1 कुरिन्थियों 7
पाठ
कुरिन्थुस की किसी बैठक में एक चिट्ठी पढ़ी जा रही है। कमरे में तेल के दीये की गंध है, और लोग दीवारों से टिककर बैठे हैं। पौलुस उनके ही लिखे प्रश्नों का उत्तर दे रहे हैं: क्या विश्वासी को विवाह से पूरी तरह दूर रहना चाहिए? जो पहले से ब्याहे हैं, वे क्या करें? और जिनका जीवनसाथी मसीह को नहीं मानता? पौलुस किसी को एक साँचे में नहीं ढालते। वे कहते हैं: जो विवाहित हैं, एक-दूसरे का हक़ पूरा करें; जो अकेले हैं, अकेले रह सकते हैं; दास हो या स्वतंत्र, खतना हो या न हो, "हर एक जन जिस दशा में बुलाया गया हो, उसी में रहे" और वहीं परमेश्वर के साथ जिए।
मर्म
सुनिए उस कमरे के दो लोगों को। एक युवती, जिसका पति मूर्तिपूजक है, काँपते हुए पूछती है: क्या मेरा घर अशुद्ध है? और एक दास, जिसकी पीठ पर कोड़ों के निशान हैं, सोचता है: क्या मसीह मुझे यहाँ से निकालेंगे? पौलुस का उत्तर दोनों को चौंका देता है। वे परिस्थिति नहीं बदलते; वे परिस्थिति का अर्थ बदल देते हैं। "जो दास की दशा में प्रभु में बुलाया गया है, वह प्रभु का स्वतंत्र किया हुआ है।" यही इस अध्याय का हृदय है: उद्धार हमें हमारी जगह से उठाकर कहीं और नहीं रखता, वह हमारी जगह पर परमेश्वर की उपस्थिति ले आता है। विवाह मोक्ष नहीं है, कुँवारापन पुण्य नहीं है। दोनों वरदान हैं, और दोनों में बुलाहट पूरी होती है।
सूत्र
यह अध्याय अकेला खड़ा दिखता है, पर इसकी जड़ क्रूस में है। पौलुस एक वाक्य में सब खोल देते हैं: "तुम दाम देकर मोल लिये गए हो, मनुष्यों के दास न बनो।" बाज़ार की भाषा। कुरिन्थुस में हर कोई जानता था कि दास कैसे खरीदा जाता है, चाँदी गिनी जाती है, नाम बदल दिया जाता है। मसीह ने वही किया, पर उल्टी दिशा में: उन्होंने अपना लहू देकर हमें खरीदा ताकि हम किसी और की सम्पत्ति न रहें। इसीलिए पति पत्नी पर, और पत्नी पति पर मालिकी नहीं जताती, बल्कि एक-दूसरे को देह सौंपती है, जैसे मसीह ने अपनी देह सौंपी। और इसीलिए समय की दौड़ थम जाती है: जिसे खरीद लिया गया है, उसे अब कुछ सिद्ध नहीं करना।
दर्पण
आप शायद उस स्त्री जैसे हैं जिसका साथी रविवार को घर रहता है और आप अकेले चर्च जाते हैं, वर्षों से। या उस व्यक्ति जैसे जो चालीस का हो चला और अब भी अकेला है, और हर शादी के निमंत्रण-पत्र के साथ भीतर कुछ सिकुड़ जाता है। या उस कर्मचारी जैसे जिसे नौकरी बाँधे रखती है और वह सोचता है, असली जीवन तब शुरू होगा जब यह बदलेगा। पौलुस आपसे कहते हैं: असली जीवन अभी है, यहीं, इसी हालत में, "परमेश्वर के साथ।" पद 30 चुभता है, "रोनेवाले ऐसे हों, मानो रोते नहीं।" यह भावना का इनकार नहीं, उसका आकार बदलना है। आज, दस मिनट में: अपनी उस परिस्थिति को एक वाक्य में कागज़ पर लिखिए जिसे आप बदलना चाहते हैं, और उसके नीचे लिखिए "यहीं परमेश्वर के साथ", फिर वह कागज़ अपनी जेब में रखिए।
अन्तर्पाठ
यीशु ने विवाह के बारे में जो कहा, पौलुस उसी पर खड़े हैं: पद 10 में वे साफ़ कहते हैं "मैं नहीं, वरन् प्रभु आज्ञा देता है।" पर पद 12 में वे उतनी ही ईमानदारी से कहते हैं, "दूसरों से प्रभु नहीं, परन्तु मैं ही कहता हूँ।" यह चालाकी नहीं, यह प्रेरित की विनम्रता है: वे जानते हैं कि प्रभु ने मिश्रित विवाह के बारे में कुछ नहीं कहा था, इसलिए वे परम्परा गढ़ने के बजाय आत्मा की अगुवाई में सम्मति देते हैं। दूसरी गूँज उत्पत्ति से आती है, जहाँ दो एक तन होते हैं; पौलुस उसी एकता को इतनी गम्भीरता से लेते हैं कि अविश्वासी साथी तक "पवित्र ठहरता है", यानी परमेश्वर के काम के दायरे में खींच लिया जाता है।
