बाइबल व्याख्या

गलातियों 5:17

बाइबल

पाठ

पौलुस एक ही साँस में दो विरोधी ताकतों का नाम लेता है: शरीर आत्मा के विरोध में लालसा करता है, और आत्मा शरीर के विरोध में। ये दोनों आपस में शत्रु हैं, और इस खींचातानी का नतीजा यह होता है, "कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ।" यानी विश्वासी के भीतर कोई शांत, सुलझा हुआ कमरा नहीं है जहाँ सब कुछ तय हो चुका हो। वहाँ एक संघर्ष चल रहा है, और पौलुस इसे छिपाता नहीं, न उसे कोई शर्मिंदगी की बात मानता है। वह इसे गलातिया के उन लोगों के सामने रखता है जो सोच रहे थे कि नियमों की एक अच्छी सूची उन्हें भीतर से ठीक कर देगी। नहीं, वह कहता है। भीतर जो हो रहा है, वह सूची से बड़ा है।

मूल

ध्यान दीजिए कि पौलुस किस क्रिया को दोनों पक्षों पर लगाता है: लालसा। शरीर लालसा करता है, और आत्मा भी लालसा करता है। यूनानी शब्द एपिथ्यूमेई आमतौर पर गलत चाहत के लिए आता है, पर यहाँ वही शब्द परमेश्वर के आत्मा के लिए इस्तेमाल होता है। इसका अर्थ यह है कि आपके भीतर जो तड़प है, वह केवल आपकी नहीं है। पवित्र आत्मा आपमें कुछ चाहते हैं, तीव्रता से चाहते हैं, आपसे भी ज़्यादा। यह बात उद्धार की हमारी समझ को बदल देती है। पवित्रता कोई ऐसा प्रोजेक्ट नहीं जिसे आप अकेले अपनी इच्छाशक्ति से चलाते हैं; यह दो चाहतों के बीच का युद्धक्षेत्र है, और उनमें से एक चाहत परमेश्वर की अपनी है। तो फिर भीतर की बेचैनी हार का प्रमाण नहीं, शायद जीवन का प्रमाण है। मुर्दे में कोई खींचातानी नहीं होती।

सूत्र

गलातियों में पौलुस बार-बार एक ही बात पर लौटता है: जो मसीह ने क्रूस पर किया, वह हमारी कोशिशों से बड़ा है। पद 24 में वह कहता है कि मसीह के लोगों ने "शरीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है।" यह पद 17 के साथ अजीब लगता है। जो क्रूस पर चढ़ाया जा चुका, वह अब भी लालसा क्यों कर रहा है? पर यही बाइबल की पूरी कहानी का आकार है। मिस्र से निकलने के बाद भी इस्राएल चालीस साल जंगल में रहा। राजा आ चुका है, पर राज्य अभी पूरा नहीं हुआ। हम उस बीच के समय में जीते हैं, जहाँ निर्णायक लड़ाई जीती जा चुकी है पर गोलियाँ अब भी चल रही हैं।

दर्पण

आप जानते हैं यह कैसा लगता है। आपने तय किया था कि इस बार बच्चे पर चिल्लाएँगे नहीं, और शाम सात बजे आपकी आवाज़ फिर ऊँची थी। आपने सोचा था कि इस महीने पैसे को लेकर इतनी चिंता नहीं करेंगे, और रात को फिर वही हिसाब दिमाग में चलता रहा। "जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ" आपके अनुभव का सटीक वर्णन है। और यहाँ पौलुस आपको यह नहीं कहता कि ज़्यादा ज़ोर लगाइए। वह कहता है कि आपके भीतर दो चाहतें हैं, और पवित्र आत्मा की चाहत आपकी नाकामी से नहीं हारती। आज शाम एक कागज़ पर वह एक काम लिखिए जो आप करना चाहते हैं पर नहीं कर पाते, और उसे ज़ोर से परमेश्वर के सामने पढ़कर कहिए: यह आपकी चाहत है, मेरी नहीं।

