गलातियों 5:22
यह पाठ
पौलुस ने अभी-अभी "शरीर के कामों" की लंबी, गंदी सूची गिनाई है: व्यभिचार, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, फूट, डाह। फिर वे एक ही शब्द से पासा पलट देते हैं: "पर आत्मा का फल।" इसके बाद नौ चीज़ें आती हैं, प्रेम से लेकर विश्वास तक, और अगले पद में नम्रता और संयम। ध्यान दीजिए कि पौलुस "फल" कहते हैं, "फलों" नहीं। शरीर के अनेक बिखरे हुए काम हैं; आत्मा का एक ही फल है जिसके नौ पहलू हैं, जैसे एक ही संतरे की नौ फाँकें। यह कोई ऐसी सूची नहीं जिसमें से आप अपने स्वभाव के अनुसार तीन चुन लें और बाकी छोड़ दें।
मूल बात
यहाँ खेती की भाषा है, कारख़ाने की नहीं। शरीर "काम" करता है; आत्मा "फल" उगाता है। काम आप गिन सकते हैं, दिखा सकते हैं, बिल भेज सकते हैं। फल पर पेड़ का कोई नियंत्रण नहीं होता, वह बस जड़ों से जुड़ा रहता है और मौसम का काम मौसम करता है। यही पूरे गलातियों का झगड़ा है: धार्मिकता कमाई जाती है या दी जाती है? पौलुस कहते हैं कि जो लोग व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहरना चाहते थे, वे "अनुग्रह से गिर गए" हैं। पर यहाँ धार पलट भी जाती है। अनुग्रह का मतलब यह नहीं कि चरित्र मायने नहीं रखता। इसका मतलब है कि चरित्र आपकी उपलब्धि नहीं, परमेश्वर की फ़सल है, और फ़सल दिखाई देती है। पेड़ अपने फल के बारे में बहस नहीं करता; वह उसे लटकाए रखता है, सबके देखने के लिए।
मुख्य सूत्र
यह सूची आसमान से नहीं टपकी। प्रेम, धीरज, दया, भलाई, विश्वासयोग्यता: ये पुराने नियम में परमेश्वर के अपने चरित्र के शब्द हैं, वही गुण जो वे सीनै पर मूसा के सामने अपने विषय में बोलते हैं। यानी आत्मा का फल कोई नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि परमेश्वर के स्वभाव की छाप है जो एक साधारण इंसान के भीतर उतरती है। और वह छाप हमने देखी है: यीशु मसीह में यह सूची चलती-फिरती दिखी, क्रूस तक। इसलिए पौलुस अगले ही पद में कहते हैं कि मसीह के लोगों ने "शरीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है।" फल मीठा है, पर वह जिस पेड़ पर उगता है उसकी जड़ें एक मृत्यु में गड़ी हैं। नए स्वभाव की कीमत पुराने स्वभाव का अंत है।
दर्पण
अब इसे रविवार से उतारकर सोमवार पर रखिए। "धीरज" के लिए पौलुस जो शब्द चुनते हैं, माक्रोथुमिया, का शाब्दिक अर्थ है "लंबा गुस्सा", यानी क्रोध तक पहुँचने का रास्ता लंबा होना। वह ऑफ़िस के उस सहकर्मी के साथ मापा जाता है जो तीसरी बार वही गलती दोहराता है। "भलाई" उस पल में दिखती है जब बिल में आपके पक्ष में गलती हुई हो और कोई कभी न जानेगा। "संयम" फ़ोन को मेज़ पर उलटा रखने में है जब बच्चा बोल रहा हो। यहाँ धार यह है: फल की जाँच सुविधा में नहीं, घर्षण में होती है। और यह भी कि आप इनमें से चुन नहीं सकते। जो आदमी उदार है पर संयमहीन, जो शांत है पर निर्दय, वह अधपका फल है, कच्चा एक तरफ़ से।
आज इतना कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसके साथ आपका धीरज पिछले हफ़्ते टूटा, और उसे दो पंक्तियों का संदेश भेजिए जिसमें एक भी शिकायत या सफ़ाई न हो, केवल कुछ भला।
पहले सुननेवाले
गलातिया की कलीसियाएँ मिश्रित थीं: यहूदी पृष्ठभूमि के विश्वासी और अन्यजाति के नए लोग, एक ही मेज़ पर, और यही समस्या थी। बाहर से आए शिक्षक कह रहे थे कि असली परिवार में शामिल होने के लिए खतना और व्यवस्था चाहिए। इसका मतलब था एक दिखाई देने वाला, गिना जाने वाला प्रमाणपत्र। पौलुस उनका प्रमाणपत्र छीनकर उनके हाथ में एक फल थमा देते हैं। और ध्यान दीजिए कि शरीर के कामों की सूची में अधिकांश शब्द सम्बन्धों के टूटने के हैं: बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, फूट, डाह। वे लोग एक दूसरे को "दाँत से काटते और फाड़ खाते" थे, ठीक इसी बहस पर। तो आत्मा का फल उनके कानों में कोई भीतरी आध्यात्मिक अनुभव नहीं था, बल्कि इसका जवाब था कि यह समुदाय जीवित रहेगा या खुद को खा जाएगा।
