बाइबल व्याख्या

मत्ती 5:6

बाइबल

पाठ

पहाड़ पर बैठे यीशु अपने चेलों से कहते हैं: “धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएँगे।” यह चौथा वचन है उन आशीषों की उस कतार में जो मन के दीनों से शुरू होती है और सताए जानेवालों तक जाती है। यीशु किसी संतुष्ट, आत्मनिर्भर इंसान को धन्य नहीं कहते, बल्कि उसे जिसके भीतर एक कमी जल रही है। भूख और प्यास, ये दो शब्द किसी हल्की-सी इच्छा की बात नहीं करते; ये शरीर की वह पुकार हैं जो टाली नहीं जा सकती। और वादा उतना ही ठोस है: तृप्ति। पेट भर जाने जैसी तृप्ति, अधूरी नहीं, पूरी, और परमेश्वर के हाथ से मिलनेवाली।

मर्म

ध्यान दीजिए कि यीशु उन्हें धन्य नहीं कहते जो धार्मिक हैं, बल्कि उन्हें जो धार्मिकता के भूखे हैं। यह फ़र्क़ सब कुछ बदल देता है। स्वर्ग का राज्य उन लोगों से नहीं भरता जिन्होंने अपना हिसाब साफ़ कर लिया है, बल्कि उनसे जो जानते हैं कि उनके पास वह नहीं है जो होना चाहिए, और जो इस कमी के साथ जीना बंद कर चुके हैं। यूनानी में जिस शब्द का अनुवाद “धार्मिकता” है, वह दिकाइओसुने है, और यह दो चीज़ों को एक साथ पकड़ता है: परमेश्वर के सामने सही खड़े होना, और दुनिया में सही किया जाना। यानी यह भूख निजी पवित्रता की भी है और उस दिन की भी जब सब टेढ़ा सीधा किया जाएगा। और वादा कर्मवाच्य में है: “वे तृप्त किए जाएँगे।” तृप्त करनेवाला कोई और है। आप अपनी भूख नहीं मिटा सकते; आप बस भूखे रह सकते हैं, और सही जगह मुँह खोल सकते हैं।

सूत्र

यह भूख बाइबल में नई नहीं है। भजनकार हिरनी की तरह हाँफता है और कहता है कि उसका प्राण परमेश्वर के लिए प्यासा है; यशायाह के अंत में परमेश्वर उन्हें बुलाते हैं जिनके पास पैसा नहीं है, कि आओ, बिना दाम पानी और दूध लो। पूरे पुराने नियम में परमेश्वर के लोग एक ऐसे दिन के भूखे हैं जब न्याय आएगा और उनका दोष हट जाएगा। पहाड़ पर बैठा यह आदमी उस भूख का जवाब है। जो व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं को “पूरा करने” आया है (पद 17), वही यह भी घोषित करता है कि जिसके पास धार्मिकता नहीं है पर उसकी तड़प है, वह धन्य है। यानी तृप्ति किसी उपलब्धि से नहीं, उस व्यक्ति से मिलती है जो खुद वह रोटी है जिसकी हमें भूख है।

दर्पण

सवाल यह नहीं है कि आप धार्मिक हैं या नहीं। सवाल यह है कि आपकी भूख किस चीज़ की है। अपने बीते हफ़्ते को याद कीजिए: आपने किस बात को सबसे ज़्यादा तरसकर सोचा? वेतन बढ़ने को? किसी की तारीफ़ को? उस झगड़े में सही साबित होने को? हमारी असली भूख हमारी प्रार्थनाओं में नहीं, हमारी कल्पनाओं में दिखती है। और यहीं यह वचन चुभता है, क्योंकि हममें से बहुत लोग धार्मिकता के भूखे नहीं, बस उतनी भलाई से संतुष्ट हैं जितनी से इज़्ज़त बनी रहे। हम टेढ़े हिसाब के साथ जीना सीख गए हैं, दफ़्तर की उस चुप्पी के साथ, घर के उस पुराने कड़वेपन के साथ। यीशु उन्हें धन्य कहते हैं जिन्होंने इस समझौते से इनकार कर दिया। आज एक पर्ची पर वह एक बात लिखिए जिसके बारे में आप ख़ुद से कहते आए हैं “चलता है”, और उसे परमेश्वर के सामने ज़ोर से पढ़कर कहिए: मैं इससे तृप्त नहीं हूँ, आप मुझे तृप्त कीजिए।

शास्त्र-संगति

इसी उपदेश में आगे यीशु कहते हैं कि शास्त्रियों और फरीसियों से बढ़कर धार्मिकता चाहिए, वरना राज्य में प्रवेश नहीं (पद 20)। सुनकर सारी उम्मीद टूट जाती है, और तब पद 6 राहत बनकर लौटता है: वह बढ़कर धार्मिकता कमाई नहीं जाती, दी जाती है, उन्हें जो उसके भूखे हैं। मरियम का गीत भी ठीक यही बताता है, कि परमेश्वर भूखों को अच्छी वस्तुओं से भर देते हैं और धनवानों को खाली हाथ लौटा देते हैं। और यूहन्ना के सुसमाचार में यीशु खुद कहते हैं कि वे जीवन की रोटी हैं, कि उनके पास आनेवाला कभी भूखा न रहेगा। पहाड़ पर दी गई यह आशीष वहाँ अपना नाम पा लेती है।

प्रसंग

सुननेवाले गलील के आम लोग थे: मछुआरे, मज़दूर, किसान, जिनके लिए भूख कोई रूपक नहीं थी। रोमी कर, हेरोदेस के अधिकारी, और मंदिर की व्यवस्था, तीनों उनसे वसूलते थे। धार्मिकता की तालीम देनेवाले वे लोग थे जिनके पास पढ़ने का समय और खाने का भरोसा था, और साधारण आदमी मानकर चलता था कि परमेश्वर के सामने सही खड़ा होना उसके बस की बात नहीं। पहाड़ पर बैठकर सिखाना रब्बी का तरीक़ा था, पर यह रब्बी सूची नहीं, आशीष से शुरू करता है। और वह आशीष उन्हीं की गोद में गिरती है जिन्हें व्यवस्था के जानकारों ने पीछे छोड़ दिया था: दीन, शोक करनेवाले, नम्र, और भूखे।

कठिन प्रश्न

“वे तृप्त किए जाएँगे”, भविष्य काल। यह वचन ईमानदार है, और इसीलिए भारी है। जिन्होंने सचमुच न्याय के लिए भूख रखी, वे कई बार भूखे ही मरे। जिस माँ ने बरसों प्रार्थना की कि उसके बेटे में बदलाव आए, वह बदलाव देखे बिना चली गई। यीशु यह नहीं कहते कि तृप्ति आज दोपहर तक मिल जाएगी। वे भूख को गलत नहीं ठहराते, न उसे जल्दी बुझाने का वादा करते हैं; वे कहते हैं कि यह भूख व्यर्थ नहीं जाएगी। यह इतनी आसानी से हल होनेवाला तनाव नहीं है, और इसे मीठी बातों से ढकना बेईमानी होगी। जो बचता है वह यह है: भूख खुद इस बात का सबूत है कि खाना मौजूद है, और मेज़ लगानेवाला भरोसेमंद है।

मनन के प्रश्न

पिछले हफ़्ते आपकी कल्पनाएँ किस चीज़ के इर्द-गिर्द घूमती रहीं, और वह आपकी असली भूख के बारे में क्या बताती है?

आपके जीवन में वह कौन-सी एक टेढ़ी बात है जिसके साथ आपने जीना सीख लिया है, और उसे “चलता है” कहना बंद करने का पहला क़दम क्या होगा?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

Michael Green

The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

Michael Wilkins

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

The Message of the Sermon on the Mount

John Stott

Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

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Matthew 5:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 5:6 का क्या अर्थ है?
पहाड़ पर बैठे यीशु अपने चेलों से कहते हैं: “धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएँगे।” यह चौथा वचन है उन आशीषों की उस कतार में जो मन के दीनों से शुरू होती है और सताए जानेवालों तक जाती है। यीशु किसी संतुष्ट, आत्मनिर्भर इंसान को धन्य नहीं कहते, बल्कि उसे जिसके भीतर एक कमी जल रही है। भूख और प्यास, ये दो शब्द किसी हल्की-सी इच्छा की बात नहीं करते; ये शरीर की वह पुकार हैं जो टाली नहीं जा सकती। और वादा उतना ही ठोस है: तृप्ति। पेट भर जाने जैसी तृप्ति, अधूरी नहीं, पूरी, और परमेश्वर के हाथ से मिलनेवाली।
मत्ती 5:6 किस विषय में है?
यह भूख बाइबल में नई नहीं है। भजनकार हिरनी की तरह हाँफता है और कहता है कि उसका प्राण परमेश्वर के लिए प्यासा है; यशायाह के अंत में परमेश्वर उन्हें बुलाते हैं जिनके पास पैसा नहीं है, कि आओ, बिना दाम पानी और दूध लो। पूरे पुराने नियम में परमेश्वर के लोग एक ऐसे दिन के भूखे हैं जब न्याय आएगा और उनका दोष हट जाएगा। पहाड़ पर बैठा यह आदमी उस भूख का जवाब है। जो व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं को “पूरा करने” आया है (पद 17), वही यह भी घोषित करता है कि जिसके पास धार्मिकता नहीं है पर उसकी तड़प है, वह धन्य है। यानी तृप्ति किसी उपलब्धि से नहीं, उस व्यक्ति से मिलती है जो खुद वह रोटी है जिसकी हमें भूख है।
मत्ती 5:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इसी उपदेश में आगे यीशु कहते हैं कि शास्त्रियों और फरीसियों से बढ़कर धार्मिकता चाहिए, वरना राज्य में प्रवेश नहीं (पद 20)। सुनकर सारी उम्मीद टूट जाती है, और तब पद 6 राहत बनकर लौटता है: वह बढ़कर धार्मिकता कमाई नहीं जाती, दी जाती है, उन्हें जो उसके भूखे हैं। मरियम का गीत भी ठीक यही बताता है, कि परमेश्वर भूखों को अच्छी वस्तुओं से भर देते हैं और धनवानों को खाली हाथ लौटा देते हैं। और यूहन्ना के सुसमाचार में यीशु खुद कहते हैं कि वे जीवन की रोटी हैं, कि उनके पास आनेवाला कभी भूखा न रहेगा। पहाड़ पर दी गई यह आशीष वहाँ अपना नाम पा लेती है।
मत्ती 5:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
“वे तृप्त किए जाएँगे”, भविष्य काल। यह वचन ईमानदार है, और इसीलिए भारी है। जिन्होंने सचमुच न्याय के लिए भूख रखी, वे कई बार भूखे ही मरे। जिस माँ ने बरसों प्रार्थना की कि उसके बेटे में बदलाव आए, वह बदलाव देखे बिना चली गई। यीशु यह नहीं कहते कि तृप्ति आज दोपहर तक मिल जाएगी। वे भूख को गलत नहीं ठहराते, न उसे जल्दी बुझाने का वादा करते हैं; वे कहते हैं कि यह भूख व्यर्थ नहीं जाएगी। यह इतनी आसानी से हल होनेवाला तनाव नहीं है, और इसे मीठी बातों से ढकना बेईमानी होगी। जो बचता है वह यह है: भूख खुद इस बात का सबूत है कि खाना मौजूद है, और मेज़ लगानेवाला भरोसेमंद है।
मत्ती 5:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन में वह कौन-सी एक टेढ़ी बात है जिसके साथ आपने जीना सीख लिया है, और उसे “चलता है” कहना बंद करने का पहला क़दम क्या होगा?
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Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय

What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 42

जो कोई तुझसे माँगे, उसे दे; और जो तुझसे उधार लेना चाहे, उससे मुँह न मोड़।"

ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि कितना दे। वे हाथ की नहीं, चेहरे की बात करते हैं। क्योंकि हम अक्सर पैसे से पहले अपनी नज़रें छिपा लेते हैं, सुनने से पहले ही भीतर से मुकर जाते हैं।

आज किसी की ज़रूरत तुझ तक आए, तो पहले उसकी आँखों में देख। देना उसके बाद आसान लगेगा।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 29

यीशु ने "बाईं" नहीं, "दाहिनी आँख" कहा। यानी वह जो सबसे कीमती है, जिस पर तू सबसे ज़्यादा भरोसा करता है। पाप हमें कभी बेकार चीज़ों से नहीं, अपनी प्रिय चीज़ों से फँसाता है। "उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे।" सोच, आज तेरे हाथ में वह क्या है जिसे तू छोड़ना नहीं चाहता, पर जो तुझे धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर खींच रहा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 32

यीशु के समय पत्नी को त्यागपत्र देना आसान था, और छोड़ी गई स्त्री के पास न सहारा था, न सम्मान। इसलिए यीशु कहते हैं, "जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से छोड़ दे, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है।" दोष उस पर डाला गया जिसने छोड़ा। क्या तेरे रिश्तों में भी कोई है जिसे तूने सुविधा से छोड़ दिया, और परमेश्वर उसका दर्द अब भी देख रहा है?

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