संदर्भ

गलातिया की कलीसियाएँ नई थीं, ज़्यादातर गैर-यहूदी, और उनके बीच शिक्षक आए थे जो कह रहे थे कि मसीह पर विश्वास काफ़ी नहीं, खतना और व्यवस्था का पालन भी ज़रूरी है। उस समाज में पहचान सब कुछ थी: आप किस समूह के हैं, किस चिह्न से पहचाने जाते हैं। व्यवस्था एक साफ़ नक्शा देती थी। पौलुस वह नक्शा छीन लेता है और बदले में कुछ बहुत कम ठोस देता है, "आत्मा के अनुसार चलो" (पद 16)। उन्हें यह असुरक्षित लगा होगा। और फिर पद 17 आता है, जो कहता है कि इस नए रास्ते पर चलना आसान नहीं, बल्कि भीतर से फटा हुआ महसूस होगा। यह एक ईमानदार वचन है, विज्ञापन नहीं।

प्रश्न

पर क्या पौलुस यहाँ हार मान रहा है? पद 16 में वह कहता है कि आत्मा के अनुसार चलने पर आप शरीर की लालसा पूरी नहीं करेंगे, और अगले ही वाक्य में कहता है कि आप वह नहीं कर पाते जो आप करना चाहते हैं। दोनों एक साथ कैसे सच हैं? मैं इसे पूरी तरह सुलझा नहीं सकता, और मुझे लगता है पौलुस भी इसे सुलझाना नहीं चाहता। शायद वह यह कह रहा है कि जीत का अनुभव और संघर्ष का अनुभव एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो लड़ नहीं रहा, वह जीत भी नहीं रहा। यह दिलासा नहीं है, पर यह झूठ भी नहीं है। और कभी-कभी सच्चाई दिलासे से ज़्यादा काम की होती है।

अंतर्पाठ

रोमियों 7 में पौलुस यही अनुभव पहले पुरुष में लिखता है: जो भलाई वह चाहता है, वह नहीं करता; जो बुराई नहीं चाहता, वही करता है। वहाँ भी वह इसे छिपाता नहीं, और वहाँ भी वह अगले अध्याय में आत्मा की ओर मुड़ता है। दोनों जगह क्रम एक ही है: पहले ईमानदारी, फिर आशा। और यहीं पद 22 पढ़िए, जहाँ आत्मा का फल गिनाया गया है, प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज। ध्यान दीजिए, फल उगाया नहीं जाता, वह उगता है। पद 17 का संघर्ष वह मिट्टी है जिसमें पद 22 का फल धीरे-धीरे पकता है, अक्सर इतने धीरे कि आप खुद उसे देख नहीं पाते। दूसरे देख लेते हैं।

चिंतन

आपके भीतर की जो बेचैनी आपको अपनी कमज़ोरी लगती है, क्या वह असल में पवित्र आत्मा की लालसा हो सकती है, और इससे आपका उस बेचैनी को देखने का तरीका कैसे बदलता है?

अगर पवित्रता आपकी इच्छाशक्ति का प्रोजेक्ट नहीं बल्कि दो चाहतों का संघर्ष है, तो आप कल सुबह प्रार्थना में क्या अलग माँगेंगे?

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Galatians 5:17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

