7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

यहूदा 1

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

यहूदा नाम का एक व्यक्ति यह चिट्ठी लिखता है। वह अपने बारे में कहता है कि वह "यीशु मसीह का दास और याकूब का भाई है।" यह याकूब वही है जो प्रभु यीशु का सौतेला भाई था। इसका मतलब यहूदा भी यीशु के परिवार से था। पर सोचो, वह खुद को "भाई" नहीं, बल्कि "दास" कहता है। उसके लिए यीशु सबसे बड़ा है।

यहूदा एक अच्छा पत्र लिखना चाहता था, उद्धार के बारे में, यानी इस बारे में कि परमेश्वर हमें कैसे बचाते हैं। पर उसने अपनी योजना बदल दी। क्यों? क्योंकि कलीसिया में एक समस्या घुस आई थी। कुछ लोग चुपके से मंडली में आ मिले थे जो गलत बातें सिखा रहे थे। वे कहते थे कि परमेश्वर का अनुग्रह इतना बड़ा है कि तुम जो चाहो कर सकते हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। यहूदा इससे बहुत दुखी था। वह लिखता है कि ये लोग "परमेश्वर के अनुग्रह को लुचपन में बदल" रहे हैं, यानी क्षमा को गंदे कामों का बहाना बना रहे हैं।

फिर यहूदा तीन पुरानी कहानियाँ याद दिलाता है। पहली, इस्राएल के लोग मिस्र से छूटे, पर जब उन्होंने विश्वास नहीं किया, तो जंगल में नाश हुए। दूसरी, कुछ स्वर्गदूतों ने अपनी जगह छोड़ दी और अब अंधकार में बंधे हैं। तीसरी, सदोम और गमोरा के लोग गंदी बातों में डूब गए और आग से नाश हुए। यहूदा कहता है, देखो, परमेश्वर के साथ खिलवाड़ मत करो।

फिर वह इन झूठे शिक्षकों को कुछ अजीब चीज़ों से तुलना करता है: "समुद्र में छिपी हुई चट्टानें" जो जहाज़ों को तोड़ती हैं, बादल जिनमें पानी नहीं, पेड़ जिनमें फल नहीं, और तारे जो अपनी जगह से भटक गए हैं। ये सब वो चीज़ें हैं जो दिखने में तो कुछ लगती हैं, पर असल में खोखली हैं।

पर यहूदा सिर्फ चेतावनी देकर नहीं रुकता। अंत में वह अपने प्रिय भाई-बहनों से कहता है: "अपने आपको परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखो।" प्रार्थना करते रहो। जो लोग शंका में हैं, उन पर दया करो। और सबसे सुंदर बात आखिर में आती है: परमेश्वर तुम्हें ठोकर खाने से बचा सकते हैं और अपनी महिमा के सामने खुशी से खड़ा कर सकते हैं।

इसका क्या मतलब है?

यहूदा एक बात बहुत साफ बताता है: विश्वास ऐसी चीज़ नहीं जो अपने-आप बना रहे। उसके लिए "पूरा यत्न" करना पड़ता है। यानी विश्वास की देखभाल करनी होती है, जैसे तुम अपने पौधे या पालतू जानवर की देखभाल करते हो।

और यहूदा ईमानदार है। वह कहता है कि कलीसिया के अंदर भी गलत लोग हो सकते हैं। यह डरावनी बात है, पर सच है। हर वह व्यक्ति जो चर्च में आता है, ज़रूरी नहीं कि यीशु से सच में प्यार करता हो। पर यहूदा हमें डराने के लिए नहीं लिखता, वह हमें जगाने के लिए लिखता है।

मुख्य धागा

देखो पहली आयत को दोबारा। यहूदा कहता है कि विश्वासी "परमेश्वर पिता में प्रिय और यीशु मसीह के लिये सुरक्षित हैं।" यह पूरी चिट्ठी का दिल है। परमेश्वर तुमसे प्यार करते हैं, और यीशु तुम्हें सुरक्षित रखते हैं।

और अंत में यहूदा लिखता है कि यीशु मसीह ऐसे हैं जो "तुम्हें ठोकर खाने से बचा सकते हैं।" यही पूरी बाइबल की बड़ी कहानी है। इंसान गिरता है, भटकता है, गलतियाँ करता है। पर यीशु आए ताकि हमें थामे रहें। हम अपनी ताकत से विश्वास में नहीं बने रहते, यीशु हमें बनाए रखते हैं।

तुम्हारे लिए

क्या तुमने कभी सोचा है कि कोई बात सुनने में सही लगे, पर हो गलत? यहूदा कहता है कि हर बात को परखो। जब कोई कहे "परमेश्वर तो प्यार करते हैं, इसलिए कुछ भी करो, कोई फर्क नहीं पड़ता", तो सावधान रहो। यह सच नहीं है। परमेश्वर का प्रेम हमें बदलता है, आलसी नहीं बनाता।

यहूदा तीन बातें कहता है जो तुम आज कर सकते हो: अपने विश्वास में बढ़ते रहो (बाइबल पढ़ो, सीखते रहो), प्रार्थना करो, और परमेश्वर के प्रेम में बने रहो। और एक चौथी बात, जो बहुत सुंदर है: उन दोस्तों पर दया करो जिनके मन में शंका है। उन्हें ठुकराओ मत। उनके साथ बैठो, सुनो, और उनके लिए प्रार्थना करो।

इस पर बात करो

अगर कोई तुमसे कहे कि "यीशु तो सब माफ कर देते हैं, इसलिए कुछ भी करो कोई बात नहीं", तो तुम क्या जवाब दोगे?

