कुलुस्सियों 1
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
कुलुस्से की कलीसिया को पौलुस एक पत्र लिखता है, जिसे उसने कभी आँखों से नहीं देखा। यह कलीसिया इपफ्रास के द्वारा शुरू हुई थी, और पौलुस को उसके बारे में सुनकर इतनी खुशी होती है कि वह लगातार उनके लिए धन्यवाद करता है। वह लिखता है कि उनका विश्वास मसीह यीशु पर है, उनका प्रेम सब पवित्र लोगों तक फैला हुआ है, और उनकी आशा स्वर्ग में रखी हुई है। यह तीन शब्द, विश्वास, प्रेम और आशा, पूरे अध्याय की धुरी बन जाते हैं।
फिर पौलुस उनके लिए प्रार्थना करता है, न कि किसी सतही आशीष के लिए, बल्कि इसके लिए कि वे परमेश्वर की इच्छा को गहराई से पहचानें, समझदारी से जीवन बिताएँ, और धीरज के साथ चलें। इसके बाद वह अचानक धर्मशास्त्र की सबसे गहरी परतों में उतरता है। वह लिखता है कि परमेश्वर ने हमें अंधकार से छुड़ाकर अपने पुत्र के राज्य में ला दिया है। और फिर वह मसीह के बारे में कुछ ऐसा कहता है जो पूरी बाइबल में सबसे ऊँचे कथनों में से एक है, यीशु "अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप" हैं, सारी सृष्टि उनके द्वारा और उनके लिए बनी है, और वे स्वयं ही हैं जिनमें सब कुछ स्थिर रहता है।
यह केवल काव्यात्मक भाषा नहीं है। पौलुस यह कह रहा है कि यीशु कोई साधारण गुरु या नबी नहीं थे, वे स्वयं परमेश्वर हैं जो देह में आए, और उन्होंने ही सारी सृष्टि को रचा और थामा हुआ है। यह भी लिखा है कि वे कलीसिया के सिर हैं, मरे हुओं में से पहले जी उठे, और उनके क्रूस पर बहे लहू से ही परमेश्वर ने सब कुछ, स्वर्ग और पृथ्वी की हर वस्तु को अपने साथ मेल कराया है। कुलुस्से के लोग, जो पहले परमेश्वर से दूर और मन से बैरी थे, अब मसीह की मृत्यु के द्वारा पवित्र, निष्कलंक और निर्दोष ठहराए गए हैं, बशर्ते वे विश्वास में दृढ़ बने रहें।
अंत में पौलुस अपनी सेवा के बारे में बताता है। वह उन दुखों में भी आनन्दित होता है जो उसे मसीह के लिए उठाने पड़ते हैं, क्योंकि उसे एक भेद, एक रहस्य सौंपा गया है जो सदियों तक छिपा रहा, अब प्रगट हुआ है, कि मसीह गैरयहूदियों में भी रहते हैं। पौलुस का लक्ष्य साफ है, हर व्यक्ति को मसीह में सिद्ध करके परमेश्वर के सामने खड़ा करना, और इसके लिए वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर परिश्रम करता है।
इसका क्या अर्थ है?
यह अध्याय एक सवाल उठाता है जिससे हर सोचने वाला इंसान गुज़रता है, यीशु कौन हैं वास्तव में? पौलुस का जवाब बेहद साफ है, यीशु कोई इतिहास का पात्र भर नहीं, कोई नैतिक शिक्षक भर नहीं। वे वह हैं जिनके द्वारा सृष्टि की हर चीज़ अस्तित्व में आई और अब भी टिकी हुई है। अगर यह सच है, तो इसका मतलब यह भी है कि तुम्हारा अस्तित्व, तुम्हारी हर सुबह की सांस, तुम्हारे रिश्ते, तुम्हारा भविष्य, सब कुछ किसी न किसी तरह उनसे जुड़ा हुआ है, चाहे तुम इसे मानो या न मानो।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि पौलुस पीड़ा से नहीं भागता। वह अपने दुखों में आनन्दित होता है, न इसलिए कि दर्द अच्छा है, बल्कि इसलिए कि वह जानता है यह किसी बड़े उद्देश्य का हिस्सा है। यह उस झूठी धारणा को तोड़ता है कि विश्वास का मतलब है सब कुछ आसान हो जाना।
समान सूत्र
