रोमियों 10
पाठ
पौलुस अपने ही लोगों के लिये तड़प से शुरू करते हैं: "मेरे मन की अभिलाषा और उनके लिये परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है, कि वे उद्धार पाएँ।" इस्राएल में धुन तो है, पर "बुद्धिमानी के साथ नहीं"; वे परमेश्वर की धार्मिकता को छोड़कर अपनी धार्मिकता खड़ी करने में लगे रहे। इसके विरुद्ध पौलुस मसीह को रखते हैं, जो "हर एक विश्वास करनेवाले के लिये धार्मिकता के निमित्त" व्यवस्था का अन्त हैं। फिर वे व्यवस्थाविवरण की भाषा उधार लेकर कहते हैं कि वचन दूर स्वर्ग या अधोलोक में नहीं, बल्कि मुँह और मन के बहुत निकट है: यीशु को प्रभु मानकर अंगीकार करो, जी उठने पर विश्वास करो, उद्धार पाओगे। अन्त में सवालों की एक श्रृंखला, प्रचारक भेजे जाने की ज़रूरत, और यशायाह का वह दर्दभरा चित्र: सारे दिन फैले हुए हाथ, और एक ऐसी प्रजा जो हठ किए बैठी है।
मूल बात
इस अध्याय का दिल एक ही टकराव में है: दो धार्मिकताएँ, दो रास्ते, और दोनों बाइबल से ही बोलते हैं। पौलुस लैव्यव्यवस्था 18:5 को मूसा के मुँह में रखते हैं, "जो व्यक्ति उनका पालन करता है, वह उनसे जीवित रहेगा", और फिर उसी मूसा की दूसरी आवाज़ (व्यवस्थाविवरण 30) को उठाते हैं, जहाँ वचन को खोजने के लिये कहीं चढ़ना या उतरना नहीं पड़ता। यह चालाकी नहीं, यह पढ़ने का तरीका है: व्यवस्था स्वयं गवाही देती है कि जीवन अन्ततः परमेश्वर के निकट आने से मिलता है, हमारे ऊपर चढ़ने से नहीं। इसलिये मसीह को "व्यवस्था का अन्त" कहना उसे रद्द करना नहीं, बल्कि उसका लक्ष्य और पूर्णता घोषित करना है। और परिणाम विस्फोटक है: "यहूदियों और यूनानियों में कुछ भेद नहीं", क्योंकि जो नाम योएल ने याहवे के लिये पुकारा था, वही नाम अब यीशु का है। जिसे कमाना असम्भव था, वह अब पुकारने भर की दूरी पर है।
सूत्र
पौलुस जिन पदों को उठाते हैं, वे सब निर्वासन की भाषा से आते हैं। व्यवस्थाविवरण 30 उस अध्याय में है जहाँ मूसा बिखर चुकी प्रजा को लौटने का वचन देते हैं, और यशायाह 52:7 उस दूत का चित्र है जो बाबेल से छुटकारे की खबर लेकर पहाड़ों पर दौड़ता है: "उनके पाँव क्या ही सुहावने हैं, जो अच्छी बातों का सुसमाचार सुनाते हैं!" पौलुस के लिये वह दूत अब कलीसिया का प्रचारक है, और वह छुटकारा मसीह का जी उठना है। ध्यान दीजिए कि ठीक इसके बाद वे यशायाह 53:1 उद्धृत करते हैं, यानी उसी भविष्यवाणी की अगली साँस, जहाँ दुखी सेवक का वर्णन शुरू होता है और साथ ही यह शिकायत भी कि खबर पर कोई विश्वास नहीं करता। सुसमाचार और उसका इनकार, दोनों एक ही पन्ने पर पहले से लिखे हैं।
दर्पण
यह अध्याय उस धुन पर उँगली रखता है जो हमारे भीतर सबसे सम्माननीय लगती है। इस्राएल आलसी नहीं था; उसमें "परमेश्वर के लिये धुन" थी। यही आपके साथ हो सकता है: आप जल्दी उठते हैं, सेवा में लगे हैं, दान देते हैं, और भीतर कहीं एक खाता चल रहा है जिसमें आप अपने नाम के आगे अंक जोड़ते जाते हैं। वह खाता ही "अपनी धार्मिकता स्थापित करने का यत्न" है। इसका सबसे साफ़ लक्षण यह है कि आप दूसरों को उनके प्रदर्शन से आँकते हैं, अपने बच्चों को भी। पौलुस कहते हैं, वचन इतना निकट है कि उसे कमाने की कोई जगह ही नहीं बची। आज कहीं अकेले में, ज़ोर से, अपने कानों को सुनाते हुए कहिए: "यीशु प्रभु हैं।" पद 10 के अनुसार यह अंगीकार मुँह से किया जाता है; इसे मन में दबाकर मत रखिए।
संदर्भ
पौलुस यह पत्र लगभग 57 ईस्वी में कुरिन्थुस से लिखते हैं, यरूशलेम जाने की तैयारी में, हाथ में गैर-यहूदी कलीसियाओं का चंदा लिये। रोम की कलीसिया को उन्होंने स्थापित नहीं किया था। कुछ ही वर्ष पहले सम्राट क्लौदियुस ने यहूदियों को रोम से निकाल दिया था, और उस दौरान वहाँ की मण्डलियाँ लगभग पूरी तरह गैर-यहूदी हो गई थीं। अब यहूदी विश्वासी लौट रहे थे और घरों में इकट्ठा होने वाली इन छोटी सभाओं में तनाव था: किसकी परम्परा, किसका भोजन, किसका शब्बत। अध्याय 9 से 11 इसी घाव पर लिखे गए हैं, कोई ठंडा धर्मशास्त्रीय निबंध नहीं।