शास्त्र की गूँज
यीशु का दाखलता और डालियों वाला चित्र (यूहन्ना 15) यहाँ ठीक पीछे खड़ा है: डाली फल पैदा करने की योजना नहीं बनाती, वह जुड़ी रहती है, और जो नहीं जुड़ी रहती वह सूख जाती है। पौलुस वही बात नैतिक भाषा में कहते हैं। दूसरा सूत्र इसी अध्याय के भीतर है: "सारी व्यवस्था इस एक ही बात में पूरी हो जाती है, 'तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।'" इसीलिए फल की सूची प्रेम से शुरू होती है और इसीलिए पौलुस कह सकते हैं कि "ऐसे-ऐसे कामों के विरोध में कोई व्यवस्था नहीं।" व्यवस्था जो चाहती थी, आत्मा वह भीतर से उगा देता है। कानून हटाया नहीं गया; उसे पूरा करने का ठिकाना बदल गया।
मुख्य पात्र
इस पद का मुख्य पात्र न आप हैं, न पौलुस, बल्कि पवित्र आत्मा हैं। और उनके काम करने का ढंग बताने लायक है: वे हमारे भीतर बिजली की तरह नहीं, मौसम की तरह आते हैं। कोई किसान सुबह उठकर आम नहीं उगाता; वह मिट्टी खोदता है, पानी देता है, और इंतज़ार करता है। परमेश्वर हमारे चरित्र के साथ इतनी धीमी गति से काम करने को तैयार हैं, यह अपने आप में उनके धीरज का प्रमाण है। वे हमें ऊपर से नैतिक नियम चिपकाकर नहीं सुधारते, वे जड़ बदलते हैं। इसका मतलब यह भी है कि आप अपने भीतर के कच्चेपन पर घबराइए मत, पर उसे बहाना भी मत बनाइए। पेड़ जुड़ा रहे; फ़सल परमेश्वर की ज़िम्मेदारी है, और वे उसे नहीं छोड़ते।
चिंतन के प्रश्न
इन नौ पहलुओं में से कौन सा आपके जीवन में सबसे कच्चा है, और वह किस एक रिश्ते में सबसे साफ़ दिखाई देता है?
आप अपने चरित्र को "काम" की तरह चलाते हैं या "फल" की तरह? पिछले महीने में ऐसा कोई पल था जब आपने जड़ की जगह केवल दिखावटी फल लटकाने की कोशिश की?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।
Galatians 5:22 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
गलातियों 5:22 का क्या अर्थ है?
गलातियों 5:22 किस विषय में है?
गलातियों 5:22 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
गलातियों 5:22 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
गलातियों 5:22 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Galatians 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पर यदि तुम एक दूसरे को दाँत से काटते और फाड़ खाते हो, तो चौकस रहो कि एक दूसरे का सत्यानाश न कर दो।" पौलुस ने जंगली जानवरों की भाषा चुनी, क्योंकि कलीसिया में बहस इतनी बढ़ गई थी। ध्यान दे, वह यह नहीं कहता कि तुम दूसरे को नष्ट कर दोगे, बल्कि दोनों मिटेंगे। जिस बात को लेकर तू आज किसी भाई से लड़ रहा है, क्या वह इस कीमत के लायक है?
हम घमण्ड करनेवाले न बनें, न एक दूसरे को चिढ़ाएँ, न एक दूसरे से डाह करें।" ध्यान दो, खोखला घमण्ड दो रास्ते बनाता है। जो हमसे पीछे लगते हैं, उन्हें हम चिढ़ाते हैं; जो हमसे आगे दिखते हैं, उनसे जलते हैं। दोनों में तुलना ही जड़ है। आत्मा का फल बताया जा चुका, अब सवाल यह है: क्या तेरी नज़र भाई को नापती है, या थामती है?
पौलुस उन लोगों को लिख रहा है जो व्यवस्था के छोटे से छोटे नियम पर बहस कर रहे थे, और उसी बीच एक दूसरे को काट खा रहे थे। उनसे वह कहता है, "क्योंकि सारी व्यवस्था इस एक ही बात में पूरी हो जाती है, 'तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।'" सोचो, जिस इंसान से तुम्हारी अनबन चल रही है, परमेश्वर की पूरी व्यवस्था उसी के साथ तुम्हारे बर्ताव में परखी जा रही है। सही होना काफी नहीं, प्रेम करना ज़रूरी है।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें