बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 10:7

बाइबल

पाठ

एक आदमी बोल रहा है, और उसके मुँह से जो निकलता है वह शब्द कम, हथियार ज़्यादा है। भजनकार उसके होंठों पर कैमरा टिका देता है: "उसका मुँह श्राप और छल और धमकियों से भरा है; उत्पात और अनर्थ की बातें उसके मुँह में हैं।" चार चीज़ें एक साथ: श्राप, जो दूसरे का बुरा चाहता है; छल, जो मीठा बोलकर जाल बिछाता है; धमकी, जो डर से काबू करती है; और उत्पात, जो हिंसा को शब्दों में पहले से चख लेता है। यह आदमी गाली देकर भाग नहीं जाता, वह बोलता रहता है, और उसकी बातें गाँव के चौक में, बाज़ार में, अदालत के दरवाज़े पर काम करती रहती हैं। ज़रा सुनिए: गला कोई काटता नहीं, पर जीभ पहले ही काट चुकी है।

मर्म

यह आयत इंसान के मुँह को उसके दिल का दरवाज़ा मानती है। पिछली आयत में वही आदमी मन ही मन कह रहा था, "मैं कभी टलने का नहीं"; अब वही भरोसा बाहर निकलकर दूसरों पर गिरता है। जो व्यक्ति परमेश्वर का हिसाब नहीं मानता, वह अपनी जीभ को भी किसी के सामने जवाबदेह नहीं समझता। और यहीं भजन परमेश्वर के बारे में कुछ कहता है जो हमें चुभता है: वे शब्दों को गंभीरता से लेते हैं। जहाँ हम कहते हैं "सिर्फ़ बात ही तो थी," वहाँ परमेश्वर उत्पीड़न देखते हैं (पद 14)। दीन को तोड़ने के लिए हमेशा मुक्का नहीं चाहिए; एक अफ़वाह, एक झूठा वादा, एक धमकी भरा फ़ोन काफ़ी है। बाइबल की भाषा में यह सिर्फ़ बदतमीज़ी नहीं, न्याय का मामला है।

सूत्र

भजन 10 का यह चेहरा बाइबल में बार-बार लौटता है, और अंत में यह हमारी ओर मुड़ जाता है। पौलुस ने रोमियों 3 में मनुष्य की हालत का जो काला चिट्ठा बनाया, उसमें उन्होंने इसी आयत को उठाकर रख दिया: शाप से भरा मुँह अब "दुष्ट" की नहीं, हर आदमी की पहचान है। यह भजन का अपहरण नहीं, उसका खुलासा है। हम दूर खड़े होकर उस अत्याचारी को कोसते हैं, जबकि उसकी जीभ का बीज हमारी अपनी जीभ में दबा पड़ा है। और इसी बिंदु पर मसीह खड़े होते हैं: वह एक मुँह जिसमें छल नहीं निकला, जिसने गाली सुनकर गाली नहीं लौटाई, और जो क्रूस पर शाप स्वयं अपने ऊपर ले गया ताकि हमारी जीभ का हिसाब चुकाया जाए।

दर्पण

यह आयत आपको गुंडे के साथ नहीं, दफ़्तर और घर के साथ जोड़ती है। वह वाक्य जो आपने मीटिंग में किसी सहकर्मी के बारे में हँसते हुए कहा, जिससे उसकी साख आधी रह गई। वह सौदा जहाँ आपने पूरा सच नहीं बोला, क्योंकि अधूरा सच कानूनी था। वह चुप्पी भरी धमकी घर में: "ठीक है, जैसा तुम्हें ठीक लगे," जिसका असली मतलब सब जानते हैं। हम शब्दों को हल्का मानते हैं क्योंकि उनसे खून नहीं बहता। परमेश्वर उन्हें हथियार मानते हैं, और लाचार को वही हथियार कुचलता है। आज, दिन खत्म होने से पहले, उस एक व्यक्ति को एक छोटा संदेश भेजिए जिसके बारे में आपने पिछले हफ़्ते कुछ ऐसा कहा था जो आधा सच था, और उसमें सिर्फ़ इतना लिखिए कि आपने क्या गलत कहा।

