निर्गमन 2:16
पाठ
मिद्यान के याजक की सात बेटियाँ थीं, और वे उस दिन भी वैसे ही कुएँ पर आईं जैसे हर दिन आती थीं: पानी भरने, कठौतों में उँडेलने, अपने पिता की भेड़-बकरियों को पिलाने। एक ही वाक्य, और उसमें कोई चमत्कार नहीं, कोई स्वर्गदूत नहीं, कोई आवाज़ नहीं। सिर्फ़ सात लड़कियाँ, एक कुआँ, और पशुओं की प्यास। यही वह दृश्य है जिसमें मूसा, जो अभी-अभी फ़िरौन के सामने से भागकर आया है और थका हुआ कुएँ के पास बैठा है, बिना जाने अपने जीवन के अगले चालीस वर्षों में प्रवेश कर रहा है। कहानी का मोड़ पानी भरने जैसे एक मामूली काम की आड़ में छिपा हुआ है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि निर्गमन का लेखक यहाँ क्या नहीं कहता। वह नहीं कहता कि परमेश्वर ने इन बेटियों को भेजा, या कि यह सब पहले से ठहराया हुआ था। वह बस बताता है कि वे पानी भरने आईं। परमेश्वर का हाथ इस आयत में अदृश्य है, और फिर भी यही वह दिन है जिसके बाद मूसा का सब कुछ बदल जाता है: घर, पत्नी, पेशा, और अंततः वह जलती झाड़ी जो इन्हीं भेड़-बकरियों को चराते हुए मिलेगी। यहाँ धर्मशास्त्र का एक ठोस दावा छिपा है: परमेश्वर का उद्धार-कार्य असाधारण क्षणों पर उतना नहीं टिकता जितना साधारण ज़िम्मेदारियों पर। ये लड़कियाँ अपने पिता के पशुओं की सेवा में वफ़ादार थीं, और उसी वफ़ादारी ने एक भगोड़े को आश्रय, परिवार और बुलाहट का मैदान दिया। जहाँ आप रोज़ अपनी बाल्टी भरते हैं, वहीं परमेश्वर काम करने के आदी हैं।
सूत्र
कुएँ पर मुलाक़ात बाइबल में संयोग नहीं लगती; यह एक दोहराया हुआ दृश्य है। इसहाक की पत्नी एक कुएँ पर मिली, याकूब राहेल से एक कुएँ पर मिला, और अब मूसा। हर बार परदेश में, हर बार एक थके हुए आदमी और भेड़-बकरियों के बीच, और हर बार उसके बाद परमेश्वर की वाचा का इतिहास एक कदम आगे बढ़ता है। यह पैटर्न बताता है कि परमेश्वर अपने उद्धार को प्यास के बिंदु पर बुनते हैं: वहाँ जहाँ जीवन के लिए पानी चाहिए और किसी को बाल्टी उठानी पड़ती है। और सदियों बाद एक और थका हुआ पुरुष एक कुएँ पर बैठेगा और एक स्त्री से कहेगा, "मुझे पानी पिला।" यीशु मसीह उसी जगह पर आते हैं जहाँ मूसा बैठा था: रोज़मर्रा की प्यास के किनारे, जहाँ उद्धार किसी मंदिर में नहीं, बल्कि कठौतों के पास शुरू होता है।
दर्पण
आपका कुआँ कहाँ है? वह जगह जहाँ आप रोज़ जाते हैं और कुछ भी ऐतिहासिक नहीं होता: वही कक्षा, वही शिफ़्ट, वही बर्तन, वही बूढ़े माता-पिता की दवाइयाँ। हममें से ज़्यादातर लोग अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा उसी दोहराव में खर्च करते हैं, और हमारे भीतर एक आवाज़ कहती रहती है कि असली जीवन कहीं और शुरू होगा, किसी बड़े अवसर के बाद। यह आयत उस आवाज़ को चुपचाप काटती है। सात बेटियाँ अपने पिता के पशुओं को पानी पिलाने आई थीं, बस इतना ही, और उसी दिन एक राष्ट्र के छुड़ानेवाले को घर मिला। वफ़ादारी का फल अक्सर उस व्यक्ति को नहीं दिखता जो वफ़ादार है। यही इसका तीखापन है: आपको शायद कभी पता न चले कि आपके रोज़ के काम ने किसके लिए दरवाज़ा खोला।
आज वह एक काम कीजिए जो आप आमतौर पर टालते हैं क्योंकि वह बहुत मामूली है: दस मिनट निकालकर वह बर्तन धोइए, वह ईमेल भेजिए, या वह फ़ोन कीजिए जो किसी और की ज़िम्मेदारी हल्की कर देगा, और करते समय मन में कहिए कि यही आज मेरा कुआँ है।
श्रोता