गलातियों 5:17 का क्या अर्थ है?
पौलुस एक ही साँस में दो विरोधी ताकतों का नाम लेता है: शरीर आत्मा के विरोध में लालसा करता है, और आत्मा शरीर के विरोध में। ये दोनों आपस में शत्रु हैं, और इस खींचातानी का नतीजा यह होता है, "कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ।" यानी विश्वासी के भीतर कोई शांत, सुलझा हुआ कमरा नहीं है जहाँ सब कुछ तय हो चुका हो। वहाँ एक संघर्ष चल रहा है, और पौलुस इसे छिपाता नहीं, न उसे कोई शर्मिंदगी की बात मानता है। वह इसे गलातिया के उन लोगों के सामने रखता है जो सोच रहे थे कि नियमों की एक अच्छी सूची उन्हें भीतर से ठीक कर देगी। नहीं, वह कहता है। भीतर जो हो रहा है, वह सूची से बड़ा है।
गलातियों 5:17 किस विषय में है?
गलातियों में पौलुस बार-बार एक ही बात पर लौटता है: जो मसीह ने क्रूस पर किया, वह हमारी कोशिशों से बड़ा है। पद 24 में वह कहता है कि मसीह के लोगों ने "शरीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है।" यह पद 17 के साथ अजीब लगता है। जो क्रूस पर चढ़ाया जा चुका, वह अब भी लालसा क्यों कर रहा है?
गलातियों 5:17 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
गलातिया की कलीसियाएँ नई थीं, ज़्यादातर गैर-यहूदी, और उनके बीच शिक्षक आए थे जो कह रहे थे कि मसीह पर विश्वास काफ़ी नहीं, खतना और व्यवस्था का पालन भी ज़रूरी है। उस समाज में पहचान सब कुछ थी: आप किस समूह के हैं, किस चिह्न से पहचाने जाते हैं। व्यवस्था एक साफ़ नक्शा देती थी। पौलुस वह नक्शा छीन लेता है और बदले में कुछ बहुत कम ठोस देता है, "आत्मा के अनुसार चलो" (पद 16)। उन्हें यह असुरक्षित लगा होगा। और फिर पद 17 आता है, जो कहता है कि इस नए रास्ते पर चलना आसान नहीं, बल्कि भीतर से फटा हुआ महसूस होगा। यह एक ईमानदार वचन है, विज्ञापन नहीं।
गलातियों 5:17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 7 में पौलुस यही अनुभव पहले पुरुष में लिखता है: जो भलाई वह चाहता है, वह नहीं करता; जो बुराई नहीं चाहता, वही करता है। वहाँ भी वह इसे छिपाता नहीं, और वहाँ भी वह अगले अध्याय में आत्मा की ओर मुड़ता है। दोनों जगह क्रम एक ही है: पहले ईमानदारी, फिर आशा। और यहीं पद 22 पढ़िए, जहाँ आत्मा का फल गिनाया गया है, प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज। ध्यान दीजिए, फल उगाया नहीं जाता, वह उगता है। पद 17 का संघर्ष वह मिट्टी है जिसमें पद 22 का फल धीरे-धीरे पकता है, अक्सर इतने धीरे कि आप खुद उसे देख नहीं पाते। दूसरे देख लेते हैं।
गलातियों 5:17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगर पवित्रता आपकी इच्छाशक्ति का प्रोजेक्ट नहीं बल्कि दो चाहतों का संघर्ष है, तो आप कल सुबह प्रार्थना में क्या अलग माँगेंगे?
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Galatians 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

थोड़ा सा ख़मीर पूरे गुँधे हुए आटे को ख़मीर कर देता है।" पौलुस यह किसी बड़े पाप के बारे में नहीं कह रहा था, बल्कि एक छोटी सी शर्त के बारे में जो कुछ लोग अनुग्रह के साथ जोड़ रहे थे। एक छोटी सी बात, और पूरा सुसमाचार बदल गया। तेरे मन में भी कोई ऐसी छोटी सी सोच पल रही है, कि मसीह तो काफ़ी है, पर थोड़ा मेरा भी करना ज़रूरी है? वह थोड़ा चुप नहीं रहता, वह फैलता है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 21

पिता, मेरे मन में जो जलन दूसरों को देखकर जागती है, उसे तू जानता है। मुझे उन आदतों से बचा जो धीरे धीरे मुझे तुझसे दूर ले जाती हैं। मेरा दिल तेरे राज्य के लिए तरसे, और मेरी ज़िंदगी तेरी पवित्रता को दिखाए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 6

गलातिया की कलीसिया में लड़ाई इसी बात पर थी कि कौन सही नियम निभा रहा है। पौलुस कहता है, "क्योंकि मसीह यीशु में न खतना और न खतनारहित कुछ काम का है, परन्तु केवल विश्वास जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है।" तेरा विश्वास चुपचाप मन में नहीं बैठा रहता, वह हाथ पैर उठाकर प्रेम करता है। आज किसके लिए?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

तुम जो व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहरना चाहते हो, मसीह से अलग हो गए और अनुग्रह से गिर गए हो।" पौलुस यह उन लोगों से कह रहा है जो बुरे नहीं, बल्कि बहुत धार्मिक बनना चाहते थे। खतरा हमेशा पाप की तरफ से नहीं आता। कभी अपनी नेकी भी मसीह और हमारे बीच खड़ी हो जाती है। सोचिए, आज आप किस बात के भरोसे परमेश्वर के सामने खड़े होते हैं?

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