भजन संहिता 10:4
पाठ
उसकी नाक ऊपर है, ठुड्डी तनी हुई, और आँखें कभी ऊपर नहीं उठतीं। वह बाज़ार से गुज़रता है जैसे ज़मीन उसकी अपनी हो। कोई उससे पूछे कि परमेश्वर के बारे में क्या सोचते हो, तो वह कंधे उचका देगा, क्योंकि सवाल ही उसके लिए बेमानी है। पद चार यही दृश्य पकड़ता है: "दुष्ट अपने अहंकार में परमेश्वर को नहीं खोजता; उसका पूरा विचार यही है कि कोई परमेश्वर है ही नहीं।" ध्यान दीजिए, यह आदमी परमेश्वर के विरुद्ध बहस नहीं कर रहा, वह तर्क नहीं दे रहा, नास्तिकता का झंडा नहीं उठाए है। वह बस खोजता नहीं। और जो खोजता नहीं, उसके मन में धीरे-धीरे यह बात घर कर जाती है कि खोजने लायक कुछ है ही नहीं।
मूल बात
यहाँ भजनकार नास्तिकता की जड़ दिमाग में नहीं, रीढ़ में खोजता है। "अपने अहंकार में" यह वाक्यांश सब कुछ तय कर देता है। जिस आदमी की गर्दन अकड़ी हुई है, वह ऊपर देख ही नहीं सकता; उसकी देह ही उसकी धर्मशास्त्र बन जाती है। बाइबल यह नहीं कहती कि पहले कोई परमेश्वर के अस्तित्व को नकारता है और फिर मनमानी करने लगता है। क्रम उल्टा है: पहले मनमानी, फिर उस मनमानी को ढाँपने के लिए एक ऐसा ब्रह्मांड गढ़ना जिसमें कोई हिसाब लेने वाला न हो। यह आत्मा की सुविधा है, बुद्धि की ईमानदारी नहीं। और इसीलिए यह पद हमें डराता है, क्योंकि चर्च जाने वाले लोग भी बिना किसी घोषणा के ठीक ऐसा ही जीवन जी सकते हैं: होंठों पर परमेश्वर, और योजनाओं में उनकी पूरी अनुपस्थिति।
जोड़ने वाला सूत्र
इस भजन की पंक्तियाँ बाइबल में दुबारा गूँजती हैं। पौलुस रोमियों के तीसरे अध्याय में इसी भजन के सातवें पद को उठाकर पूरी मानवजाति पर चिपका देता है: यह अहंकारी आदमी कोई दुर्लभ राक्षस नहीं, यह हम सबकी संभावना है। और यहीं से एक उलटफेर शुरू होता है जो सुसमाचार की धड़कन है। भजन का दुष्ट परमेश्वर को नहीं खोजता; यीशु मसीह आकर कहते हैं कि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को खोजने और बचाने आया है। खोज की दिशा पलट जाती है। जो ऊपर नहीं देख सकता था क्योंकि उसकी गर्दन अकड़ी थी, उसके पास परमेश्वर स्वयं नीचे उतरकर आते हैं। क्रूस पर वह दीन बन गए जिसकी घात में यह शिकारी बैठा था, और इसी तरह शिकारी के लिए भी द्वार खुला रह गया।
दर्पण
ईमानदारी से पूछिए: पिछले महीने आपने जो सबसे बड़ा फैसला लिया, नौकरी बदलने का, पैसा लगाने का, किसी रिश्ते को तोड़ने या जोड़ने का, उसमें परमेश्वर कहाँ थे? प्रार्थना में उनका नाम शायद आया होगा। पर क्या आपने सचमुच पूछा, या सिर्फ सूचित किया? यह पद नास्तिक पड़ोसी के बारे में कम और हमारी व्यावहारिक निरीश्वरता के बारे में ज़्यादा है: वह जीवनशैली जिसमें रविवार की आराधना पूरी ईमानदारी से होती है और सोमवार की योजना पूरी स्वायत्तता से। बजट, कैलेंडर और करियर, ये तीन जगहें सबसे साफ बताती हैं कि हम किसे खोजते हैं।
आज ही, दस मिनट के भीतर: इस हफ्ते का अपना सबसे बड़ा फैसला एक कागज़ पर लिखिए और परमेश्वर के सामने ज़ोर से कहिए, "इसमें मैंने आपसे पूछा ही नहीं," और फिर पूछिए।
एक बारीकी