प्रश्न
पद 14 आसानी से नहीं पचता। अविश्वासी पति "पत्नी के कारण पवित्र ठहरता है" का क्या अर्थ है? क्या वह बच गया? नहीं, क्योंकि दो पद बाद पौलुस स्वयं पूछते हैं, "हे स्त्री, तू क्या जानती है, कि तू अपने पति का उद्धार करा लेगी?" तो उद्धार निश्चित नहीं है। फिर भी कुछ तो हुआ है। उस घर पर अब अंधकार का एकछत्र राज नहीं; वहाँ प्रार्थना होती है, वहाँ मसीह का नाम लिया जाता है, और बच्चे उस छाया में बड़े होते हैं। यह गारंटी नहीं, यह क्षेत्र है। और यह बेचैन करने वाला सच छोड़ जाता है: आप किसी को बचा नहीं सकते, पर आप उसे वहाँ रख सकते हैं जहाँ परमेश्वर काम करते हैं।
बारीकी
पद 29 के "समय कम किया गया है" में जो क्रिया है, वह नाविकों की भाषा से आती है: सुनेस्तालमेनोस, यानी पाल को समेट लेना, कपड़े को तह कर देना। समय छोटा नहीं हुआ जैसे घड़ी तेज़ चल रही हो; समय समेट लिया गया है, जैसे जहाज़ बंदरगाह के पास पहुँचकर पाल उतार देता है। कुरिन्थुस के लोग बंदरगाह के लोग थे, उन्होंने यह दृश्य रोज़ देखा था। इसका अर्थ यह नहीं कि विवाह, रोना, हँसना, खरीदना छोड़ दो। अर्थ यह है कि अब खुली हवा में दौड़ने का समय बीत चुका, किनारा दिख रहा है, और जो किनारा देख लेता है वह सामान को अलग नज़र से बाँधता है।
चिन्तन
आपकी वर्तमान "दशा" में ऐसा क्या है जिसे आप अभिशाप मानते हैं, और यदि आप उसमें "परमेश्वर के साथ" रहना चुनें तो कल सुबह क्या बदलेगा?
आपके जीवन में कौन-सा सम्बन्ध ऐसा है जहाँ आप परिणाम नहीं बदल सकते, पर अपनी उपस्थिति से उसे परमेश्वर के काम के दायरे में रख सकते हैं?
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1 Corinthians 7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 7 का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 7 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 कुरिन्थियों 7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरा मन कई दिशाओं में बँटा रहता है, रोज़ के काम और चिंताएँ मुझे खींचती हैं। मुझे सिखा कि इन सबके बीच भी मेरा दिल तेरी ओर टिका रहे। मेरी देह और आत्मा तेरी हों, और जो कुछ मैं करूँ, उसमें तुझे खुश करने की चाह बनी रहे।
पिता, धन्यवाद कि मेरे आँसू मुझ पर राज नहीं करते और मेरी खुशी हालातों के भरोसे नहीं टिकी। धन्यवाद कि जो कुछ मैंने मोल लिया है, वह मुझे बाँध नहीं सकता, क्योंकि मेरा असली धन और असली सहारा तू ही है।
पिता, धन्यवाद कि जहाँ कोई स्पष्ट आज्ञा नहीं, वहाँ भी आप हमें अकेला नहीं छोड़ते, बल्कि अपनी दया से सम्मति देते हैं। धन्यवाद कि पौलुस की तरह आपकी दया ही हमें विश्वासयोग्य बनाती है, हमारी योग्यता नहीं। हर उलझन में आपकी बुद्धि के लिए हम आभारी हैं।
पिता, मेरा मन कितनी दिशाओं में बँटा रहता है। तू मुझे बाँधना नहीं चाहता, बल्कि आज़ाद करना चाहता है, यह जानकर चैन मिलता है। मुझे सिखा कि मैं बिना बँटे मन से तेरे साथ चलूँ और जो सही है वही चुनूँ।
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