फिलिप्पियों 4:7
पाठ
पौलुस ने अभी-अभी कहा है कि किसी भी बात की चिन्ता मत करो, बल्कि धन्यवाद के साथ हर बात परमेश्वर के सामने रख दो। इस आज्ञा के ठीक बाद वह बताते हैं कि इसका परिणाम क्या होगा: "तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।" ध्यान दीजिए, वे यह नहीं कहते कि परिस्थिति बदल जाएगी, कि जेल का दरवाज़ा खुल जाएगा या फिलिप्पी की कलीसिया में यूओदिया और सुन्तुखे का झगड़ा अपने आप सुलझ जाएगा। वे कहते हैं कि तुम्हारे भीतर कुछ पहरे पर बैठ जाएगा। प्रार्थना चिन्ता को हटाने का उपाय नहीं, बल्कि उस द्वार को खोलना है जिससे परमेश्वर की शान्ति भीतर आकर अपनी चौकी संभाल लेती है।
मर्म
यहाँ जो क्रिया पौलुस चुनते हैं वह भावुक नहीं, सैनिक है: फ्रूरेओ, अर्थात् किसी नगर के फाटक पर पहरा देना। फिलिप्पी रोमी सैनिकों की बसाई हुई उपनिवेश-नगरी थी; वहाँ के लोग जानते थे कि पहरेदार कैसा दिखता है। और यही चित्र बताता है कि "परमेश्वर की शान्ति" कोई मनःस्थिति नहीं है जिसे हम ध्यान लगाकर पैदा करें। यह वह सन्धि है जो परमेश्वर ने मसीह में शत्रुओं के साथ बाँधी, वही पुराना नियम का शालोम, जहाँ बैर समाप्त होता है और सम्बन्ध पूरा किया जाता है। इसीलिए यह "सारी समझ से बिलकुल परे" है: इसका आधार हमारे हालात का हिसाब नहीं, बल्कि अनुग्रह है, जो हिसाब से कभी नहीं निकलता। और इसका ठिकाना भी बताया गया है, "मसीह यीशु में", अर्थात् उस परमेश्वर के अधिकार-क्षेत्र में जिसने क्रूस पर हमारे साथ मेल कर लिया।
सूत्र
पौलुस के शब्दों के नीचे यशायाह की एक पुरानी पंक्ति गूँज रही है: जिसका मन परमेश्वर पर टिका है, उसे वे पूर्ण शान्ति में रखते हैं। यह वादा वहाँ किसी शान्त समय में नहीं, बल्कि गिरते हुए नगरों और टूटी हुई दीवारों के बीच दिया गया था। परमेश्वर की वाचा का इतिहास यही है: वे शत्रुता के बीच मेल की घोषणा करते हैं और फिर स्वयं उस मेल की रक्षा करते हैं। और यहाँ एक और सूत्र दिखता है। अदन के बाद परमेश्वर ने फाटक पर पहरा बिठाया था, ताकि मनुष्य भीतर न आ सके। मसीह में वह पहरा उलट गया है: अब परमेश्वर की शान्ति फाटक पर खड़ी है, मनुष्य को बाहर रखने के लिए नहीं, बल्कि उसे भीतर सुरक्षित रखने के लिए। क्रूस ने द्वारपाल को शत्रु से रक्षक बना दिया।
दर्पण
चिन्ता हमारे भीतर एक चुपचाप काम करती हुई धर्मशास्त्र-पुस्तक है। रात के दो बजे जब आप जागकर बच्चे के भविष्य, बैंक के बकाया, या डॉक्टर की उस रिपोर्ट के बारे में सोचते हैं, तो असल में आप यह मान रहे होते हैं कि इस मामले में पहरा देना आपका काम है, और सिर्फ आपका। चिन्ता श्रम की तरह महसूस होती है; लगता है कुछ किया जा रहा है। पौलुस उस भ्रम को तोड़ते हैं। वे नहीं कहते कि सोचना बन्द करो, वे कहते हैं कि उस भार को किसी और चौकी पर पहुँचा दो, और धन्यवाद के साथ पहुँचाओ, क्योंकि धन्यवाद ही वह स्वीकारोक्ति है कि परमेश्वर पहले भी विश्वासयोग्य रहे हैं। आज यह कीजिए: एक कागज़ पर उस एक चिन्ता को पूरे वाक्य में लिखिए, नीचे लिखिए कि परमेश्वर ने पिछले साल क्या किया था, और दोनों पंक्तियाँ ऊँची आवाज़ में पढ़कर वह कागज़ मोड़कर रख दीजिए।
मुख्य पात्र