यहूदा कहता है कि यीशु हमें ठोकर खाने से बचाते हैं। पर फिर भी हमें "यत्न" करना है। ये दोनों बातें एक साथ कैसे सच हो सकती हैं?

साथ में प्रार्थना

प्रभु यीशु, धन्यवाद कि आप हमें प्यार करते हैं और हमें सुरक्षित रखते हैं। हमारा विश्वास कभी-कभी छोटा होता है और हमारे मन में शंकाएँ आती हैं। हमें थामे रखिए। हमें सिखाइए कि सच क्या है और झूठ क्या है। और उन दोस्तों की मदद कीजिए जो अभी शंका में हैं। आमीन।

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यहूदा 1 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

यहूदा 1 किस विषय में है?
यहूदा नाम का एक व्यक्ति यह चिट्ठी लिखता है। वह अपने बारे में कहता है कि वह "यीशु मसीह का दास और याकूब का भाई है।" यह याकूब वही है जो प्रभु यीशु का सौतेला भाई था। इसका मतलब यहूदा भी यीशु के परिवार से था। पर सोचो, वह खुद को "भाई" नहीं, बल्कि "दास" कहता है। उसके लिए यीशु सबसे बड़ा है।
यहूदा 1 क्या कहता है?
फिर वह इन झूठे शिक्षकों को कुछ अजीब चीज़ों से तुलना करता है: "समुद्र में छिपी हुई चट्टानें" जो जहाज़ों को तोड़ती हैं, बादल जिनमें पानी नहीं, पेड़ जिनमें फल नहीं, और तारे जो अपनी जगह से भटक गए हैं। ये सब वो चीज़ें हैं जो दिखने में तो कुछ लगती हैं, पर असल में खोखली हैं।
यहूदा 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
और यहूदा ईमानदार है। वह कहता है कि कलीसिया के अंदर भी गलत लोग हो सकते हैं। यह डरावनी बात है, पर सच है। हर वह व्यक्ति जो चर्च में आता है, ज़रूरी नहीं कि यीशु से सच में प्यार करता हो। पर यहूदा हमें डराने के लिए नहीं लिखता, वह हमें जगाने के लिए लिखता है।
बच्चे यहूदा 1 से क्या सीख सकते हैं?
क्या तुमने कभी सोचा है कि कोई बात सुनने में सही लगे, पर हो गलत? यहूदा कहता है कि हर बात को परखो। जब कोई कहे "परमेश्वर तो प्यार करते हैं, इसलिए कुछ भी करो, कोई फर्क नहीं पड़ता", तो सावधान रहो। यह सच नहीं है। परमेश्वर का प्रेम हमें बदलता है, आलसी नहीं बनाता।
यहूदा 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
यहूदा कहता है कि यीशु हमें ठोकर खाने से बचाते हैं। पर फिर भी हमें "यत्न" करना है। ये दोनों बातें एक साथ कैसे सच हो सकती हैं?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

यहूदा उन्हें चौंकाता नहीं, याद दिलाता है: "अन्तिम दिनों में ऐसे उपहास करनेवाले होंगे, जो अपनी अभक्ति की अभिलाषाओं के अनुसार चलेंगे।" ध्यान दे, उपहास पहले दिल की चाह से जन्मता है, फिर तर्क बनता है। जो हँसी तुझे आज चुभती है, वह तेरे विश्वास के टूटने का चिन्ह नहीं, बल्कि पहले से कहे गए वचन का पूरा होना है। तू अकेला नहीं, और तू अचंभित होने की जरूरत नहीं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

यहूदा ने झूठे शिक्षकों के बारे में कड़ी बातें लिखने के बाद पाठकों को "हे प्रियो" कहकर पुकारा और कहा, "उन बातों को स्मरण रखो जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रेरितों ने पहले कही हैं।" कोई नई भविष्यवाणी नहीं, बस याद रखना। जो तुझे पहले ही बताया गया था, वही तुझे डगमगाने से बचाएगा। सवाल यह है, क्या तू भूल गया है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 21

अपने आप को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखो" (यहूदा 1:21)। ध्यान दे, यहूदा यह नहीं कहता कि परमेश्वर का प्रेम कमाओ। वह प्रेम तो बह ही रहा है। बात सिर्फ इतनी है कि तू उसमें ठहरा रहे। धूप की तरह है यह, सूरज बुझता नहीं, पर हम खुद छाँव में सरक जाते हैं। आज तू कहाँ खड़ा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

यहूदा कुछ और लिखना चाहता था। उद्धार की उस साझी खुशी पर, जिसमें हम सब सहभागी हैं। पर उसने कलम रोक दी और लिखा, "उस विश्वास के लिये पूरा यत्न करो जो पवित्र लोगों को एक ही बार सौंपा गया था।" कभी कभी प्रेम मीठी बातें छोड़कर ज़रूरी बात कहता है। यह विश्वास तुम्हारी अपनी खोज नहीं, किसी ने तुम्हारे हाथ में सौंपा है। तुम उसे किसके हाथ में सौंप रहे हो?

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