भजन संहिता 10:5
पाठ
दुष्ट का जीवन चलता है, और अच्छा चलता है। भजनकार यही देखता है और यही उसे चुभता है: "वह अपने मार्ग पर दृढ़ता से बना रहता है।" उसकी योजनाएँ सफल होती हैं, उसका पैर कहीं नहीं फिसलता। और परमेश्वर के न्याय के नियम? वे उसके लिए इतनी ऊँचाई पर टँगे हैं कि उसकी नज़र वहाँ तक पहुँचती ही नहीं, जैसे किसी ऊँची दीवार पर लिखी इबारत जिसे पढ़ने की ज़रूरत ही न हो। और जो उसके रास्ते में खड़े होते हैं, उन पर वह फुँकारता है, जैसे कोई हिंसक पशु अपने शिकार पर गुर्राता है। तीन चित्र, एक ही वाक्य में: सफलता, अंधापन, और तिरस्कार।
मर्म
यह पद परमेश्वर के बारे में एक असहज सच्चाई खोलता है: उनके नियम सचमुच ऊँचे हैं, पर वे दुष्ट की दृष्टि से इसलिए दूर नहीं कि परमेश्वर ने उन्हें छिपाया, बल्कि इसलिए कि वह ऊपर देखना ही नहीं चाहता। पाप यहाँ केवल बुरा काम नहीं, यह एक प्रकार का चुना हुआ अंधापन है। पद 4 कह चुका है कि वह मन में सोचता है कि परमेश्वर है ही नहीं; पद 5 बताता है कि इस सोच का फल क्या होता है, एक ऐसा जीवन जो बिना हिसाब के, बिना ऊपर देखे, आराम से चलता रहता है। और यही सबसे डरावनी बात है: समृद्धि कभी-कभी न्याय का प्रमाण नहीं, बल्कि न्याय के स्थगित होने का चिह्न होती है। परमेश्वर की चुप्पी उनकी सहमति नहीं है।
सूत्र
भजन 10 का दुष्ट कोई दूर खड़ा खलनायक नहीं रहता, क्योंकि पौलुस ने इसी भजन की पंक्तियों को उठाकर रोमियों 3 में पूरी मानवजाति के ऊपर रख दिया। जिस मुँह में श्राप और छल भरा है, वह केवल अत्याचारी का नहीं, वह हमारा भी है। और ठीक यहीं मसीह की ज़रूरत दिखाई देती है, क्योंकि यीशु वह एकमात्र मनुष्य हैं जिनकी दृष्टि से परमेश्वर के धार्मिकता के नियम कभी ऊँचाई पर नहीं टँगे रहे; वे लगातार ऊपर देखते रहे, पिता की इच्छा को अपना भोजन कहते रहे। पर इससे भी गहरी बात यह है कि इस भजन में जो दीन घात में फँसता है, झाड़ी में छिपे सिंह का शिकार बनता है, क्रूस पर वही स्थान मसीह ने ले लिया। वे फुँकारनेवाले नहीं, फुँकारे जानेवाले बने। न्याय स्थगित नहीं हुआ; वह उन पर आ पड़ा।
दर्पण
यह पद सबसे पहले हमारी ईर्ष्या को नंगा करता है। वह सहकर्मी जो नियम तोड़कर आगे बढ़ गया, वह रिश्तेदार जिसने ज़मीन के कागज़ात में हेरफेर किया और आज आराम से है, वह ठेकेदार जो मज़दूरी दबा लेता है और जिसका कारोबार फलता ही जाता है। आप देखते हैं और भीतर कुछ खट्टा हो जाता है। पर दर्पण यहीं नहीं रुकता। पूछिए: मेरे जीवन का कौन सा कोना है जिसे मैंने जानबूझकर "बहुत ऊँचाई पर" टाँग रखा है, जहाँ मैं ऊपर देखना ही नहीं चाहता? पैसे का हिसाब, इंटरनेट पर अकेले बिताया समय, घर में अपनी पत्नी या बच्चों से बोलने का लहजा। अंधापन हमेशा दूसरों का नहीं होता।
आज एक कागज़ पर वह एक क्षेत्र लिखिए जिसे आपने परमेश्वर की नज़र से बाहर रखा है, और उस कागज़ को हाथ में लेकर ऊँचे स्वर में परमेश्वर के सामने उसका नाम लीजिए।
पहले सुननेवाले
