भजन संहिता 10:1
पाठ
भजन की यह पहली पंक्ति कोई प्रार्थना की भूमिका नहीं, एक शिकायत है: "हे यहोवा तू क्यों दूर खड़ा रहता है? संकट के समय में क्यों छिपा रहता है?" कवि यह नहीं पूछता कि परमेश्वर हैं या नहीं; वह मानता है कि वे हैं, और ठीक इसीलिए उसे चोट लगती है। उसके सामने जो दृश्य है वह आगे की आयतों में खुलता है: दुष्ट अपनी अभिलाषा पर घमण्ड करता है, दीन कुचला जाता है, और आकाश चुप है। दो प्रश्न, दोनों "क्यों" से शुरू, दोनों बिना उत्तर के छोड़ दिए गए। भजनकार परमेश्वर की अनुपस्थिति का अनुभव करता है और उस अनुभव को दबाता नहीं, बल्कि सीधे परमेश्वर के सामने रख देता है।
मर्म
ध्यान दीजिए कि यह प्रश्न किसके सामने रखा गया है। नास्तिक भी यही देखता है, पर वह किसी से पूछता नहीं; वह निष्कर्ष निकाल लेता है, जैसे आयत 4 का दुष्ट: "कोई परमेश्वर है ही नहीं।" भजनकार वही दृश्य देखता है और विपरीत दिशा में मुड़ता है, परमेश्वर की ओर, नाम लेकर, "हे यहोवा", वाचा का नाम। यही इस आयत का धर्मशास्त्रीय हृदय है: संदेह जब परमेश्वर से बात करता है, तब वह अविश्वास नहीं, विश्वास का सबसे कच्चा और सबसे ईमानदार रूप होता है। और बाइबल ऐसी शिकायत को सेंसर नहीं करती, वह उसे गीतपुस्तिका में रख देती है, गाने के लिए। इसका अर्थ है कि परमेश्वर के लोगों को अपनी पीड़ा सजाकर पेश करने की ज़रूरत नहीं। वे दूर लगते हैं, यह कहना अनुमत है; वे वास्तव में दूर हैं, यह मान लेना ही पतन है।
सूत्र
इस "क्यों" का रास्ता बाइबल में बंद गली नहीं है; वह आगे जाकर एक क्रूस पर पहुँचता है। गुड फ्राइडे की दोपहर यीशु मसीह ने जो पुकार लगाई, वह उन्होंने अपने मन से नहीं गढ़ी, वह भजनसंहिता से उठाई गई शिकायत थी, ठीक इसी किस्म की: परमेश्वर, आप दूर क्यों हैं। जो परमेश्वर इस भजन में छिपे हुए लगते हैं, वे मसीह में स्वयं उस छिपाव के भीतर उतर आए, निर्दोष होकर घात में बैठे हुए लोगों के हाथों पकड़े गए, "दीन" की जगह पर खड़े हुए। इसीलिए यह भजन निराशा में नहीं, आयत 16 की घोषणा में ढलता है कि यहोवा अनन्तकाल के लिये महाराज हैं। परमेश्वर की चुप्पी अंतिम शब्द नहीं निकली; उन्होंने उत्तर शब्दों में नहीं, एक व्यक्ति में दिया।
दर्पण
आप जानते हैं वह क्षण। जिस सहकर्मी ने झूठ बोलकर आपका काम अपने नाम किया, उसी को पदोन्नति मिली। जिस रिश्तेदार ने ज़मीन हड़पी, वह रविवार को आपके आगे वाली कुर्सी पर बैठता है। जिस बच्चे के लिए आप बारह साल से प्रार्थना कर रहे हैं, उसकी हालत पहले से बदतर है। और आपने उस पर एक धार्मिक ढक्कन लगा दिया है: "परमेश्वर का समय अलग होता है।" वाक्य सच है, पर आपके मुँह में वह सच नहीं, एक पट्टी है जो घाव पर लगाई गई है ताकि किसी को दिखे नहीं। यह आयत उस ढक्कन को हटाती है। यहाँ जो ख़तरा है वह शिकायत करना नहीं, शिकायत को निगल जाना है, क्योंकि निगली हुई शिकायत भीतर ही भीतर आयत 11 के दुष्ट वाली सोच में बदल जाती है: परमेश्वर देखते ही नहीं।
आज दस मिनट निकालिए, दरवाज़ा बंद कीजिए और ज़ोर से, आवाज़ निकालकर, परमेश्वर से यही प्रश्न पूछिए, पर उसमें उस एक नाम या उस एक परिस्थिति को जोड़िए जिसे आप महीनों से प्रार्थना में टाल रहे हैं। फुसफुसाकर नहीं, सुनाई देने लायक।
