भजन संहिता 145:3
यह पाठ
दाऊद का यह वाक्य एक ही साँस में दो बातें कहता है: "यहोवा महान और अति स्तुति के योग्य है, और उसकी बड़ाई अगम है।" पहले आधे भाग में स्तुति का आमंत्रण है, दूसरे में उसकी सीमा का स्वीकार। परमेश्वर इतने बड़े हैं कि उनकी स्तुति की जानी चाहिए, और इतने बड़े हैं कि उनकी स्तुति कभी पूरी नहीं हो सकती। यह पद इस पूरे भजन के बीच में एक खुला दरवाज़ा है, जिसके पार अंधेरा नहीं, बल्कि इतनी रोशनी है कि आँखें सह नहीं पातीं।
मूल बात
हम आमतौर पर तभी किसी की प्रशंसा करते हैं जब हम उसे समझ चुके हों। यहाँ उल्टा है। स्तुति यहाँ किसी जाँच का निष्कर्ष नहीं, बल्कि उस मुलाक़ात की प्रतिक्रिया है जिसमें हम हार जाते हैं। "अगम" का अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर अनजान हैं; भजन आगे बहुत कुछ बताता है, कि वे "अनुग्रहकारी और दयालु" हैं, कि वे "सब गिरते हुओं को सम्भालता" हैं। इसका अर्थ है कि जो हम जानते हैं, वह सच है, पर पूरा नहीं। परमेश्वर हमारी धर्मशास्त्रीय व्यवस्थाओं में समा नहीं जाते। यही हमारी सुरक्षा भी है: एक ऐसा परमेश्वर जिसे मैं पूरी तरह नाप लूँ, वह मुझसे बड़ा नहीं होगा, और इसलिए मुझे बचा भी नहीं सकेगा।
सूत्र
ध्यान दीजिए कि यह भजन कहाँ से कहाँ जाता है। तीसरे पद की अथाह महानता चौदहवें पद में झुककर गिरते हुए को थामने लगती है, और सोलहवें में मुट्ठी खोलकर हर प्राणी को भोजन देती है। बाइबल की पूरी कहानी इसी दिशा में बहती है: जो अगम है, वह नीचे उतरता है। यही मसीह का रहस्य है। यीशु में वह महानता ऐसी देह में आ बसी जिसे लोग छू सकते थे, जिस पर थूका भी गया। ईश्वर छोटे नहीं हुए; बल्कि उनकी महानता का वह पक्ष प्रकट हुआ जिसे कोई खोज नहीं सकता था, केवल पाया जा सकता था। क्रूस पर परमेश्वर की बड़ाई कम नहीं होती, वह और भी अगम हो जाती है।
दर्पण
हम में से अधिकतर लोग परमेश्वर से उत्तर चाहते हैं, आराधना बाद में। बीमारी की रिपोर्ट हाथ में है और हम पूछते हैं क्यों। बेटा घर छोड़ चुका है, और हर प्रार्थना के बाद वही चुप्पी है। दफ़्तर में वह पदोन्नति किसी और को मिल गई जिसने ईमानदारी नहीं दिखाई। ऐसे क्षणों में यह पद हमारी सबसे गहरी अपेक्षा को छूता है: कि परमेश्वर हमें समझ में आ जाएँ। "अगम" शब्द उस अपेक्षा को विनम्रता से नकारता है, पर हमें अकेला नहीं छोड़ता, क्योंकि यही भजन कहता है कि वे "जितने उसको सच्चाई से पुकारते है; उन सभी के वह निकट रहता है"।
आज एक कागज़ पर वह एक प्रश्न लिखिए जिसका उत्तर आपके पास नहीं है, और उसके नीचे लिखिए: "उसकी बड़ाई अगम है।" फिर दोनों पंक्तियाँ ज़ोर से पढ़िए और कागज़ को अपनी बाइबल में रख दीजिए।
मुख्य पात्र
इस पद का मुख्य पात्र परमेश्वर स्वयं हैं, और दाऊद उन्हें किसी दूर के सम्राट की तरह नहीं, बल्कि "हे मेरे परमेश्वर, हे राजा" कहकर पुकारता है। यह संबोधन ही सब कुछ बदल देता है। जो अथाह है, वह मेरा है। राजा शब्द उस समय के पाठकों के लिए ठोस था: वे जानते थे कि राजा दूर बैठता है, दरबार में पहुँच पाना कठिन होता है। पर यह राजा गिरते हुओं को थामता है और भूखों को समय पर भोजन देता है। परमेश्वर की महानता उनकी दूरी में नहीं, उनके झुकने में दिखती है। यही वह चरित्र है जिसे भजन पीढ़ी-पीढ़ी सुनाना चाहता है।
एक बारीकी
"अगम" के पीछे इब्रानी शब्द है ḥēqer, जिसका अर्थ है खोजबीन, गहराई तक जाकर तह पाना। शाब्दिक रूप से पद कहता है: उनकी महानता की कोई तह नहीं। यह खनन की भाषा है, उस आदमी की भाषा जो चट्टान काटता हुआ नीचे उतरता जाता है और कभी अंत तक नहीं पहुँचता। यह हार का शब्द नहीं, आश्चर्य का शब्द है। खोज व्यर्थ नहीं है; भजनकार स्वयं कहता है, "मैं तेरे ऐश्वर्य की महिमा के प्रताप पर… ध्यान करूँगा"। पर वह खुदाई कभी पूरी नहीं होगी। अनंत काल भी छोटा पड़ेगा। स्तुति इसीलिए "सदा सर्वदा" की जाती है, क्योंकि विषय कभी चुकता नहीं।
अंतर्पाठ
यशायाह 40 में यही स्वर लौटता है, जहाँ थके हुए निर्वासितों से कहा जाता है कि परमेश्वर की समझ की कोई थाह नहीं, और ठीक इसी कारण वे थके हुओं को बल देते हैं। वहाँ भी अथाहता सांत्वना है, धमकी नहीं। नए नियम में पौलुस रोमियों 11 के अंत में परमेश्वर के मार्गों की अथाहता के सामने रुक जाता है और तर्क छोड़कर स्तुति में फूट पड़ता है। दोनों जगह वही गति है जो इस पद में है: समझ की सीमा पर पहुँचकर मनुष्य या तो कड़वा होता है या आराधना करता है। भजन 145 चुनाव साफ़ रखता है और हमें दूसरी दिशा में धकेलता है।
चिंतन के प्रश्न
परमेश्वर के बारे में वह कौन-सी बात है जिसे मैं समझ नहीं पाया, और क्या मैं उसे हल किए बिना उनकी स्तुति कर सकता हूँ?
मेरी आराधना में कितना हिस्सा माँगने का है और कितना केवल देखने और चकित होने का?
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Psalms 145:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 145:3 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 145:3 किस विषय में है?
भजन संहिता 145:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन संहिता 145:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 145:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 145 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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