यशायाह 54
पाठ
एक स्त्री जिसने कभी बच्चा नहीं जना, जिसे प्रसव-पीड़ा तक नहीं हुई, उससे कहा जाता है: गला खोलकर जयजयकार कर। इसके बाद आदेश आता है कि वह अपने तम्बू के पट लम्बे करे, रस्सियाँ बढ़ाए, खूँटे गाड़े, क्योंकि उसका वंश जाति-जाति का अधिकारी होगा। फिर स्वर बदलता है और परमेश्वर स्वयं बोलते हैं: क्षण भर के लिए मैंने तुझे छोड़ा था, पर अब अनन्त करुणा से तुझे रख लूँगा; नूह की शपथ की तरह यह भी अटल है। अध्याय का अन्तिम भाग उस उजड़ी नगरी को नीलमणि की नींव, माणिक के कलश और रत्नों की सीमाओं से सजाता है, उसके बच्चों को यहोवा का सिखाया हुआ कहता है, और घोषणा करता है कि उसके विरुद्ध बनाया गया कोई हथियार सफल न होगा।
केंद्रीय सत्य
यह अध्याय परमेश्वर को पहले सृष्टिकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि पति के रूप में प्रस्तुत करता है: "तेरा कर्ता तेरा पति है।" बनानेवाला और ब्याहनेवाला एक ही हैं, और यही इस पाठ की चोट है। बंधन केवल शक्ति का नहीं, वाचा का है, और वाचा टूटने पर जो लज्जा आती है वह ठंडी नहीं होती। इस्राएल की निर्वासित पीढ़ी अपने आप को त्यागी हुई पत्नी समझती थी, और परमेश्वर इस चित्र को नकारते नहीं; वे इसे स्वीकारकर उलट देते हैं। क्रोध को वे "क्षण भर" कहते हैं, करुणा को "अनन्त"। यह अनुपात ही सुसमाचार है। और अन्तिम पंक्ति सब कुछ खोल देती है: धार्मिकता कमाई नहीं जाती, "वे मेरे ही कारण धर्मी ठहरेंगे" यह भाग है, विरासत है, दासों को दिया गया उपहार।
सामान्य सूत्र
ध्यान दीजिए कि यह अध्याय कहाँ रखा गया है। ठीक पहले वह दास खड़ा है जो कुचला जाता है, जिसकी कब्र दुष्टों के बीच ठहराई जाती है, और जिसे फिर भी वंश देखने का वचन मिलता है। उसके तुरन्त बाद एक बाँझ स्त्री को गाने का हुक्म मिलता है। यह क्रम संयोग नहीं है: जो सन्तान वह अकेला मरनेवाला दास पाता है, वही भीड़ इस स्त्री के तम्बू में समाती नहीं। पौलुस ने गलातियों 4 में इसी पद 1 को उठाकर कलीसिया पर लगाया, क्योंकि वह समझ गया था कि परमेश्वर का परिवार जैविक क्षमता से नहीं, प्रतिज्ञा से जन्मता है। मसीह में वह पति सामने आता है जो अपनी दुल्हन को उसकी लज्जा समेत मोल लेता है, और तब तम्बू के पट सचमुच जाति-जाति तक खींचने पड़ते हैं।
दर्पण
यह पाठ उस जगह पर हाथ रखता है जिसे हम ढके रखते हैं: "अपनी जवानी की लज्जा" और "विधवापन की नामधराई"। वह असफल विवाह, वह नौकरी जहाँ से आपको चुपचाप हटा दिया गया, वह सन्तानहीनता जिस पर रिश्तेदार सहानुभूति की चादर डालते हैं, वह पाप जिसे आपने कभी किसी से नहीं कहा। ऐसी स्मृतियाँ खामोश नहीं रहतीं; वे रात के दो बजे बोलती हैं। परमेश्वर यहाँ यह नहीं कहते कि आपकी लज्जा काल्पनिक थी। वे कहते हैं कि वह अब आपका पता नहीं रहेगी, क्योंकि आपका नाम अब पति के नाम से बनता है, "सेनाओं का यहोवा"। आज ही एक कागज़ पर उस एक शर्मिंदगी को दो शब्दों में लिखिए, और उसके नीचे पद 8 के दो शब्द लिखिए: "पल भर" और "अनन्त करुणा"; फिर उसे ज़ोर से पढ़कर कागज़ फाड़ दीजिए।