अपने हक़ की वकालत छोड़ देना आत्मघात नहीं, विरासत में निवेश है।
मत्ती 5:5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
जिस शब्द का अनुवाद "नम्र" हुआ है, वह यूनानी में प्राऊस है, और उसका इस्तेमाल उस घोड़े के लिए भी होता था जिसे साधा जा चुका हो। ऐसा घोड़ा कमज़ोर नहीं होता; उसकी ताक़त ज़रा भी कम नहीं हुई, बस अब वह लगाम मानता है। यही फ़र्क़ नम्रता और दब्बूपन के बीच है। दब्बू आदमी इसलिए चुप रहता है क्योंकि उसके पास जवाब नहीं; नम्र आदमी इसलिए चुप रहता है क्योंकि उसने जवाब देने का अधिकार किसी और को सौंप दिया है। मूसा को शास्त्र सबसे नम्र कहता है, और वही मूसा फ़िरौन के सामने खड़ा हुआ। तो नम्रता रीढ़विहीनता नहीं, लगाम में बँधी ताक़त है, और लगाम परमेश्वर के हाथ में है।
मत्ती 5:5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पहाड़ पर बैठे लोगों ने "पृथ्वी के अधिकारी" सुनकर पहले कोई स्वर्गिक कल्पना नहीं की। उन्होंने अपने गाँव की वह मेड़ सोची जो अब किसी और की है। उन्होंने वह टैक्स कलेक्टर सोचा जो उनके नाम पर बही में लिखता है। उनके कानों में यह वाक्य एक भूमि-सुधार के वादे जैसा गूँजा, पर बिना बग़ावत के। उनके लिए यह राहत भी थी और चुनौती भी: राहत, क्योंकि हारने वालों को नाम से पुकारा जा रहा था; चुनौती, क्योंकि हथियार उठाने का जो रास्ता सबसे स्वाभाविक लगता था, वह बंद किया जा रहा था। बाद में मत्ती के पाठक, जिन्होंने यरूशलेम का विनाश देखा था, समझ गए कि तलवार का रास्ता किस अंजाम तक पहुँचा था, और नम्रता का वादा अभी भी खुला खड़ा था।
मत्ती 5:5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आप नम्रता और दब्बूपन में फ़र्क़ कैसे करेंगे, जब अगली बार आपको चुप रहने का मन करे?
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Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय

What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 42

जो कोई तुझसे माँगे, उसे दे; और जो तुझसे उधार लेना चाहे, उससे मुँह न मोड़।"

ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि कितना दे। वे हाथ की नहीं, चेहरे की बात करते हैं। क्योंकि हम अक्सर पैसे से पहले अपनी नज़रें छिपा लेते हैं, सुनने से पहले ही भीतर से मुकर जाते हैं।

आज किसी की ज़रूरत तुझ तक आए, तो पहले उसकी आँखों में देख। देना उसके बाद आसान लगेगा।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 29

यीशु ने "बाईं" नहीं, "दाहिनी आँख" कहा। यानी वह जो सबसे कीमती है, जिस पर तू सबसे ज़्यादा भरोसा करता है। पाप हमें कभी बेकार चीज़ों से नहीं, अपनी प्रिय चीज़ों से फँसाता है। "उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे।" सोच, आज तेरे हाथ में वह क्या है जिसे तू छोड़ना नहीं चाहता, पर जो तुझे धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर खींच रहा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 32

यीशु के समय पत्नी को त्यागपत्र देना आसान था, और छोड़ी गई स्त्री के पास न सहारा था, न सम्मान। इसलिए यीशु कहते हैं, "जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से छोड़ दे, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है।" दोष उस पर डाला गया जिसने छोड़ा। क्या तेरे रिश्तों में भी कोई है जिसे तूने सुविधा से छोड़ दिया, और परमेश्वर उसका दर्द अब भी देख रहा है?

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