निर्गमन 2:11
पाठ
महल का पला-पोसा जवान एक दिन बाहर निकलता है। कोई उसे भेजता नहीं, कोई उसे बुलाता नहीं; वह खुद जाता है, "अपने भाई-बन्धुओं के पास," और वहाँ खड़े होकर "उनके दुःखों पर दृष्टि" करता है। ईंटों की धूल, कोड़ों की आवाज़, झुकी हुई पीठें। और तभी उसकी आँख एक दृश्य पर अटक जाती है: एक मिस्री एक इब्री को मार रहा है। ध्यान दीजिए, कहानी कहती है "मेरे एक इब्री भाई को," मानो लिखने वाला मूसा के भीतर से बोल रहा हो। यही वह क्षण है जब राजकुमार के भीतर का इब्री जाग उठता है, और उसका पूरा जीवन दो हिस्सों में बँट जाता है।
मर्म
यह पद बताता है कि परमेश्वर का उद्धार भावशून्य नहीं होता; वह देखने से शुरू होता है। मूसा "दृष्टि करने लगा," और यही क्रिया अध्याय के अंत में परमेश्वर के लिए दोहराई जाती है: "परमेश्वर ने इस्राएलियों पर दृष्टि करके उन पर चित्त लगाया।" इब्रानी में देखना केवल आँख का काम नहीं, वह भीतर तक उतरने वाली सहभागिता है। मूसा में जो जागा, वह परमेश्वर के हृदय की एक हल्की परछाईं है। पर यहाँ मर्म की धार भी है: सही करुणा अभी सही तरीके को नहीं जानती। अगला पद उसे हत्या और रेत में छिपाने तक ले जाएगा। परमेश्वर मनुष्य के भीतर पुकार तो जगा देते हैं, पर उसे अपने समय और अपनी बुलाहट के अनुसार गढ़ते हैं, और वह गढ़ाई अक्सर लंबी और अपमानजनक होती है।
सूत्र
इस एक पद में उद्धार की कहानी का एक पुराना आकार दिखाई देने लगता है: छुड़ाने वाला उन्हीं के बीच उतरता है जिन्हें छुड़ाना है। मूसा को बाहर जाने की कोई मजबूरी नहीं थी। उसकी थाली भरी थी, उसका नाम फ़िरौन की बेटी के घर से जुड़ा था, और गारे में सने लोग उसके लिए बस "वे लोग" हो सकते थे। पर वह जाता है, और उन्हें "भाई" कहता है। यही चाल बाद में और गहरी होकर लौटती है, जब परमेश्वर का पुत्र स्वर्ग के महल से नहीं, बल्कि उस देह में उतरते हैं जो दुःख उठाती है, और हमें भाई कहने में लज्जित नहीं होते। अंतर यह है कि मूसा का हस्तक्षेप रेत में एक लाश छिपाकर समाप्त होता है; मसीह का हस्तक्षेप स्वयं को देकर पूरा होता है। एक ने एक मिस्री को मारा, दूसरे ने अपने आप को मरने दिया, और वही असली छुटकारा बना।
दर्पण
आप शायद उस दफ़्तर में बैठते हैं जहाँ किसी सहकर्मी के साथ रोज़ अन्याय होता है और आप जानते हैं कि बोलने की कीमत क्या होगी। या उस परिवार में हैं जहाँ एक रिश्तेदार को चुपचाप कुचला जा रहा है और सबने तय कर लिया है कि यह "उनका घरेलू मामला" है। मूसा का पहला पाप देखना नहीं था, बल्कि उसके बाद इधर-उधर देखना, यह जाँचना कि कोई गवाह तो नहीं। हममें से कई लोग उल्टा करते हैं: हम देखने से ही बचते हैं, क्योंकि जो दिख गया वह ज़िम्मेदारी बन जाता है। और कई बार हम मूसा जैसी जल्दबाज़ी करते हैं, गुस्से में एक संदेश, एक ताना, एक फ़ैसला, और फिर सालों उसे रेत में छिपाते फिरते हैं। आज ही एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसका दुःख आप जानते हैं पर जिससे आपने आँख चुराई है, और उसे आज ही फ़ोन करके पूछिए कि वह कैसा है।
संदर्भ
मूसा का जन्म ऐसे समय में हुआ जब फ़िरौन का आदेश था कि इब्री बेटों को जीवित न रहने दिया जाए। जिस नदी में उसे डूबना था, उसी नदी ने उसे बचाया, और जिस राजघराने ने उसकी जाति को कुचला, उसी ने उसे पाला। सोचिए वह विचित्र स्थिति: दूध पिलाने वाली माँ अपनी ही थी, पर मजदूरी फ़िरौन की बेटी से मिलती थी। यानी मूसा बचपन से जानता था कि वह कौन है, और साथ ही जानता था कि उसे किसकी मेज़ पर बैठाया गया है। मिस्र में इब्री एक दास-वर्ग थे, ईंट बनाने वाले, बेनाम, गिनती में ख़तरा और मूल्य में कुछ नहीं। एक मिस्री का किसी इब्री को पीटना अपराध नहीं, व्यवस्था का सामान्य दृश्य था। इसलिए मूसा का बाहर निकलना केवल टहलना नहीं, वह वर्ग-रेखा को जान-बूझकर पार करना था।
