यशायाह 9
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
यशायाह 9 एक ऐसे समय में लिखा गया जब इस्राएल का उत्तरी हिस्सा, जिसमें जबूलून और नप्ताली के क्षेत्र थे, अंधकार और अपमान का अनुभव कर रहा था। अश्शूर की सेनाएँ इन इलाकों को रौंद चुकी थीं। लोग डर में जी रहे थे, कुछ मारे गए, कुछ बंदी बनाए गए। यह वह पृष्ठभूमि है जिस पर यशायाह अपनी भविष्यवाणी लिखते हैं। पर वे कहते हैं कि यह अंधकार अंतिम शब्द नहीं है। "जो लोग अंधियारे में चल रहे थे उन्होंने बड़ा उजियाला देखा" (पद 2)। यह भविष्य की एक झलक है, एक ऐसा दिन जब भारी जूआ टूटेगा, जब युद्ध के औज़ार आग में जलाए जाएँगे, क्योंकि अब उनकी ज़रूरत नहीं रहेगी।
इसी उम्मीद के केंद्र में एक बालक का जन्म है। पद 6 और 7 इस पूरे अध्याय का हृदय हैं, "हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है।" उसे चार नाम दिए गए हैं, अद्भुत युक्ति करनेवाला पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार। यह कोई सामान्य राजकुमार नहीं होगा। उसका राज्य न्याय और धर्म पर टिका होगा, और उसका अंत नहीं होगा।
पर अध्याय यहीं नहीं रुकता। पद 8 से आगे यशायाह वापस कठोर सच्चाई की ओर मुड़ते हैं। इस्राएल के लोग, विशेष रूप से एप्रैम और सामरिया के निवासी, घमंड में जी रहे थे। उनके शहर गिर गए, पर उन्होंने कहा, "हम इससे भी बेहतर बना लेंगे" (पद 10)। यह पश्चाताप नहीं था, यह अहंकार था। इसलिए परमेश्वर का न्याय जारी रहा, शत्रु उभरते रहे, और लोग एक-दूसरे के विरुद्ध हो गए, मनश्शे एप्रैम के विरुद्ध, दोनों यहूदा के विरुद्ध। अध्याय एक भयानक पंक्ति से चार बार दोहराई जाती है, "इतने पर भी उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ, और उसका हाथ अब तक बढ़ा हुआ है।"
इसका क्या अर्थ है?
यह अध्याय दो सच्चाइयों को एक साथ पकड़े रहता है, जो पहली नज़र में विरोधाभासी लगती हैं। एक तरफ अद्भुत आशा, एक बालक जो राजा होगा, जिसका राज्य कभी खत्म नहीं होगा। दूसरी तरफ लोगों का हठ, उनका घमंड, उनका एक-दूसरे को खा जाने वाला विनाश। यह विरोधाभास असली है। परमेश्वर का वरदान और मनुष्य का इनकार, दोनों एक साथ खड़े हैं।
यह हमें कुछ ज़रूरी बताता है, आशा सस्ती नहीं है। यशायाह यह नहीं कहते कि सब कुछ अचानक ठीक हो जाएगा और सब खुश रहेंगे। वे साफ़ देखते हैं कि लोग अपने विनाश की ओर बढ़ रहे हैं, और फिर भी परमेश्वर एक वादा बोलते हैं जो उस अंधकार से भी बड़ा है। यह ईमानदार आशा है, वह आशा जो दुख को नकारती नहीं, बल्कि उसके भीतर से बोलती है।
समान सूत्र
मत्ती 4:15,16 सीधे इस भविष्यवाणी को यीशु मसीह से जोड़ते हैं। जब यीशु ने गलील में अपनी सेवा शुरू की, वही क्षेत्र जो अध्याय के पहले पद में नाम लिया गया है, मत्ती कहते हैं कि यहाँ वह ज्योति चमकी जिसकी यशायाह ने बात की थी। यीशु ही वह बालक हैं, वह पुत्र, जिसका नाम अद्भुत युक्ति करनेवाला पराक्रमी परमेश्वर और शान्ति का राजकुमार है। लूका 1:32,33 में यही बात दोहराई जाती है, जब स्वर्गदूत मरियम से कहता है कि उसका पुत्र दाऊद की गद्दी पर बैठेगा और उसका राज्य कभी खत्म नहीं होगा।