सवाल

पर सवाल बचा रहता है, और भजनकार खुद उसे पूछता है: "हे यहोवा तू क्यों दूर खड़ा रहता है?" अगर परमेश्वर शब्दों को इतनी गंभीरता से लेते हैं, तो वे चुप क्यों रहते हैं जब झूठ बोलने वाला पदोन्नति पाता है और सच बोलने वाला नौकरी खोता है? भजन इसका कोई साफ़ जवाब नहीं देता। वह सिर्फ़ दो बातें साथ रखता है: दुष्ट कहता है "परमेश्वर भूल गया," और भजनकार कहता है "तूने देख लिया है।" दोनों के बीच कोई तारीख नहीं दी गई, कोई समय-सारणी नहीं। विश्वास यहाँ यह नहीं कि हमें पता है कब; विश्वास यह है कि हम उस चुप्पी को अनुपस्थिति पढ़ने से इनकार कर देते हैं।

शास्त्र की गूँज

याकूब की पत्री में जीभ को आग कहा गया है, एक छोटा अंग जो पूरे जंगल को जला देता है, और याकूब जोड़ते हैं कि उसी मुँह से हम परमेश्वर को धन्य कहते हैं और मनुष्य को शाप देते हैं। वह भजन 10 के अत्याचारी को कलीसिया की बैठक में ले आता है। दूसरी ओर इसी भजन का अंत एक और गूँज देता है: "अनाथ और पिसे हुए का न्याय करे, ताकि मनुष्य जो मिट्टी से बना है फिर भय दिखाने न पाए।" जिसका मुँह धमकियों से भरा है, वह भी मिट्टी है। यही भजन का आख़िरी तीर है: डराने वाला खुद धूल भर है, और धूल सदा नहीं बोलती।

पृष्ठभूमि

यह भजन किसी राजमहल की दूर की राजनीति नहीं, गाँव की ज़मीनी हकीकत है। पद 8 कहता है वह "गाँवों में घात में बैठा करता है।" प्राचीन इस्राएल में न्याय नगर के फाटक पर होता था, जहाँ बुज़ुर्ग बैठते और गवाहों के शब्दों से फ़ैसला होता था। वहाँ जिसकी ज़बान चलती, उसी का मुकदमा चलता। विधवा और अनाथ के पास न ज़मीन का रक्षक था, न बोलने वाला रिश्तेदार, इसलिए एक झूठा गवाह उनका खेत छीन सकता था। इस दुनिया में शब्द कागज़ी नहीं, कानूनी थे। इसीलिए भजनकार परमेश्वर से हाथ बढ़ाने को कहता है: जहाँ अदालत खरीदी जा चुकी है, वहाँ अपील सिर्फ़ ऊपर की जा सकती है।

चिंतन

पिछले सात दिनों में आपके मुँह से निकला कौन-सा वाक्य आप चाहेंगे कि कोई रिकॉर्डिंग न हो, और वह किसके बारे में था?

आपके आसपास कौन ऐसा है जिसके पास अपने बचाव में बोलने वाला कोई नहीं, और इस हफ़्ते आपकी जीभ उसके लिए क्या कर सकती है?