जो इस्राएली इस कहानी को पहली बार सुन रहे थे, वे जानते थे कि कुएँ पर पानी भरना केवल घरेलू काम नहीं, बल्कि संघर्ष का मैदान था। पानी के अधिकार पर झगड़े होते थे, और अगली आयत बताती है कि चरवाहे इन लड़कियों को हटाने लगे, यानी यह पहली बार नहीं रहा होगा। सात बेटियों का भेड़ें चराना यह भी संकेत देता है कि उस घर में बेटा नहीं था, यानी वह परिवार सुरक्षा के मामले में कमज़ोर था। सुननेवाले मिस्र की गुलामी से निकले लोग थे, जो खुद ताक़तवरों के हाथों धकेले जाने का स्वाद जानते थे। उन्होंने इस दृश्य में अपनी ही हालत का छोटा-सा प्रतिबिंब देखा होगा, और यह भी कि परमेश्वर ऐसे ही धकेले गए लोगों के बीच अपना काम शुरू करते हैं।
मुख्य पात्र
ये सात बेटियाँ नाम के बिना आती हैं, और एक ही वाक्य में अपना पूरा चरित्र दिखा देती हैं। वे आईं, उन्होंने भरा, उन्होंने उँडेला, उन्होंने पिलाया: चार क्रियाएँ, सब दूसरों के लिए। उनका जीवन उस कठिन संतुलन पर टिका है जिसे बहुत से लोग पहचानेंगे, जहाँ कर्तव्य निभाना पड़ता है भले ही हर बार कोई धक्का देने वाला खड़ा हो। वे लड़ाकू नहीं हैं; अगली आयत में वे चरवाहों से भिड़ती नहीं, हट जाती हैं और फिर लौट आती हैं। इसमें कमज़ोरी भी है और एक ज़िद भी: अन्याय के बावजूद काम छोड़ा नहीं जाता। ऐसे ही लोगों के ज़रिए परमेश्वर इतिहास मोड़ते हैं, और उन्हें आमतौर पर इसका श्रेय नहीं मिलता।
सवाल
मुश्किल बात यह है कि मूसा को आश्रय देनेवाला घर "मिद्यान के याजक" का है, यानी इस्राएल के परमेश्वर की उपासना करनेवाला नहीं, किसी और देवता का पुरोहित। परमेश्वर अपने छुड़ानेवाले को उस घर में चालीस साल के लिए सौंप देते हैं। हम चाहेंगे कि कहानी साफ़-सुथरी हो, कि सच्चे विश्वासी ही परमेश्वर के काम आएँ। पाठ यह सुविधा नहीं देता। वह न तो रूएल की आस्था पर टिप्पणी करता है, न उसे सही ठहराता है, न दोषी। शायद यही इसका संदेश है: परमेश्वर की देखरेख हमारी धार्मिक सीमाओं का सम्मान करने को बाध्य नहीं है। यह असहज है, और इसे असहज ही रहने देना चाहिए।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सा दोहराया हुआ काम है जिसे आप "असली जीवन" नहीं मानते, और क्या होगा अगर परमेश्वर ठीक वहीं काम कर रहे हों?
किसने अपनी चुपचाप निभाई गई ज़िम्मेदारी से आपके लिए दरवाज़ा खोला, और क्या उन्हें कभी इसका पता चला?
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किसने तुझे हम पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" यह सवाल मूसा को चुभ गया, क्योंकि सच यही था। अभी परमेश्वर ने उसे भेजा नहीं था। उसने इधर उधर देखकर, छिपकर, अपने हाथ से छुड़ाना चाहा। चालीस साल बाद वही मूसा जलती झाड़ी के सामने बुलाया गया। तेरे भीतर का जोश गलत नहीं है। पर पूछ ले, यह काम तू कर रहा है या परमेश्वर तुझसे करवा रहा है?
पिता, जब मुझे किनारे धकेला जाता है और कोई पक्ष नहीं लेता, तब भी तू देखता है। तू ऐसे लोग भेजता है जो उठकर मेरी मदद करते हैं। मुझे भी वैसा ही साहस दे कि जहाँ किसी के साथ अन्याय हो, मैं चुप न रहूँ, बल्कि आगे बढ़कर हाथ बढ़ाऊँ।
पिता, धन्यवाद कि आपने फ़िरौन की बेटी के मन में तरस डाल दिया, जब उसने रोते हुए बच्चे को देखा। धन्यवाद कि मूसा का वह छोटा सा रोना भी अनसुना न रहा, और आपने शत्रु के घर में ही उसके लिए सुरक्षा तैयार कर रखी थी। हमारे आँसुओं पर भी आपकी वही दयादृष्टि है।
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