इस वाक्य का असली कर्ता हम नहीं, परमेश्वर हैं। हम प्रार्थना करते हैं, पर पहरा वे देते हैं। और यहाँ परमेश्वर का जो चेहरा दिखता है वह ध्यान देने योग्य है: वे दूर बैठे न्यायाधीश नहीं जो हमारी चिन्ता को अविश्वास कहकर डाँटें, और न ही कोई भावुक सान्त्वना-दाता जो कहे कि सब ठीक हो जाएगा। वे एक सैनिक की तरह हमारे हृदय और विचारों के फाटक पर खड़े हो जाते हैं। यह वही परमेश्वर हैं जिन्होंने अपने पुत्र को हमारे लिए सौंप दिया; जो इतना दे चुके हैं, उनके लिए पहरा देना छोटी बात है। ध्यान दीजिए कि वे हमें हमारे विचारों से नहीं छुड़ाते, वे उनकी रखवाली करते हैं। परमेश्वर हमारे मन को खाली नहीं करते, वे उसे अपने अधिकार में ले लेते हैं।
कठिन प्रश्न
तो फिर वह विश्वासी क्या करे जो सचमुच प्रार्थना करता है और फिर भी घबराहट से काँपता है, जिसे नींद की गोली चाहिए, जिसका मन बार-बार उसी अंधेरे गड्ढे में लौट जाता है? क्या उसकी प्रार्थना कम थी? इस पद को उस तरह पढ़ना क्रूर होगा। पौलुस यह नहीं कहते कि शान्ति महसूस होगी; वे कहते हैं कि शान्ति पहरा देगी। पहरेदार बाहर खड़ा होता है, और भीतर बैठा आदमी कभी-कभी फिर भी काँपता है। यह वादा हमारी भावनाओं की गारंटी नहीं, बल्कि हमारे बचे रहने की गारंटी है: कि मसीह यीशु में जो हैं, वे टूटकर भी बहकर नहीं जाएँगे। यह उत्तर सब दर्द नहीं मिटाता। पर यह झूठ भी नहीं बोलता, और यही इसकी ताकत है।
श्रोता
फिलिप्पी रोम की एक उपनिवेश-नगरी थी, सेवानिवृत्त सैनिकों से भरी हुई, और पौलुस का यह पत्र उन तक पहुँचा जब वे स्वयं कैद में थे, जहाँ से वे "कैसर के घराने" के विश्वासियों का नमस्कार भेजते हैं। इन लोगों के कानों में "शान्ति" शब्द का एक बहुत ठोस अर्थ था: पैक्स रोमाना, वह शान्ति जिसकी रक्षा भाले और तलवार करते थे, और जो किसी भी क्षण सम्राट की इच्छा से छिन सकती थी। पौलुस उसी शब्दावली को उठाकर उलट देते हैं। एक और शान्ति है, जिसकी सेना कोई और है, जिसका सम्राट क्रूस पर चढ़ा और जी उठा, और जो जेल की दीवारों के भीतर भी काम करती है। यह राजनीतिक रूप से निर्दोष वाक्य नहीं था। यह दो राज्यों की तुलना थी।
चिन्तन
आपकी कौन-सी चिन्ता आपने इसलिए नहीं छोड़ी क्योंकि गहराई में आप मानते हैं कि उसका पहरा देना आपकी ही ज़िम्मेदारी है?
यदि परमेश्वर की शान्ति भावना नहीं बल्कि पहरा है, तो इससे आपके उन दिनों की समझ कैसे बदलती है जब आप प्रार्थना के बाद भी बेचैन रहे?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आप ही मुझे सामर्थ्य देते हैं। जो काम मेरे अपने बल से नहीं होते, वे आपकी शक्ति में पूरे हो जाते हैं। थकान भरे दिनों में, कमी में भी और बहुतायत में भी, आपने मुझे थामे रखा। यही भरोसा मेरा सहारा है।
पिता, धन्यवाद कि आपने मुझे अकेले नहीं छोड़ा, बल्कि ऐसे साथी दिए जो कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं। मुझे भी किसी का सहारा बनना सिखाइए, चुपचाप, बिना नाम की चाह के। यह जानना ही काफी है कि मेरा नाम आपके पास लिखा है।
पिता, धन्यवाद कि हमारा आनन्द हालातों पर नहीं, बल्कि आप में टिका है। धन्यवाद कि आप कहते हैं, "प्रभु में सदा आनन्दित रहो," और दोहराकर हमें याद दिलाते हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि हम कितनी जल्दी भूल जाते हैं। आँसुओं के बीच भी आपकी उपस्थिति में गीत मिलता है, इसके लिए आपका शुक्रिया।
पौलुस ने दो बहनों का नाम चिट्ठी में लिख दिया, जो पूरी कलीसिया के सामने पढ़ी जानी थी: "मैं यूओदिया से विनती करता हूँ, और सुन्तुखे से भी विनती करता हूँ कि वे प्रभु में एक मन रहें।" ये दोनों सुसमाचार के काम में उसके साथ परिश्रम कर चुकी थीं। यानी सेवा करते हुए भी मन फट सकता है। सोचो, तुम्हारे और किसके बीच ऐसी दूरी है जिसे तुमने "छोटी बात" कहकर टाल रखा है?
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