पर ध्यान दें, यीशु का आना अध्याय के दूसरे भाग की समस्या को हल नहीं करता, कम से कम तुरंत नहीं। लोगों का घमंड, उनका इनकार, उनका एक-दूसरे को नष्ट करना, यह सब आज भी चलता है। मसीह का राज्य आया, पर वह अभी पूरी तरह प्रगट नहीं हुआ। यही बाइबल की पूरी कहानी का ढाँचा है, वादा और प्रतीक्षा, रोशनी और अंधकार, जो अभी साथ-साथ चलते हैं। यशायाह 9 हमें यह याद दिलाता है कि जिस दुनिया में हम रहते हैं, वह वादे और उसकी पूर्ति के बीच की दुनिया है।
आपके लिए
यह अध्याय आपसे एक सच्चा सवाल पूछता है, आप किस पर भरोसा करते हैं जब चीज़ें टूट जाती हैं? सामरिया के लोगों का जवाब था, अपने बल पर, अपनी योजना पर, "हम बेहतर बना लेंगे।" यह आज भी हमारा पहला उत्तर होता है, चाहे बात परीक्षा की हो, रिश्तों की हो, या भविष्य की चिंता की। हम सोचते हैं कि अगर हम कड़ी मेहनत करें, थोड़ा और नियंत्रण रखें, तो अंधकार दूर हो जाएगा।
पर यशायाह कहते हैं कि सच्चा उजियाला बाहर से आता है, एक बालक के रूप में, एक वादे के रूप में जो हमारी बनाई योजनाओं से बड़ा है। यह विश्वास कमज़ोरी नहीं है, बल्कि यह मान लेना है कि हम अपने भीतर के अंधकार को खुद दूर नहीं कर सकते। जब आप अपनी ज़िंदगी में देखते हैं कि कहाँ घमंड ने आपको यह सोचने पर मजबूर किया कि आप खुद संभाल लेंगे, वहीं रुककर पूछें कि क्या आप उस शांति के राजकुमार की ओर मुड़ने को तैयार हैं, जिसका राज्य आपकी मेहनत पर नहीं, उसकी वफ़ादारी पर टिका है।
बातचीत के लिए
यशायाह बार-बार कहते हैं, "उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ।" क्या आपको यह सोचकर असहज लगता है कि परमेश्वर क्रोधित हो सकते हैं? क्यों?
अध्याय में आशा और चेतावनी दोनों साथ-साथ हैं। आपकी अपनी ज़िंदगी में, क्या आप कभी ऐसी जगह पर हैं जहाँ आप घमंड में अपनी ताकत पर भरोसा कर रहे हैं, न कि परमेश्वर पर?
साथ में प्रार्थना
प्रभु, हमारे जीवन में अंधकार के कोने हैं, जहाँ हम खुद को संभालने की कोशिश करते रहते हैं। हमें याद दिलाइए कि आपने हमारे लिए एक पुत्र दिया है, जिसका नाम शान्ति का राजकुमार है। हमारे घमंड को तोड़िए, और हमें उस उजियाले की ओर मोड़िए जो आप ही देते हैं। आमीन।
यशायाह 9 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
यशायाह 9 किस विषय में है?
यशायाह 9 क्या कहता है?
यशायाह 9 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर यशायाह 9 से क्या सीख सकते हैं?
यशायाह 9 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
जबूलून और नप्ताली, यही वे इलाके थे जिन पर सबसे पहले अश्शूर की मार पड़ी। सबसे पहले उजड़े, सबसे पहले भुला दिए गए। और परमेश्वर कहता है, "अन्त में वह समुद्र के मार्ग को, यरदन के पार, अन्यजातियों के गलील को महिमा देगा।" वहीं से यीशु ने अपनी सेवा शुरू की।
तेरे जीवन का जो हिस्सा सबसे ज़्यादा टूटा है, हो सकता है वहीं से उसकी ज्योति उगे।
यशायाह अध्याय 9 में एक अंधकार भरी घड़ी है। इस्राएल शत्रुओं के भय में जी रहा है, युद्ध की गूँज हर घर तक पहुँच रही है। तभी परमेश्वर एक अजीब सी बात कहते हैं, "सिपाही के जूते जो लड़ाई में पहने जाते हैं, और लहू में लथपथ किए हुए कपड़े, आग की ईंधन होकर भस्म हो जाएंगे।"
सोचिए, सैनिकों के जूते अब जलाने की लकड़ी बनेंगे। जिन चीज़ों ने आपको इतने दिनों तक डराया, परमेश्वर उन्हें राख कर सकते हैं। आपके जीवन का कौन सा "युद्ध का जूता" आज उनके हाथ में सौंपने की ज़रूरत है?
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