श्रोता
इन पत्रों को पढ़कर नहीं, सुनकर ग्रहण किया जाता था, एक बैठक में पूरा। कल्पना कीजिए कि व्यवस्थाविवरण में पले-बढ़े यहूदी विश्वासी सुनते हैं कि मूसा के अपने शब्द अब यीशु के जी उठने की ओर इशारा कर रहे हैं; यह उन्हें रोमांचित भी करता होगा और चुभता भी। और गैर-यहूदी सुनते हैं, "मैं एक मूर्ख जाति के द्वारा तुम्हें रिस दिलाऊँगा" और समझते हैं कि उस वाक्य में मूर्ख जाति वे स्वयं हैं। यह तारीफ़ नहीं थी। जिस क्षण उन्हें अपनी श्रेष्ठता का स्वाद आने लगता, पौलुस उन्हें याद दिलाते हैं कि वे मूसा के गीत में केवल इस्राएल को जलाने का साधन हैं, इनाम पाने वाले नायक नहीं।
कठिन प्रश्न
पद 18 में पौलुस पूछते हैं कि क्या उन्होंने नहीं सुना, और भजन 19 उद्धृत करके कहते हैं कि सुना तो सही। फिर भी अध्याय का अन्त हठ पर होता है। तो दोष किसका? अध्याय 9 में परमेश्वर की चुनने की स्वतंत्रता खड़ी है, और यहाँ मनुष्य की ज़िम्मेदारी उतनी ही मज़बूती से। पौलुस इन दोनों को मिलाकर कोई साफ़ समीकरण नहीं देते। वे केवल एक चित्र देकर रुक जाते हैं: "मैं सारे दिन अपने हाथ एक आज्ञा न माननेवाली और विवाद करनेवाली प्रजा की ओर पसारे रहा।" यह किसी उदासीन फ़ैसले की भाषा नहीं, यह ठुकराए गए प्रेमी की भाषा है। रहस्य बना रहता है, पर वह ठंडा रहस्य नहीं; उसमें थके हुए, फिर भी फैले हुए हाथ हैं।
चिंतन
आपकी "धुन" कहाँ बुद्धिमानी के बिना चल रही है, यानी कहाँ आप परमेश्वर के लिये मेहनत करते हुए भी उनकी दी हुई धार्मिकता के अधीन होने से बच रहे हैं?
यशायाह 52:7 के सुहावने पाँव किसी भेजे हुए व्यक्ति के हैं। आपके जीवन में वह आवाज़ किसकी थी, और आज किसके लिये आप वह आवाज़ बन सकते हैं?
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Romans 10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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रोमियों 10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तेरा वचन कहीं दूर नहीं, वह मेरे बहुत पास है, मेरे मन में और मेरे होंठों पर। कई बार मैं तुझे ढूँढ़ने के लिए दूर भागता हूँ, जबकि तू पहले से ही यहीं है। मुझे विश्वास दे कि मैं जो मानता हूँ, वही सच्चाई से बोलूँ और जीऊँ।
वह सब का प्रभु है और अपने सब नाम लेनेवालों के लिये उदार है।" पौलुस यह उन लोगों से कह रहा था जो जाति और परंपरा के आधार पर खुद को दूसरों से ऊँचा समझते थे। परमेश्वर के पास कोई ऊँची पंक्ति नहीं है, कोई पिछड़ी कतार नहीं। तेरी जाति, तेरा गाँव, तेरा बीता हुआ जीवन उसकी उदारता की सीमा तय नहीं करते। तू पुकार, वह सुनता है। सवाल यह है कि जिन्हें तू अपने से छोटा मानता है, उनके लिए भी तेरा दिल इतना ही खुला है?
मैं सारे दिन अपने हाथ एक आज्ञा न माननेवाली और विवाद करनेवाली प्रजा की ओर बढ़ाए रहा।" सोचो, हाथ फैलाए रखना कितना थका देता है। परमेश्वर सारे दिन ऐसे ही खड़ा रहा, बुलाता रहा, और लोग मुँह फेरते रहे। तुम्हारी ओर भी वे हाथ अब तक फैले हैं। सवाल यह नहीं कि वह कब तक रुकेगा, सवाल यह है कि तुम कब तक टालोगे।
पिता, आपका धन्यवाद कि आपका शब्द सारी पृथ्वी पर और आपके वचन जगत की छोर तक पहुँच गए हैं। आपने चुप नहीं रहे, बल्कि मेरे कानों तक भी सुसमाचार पहुँचाया। धन्यवाद उन जनों के लिए जो इसे सुनाते रहे, और इसलिए कि मैंने सुना और विश्वास किया।
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