बाइबल व्याख्या

इफिसियों 4:29

बाइबल
यह वचन Horeb Maranatha Prayer House द्वारा समर्पित है

पाठ

"कोई गंदी बात तुम्हारे मुँह से न निकले" — पौलुस यहाँ किसी अशिष्ट शब्दावली की सूची नहीं गिना रहा। मूल शब्द का अर्थ है सड़ा हुआ, गला हुआ, वह फल जो टोकरी में रखा-रखा बदबू देने लगे। पौलुस कहता है: जो बात दूसरे के भीतर सड़ान फैलाए, वह तुम्हारे मुँह से बाहर न आए। इसके बदले वह एक कसौटी देता है जो हैरान करने वाली है: बोलो वही "जो उन्नति के लिये उत्तम हो", और वह भी "आवश्यकता के अनुसार", यानी उस पल में सुननेवाले को जिसकी ज़रूरत है। और नतीजा? "ताकि उससे सुननेवालों पर अनुग्रह हो।" शब्द कान तक पहुँचें और वहाँ अनुग्रह छोड़ जाएँ। यही पूरा वाक्य है, और यही पूरी चुनौती।

मर्म

ध्यान दीजिए कि पौलुस नियम नहीं, दिशा बदल रहा है। "गंदी बात" रोकना आधी बात है; असली माँग यह है कि बोलने का उद्देश्य ही बदल जाए। स्वाभाविक रूप से हम अपने बचाव के लिए, अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए, या बस भीतर का दबाव निकालने के लिए बोलते हैं। पौलुस कहता है: तुम्हारी ज़बान अब तुम्हारी नहीं, सुननेवाले की सेवा में है। और जो शब्द वह माँगता है वह "अनुग्रह" देते हैं, वही शब्द जिससे पूरा पत्र शुरू होता है, परमेश्वर की अपात्र कृपा। यानी मसीही बोली परमेश्वर के व्यवहार की नकल है: वे हमें वह देते हैं जिसके हम हक़दार नहीं थे, और हमारा मुँह दूसरों के साथ वही करता है। भाषा यहाँ नैतिकता का मामला नहीं, नए मनुष्यत्व का पहला दिखाई देने वाला लक्षण है।

सूत्र

परमेश्वर ने बोलकर सृष्टि रची। शब्द उनके हाथ में औज़ार है, विनाश का नहीं, अस्तित्व का। जब पौलुस कहता है कि हमारी बात "उन्नति के लिये उत्तम" हो, तो वह हमें उसी रचनात्मक धारा में खड़ा कर रहा है: बोलना बनाना है। और यह सिलसिला मसीह पर आकर सघन हो जाता है, जिनके बारे में यही पत्र कहता है कि उन्होंने "मनुष्यों को दान दिए" और उनमें से कई दान बोलनेवाले लोग हैं, प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, उपदेशक। परमेश्वर अपनी देह को शब्दों से गढ़ते हैं। इसलिए आयत 32 अचानक नहीं आती: "जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी।" क्षमा भी अंततः एक वाक्य है जो किसी के मुँह से निकलना पड़ता है। उद्धार का इतिहास बोले गए शब्दों का इतिहास है।

दर्पण

सोचिए उस दफ़्तर के बारे में जहाँ किसी सहकर्मी की ग़लती की कहानी आपने तीसरी बार सुनाई, हर बार थोड़ा और मज़ेदार बनाकर। उस व्हाट्सएप ग्रुप के बारे में जहाँ "प्रार्थना की ज़रूरत है" कहकर किसी की शर्म सार्वजनिक कर दी गई। अपने घर के बारे में, जहाँ आपका व्यंग्य इतना तेज़ है कि बच्चा जवाब नहीं दे पाता, और आप इसे हास्य कहते हैं। पौलुस की कसौटी बेरहम है: बात सच थी या नहीं, यह अकेला सवाल नहीं है। सवाल यह है कि सुननेवाले पर उसका क्या असर छूटा, सड़ान या अनुग्रह। और "आवश्यकता के अनुसार" का मतलब है कि मुझे पहले जानना होगा कि इस व्यक्ति को इस वक़्त किस चीज़ की ज़रूरत है, जो बिना सुने संभव नहीं।

आज एक व्यक्ति चुनिए जिसके बारे में आपने पिछले हफ़्ते किसी तीसरे से नकारात्मक बात कही थी। उसे अभी एक संदेश भेजिए जिसमें आप ठोस रूप से, बिना अतिशयोक्ति के, एक बात नाम लेकर लिखें जो उसमें आपको सचमुच अच्छी लगती है।

