3 से 6 वर्ष के बच्चे के लिए

गिनती 14

नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

गिनती 14 की कहानी

व्याख्या

रात का समय था। चारों ओर अंधेरा था। इस्राएल के सारे लोग तंबुओं में बैठे थे। और वे रो रहे थे। बहुत रो रहे थे। क्यों?

कुछ लोग उस देश को देखने गए थे, जो परमेश्वर उन्हें देना चाहते थे। वहाँ से लौटकर उन्होंने कहा, वहाँ बड़े-बड़े लोग हैं। हम डर गए हैं। सारे लोग यह सुनकर रोने लगे। वे मूसा से बुड़बुड़ाने लगे। वे कहने लगे, काश हम वहीं मर जाते। हम वहाँ नहीं जाएँगे।

पर दो लोग अलग खड़े थे। उनका नाम यहोशू और कालेब था। उन्होंने अपने कपड़े फाड़े। वे चिल्लाकर बोले, वह देश बहुत अच्छा है। परमेश्वर हमारे साथ हैं। मत डरो।

पर लोगों ने नहीं सुना। वे चिल्लाए, इनको पत्थरों से मारो।

तब कुछ हुआ। परमेश्वर का तेज, एक चमकीली रोशनी, तंबू में दिखाई दी। परमेश्वर ने देखा और सुना। उन्होंने सब कुछ सुना था।

इसका क्या मतलब है?

मूसा परमेश्वर से बात करने लगे। उन्होंने कहा, हे परमेश्वर, कृपया इन लोगों को क्षमा कर दीजिए।

परमेश्वर ने सुना। उन्होंने कहा, मैं क्षमा करता हूँ। पर एक बात भी हुई। जिन लोगों ने विश्वास नहीं किया, वे उस अच्छे देश को नहीं देख पाएँगे। केवल यहोशू और कालेब देखेंगे, क्योंकि वे विश्वास करते थे। बाकी लोग रेगिस्तान में ही चलते रहेंगे। चालीस साल तक।

यह सुनकर लोग फिर रोए। बहुत रोए।

सिलसिला

परमेश्वर ने कहा था, मैं कोप करने में धीरजवन्त हूँ, और बहुत करुणामय हूँ, और क्षमा करनेवाला हूँ। यह बात हर जगह सच है। यीशु भी ऐसे ही हैं। जब हम डर जाते हैं, जब हम भरोसा नहीं करते, तब भी यीशु हमें प्यार करते हैं। वे हमें क्षमा करना चाहते हैं। जैसे परमेश्वर ने मूसा की बात सुनी, वैसे ही यीशु हमारी भी सुनते हैं।

तुम्हारे लिए

कभी-कभी तुम भी डर जाते हो। अंधेरे कमरे से, या किसी नई जगह से। इस्राएल के लोग भी डर गए थे। पर यहोशू और कालेब नहीं डरे, क्योंकि उन्हें पता था, परमेश्वर उनके साथ हैं।

जब तुम डरो, तो याद करना। परमेश्वर तुम्हारे साथ हैं। तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है।

बात करें

जब इस्राएल के लोग डर गए, तब यहोशू और कालेब को डर क्यों नहीं लगा?

जब तुम डरते हो, तो तुम किससे मदद माँग सकते हो?

आराधना साथ में

प्रभु, कभी-कभी मैं भी डर जाता हूँ। कृपया मेरे साथ रहिए। जैसे आप इस्राएल के साथ थे। मुझे भी याद रखने में मदद करें, कि आप पास हैं। आमीन।

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गिनती 14 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

गिनती 14 किस विषय में है?
रात का समय था। चारों ओर अंधेरा था। इस्राएल के सारे लोग तंबुओं में बैठे थे। और वे रो रहे थे। बहुत रो रहे थे। क्यों?
गिनती 14 क्या कहता है?
पर दो लोग अलग खड़े थे। उनका नाम यहोशू और कालेब था। उन्होंने अपने कपड़े फाड़े। वे चिल्लाकर बोले, वह देश बहुत अच्छा है। परमेश्वर हमारे साथ हैं। मत डरो।
गिनती 14 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
मूसा परमेश्वर से बात करने लगे। उन्होंने कहा, हे परमेश्वर, कृपया इन लोगों को क्षमा कर दीजिए।
नन्हे बच्चे गिनती 14 से क्या सीख सकते हैं?
परमेश्वर ने कहा था, मैं कोप करने में धीरजवन्त हूँ, और बहुत करुणामय हूँ, और क्षमा करनेवाला हूँ। यह बात हर जगह सच है। यीशु भी ऐसे ही हैं। जब हम डर जाते हैं, जब हम भरोसा नहीं करते, तब भी यीशु हमें प्यार करते हैं। वे हमें क्षमा करना चाहते हैं। जैसे परमेश्वर ने मूसा की बात सुनी, वैसे ही यीशु हमारी भी सुनते हैं।
गिनती 14 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
जब तुम डरो, तो याद करना। परमेश्वर तुम्हारे साथ हैं। तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 41

कल जब परमेश्वर ने कहा "जाओ", तब वे डर गए। आज जब उसने कहा "मत जाओ", तब वे चढ़ गए। मूसा की चेतावनी सीधी है, "तुम यहोवा की आज्ञा का उल्लंघन क्यों करते हो? यह सफल न होगा।" देर से किया गया आज्ञापालन भी आज्ञापालन नहीं रहता, अगर वह हमारी शर्तों पर हो। पश्चाताप का मतलब है उसकी आवाज़ पर लौटना, न कि अपनी गलती अपने बल से सुधारना। आज वह तुझसे क्या कह रहा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 39

जब मूसा ने ये बातें सब इस्राएलियों को कह सुनाईं, तब वे लोग बहुत विलाप करने लगे।" ध्यान दे, ये वही लोग हैं जो एक रात पहले भी रोए थे, पर तब अविश्वास में। अब आँसू तो हैं, मगर समय बीत चुका। दुख होना और मन फिराना दो अलग बातें हैं। परिणाम पर रोना आसान है, आज्ञा मानना कठिन। तू किस बात पर रो रहा है, अपने पाप पर या उसकी कीमत पर?

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For parents and teachers: विशेष रूप से 3 से 6 वर्ष के बच्चों को ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए लिखा गया। इसे अपने बच्चे के साथ बातचीत की शुरुआत के रूप में उपयोग करें, एकमात्र स्रोत के रूप में नहीं। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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