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Psalms 10:7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 10:7 का क्या अर्थ है?
एक आदमी बोल रहा है, और उसके मुँह से जो निकलता है वह शब्द कम, हथियार ज़्यादा है। भजनकार उसके होंठों पर कैमरा टिका देता है: "उसका मुँह श्राप और छल और धमकियों से भरा है; उत्पात और अनर्थ की बातें उसके मुँह में हैं।" चार चीज़ें एक साथ: श्राप, जो दूसरे का बुरा चाहता है; छल, जो मीठा बोलकर जाल बिछाता है; धमकी, जो डर से काबू करती है; और उत्पात, जो हिंसा को शब्दों में पहले से चख लेता है। यह आदमी गाली देकर भाग नहीं जाता, वह बोलता रहता है, और उसकी बातें गाँव के चौक में, बाज़ार में, अदालत के दरवाज़े पर काम करती रहती हैं। ज़रा सुनिए: गला कोई काटता नहीं, पर जीभ पहले ही काट चुकी है।
भजन संहिता 10:7 किस विषय में है?
भजन 10 का यह चेहरा बाइबल में बार-बार लौटता है, और अंत में यह हमारी ओर मुड़ जाता है। पौलुस ने रोमियों 3 में मनुष्य की हालत का जो काला चिट्ठा बनाया, उसमें उन्होंने इसी आयत को उठाकर रख दिया: शाप से भरा मुँह अब "दुष्ट" की नहीं, हर आदमी की पहचान है। यह भजन का अपहरण नहीं, उसका खुलासा है। हम दूर खड़े होकर उस अत्याचारी को कोसते हैं, जबकि उसकी जीभ का बीज हमारी अपनी जीभ में दबा पड़ा है। और इसी बिंदु पर मसीह खड़े होते हैं: वह एक मुँह जिसमें छल नहीं निकला, जिसने गाली सुनकर गाली नहीं लौटाई, और जो क्रूस पर शाप स्वयं अपने ऊपर ले गया ताकि हमारी जीभ का हिसाब चुकाया जाए।
भजन संहिता 10:7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पर सवाल बचा रहता है, और भजनकार खुद उसे पूछता है: "हे यहोवा तू क्यों दूर खड़ा रहता है?" अगर परमेश्वर शब्दों को इतनी गंभीरता से लेते हैं, तो वे चुप क्यों रहते हैं जब झूठ बोलने वाला पदोन्नति पाता है और सच बोलने वाला नौकरी खोता है? भजन इसका कोई साफ़ जवाब नहीं देता। वह सिर्फ़ दो बातें साथ रखता है: दुष्ट कहता है "परमेश्वर भूल गया," और भजनकार कहता है "तूने देख लिया है।" दोनों के बीच कोई तारीख नहीं दी गई, कोई समय-सारणी नहीं। विश्वास यहाँ यह नहीं कि हमें पता है कब; विश्वास यह है कि हम उस चुप्पी को अनुपस्थिति पढ़ने से इनकार कर देते हैं।
भजन संहिता 10:7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यह भजन किसी राजमहल की दूर की राजनीति नहीं, गाँव की ज़मीनी हकीकत है। पद 8 कहता है वह "गाँवों में घात में बैठा करता है।" प्राचीन इस्राएल में न्याय नगर के फाटक पर होता था, जहाँ बुज़ुर्ग बैठते और गवाहों के शब्दों से फ़ैसला होता था। वहाँ जिसकी ज़बान चलती, उसी का मुकदमा चलता। विधवा और अनाथ के पास न ज़मीन का रक्षक था, न बोलने वाला रिश्तेदार, इसलिए एक झूठा गवाह उनका खेत छीन सकता था। इस दुनिया में शब्द कागज़ी नहीं, कानूनी थे। इसीलिए भजनकार परमेश्वर से हाथ बढ़ाने को कहता है: जहाँ अदालत खरीदी जा चुकी है, वहाँ अपील सिर्फ़ ऊपर की जा सकती है।
भजन संहिता 10:7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके आसपास कौन ऐसा है जिसके पास अपने बचाव में बोलने वाला कोई नहीं, और इस हफ़्ते आपकी जीभ उसके लिए क्या कर सकती है?
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Psalms 10 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 11

दुष्ट अपने मन में कहता है, "परमेश्वर भूल गया है; उसने अपना मुँह छिपा लिया है, वह कभी न देखेगा।" यही उसकी सबसे बड़ी भूल है। वह परमेश्वर की चुप्पी को अंधापन समझ बैठा। पर उसी भजन में आगे लिखा है, "तू ने तो देखा है।"

तू भी कभी सोचता है कि तेरे आँसू किसी ने नहीं गिने? वे गिने गए हैं। देर का मतलब भूलना नहीं होता।

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