मुख्य पात्र

यह उपदेश किसी आरामकुर्सी से नहीं आ रहा। पत्र का पहला वाक्य ही है: "मैं जो प्रभु में बन्दी हूँ।" जो आदमी ज़ंजीरों में है, जिसके पास शिकायत करने, अपने विरोधियों का नाम लेकर कोसने, और अपनी बेगुनाही चिल्लाने के पूरे कारण हैं, वह कलम उठाकर दूर बैठी कलीसिया को बनाने वाली बातें लिखता है। कैदखाना आदमी की ज़बान का सबसे ईमानदार परीक्षण होता है; वहाँ कड़वाहट को कोई सामाजिक शिष्टाचार नहीं रोकता। पौलुस के भीतर का यह संयम अनुशासन से ज़्यादा दृष्टि से आता है: वह अपने हालात को अपना विषय बनाने से इनकार करता है। उसका आत्मिक परिदृश्य यही है, एक आदमी जो अपनी परिस्थिति से नहीं, अपने बुलावे से परिभाषित होता है, और इसीलिए उसके शब्द दूसरों के लिए बचे रहते हैं।

बारीकी

"उन्नति" के लिए पौलुस जो यूनानी शब्द चुनता है वह है ओइकोदोमे, यानी इमारत खड़ी करना, चिनाई। शब्द ईंट हैं, और वाक्य दीवार। पर असली धार अगले टुकड़े में है: "आवश्यकता के अनुसार।" राजमिस्त्री हर जगह एक जैसी ईंट नहीं लगाता; जो चीज़ छत के लिए सही है वह नींव में बेकार है। इसका मतलब है कि सही बात ग़लत वक़्त पर कही जाए तो वह भी निर्माण नहीं, ढहाव है। शोक में डूबे आदमी को धर्मशास्त्र समझाना, या पाप में फँसे आदमी को सिर्फ़ सांत्वना देना, दोनों उसी सड़े फल की श्रेणी में आ सकते हैं। यह कसौटी हमें बोलने से पहले देखने पर मजबूर करती है: इस व्यक्ति की इमारत में इस वक़्त कौन-सी ईंट कम है।

प्रसंग

इफिसुस रोमी एशिया का सबसे बड़ा शहर था, बंदरगाह, मंदिर, जादू-टोने और भाषण-कला का केंद्र। वहाँ की कलीसिया घरों में जमा होती थी, बीस-तीस लोग, जिनमें दास और मालिक, यहूदी और अन्यजाति, एक ही कमरे में एक ही मेज़ पर। उस समाज में शब्द हथियार था: इज़्ज़त और बेइज़्ज़ती सार्वजनिक बोली से तय होती थी, और नीचा दिखाने की कला सम्मान की बात मानी जाती थी। ऐसे माहौल में यह चिट्ठी ऊँची आवाज़ में पढ़ी जाती थी, और आयत 29 सुनते ही हर कोई जानता था कि किसकी बात हो रही है। उनके पास न इमारत थी, न पद, न सुरक्षा। उन्हें एक-दूसरे को थामे रखने के लिए जो मिला था, वह मुख्यतः यही था: आपस में बोले गए शब्द, "क्योंकि हम आपस में एक दूसरे के अंग हैं।"

चिंतन

पिछले चौबीस घंटों में आपने जो कुछ कहा, उसमें से कौन-सा वाक्य सुननेवाले के भीतर अनुग्रह छोड़ गया, और कौन-सा सड़ान?

जिन लोगों से आप रोज़ बोलते हैं, क्या आप सचमुच जानते हैं कि इस समय उनकी "आवश्यकता" क्या है, या आप सिर्फ़ अनुमान लगाकर बोलते रहे हैं?

Ephesians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Ephesians

John Stott

God's new society: Stott at his very best on church and calling.

Paul For Everyone: The Prison Letters

N.T. Wright

Ephesians, Philippians, Colossians and Philemon in short daily readings.

Ephesians For You

Richard Coekin

Grace, church and spiritual battle made wonderfully practical.

Ephesians: An Introduction and Commentary

Francis Foulkes

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Ephesians

Klyne Snodgrass

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.

यह व्याख्या साझा करें

सुसमाचार फैलाने में मदद करें। यह व्याख्या किसी ऐसे व्यक्ति को भेजें जिसे इससे प्रोत्साहन मिल सके।

