मत्ती 8:18
पाठ
भीड़ बढ़ती जा रही है। सुबह से शाम तक कोढ़ी शुद्ध हुआ, सूबेदार का सेवक चंगा हुआ, पतरस की सास का बुखार उतरा, और संध्या होते-होते पूरा कफरनहूम दरवाज़े पर खड़ा था। और ठीक उसी घड़ी, जब सफलता चरम पर है, मत्ती एक छोटी-सी पंक्ति लिखता है: "यीशु ने अपने चारों ओर एक बड़ी भीड़ देखकर झील के उस पार जाने की आज्ञा दी।" उन्होंने भीड़ देखी, और चले गए। यह कोई थकान का पलायन नहीं है, न ही लोगों से विरक्ति। यह एक आदेश है, दिया गया, न कि माँगा गया। नाव खुलती है, और अगला अध्याय तूफान और गदरेनियों का है।
मर्म
हम यह मान बैठे हैं कि माँग ही बुलाहट है। जहाँ भीड़ है, वहाँ परमेश्वर का काम है; जहाँ लोग पुकार रहे हैं, वहाँ ठहरना ही सेवा है। यह वचन उस समीकरण को तोड़ देता है। यीशु मसीह भीड़ को देखते हैं और उसी देखने के कारण जाने की आज्ञा देते हैं। उनकी दिशा उनके पिता से आती है, जनता की भूख से नहीं। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक ऐसा मसीहा जो हर आवाज़ के पीछे दौड़े, वह अंततः किसी का उद्धारकर्ता नहीं, सबका नौकर-भर होगा। और "उस पार" कोई खाली जगह नहीं है: वहाँ अशुद्ध कब्रें हैं, सूअर हैं, गैर-यहूदी हैं। यीशु भीड़ छोड़कर उनके पास जाते हैं जिनके पास कोई नहीं जाता। यह प्रेम का त्याग नहीं, प्रेम का विस्तार है। और हमारे लिए इसका अर्थ कड़वा है: जो सबसे ज़ोर से पुकारता है, ज़रूरी नहीं कि वही परमेश्वर की आवाज़ हो।
सूत्र
यह "उस पार जाना" मत्ती के पूरे सुसमाचार की दिशा है। जो मसीहा इस्राएल के लिए आया, वह बार-बार सीमा पार करता है: कोढ़ी को छूता है, सूबेदार के विश्वास पर अचम्भा करता है, और कह देता है कि "बहुत सारे पूर्व और पश्चिम से आकर" राज्य में बैठेंगे। अध्याय आठ का यह एक वाक्य उसी गति का हिस्सा है। परमेश्वर का काम हमेशा केंद्र से किनारे की ओर बहता है, कभी किनारे से केंद्र की ओर नहीं। और अंत में वही गति क्रूस तक ले जाती है, जो यरूशलेम की दीवार के बाहर था। भीड़ छोड़कर नाव में चढ़ना एक छोटा-सा पूर्वाभास है उस बड़े निर्गमन का, जिसमें वे हमारे लिए सब कुछ छोड़कर बाहर निकले।
दर्पण
आपकी व्यस्तता का कितना हिस्सा वास्तव में बुलाहट है, और कितना केवल उपलब्धता? कलीसिया में वह सेवा जो आपने इसलिए ली क्योंकि कोई और नहीं था; दफ्तर का वह अतिरिक्त काम जो आपको ज़रूरी महसूस कराता है; वह रिश्तेदार जिसका फोन उठाना आप कर्तव्य समझते हैं पर जिसके बाद आप खाली हो जाते हैं। भीड़ चापलूसी भी करती है, और हम उसे पवित्र आत्मा की अगुवाई समझ लेते हैं। यीशु मसीह भीड़ के बीच खड़े होकर नाव की ओर मुड़ जाते हैं, और यह आपको डराता है, क्योंकि आप जानते हैं कि "ना" कहने पर लोग क्या सोचेंगे। पर जो हर माँग के आगे झुकता है, वह अंततः उनके लिए भी नहीं बचता जिनके लिए परमेश्वर ने उसे भेजा है। आज, दस मिनट के भीतर, इस सप्ताह की उस एक हाँ को खोजिए जो आपने केवल दबाव में दी थी, और उस व्यक्ति को अभी संदेश भेजकर साफ़ शब्दों में मना कर दीजिए।
मुख्य पात्र
इस वाक्य में यीशु मसीह लगभग मौन हैं; केवल एक आज्ञा है। पर यही मौन बहुत कुछ कहता है। वे चंगाई के नशे में नहीं हैं, और न ही लोकप्रियता से घबराए हुए। भीड़ उन्हें न फुलाती है, न डराती है। उन्होंने अभी-अभी सैकड़ों को छुआ है, और फिर भी वे अगली नाव की ओर चल पड़ते हैं, क्योंकि उनका काम माँग पूरी करना नहीं, राज्य लाना है। और ध्यान दीजिए: इसी यात्रा में वे नाव में सो जाते हैं। यह वही गहरी निश्चिंतता है जो सिर्फ़ उसी में हो सकती है जो जानता है कि वह किसके भेजे हुए चल रहा है। थकान में नहीं, विश्राम में।
पृष्ठभूमि
कफरनहूम गलील झील के उत्तरी किनारे पर व्यापार-मार्ग का कस्बा था, यहूदी बस्ती, आराधनालय, मछुआरों के घर। "उस पार" का अर्थ था पूर्वी किनारा, दिकापुलिस का क्षेत्र, जहाँ यूनानी संस्कृति थी, सूअर पाले जाते थे और कब्रें अशुद्ध मानी जाती थीं। एक यहूदी गुरु के लिए वह जाने की जगह नहीं थी। साथ ही, भीड़ का बढ़ना गलील में खतरनाक भी था: रोमी शासन के नीचे किसी के पीछे जमा होती भीड़ राजनीतिक संदेह पैदा करती थी, और लोग एक ऐसे नेता की तलाश में थे जो रोटी और चंगाई दे। यीशु उस तलाश को पूरा करने से इनकार करते हैं, और नाव में चढ़ जाते हैं।
अन्तर्पाठ
ठीक अगली पंक्तियों में एक शास्त्री कहता है, "जहाँ कहीं तू जाएगा, मैं तेरे पीछे-पीछे हो लूँगा," और उत्तर मिलता है कि मनुष्य के पुत्र के पास "सिर धरने की भी जगह नहीं है।" मत्ती ने ये दोनों दृश्य जानबूझकर जोड़े हैं: जो भीड़ छोड़कर जाता है, उसके पीछे चलने का मतलब भी ठिकाने का छूटना है। और अध्याय के अंत में, जब वे उस पार पहुँचते हैं, नगर के लोग विनती करते हैं, "हमारे क्षेत्र से बाहर निकल जा।" एक किनारा उन्हें रोकना चाहता है, दूसरा भगाना चाहता है। आज्ञाकारिता की कीमत यही है: भीड़ की तालियाँ भी छूटती हैं और दूसरी ओर स्वागत भी नहीं मिलता।
चिंतन
इस सप्ताह आपने जो सबसे ज़रूरी काम समझा, क्या वह परमेश्वर की आज्ञा थी या सिर्फ़ सबसे ऊँची आवाज़?
आपके जीवन में "उस पार" कौन है, वह व्यक्ति या जगह जहाँ कोई नहीं जाता और जहाँ जाने के लिए आपको कुछ अच्छा छोड़ना पड़ेगा?
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Matthew 8 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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