भजन संहिता 102:23
पाठ
यह एक ही वाक्य है, और उसमें कोई शिकायत का ढोल नहीं, बस एक सूखी स्वीकारोक्ति: "उसने मुझे जीवन यात्रा में दुःख देकर, मेरे बल और आयु को घटाया।" प्रार्थना करनेवाला कहता है कि वह रास्ते के बीचोंबीच है, मंज़िल दूर है, और उसकी ताकत बीच सफ़र में ही टूट गई। इब्रानी में यहाँ "बद्देरेख" शब्द है, यानी "रास्ते पर", वही शब्द जो कारवाँ, तीर्थयात्रा और निर्वासन की लंबी धूल भरी सड़कों के लिए इस्तेमाल होता था। और सबसे चुभनेवाली बात यह है कि घटाने वाला कोई शत्रु नहीं, बल्कि "उसने", यानी परमेश्वर स्वयं कहे गए हैं।
मूल बात
यह पद ईमानदारी की एक हद तक जाता है जहाँ हमारी अधिकतर प्रार्थनाएँ जाने से डरती हैं। दुःख को न संयोग कहा गया, न शैतान के खाते में डाला गया, न "जीवन ऐसा ही होता है" कहकर टाला गया। प्रार्थी सीधे परमेश्वर के हाथ को पहचानता है, और फिर भी उसी हाथ की ओर मुड़कर पुकारता है, "हे मेरे परमेश्वर, मुझे आधी आयु में न उठा ले।" यही विश्वास का असली आकार है: जिसने घटाया, उसी से विनती। और इसके ठीक बाद वह परमेश्वर के अनन्त वर्षों की ओर देखता है, मानो अपनी छोटी, कटी हुई उम्र को किसी ऐसे जीवन में टिका देना चाहता हो जो कभी नहीं घटता।
साझा सूत्र
निर्वासन में लिखी यह पंक्ति एक बड़े ढाँचे का हिस्सा है: यहाँ एक आदमी की टूटी उम्र और एक शहर के टूटे पत्थर एक ही साँस में रोए जाते हैं। जो सिय्योन के खंडहरों की धूल पर तरस खाता है, वही अपनी घटती हड्डियों पर तरस खाता है, और दोनों का उत्तर एक ही है: परमेश्वर उठकर दया करेंगे। इसी कारण नया नियम इसी भजन के अगले पदों को मसीह पर लागू करता है, उसी "तू वहीं है, और तेरे वर्षों का अन्त न होगा" को। और इसमें एक गहरी विडंबना है: जो अनन्त हैं, वे स्वयं आधी आयु में, तैंतीस के आसपास, रास्ते के बीच काट दिए गए। भजनकार का डर मसीह की देह पर उतरा, ताकि उसका बचा हुआ जीवन परमेश्वर के अनन्त वर्षों से जुड़ जाए।
दर्पण
यह पद उन लोगों का है जिनकी योजना बीच में कट गई। जिस उम्र में आपने सोचा था कि अब स्थिरता आएगी, वहीं रिपोर्ट आई, या नौकरी गई, या शरीर ने साथ छोड़ दिया। और आपके भीतर वह सवाल घूमता है जिसे आप प्रार्थना सभा में नहीं कहते: क्या यह परमेश्वर ने किया? भजनकार आपको सिखाता है कि इस सवाल को दबाना ज़रूरी नहीं। वह परमेश्वर पर आरोप नहीं लगाता, पर उन्हें बरी भी नहीं करता; वह बस उनके हाथ को पहचानकर उसी हाथ को पकड़ लेता है। आज यह करें: एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जो आपके जीवन में "घटी" है, समय, शक्ति, कोई रिश्ता, और उसे ज़ोर से बोलकर परमेश्वर से कहिए, "यह आपने होने दिया, और फिर भी मैं आपसे ही माँगता हूँ।"
कठिन सवाल
अगर परमेश्वर ने ही बल घटाया, तो उन्हीं से बचाव माँगना क्या अपने आप में विरोधाभास नहीं? भजन इसका सुलझा हुआ उत्तर नहीं देता। वह न कहता है कि दुःख कोई छिपा हुआ वरदान है, न यह कि परमेश्वर बेबस दर्शक हैं। वह दोनों सिरों को पकड़े रहता है: वही जिन्होंने "उठाया, और फिर फेंक दिया", वही "लाचार की प्रार्थना की ओर मुँह करता है"। शास्त्र यहाँ हमें एक तर्क नहीं, एक रिश्ता देता है। और शायद यही सबसे ईमानदार बात है, क्योंकि दुःख में हमें व्याख्या से ज़्यादा किसी ऐसे की ज़रूरत होती है जिसके सामने चीख़ा जा सके, बिना यह डर कि वे नाराज़ होकर चले जाएँगे।
प्रसंग
कल्पना कीजिए: यरूशलेम का मंदिर जल चुका है, दीवारें गिरी हैं, और लोगों की कतारें बाबुल की सड़कों पर चल रही हैं, महीनों की धूल भरी यात्रा। "जीवन यात्रा" यहाँ केवल रूपक नहीं, हड्डियों में बसा अनुभव है। बंदी की पहचान उसका शहर था, उसका मंदिर था, उसका राजा था; तीनों छिन गए। जो जीवित बचे, उन्होंने राख में बैठकर शोक किया, और भजनकार कहता है कि उसने "रोटी के समान राख खाई"। पड़ोसी जातियाँ उसके नाम को गाली की तरह इस्तेमाल करती हैं। ऐसे माहौल में आधी उम्र में मर जाना केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं थी, यह डर था कि वादा किया हुआ लौटना अपनी आँखों से कभी न देख पाएँगे।
मुख्य पात्र
इस पद का असली कर्ता परमेश्वर हैं, और वे यहाँ असहज रूप से सक्रिय हैं। वे दूर नहीं खड़े; उनका हाथ इतिहास में, और इस आदमी की हड्डियों में लगा हुआ है। यह वही परमेश्वर हैं जिनके बारे में भजन दो साँस बाद कहता है कि उन्होंने "अपने ऊँचे और पवित्रस्थान से दृष्टि की" ताकि "बन्दियों का कराहना सुने"। ऊँचाई और झुकाव एक साथ। वे इतने बड़े हैं कि आकाश उनके लिए बदला जानेवाला वस्त्र है, और इतने पास कि एक बीमार, अपमानित निर्वासित की कराह उन तक पहुँचती है। यह चरित्र हमें आराम नहीं, आधार देता है: जो घटाते हैं वही थामते भी हैं, और उनके वर्षों का अन्त नहीं।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन में कौन-सी बात "आधी" रह गई है, और क्या आप उसे परमेश्वर के सामने उतनी ही सीधी भाषा में रख सकते हैं जितनी भजनकार ने रखी?
जब आप अपनी घटती शक्ति गिनते हैं, तो परमेश्वर के अनगिनत वर्षों की बात आपको डराती है या सँभालती है, और क्यों?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।
Psalms 102:23 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 102:23 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 102:23 किस विषय में है?
भजन संहिता 102:23 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन संहिता 102:23 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 102:23 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 102 में आपको क्या स्पर्श करता है?
इस अंश पर अभी तक कोई अंतर्दृष्टि साझा नहीं की गई है। पहले बनें और कुछ छोड़ें: एक अंतर्दृष्टि, प्रार्थना या धन्यवाद।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें