12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

यहूदा 1

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

यहूदा अपनी चिट्ठी बहुत छोटे परिचय से शुरू करता है: "यीशु मसीह का दास और याकूब का भाई।" वह अपने बारे में और कुछ नहीं कहता। परंपरा कहती है कि वह यीशु का सगा भाई था, यानी उसी घर में पला-बढ़ा। फिर भी वह खुद को "भाई" नहीं, "दास" कहता है। जिन्हें वह लिखता है, उनकी पहचान भी वह उनकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि परमेश्वर के काम से बताता है: बुलाए हुए, पिता में प्रिय, यीशु मसीह के लिये सुरक्षित।

फिर वह ईमानदारी से कबूल करता है कि उसकी योजना कुछ और थी। वह उस उद्धार के बारे में लिखना चाहता था "जिसमें हम सब सहभागी हैं", एक सुंदर, साझा विषय। पर उसे योजना बदलनी पड़ी। कुछ लोग "चुपके से" कलीसिया में आ मिले हैं। वे बाहर से हमला नहीं करते, वे भीतर बैठकर साथ खाते हैं। उनका काम यह है कि वे "परमेश्वर के अनुग्रह को लुचपन में बदल डालते हैं" और यीशु मसीह को, जो एकमात्र स्वामी है, इन्कार करते हैं। इसलिए यहूदा लिखता है: "उस विश्वास के लिये पूरा यत्न करो जो पवित्र लोगों को एक ही बार सौंपा गया था।"

इसके बाद वह इतिहास खोलता है, तीन उदाहरणों के साथ। परमेश्वर ने एक पूरी पीढ़ी को मिस्र से छुड़ाया, पर जिन्होंने विश्वास नहीं किया वे नाश हुए। कुछ स्वर्गदूतों ने अपना पद छोड़ दिया और अब अंधकार में बंधे हैं। सदोम और गमोरा जल गए और चेतावनी का दृष्टान्त बन गए। तीनों बार वही बात: शुरुआत अच्छी हो सकती है, फिर भी अंत निश्चित नहीं है।

फिर यहूदा उन घुसपैठियों का वर्णन करता है, और उसकी भाषा तीखी है। वे "स्वप्नदर्शी" हैं जो प्रभुता को तुच्छ जानते हैं और ऊँचे पदवालों को बुरा-भला कहते हैं। यहूदा इसकी तुलना प्रधान स्वर्गदूत मीकाईल से करता है, जिसने शैतान से बहस करते समय भी दोष लगाने का साहस नहीं किया, बस कहा: "प्रभु तुझे डाँटे।" जो सबसे शक्तिशाली था, वह सबसे संयमित था। जो सबसे खोखले हैं, वे सबसे ऊँचा बोलते हैं।

चित्र और भी कड़े होते जाते हैं। ये लोग प्रेम-भोजों में समुद्र की छिपी चट्टान जैसे हैं, जिनसे जहाज़ टकराकर टूट जाता है। वे बादल हैं जिनमें पानी नहीं, पेड़ हैं जिन पर फल नहीं और जो जड़ से उखड़े हुए हैं, लहरें हैं जो अपनी लज्जा का फेन उछालती हैं, तारे हैं जो भटक गए हैं। सब कुछ वादा करता दिखता है, कुछ भी देता नहीं। और वे "असंतुष्ट, कुड़कुड़ानेवाले" हैं जो लाभ के लिये मुँह देखी बड़ाई करते हैं, यानी जिससे फायदा हो, उसकी तारीफ़।

फिर स्वर बदलता है। "पर हे प्रियों" कहकर यहूदा अपने पाठकों की ओर मुड़ता है और चार बातें कहता है: अपने अति पवित्र विश्वास में उन्नति करो, पवित्र आत्मा में प्रार्थना करो, अपने आपको परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखो, और मसीह की दया की आशा देखते रहो। और फिर, हैरान करने वाली बात: "उन पर जो शंका में हैं दया करो।" संदेह करने वालों को निकाला नहीं जाता, उन पर दया की जाती है। कुछ को आग में से झपटकर निकालना है। अंत में वह उस परमेश्वर की महिमा करता है जो "तुम्हें ठोकर खाने से बचा सकता है" और निर्दोष करके खड़ा कर सकता है।

इसका अर्थ क्या है?

यहूदा उस झूठ के पीछे पड़ता है जो आज भी ज़िंदा है: अनुग्रह को लुचपन में बदल देना। तर्क सीधा लगता है। परमेश्वर क्षमा करते हैं, तो मैं जैसे जीना चाहूँ जी सकता हूँ। यहूदा कहता है, यह अनुग्रह का इस्तेमाल नहीं, अनुग्रह का इन्कार है। क्योंकि जो अनुग्रह क्षमा देता है, वही अनुग्रह एक स्वामी भी देता है, और वह स्वामी यीशु मसीह है।

दूसरी बात: सच्चाई की कोई कीमत होती है। "पूरा यत्न करो" का मतलब झगड़ालू होना नहीं है, वरना यहूदा मीकाईल की मिसाल न देता। इसका मतलब है कि विश्वास कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे हर पीढ़ी अपनी पसंद के हिसाब से नए सिरे से गढ़े। वह "एक ही बार सौंपा गया" है। तुम उसे प्राप्त करते हो, आविष्कार नहीं करते।

और तीसरी बात, जो सबसे ज़्यादा राहत देती है: तुम्हारी सुरक्षा तुम्हारी पकड़ पर नहीं टिकी। पहले पद में तुम "सुरक्षित" हो, चौबीसवें पद में वही परमेश्वर तुम्हें ठोकर से बचाते हैं। बीच में तुम्हें खुद को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखना है। दोनों सच हैं, और यहूदा किसी को कमज़ोर नहीं करता।

मुख्य सूत्र

पूरी चिट्ठी दो नामों के बीच बंधी है। शुरू में: "यीशु मसीह के लिये सुरक्षित।" अंत में: उस परमेश्वर की महिमा "हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा।" बीच का सारा अंधेरा, न्याय, आग, भटकते तारे, इन दोनों खूँटों के बीच टँगा है।

हनोक की भविष्यद्वाणी कहती है कि प्रभु न्याय करने आएँगे। पर यहूदा हमें डर में नहीं छोड़ता। वह कहता है: "मसीह की दया की आशा देखते रहो।" वही न्यायी हमारा उद्धारकर्ता है। जो आग वास्तविक है, उसी में से लोगों को झपटकर निकालने की ज़िम्मेदारी हमें दी गई है। यह पूरी बाइबल की कहानी है: परमेश्वर पाप को हल्के में नहीं लेते, और परमेश्वर पापी को छोड़ते नहीं।

तुम्हारे लिए

तुम्हारे आसपास आवाज़ों की कमी नहीं है। स्क्रीन पर हर कोई आत्मविश्वास से बोलता है, और सबसे ऊँची आवाज़ अक्सर सबसे खोखली होती है। यहूदा तुम्हें एक कसौटी देता है: क्या यह बादल पानी बरसाता है? क्या इस पेड़ पर फल है? कोई कितना भी प्रभावशाली लगे, पूछो कि उसके जीवन में असल में क्या उगा है।

दूसरी बात, तुम्हारा संदेह तुम्हें अयोग्य नहीं बनाता। पद 22 यहूदा की चिट्ठी की सबसे कोमल पंक्ति है। जो शंका में हैं, उन पर दया करो। अगर तुम खुद शंका में हो, तो जान लो कि परमेश्वर तुम्हें बाहर नहीं फेंकते। और अगर तुम्हारा दोस्त शंका में है, तो उसका मज़ाक मत उड़ाओ, उसके साथ खड़े रहो।

अब एक असली चुनौती। यहूदा चार क्रियाएँ देता है, और वे रोज़ की चीज़ें हैं: विश्वास में बढ़ो, प्रार्थना करो, परमेश्वर के प्रेम में बने रहो, आशा में देखो। अगले तीस दिन इनमें से पहली दो को गंभीरता से लो। हर दिन बाइबल का एक हिस्सा पढ़ो, चाहे मन न करे, और हर दिन प्रार्थना करो, चाहे शब्द न मिलें। साथ ही एक और काम करो जो असुविधाजनक है: अपने जीवन में एक ऐसी चीज़ पहचानो जिसे तुम "परमेश्वर तो माफ़ कर ही देंगे" कहकर चलने देते हो, और किसी भरोसेमंद बड़े व्यक्ति के सामने उसे नाम देकर स्वीकार करो। अनुग्रह को लुचपन में बदलना दूसरों की समस्या नहीं है। वह सबसे पहले हमारे अपने दिल में शुरू होता है।

इस पर बात करें

कहाँ-कहाँ तुमने "परमेश्वर तो दयालु हैं" वाक्य का इस्तेमाल किसी ऐसी बात को सही ठहराने के लिए किया है जिसे तुम भीतर से गलत जानते हो?

यहूदा कहता है कि शंका करने वालों पर दया करो। तुम्हारी मंडली या दोस्तों के बीच संदेह करने वाले के साथ असल में कैसा व्यवहार होता है, और उसमें तुम्हारी क्या भूमिका है?

मिलकर प्रार्थना

प्रभु यीशु, आपने हमें अपने लिए सुरक्षित रखा है, और यही हमारी एकमात्र नींव है। हमें अपने अनुग्रह को सस्ता बनाने से बचाइए। जहाँ हम संदेह में हैं, हमें थामे रखिए; जहाँ हम कठोर हैं, हमें कोमल कीजिए। हमें उन लोगों की परवाह करना सिखाइए जो डगमगा रहे हैं। जो हमें ठोकर खाने से बचा सकते हैं, उन्हीं परमेश्वर की महिमा युगानुयुग हो। आमीन।

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यहूदा 1 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

यहूदा 1 किस विषय में है?
यहूदा अपनी चिट्ठी बहुत छोटे परिचय से शुरू करता है: "यीशु मसीह का दास और याकूब का भाई।" वह अपने बारे में और कुछ नहीं कहता। परंपरा कहती है कि वह यीशु का सगा भाई था, यानी उसी घर में पला-बढ़ा। फिर भी वह खुद को "भाई" नहीं, "दास" कहता है। जिन्हें वह लिखता है, उनकी पहचान भी वह उनकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि परमेश्वर के काम से बताता है: बुलाए हुए, पिता में प्रिय, यीशु मसीह के लिये सुरक्षित।
यहूदा 1 क्या कहता है?
चित्र और भी कड़े होते जाते हैं। ये लोग प्रेम-भोजों में समुद्र की छिपी चट्टान जैसे हैं, जिनसे जहाज़ टकराकर टूट जाता है। वे बादल हैं जिनमें पानी नहीं, पेड़ हैं जिन पर फल नहीं और जो जड़ से उखड़े हुए हैं, लहरें हैं जो अपनी लज्जा का फेन उछालती हैं, तारे हैं जो भटक गए हैं। सब कुछ वादा करता दिखता है, कुछ भी देता नहीं। और वे "असंतुष्ट, कुड़कुड़ानेवाले" हैं जो लाभ के लिये मुँह देखी बड़ाई करते हैं, यानी जिससे फायदा हो, उसकी तारीफ़।
यहूदा 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
और तीसरी बात, जो सबसे ज़्यादा राहत देती है: तुम्हारी सुरक्षा तुम्हारी पकड़ पर नहीं टिकी। पहले पद में तुम "सुरक्षित" हो, चौबीसवें पद में वही परमेश्वर तुम्हें ठोकर से बचाते हैं। बीच में तुम्हें खुद को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखना है। दोनों सच हैं, और यहूदा किसी को कमज़ोर नहीं करता।
किशोर यहूदा 1 से क्या सीख सकते हैं?
दूसरी बात, तुम्हारा संदेह तुम्हें अयोग्य नहीं बनाता। पद 22 यहूदा की चिट्ठी की सबसे कोमल पंक्ति है। जो शंका में हैं, उन पर दया करो। अगर तुम खुद शंका में हो, तो जान लो कि परमेश्वर तुम्हें बाहर नहीं फेंकते। और अगर तुम्हारा दोस्त शंका में है, तो उसका मज़ाक मत उड़ाओ, उसके साथ खड़े रहो।
यहूदा 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
प्रभु यीशु, आपने हमें अपने लिए सुरक्षित रखा है, और यही हमारी एकमात्र नींव है। हमें अपने अनुग्रह को सस्ता बनाने से बचाइए। जहाँ हम संदेह में हैं, हमें थामे रखिए; जहाँ हम कठोर हैं, हमें कोमल कीजिए। हमें उन लोगों की परवाह करना सिखाइए जो डगमगा रहे हैं। जो हमें ठोकर खाने से बचा सकते हैं, उन्हीं परमेश्वर की महिमा युगानुयुग हो। आमीन।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

यहूदा उन्हें चौंकाता नहीं, याद दिलाता है: "अन्तिम दिनों में ऐसे उपहास करनेवाले होंगे, जो अपनी अभक्ति की अभिलाषाओं के अनुसार चलेंगे।" ध्यान दे, उपहास पहले दिल की चाह से जन्मता है, फिर तर्क बनता है। जो हँसी तुझे आज चुभती है, वह तेरे विश्वास के टूटने का चिन्ह नहीं, बल्कि पहले से कहे गए वचन का पूरा होना है। तू अकेला नहीं, और तू अचंभित होने की जरूरत नहीं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

यहूदा ने झूठे शिक्षकों के बारे में कड़ी बातें लिखने के बाद पाठकों को "हे प्रियो" कहकर पुकारा और कहा, "उन बातों को स्मरण रखो जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रेरितों ने पहले कही हैं।" कोई नई भविष्यवाणी नहीं, बस याद रखना। जो तुझे पहले ही बताया गया था, वही तुझे डगमगाने से बचाएगा। सवाल यह है, क्या तू भूल गया है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 21

अपने आप को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखो" (यहूदा 1:21)। ध्यान दे, यहूदा यह नहीं कहता कि परमेश्वर का प्रेम कमाओ। वह प्रेम तो बह ही रहा है। बात सिर्फ इतनी है कि तू उसमें ठहरा रहे। धूप की तरह है यह, सूरज बुझता नहीं, पर हम खुद छाँव में सरक जाते हैं। आज तू कहाँ खड़ा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

यहूदा कुछ और लिखना चाहता था। उद्धार की उस साझी खुशी पर, जिसमें हम सब सहभागी हैं। पर उसने कलम रोक दी और लिखा, "उस विश्वास के लिये पूरा यत्न करो जो पवित्र लोगों को एक ही बार सौंपा गया था।" कभी कभी प्रेम मीठी बातें छोड़कर ज़रूरी बात कहता है। यह विश्वास तुम्हारी अपनी खोज नहीं, किसी ने तुम्हारे हाथ में सौंपा है। तुम उसे किसके हाथ में सौंप रहे हो?

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