मुख्य पात्र
मूसा यहाँ पहली बार बोलने वाला नहीं, केवल देखने वाला है, और उसकी आँख ही उसका चरित्र खोलती है। वह विशेषाधिकार का आदी आदमी है जो विशेषाधिकार में चैन नहीं पाता। उसके भीतर दो पहचानें आपस में लड़ती हैं: महल की भाषा उसकी जीभ पर है, पर गारे की गंध उसके ख़ून में है। यह वही बेचैनी है जिसे बाद में इब्रानियों की पत्री सराहती है, कि उसने पाप के क्षणिक सुख से बढ़कर परमेश्वर की प्रजा के साथ दुःख उठाना चुना। पर इस पद में वह चुनाव अभी परिपक्व नहीं, केवल कच्चा और भावुक है। वह न्याय चाहता है पर अधिकार नहीं रखता, करुणा रखता है पर धैर्य नहीं। परमेश्वर उस कच्चेपन को नकारते नहीं; वे उसे चालीस साल भेड़ें चराने भेजते हैं जब तक जल्दबाज़ी नम्रता में न ढल जाए।
अन्तर्पाठ
इसी अध्याय का अंत मूसा के देखने को परमेश्वर के देखने से जोड़ देता है: "और परमेश्वर ने इस्राएलियों पर दृष्टि करके उन पर चित्त लगाया।" पहले मनुष्य देखता है और गड़बड़ कर बैठता है; फिर परमेश्वर देखते हैं, और इतिहास मुड़ जाता है। दूसरी गूँज प्रेरितों के काम के सातवें अध्याय में सुनाई देती है, जहाँ स्तिफनुस यही घटना सुनाता है और कहता है कि मूसा ने सोचा उसके भाई समझेंगे कि परमेश्वर उसके हाथ से उन्हें छुड़ाएँगे, पर उन्होंने नहीं समझा। स्तिफनुस यह बात उन लोगों के सामने कहता है जिन्होंने अपने असली छुड़ाने वाले को भी नहीं पहचाना। ठुकराया गया मुक्तिदाता एक बार का हादसा नहीं, बाइबल का दोहराया जाने वाला पैटर्न है।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सा दुःख है जिसे आप जानते तो हैं, पर जिस पर "दृष्टि करने" से बचते हैं, क्योंकि देख लेने के बाद कुछ करना पड़ेगा?
कहीं आपकी करुणा जल्दबाज़ी में तो नहीं बदल रही? परमेश्वर आपके भीतर की उस बेचैनी को इस समय किस तरह गढ़ रहे हैं, और क्या आप उस धीमी गढ़ाई के लिए तैयार हैं?
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Exodus 2:11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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किसने तुझे हम पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" यह सवाल मूसा को चुभ गया, क्योंकि सच यही था। अभी परमेश्वर ने उसे भेजा नहीं था। उसने इधर उधर देखकर, छिपकर, अपने हाथ से छुड़ाना चाहा। चालीस साल बाद वही मूसा जलती झाड़ी के सामने बुलाया गया। तेरे भीतर का जोश गलत नहीं है। पर पूछ ले, यह काम तू कर रहा है या परमेश्वर तुझसे करवा रहा है?
पिता, जब मुझे किनारे धकेला जाता है और कोई पक्ष नहीं लेता, तब भी तू देखता है। तू ऐसे लोग भेजता है जो उठकर मेरी मदद करते हैं। मुझे भी वैसा ही साहस दे कि जहाँ किसी के साथ अन्याय हो, मैं चुप न रहूँ, बल्कि आगे बढ़कर हाथ बढ़ाऊँ।
पिता, धन्यवाद कि आपने फ़िरौन की बेटी के मन में तरस डाल दिया, जब उसने रोते हुए बच्चे को देखा। धन्यवाद कि मूसा का वह छोटा सा रोना भी अनसुना न रहा, और आपने शत्रु के घर में ही उसके लिए सुरक्षा तैयार कर रखी थी। हमारे आँसुओं पर भी आपकी वही दयादृष्टि है।
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