पूरी बाइबल की कहानी एक ही दिशा में बढ़ती है, परमेश्वर मनुष्य को अपने पास लाना चाहते हैं, जो पाप के कारण दूर हो गया था। कुलुस्सियों 1 इस पूरी कहानी को एक ही अध्याय में समेट देता है। सृष्टि की शुरुआत में मसीह हैं, नई सृष्टि की शुरुआत में भी वे ही हैं, मरे हुओं में से पहले जी उठनेवाले। क्रूस पर उनका लहू वही कीमत है जिससे दूरी मिटी और मेल हुआ। यह कोई नया विचार नहीं है, यह वही वादा है जो पूरे पुराने नियम में गूंजता रहा, कि परमेश्वर अपनी प्रजा को छुड़ाएँगे, और अब वह वादा एक व्यक्ति में, यीशु मसीह में, पूरा हुआ है।
तुम्हारे लिए
तुम शायद हर दिन यह सवाल किसी न किसी रूप में सुनते हो, तुम्हारी पहचान क्या है, तुम्हारी कीमत किस पर टिकी है। यह अध्याय जवाब देता है कि तुम्हारी पहचान किसी परफॉर्मेंस, किसी लाइक, किसी नंबर पर नहीं टिकी, बल्कि उस पर टिकी है जिसने तुम्हें अंधकार से निकाला और अपने साथ मेल किया, बिना किसी शर्त के, सिर्फ उसकी कृपा से। यह सच पचाना आसान नहीं है, खासकर जब तुम्हारे भीतर शक भी हो और असफलता का बोझ भी। लेकिन पौलुस यही कहता है, विश्वास की नींव पर दृढ़ बने रहो। इसका मतलब यह नहीं कि शक मत करो, इसका मतलब है कि शक के बीच भी उस सत्य को थामे रहो जिसे तुमने सुना है। यह अध्याय तुम्हें आमंत्रित करता है कि तुम अपनी नज़र सिर्फ अपने हालात पर नहीं, बल्कि उस मसीह पर टिकाओ जो सब वस्तुओं से पहले है और जिनमें सब कुछ स्थिर रहता है।
चर्चा करें
अगर मसीह सचमुच वैसे ही हैं जैसा पौलुस उन्हें बताता है, सारी सृष्टि के रचनहार और थामने वाले, तो यह तुम्हारे रोज़मर्रा के फैसलों, रिश्तों और प्राथमिकताओं को कैसे बदल सकता है?
पौलुस अपने दुखों में आनन्दित होता है क्योंकि वह उनका अर्थ जानता है। तुम्हारे जीवन में कौन सा दर्द या संघर्ष है जिसका अर्थ तुम्हें अभी समझ नहीं आता, और क्या तुम उस पर परमेश्वर से खुलकर बात कर सकते हो?
साथ में प्रार्थना
प्रभु, हम अक्सर आपको छोटा कर देते हैं, अपनी समझ के दायरे में बाँध देते हैं। हमें फिर से दिखाइए कि आप कौन हैं, वह जिनमें और जिनके द्वारा सब कुछ बना और टिका हुआ है। हमारे शक के बीच भी हमें विश्वास की नींव पर दृढ़ रहने की शक्ति दीजिए, और हमारे दर्द में भी वह आशा दिखाइए जो आपने क्रूस से हमें दी है। आमीन।
कुलुस्सियों 1 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
कुलुस्सियों 1 किस विषय में है?
कुलुस्सियों 1 क्या कहता है?
कुलुस्सियों 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर कुलुस्सियों 1 से क्या सीख सकते हैं?
कुलुस्सियों 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
पौलुस की ओर से, जो परमेश्वर की इच्छा से मसीह यीशु का प्रेरित है, और भाई तीमुथियुस की ओर से।"
पौलुस अपने नाम के आगे अपनी मेहनत नहीं, परमेश्वर की इच्छा रखता है। उसकी पहचान उसकी कमाई हुई नहीं, दी हुई है। और साथ में एक नाम और है, तीमुथियुस, बिना किसी बड़ी उपाधि के, बस "भाई"।
तू अपने नाम के आगे क्या लिखता है? और तेरे साथ खड़ा भाई कौन है?
तुम जो पहले दूर थे, और बुरे कामों के कारण मन से बैरी थे।" ध्यान दे, दूरी सिर्फ हालात की नहीं थी। बैर मन में था, सोच में था। परमेश्वर हमें उस समय भी जानता था जब हम उसके बारे में गलत सोचते थे। और उसी हाल में उसने पहल की। तेरे मन के जिस कोने को तू छिपाता है, वहीं से मेल शुरू होता है।
सुसमाचार के बारे में पौलुस कहता है, "जो तुम्हारे पास पहुँचा है और जैसा जगत में फल लाता और बढ़ता जाता है, वैसा ही तुम में भी।" ध्यान दे, यह बढ़ता है, चुपचाप, बीज की तरह। जिस दिन तूने परमेश्वर का अनुग्रह सुना और सच में पहचाना, उसी दिन से यह काम तुझमें शुरू हुआ। शायद तुझे फल दिखाई न दे, पर वचन बाँझ नहीं होता। धीरज रख।
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