श्रोता
जो लोग यह भजन मंदिर में गाते थे, उनके लिए आयत 8 का "गाँवों में घात" कोई रूपक नहीं था। वे ऐसी दुनिया में रहते थे जहाँ कानून लिखित था पर न्याय ताकतवर के हाथ में था, जहाँ अनाथ और विधवा का मुकदमा लड़ने वाला कोई नहीं था क्योंकि उनके पीछे खड़ा होने वाला कुल नहीं था। "दीन" उनके लिए एक आध्यात्मिक अवस्था से पहले एक सामाजिक वर्ग था: भूमिहीन, कर्ज़ में डूबा, कचहरी में अकेला। और परमेश्वर की "दूरी" भी उनके लिए अमूर्त नहीं थी; वाचा का वादा यही था कि परमेश्वर अपने लोगों के बीच वास करते हैं। इसलिए यह प्रश्न केवल भावना नहीं था, यह वाचा की याद दिलाना था: आपने कहा था आप पास रहेंगे।
बारीकी
"छिपा रहता है" इस भजन में दो बार आता है, और दोनों बार मुँह के इर्द-गिर्द। आयत 11 में दुष्ट अपने मन में कहता है, "वह अपना मुँह छिपाता है; वह कभी नहीं देखेगा।" वही इब्रानी क्रिया, सातर, पुराने नियम में परमेश्वर के मुख छिपाने के लिए इस्तेमाल होती है, और वह वाचा की सबसे भयानक धमकी है। अब देखिए क्या हुआ है: भजनकार और दुष्ट, दोनों एक ही तथ्य देख रहे हैं। परमेश्वर चुप हैं। दुष्ट उससे लाइसेंस निकालता है, भजनकार उससे पुकार निकालता है। एक ही अँधेरे में से दो बिल्कुल अलग ज़िंदगियाँ निकलती हैं। आपकी चुप्पी-भरी रातें आपसे यही पूछती हैं: आप उसमें से क्या निकाल रहे हैं।
शास्त्र की गूँज
हबक्कूक 1:2 में भविष्यद्वक्ता लगभग यही शब्द बोलता है, "हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दुहाई दूँगा," और परमेश्वर उसे डाँटते नहीं, उत्तर देते हैं, भले ही उत्तर उसकी अपेक्षा से अलग हो। यानी यह लहजा बाइबल में अपवाद नहीं, एक स्वीकृत परंपरा है। और इसी भजन के भीतर, आयत 7 की पंक्तियाँ पौलुस रोमियों 3 में उठाकर पूरी मानवजाति पर लागू कर देते हैं। यह थोड़ा चुभता है: जिस दुष्ट की ओर हम उँगली उठाते हैं, नया नियम कहता है कि उसका बीज हममें भी है। इसलिए आयत 1 की शिकायत के साथ आयत 14 का भरोसा पकड़े रहिए: "तूने देख लिया है।"
चिंतन के प्रश्न
आपकी प्रार्थनाओं में वह कौन सी बात है जिसे आप परमेश्वर से कहने लायक नहीं समझते, और किसने तय किया कि वह कहने लायक नहीं है?
जिस अन्याय को आप वर्षों से देख रहे हैं, उसमें से आप रोज़ क्या निकाल रहे हैं: आयत 11 वाला निष्कर्ष, या आयत 1 वाली पुकार?
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Psalms 10:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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भजन संहिता 10:1 का क्या अर्थ है?
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भजन संहिता 10:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
दुष्ट अपने मन में कहता है, "परमेश्वर भूल गया है; उसने अपना मुँह छिपा लिया है, वह कभी न देखेगा।" यही उसकी सबसे बड़ी भूल है। वह परमेश्वर की चुप्पी को अंधापन समझ बैठा। पर उसी भजन में आगे लिखा है, "तू ने तो देखा है।"
तू भी कभी सोचता है कि तेरे आँसू किसी ने नहीं गिने? वे गिने गए हैं। देर का मतलब भूलना नहीं होता।
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