WhatsApp Email Facebook X / Twitter

Ephesians 4:29 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

इफिसियों 4:29 का क्या अर्थ है?
"कोई गंदी बात तुम्हारे मुँह से न निकले" — पौलुस यहाँ किसी अशिष्ट शब्दावली की सूची नहीं गिना रहा। मूल शब्द का अर्थ है सड़ा हुआ, गला हुआ, वह फल जो टोकरी में रखा-रखा बदबू देने लगे। पौलुस कहता है: जो बात दूसरे के भीतर सड़ान फैलाए, वह तुम्हारे मुँह से बाहर न आए। इसके बदले वह एक कसौटी देता है जो हैरान करने वाली है: बोलो वही "जो उन्नति के लिये उत्तम हो", और वह भी "आवश्यकता के अनुसार", यानी उस प
इफिसियों 4:29 किस विषय में है?
परमेश्वर ने बोलकर सृष्टि रची। शब्द उनके हाथ में औज़ार है, विनाश का नहीं, अस्तित्व का। जब पौलुस कहता है कि हमारी बात "उन्नति के लिये उत्तम" हो, तो वह हमें उसी रचनात्मक धारा में खड़ा कर रहा है: बोलना बनाना है। और यह सिलसिला मसीह पर आकर सघन हो जाता है, जिनके बारे में यही पत्र कहता है कि उन्होंने "मनुष्यों को दान दिए" और उनमें से कई दान बोलनेवाले लोग हैं, प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, उपदेशक। परमेश्वर अपनी देह को शब्दों से गढ़ते हैं। इसलिए आयत 32 अचानक नहीं आती: "जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी।" क्षमा भी अंततः एक वाक्य है जो किसी के मुँह से निकलना पड़ता है। उद्धार का इतिहास बोले गए शब्दों का इतिहास है।
इफिसियों 4:29 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज एक व्यक्ति चुनिए जिसके बारे में आपने पिछले हफ़्ते किसी तीसरे से नकारात्मक बात कही थी। उसे अभी एक संदेश भेजिए जिसमें आप ठोस रूप से, बिना अतिशयोक्ति के, एक बात नाम लेकर लिखें जो उसमें आपको सचमुच अच्छी लगती है।
इफिसियों 4:29 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"उन्नति" के लिए पौलुस जो यूनानी शब्द चुनता है वह है ओइकोदोमे, यानी इमारत खड़ी करना, चिनाई। शब्द ईंट हैं, और वाक्य दीवार। पर असली धार अगले टुकड़े में है: "आवश्यकता के अनुसार।" राजमिस्त्री हर जगह एक जैसी ईंट नहीं लगाता; जो चीज़ छत के लिए सही है वह नींव में बेकार है। इसका मतलब है कि सही बात ग़लत वक़्त पर कही जाए तो वह भी निर्माण नहीं, ढहाव है। शोक में डूबे आदमी को धर्मशास्त्र समझाना, या पाप में फँसे आदमी को सिर्फ़ सांत्वना देना, दोनों उसी सड़े फल की श्रेणी में आ सकते हैं। यह कसौटी हमें बोलने से पहले देखने पर मजबूर करती है: इस व्यक्ति की इमारत में इस वक़्त कौन-सी ईंट कम है।
इफिसियों 4:29 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछले चौबीस घंटों में आपने जो कुछ कहा, उसमें से कौन-सा वाक्य सुननेवाले के भीतर अनुग्रह छोड़ गया, और कौन-सा सड़ान?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Ephesians 4 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 9

पिता, आपका पुत्र ऊपर जाने से पहले सबसे नीचे उतरा, वहाँ तक जहाँ मेरी टूटन और अंधेरा है। जब मैं गहराई में डूबता हूँ, मुझे याद दिला कि वहाँ भी आप पहले से मौजूद हैं। आपका प्रेम किसी भी गड्ढे से नीचे पहुँच सकता है, यही मेरा भरोसा है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 31

pita, mere bhitar jo kadwahat chhupi hai, use tu jaanta hai. gussa, chubhte shabd aur purani shikayatein mujhe andar se thaka rahi hain. mujhe himmat de ki main inhein pakde rehne ke bajay tere haathon mein chhod doon, aur mera dil halka ho jaaye.

*(Hindi script version below)*

पिता, मेरे भीतर जो कड़वाहट छिपी है, उसे तू जानता है। गुस्सा, चुभते शब्द और पुरानी शिकायतें मुझे अंदर से थका रही हैं। मुझे हिम्मत दे कि मैं इन्हें पकड़े रहने के बजाय तेरे हाथों में छोड़ दूँ, और मेरा दिल हल्का हो जाए।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 22

पिता, मेरे भीतर अब भी वह पुराना स्वभाव अटका है, जो धोखा देने वाली इच्छाओं से मुझे खींचता है। मुझे ताकत दे कि मैं उसे उतारकर रख दूँ, जैसे मैला कपड़ा। मुझे नया कर, ताकि मेरा जीना तेरे प्यार जैसा दिखे।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 2

पिता, धन्यवाद कि आपने मुझे ऐसे लोग दिए जो "प्रेम में एक दूसरे को सह" लेते हैं, जिन्होंने मेरी चिड़चिड़ाहट और कमियों को धीरज से सहा है। धन्यवाद कि आप स्वयं मुझ पर हर दिन धीरज धरते हैं, और दीनता और नम्रता सीखने की कृपा देते हैं।

इस अंश को किसी और स्तर पर देखें

शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।

अध्ययन टूल में खोलें