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का मुख्य पात्र वह परमेश्वर हैं जो अपने क्रोध के विषय में स्वयं हिसाब देते हैं। वे इनकार नहीं करते कि मुँह छिपाया गया था; वे उसे "क्रोध के आवेग" कहते हैं और उसकी अवधि नापते हैं। यह असाधारण है, क्योंकि यहाँ परमेश्वर अपने ही व्यवहार की व्याख्या करते हुए स्वयं को बाँधते हैं: जैसे नूह से शपथ खाई थी, वैसे ही अब। एक ऐसा परमेश्वर जो शपथ खाकर अपने क्रोध की सीमा तय कर देते हैं, वह मनमौजी देवता नहीं है जिसे रोज़ शान्त करना पड़े। और वे स्वयं को छुड़ानेवाला कहते हैं, यानी वह निकट सम्बन्धी जो कर्ज़ में बिके अपने परिवार को दाम देकर वापस खरीदता है। पति, सृष्टिकर्ता, छुड़ानेवाला: तीनों एक ही आवाज़ में बोल रहे हैं।
एक बारीकी
पद 16 अजीब लगता है और अक्सर छोड़ दिया जाता है: "एक लोहार कोएले की आग धोंककर इसके लिये हथियार बनाता है, वह मेरा ही सृजा हुआ है।" यह शान्ति का सस्ता वादा नहीं है। परमेश्वर यह नहीं कहते कि आपके विरुद्ध हथियार बनेंगे ही नहीं। वे कहते हैं कि हथियार गढ़नेवाला लोहार भी उन्हीं की सृष्टि है, और इसलिए उनके नियन्त्रण से बाहर नहीं। तभी पद 17 की प्रसिद्ध पंक्ति अपना असली वज़न पाती है: हथियार बनेंगे, चलेंगे, पर सफल नहीं होंगे। सुरक्षा का आधार यह नहीं कि दुनिया में शत्रुता नहीं है, बल्कि यह कि शत्रु की भट्टी भी परमेश्वर की सृष्टि के भीतर जलती है।
अन्तर्पाठ
इस अध्याय की गूँज दूर तक जाती है। पद 9 नूह की वाचा को उठाता है, यानी उत्पत्ति 9 की उस शपथ को जो पूरी पृथ्वी से थी; परमेश्वर अपनी दया की स्थिरता को नापने के लिए वही पैमाना चुनते हैं जिसे हर पीढ़ी इन्द्रधनुष में देखती है। पद 11 और 12 के नीलमणि, माणिक और रत्न प्रकाशितवाक्य 21 में लौटते हैं, जहाँ वही सजी हुई नगरी दुल्हन के रूप में उतरती है; यूहन्ना ने कोई नया चित्र नहीं गढ़ा, उसने यशायाह का चित्र पूरा होते देखा। पद 13, "तेरे सब लड़के यहोवा के सिखाए हुए होंगे", यीशु के मुँह में यूहन्ना 6 में आता है, जहाँ वे कहते हैं कि पिता से सीखा हुआ ही उनके पास आता है। और पद 17 का वह वाक्य कि कोई मुद्दई नालिश में जीत नहीं पाएगा, रोमियों 8 में पौलुस के उस प्रश्न के पीछे खड़ा है कि परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा। पर तनाव भी बना रहता है: होशे की पुस्तक में वही परमेश्वर उसी पत्नी को अदालत में खींचते हैं। यशायाह 54 उस मुकदमे को रद्द नहीं करता, वह उसे समाप्त करता है, और कीमत अध्याय 53 में पहले ही चुकाई जा चुकी है।
चिंतन
आपके जीवन की कौन-सी लज्जा है जिसे आप "अनन्त" मानते रहे हैं, जबकि परमेश्वर उसकी अवधि "क्षण भर" बताते हैं?
यदि आपकी सुरक्षा इस पर टिकी है कि हथियार बनेंगे ही नहीं, तो पद 16 आपकी उस नींव को कैसे हिलाता है, और उसकी जगह क्या रखता है?
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Isaiah 54 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यशायाह 54 का क्या अर्थ है?
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Isaiah 54 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
क्योंकि यहोवा ने तुझे ऐसी स्त्री के समान बुलाया है जो त्यागी गई और मन से व्याकुल हो।" गौर कर, परमेश्वर तेरे दर्द को छिपाता नहीं, वह उसे नाम देकर बुलाता है। तू सोचती है तेरा टूटापन तुझे अयोग्य बनाता है, पर वही तो वह पता है जिस पर वह तुझे ढूँढ़ने आता है। जवानी का प्यार उसने नहीं भुलाया। क्या तू अब भी खुद को भूली हुई मानेगी?
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