जिन्होंने यह भजन पहली बार गाया, उनके लिए यह सैद्धांतिक प्रश्न नहीं था। इस्राएल में ज़मीन, कर्ज़ और अदालत के दरवाज़े पर बैठे बुज़ुर्ग, सब कुछ स्थानीय ताकतवरों के हाथ में था। अनाथ और विधवा के पास न वकील था न गवाह। और वाचा ने तो वादा किया था कि आज्ञा मानने पर आशीष और तोड़ने पर दण्ड मिलेगा। तो जब अत्याचारी का खेत लहलहाता रहे और धर्मी का घर उजड़ जाए, तो यह केवल अन्याय नहीं, यह परमेश्वर की सच्चाई पर प्रश्नचिह्न था। "तू क्यों दूर खड़ा रहता है" पद 1 की यह चीख इसी संकट से निकलती है। वे ईश्वरहीनता की शिकायत नहीं कर रहे थे, वे परमेश्वर से उनके अपने वचन की माँग कर रहे थे।
अंतर्पाठ
भजन 73 इसी दर्द को दूसरी दिशा से पकड़ता है। वहाँ आसाप दुष्टों की सुख-समृद्धि देखकर लगभग फिसल पड़ता है, जब तक वह परमेश्वर के पवित्रस्थान में नहीं जाता और उनका अंत नहीं देखता। दृष्टिकोण बदलने से तथ्य नहीं बदले, पर उनका अर्थ बदल गया। और रोमियों 3:14, जहाँ पौलुस इसी भजन के पद 7 को उद्धृत करता है, वह दूसरी दिशा खोलता है: यह चित्र केवल उनका नहीं, सबका है। दोनों मिलकर एक ही निष्कर्ष पर ले जाते हैं। न्याय आएगा, और वह इतना पूरा होगा कि यदि अनुग्रह न हो तो हममें से कोई खड़ा न रह सके।
एक बारीकी
"फुँकारता है" के पीछे का इब्रानी शब्द है पूअख़, यानी फूँक मारना, नाक से हवा छोड़ना। यह तलवार नहीं है, मुक्का भी नहीं। यह केवल एक फूँक है, तिरस्कार की सबसे सस्ती मुद्रा। विरोधी इतना तुच्छ है कि उस पर ऊर्जा खर्च करना भी ज़रूरी नहीं, बस हवा छोड़ दो। पर इसी भजन का अंतिम पद इस फूँक को लौटा देता है: "मनुष्य जो मिट्टी से बना है फिर भय दिखाने न पाए।" जो फूँक मार रहा है, वह स्वयं मिट्टी है, और उसमें जो साँस है वह उधार की है। एक दिन वह साँस वापस ली जाएगी, और जिस दीन पर उसने फूँक मारी थी, वह राजा के सिंहासन के सामने खड़ा होगा।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन में वह कौन सा क्षेत्र है जहाँ परमेश्वर के नियम आपकी "दृष्टि से बहुत दूर ऊँचाई पर" टँगे हैं, और आपने ऊपर देखना कब से बंद किया?
यदि क्रूस पर मसीह ने उस दीन का स्थान लिया जिस पर फुँकारा जाता है, तो उन लोगों के प्रति आपका रवैया कैसे बदलना चाहिए जिन्हें आप अनदेखा करने की आदत डाल चुके हैं?
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Psalms 10:5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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भजन संहिता 10:5 का क्या अर्थ है?
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भजन संहिता 10:5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
दुष्ट अपने मन में कहता है, "परमेश्वर भूल गया है; उसने अपना मुँह छिपा लिया है, वह कभी न देखेगा।" यही उसकी सबसे बड़ी भूल है। वह परमेश्वर की चुप्पी को अंधापन समझ बैठा। पर उसी भजन में आगे लिखा है, "तू ने तो देखा है।"
तू भी कभी सोचता है कि तेरे आँसू किसी ने नहीं गिने? वे गिने गए हैं। देर का मतलब भूलना नहीं होता।
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