"खोजता" शब्द पर रुकिए। इब्रानी में यह दारश है, वही क्रिया जो परमेश्वर से सलाह माँगने, उनकी इच्छा पूछने के लिए इस्तेमाल होती है। अब तेरहवें पद को देखिए, जहाँ दुष्ट अपने मन में कहता है, "तू लेखा न लेगा।" वहाँ भी मूल में यही क्रिया है। यानी भजनकार एक कड़वा शब्द-खेल रच रहा है: जो आदमी परमेश्वर को नहीं खोजता, वह खुद को यह भरोसा दिला लेता है कि परमेश्वर भी उसे नहीं खोजेंगे, उससे हिसाब नहीं माँगेंगे। पूछताछ से इनकार और जवाबदेही से इनकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आप जिससे सलाह नहीं लेते, आपको लगने लगता है कि वह आपका लेखा भी नहीं लेगा। भजन शांत स्वर में कहता है: यह गणित गलत है।
कठिन सवाल
पर भजन खुद एक काँटा छोड़ जाता है। पहला पद चीखता है, "हे यहोवा तू क्यों दूर खड़ा रहता है?" अगर परमेश्वर सचमुच दूर खड़े दिखते हैं, तो क्या दुष्ट का निष्कर्ष बिल्कुल बेतुका है? उसकी आँखों के सामने वही सबूत है जो पीड़ित की आँखों के सामने है: खून, चुप्पी, और कोई बिजली नहीं गिरती। फर्क विश्वास की व्याख्या का है, आँकड़ों का नहीं। भजनकार चौदहवें पद में कहता है, "तूने देख लिया है," पर यह कोई प्रमाण नहीं, यह एक विश्वास-कथन है जो अंधेरे में बोला गया है। भजन इस तनाव को सुलझाता नहीं, उसे परमेश्वर के सामने पटक देता है और माँगता है, "उठ, हे यहोवा।" कभी-कभी विश्वास यही है: जवाब न मिलने पर भी पता रहना कि पुकारना किसे है।
पृष्ठभूमि
यह कोई राजनीतिक कविता नहीं, गाँव का दृश्य है। नवें और दसवें पद की तस्वीरें, झाड़ी में छिपा सिंह, गलियों में घात, जाल में फँसा आदमी, किसी विदेशी सेना की नहीं, मोहल्ले के ताकतवर की हैं। प्राचीन इस्राएल में अनाथ और विधवा इसलिए सबसे असुरक्षित थे क्योंकि न्याय नगर के फाटक पर होता था, और वहाँ आपकी पैरवी करने के लिए एक पुरुष रिश्तेदार चाहिए था। जिसका कोई नहीं, उसका मुकदमा शुरू होने से पहले हार जाता था। कर्ज़, गिरवी रखी ज़मीन, झूठी गवाही; यही थे वे "मजबूत जाल" जिनमें लाचार गिरते थे। इस समाज में परमेश्वर ही अनाथ के एकमात्र रिश्तेदार थे, और अंतिम पद यही माँगता है कि मिट्टी से बना मनुष्य फिर डराने न पाए।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा ऐसा है जहाँ आप व्यवहार में मान बैठे हैं कि परमेश्वर हिसाब नहीं लेंगे?
आप जिन लोगों से सलाह लेते हैं, उनकी सूची में परमेश्वर किस नंबर पर आते हैं, और यह क्रम कैसे बना?
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Psalms 10:4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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भजन संहिता 10:4 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 10:4 किस विषय में है?
भजन संहिता 10:4 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन संहिता 10:4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 10:4 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
दुष्ट अपने मन में कहता है, "परमेश्वर भूल गया है; उसने अपना मुँह छिपा लिया है, वह कभी न देखेगा।" यही उसकी सबसे बड़ी भूल है। वह परमेश्वर की चुप्पी को अंधापन समझ बैठा। पर उसी भजन में आगे लिखा है, "तू ने तो देखा है।"
तू भी कभी सोचता है कि तेरे आँसू किसी ने नहीं गिने? वे गिने गए हैं। देर का मतलब भूलना नहीं होता।
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