भजन संहिता 126:1
पाठ
कल्पना कीजिए: सत्तर साल बाद सिय्योन की ओर लौटती धूल भरी सड़क, और पैरों के नीचे वही पथरीली मिट्टी जिसके बारे में दादा-दादी ने कहानियाँ सुनाई थीं। भजन की पहली पंक्ति ठीक उसी क्षण को पकड़ती है: "जब यहोवा सिय्योन में लौटनेवालों को लौटा ले आया, तब हम स्वप्न देखनेवाले से हो गए।" यह कोई विजय-घोषणा नहीं है, बल्कि एक चकित, आँखें मलती हुई गवाही है। लौटना इतना असंभव था कि जब वह हुआ, तो सच्चा नहीं लगा। कर्ता कौन है, इस पर ध्यान दें: लौटानेवाले यहोवा हैं, लौटनेवाले तो केवल लौटे। और लोगों की पहली प्रतिक्रिया जयजयकार नहीं, अविश्वास है, वह मीठा अविश्वास जो अगले पद में हँसी बनकर फूट पड़ता है।
मर्म
यहाँ परमेश्वर के बारे में एक बात कही जा रही है जो हमारे धर्मशास्त्र के ढाँचों से पहले हमारे शरीर में महसूस होती है: वे ऐसा करते हैं जिसकी हमने प्रार्थना करना भी लगभग छोड़ दिया था। बन्धुआई ईश्वर के न्याय का परिणाम थी, यह इस्राएल जानता था। इसलिए वापसी कोई हक़ नहीं, कोई अर्जित पुरस्कार नहीं, शुद्ध अनुग्रह थी। और अनुग्रह की पहचान यही है कि वह हमें हक्का-बक्का छोड़ देता है। ध्यान दें, भजनकार यह नहीं कहता कि "हमने विश्वास किया और परमेश्वर ने पूरा किया", बल्कि यह कि हम स्वप्न देखनेवालों जैसे हो गए। उद्धार हमारी अपेक्षाओं से बड़ा होता है, और इसीलिए जब वह आता है, तो वह हमारी छोटी-छोटी गणनाओं को तोड़कर हमें आनंद में धकेल देता है, न कि आत्म-संतोष में।
सूत्र
यह अचंभा बाइबल की कहानी में एक ही आकार में बार-बार लौटता है। लाल समुद्र के किनारे इस्राएल गाता है, बन्धुआई से लौटे लोग आँखें मलते हैं, और खाली कब्र के सामने स्त्रियाँ काँपती हुई भागती हैं। परमेश्वर का उद्धार हमेशा हमारी कल्पना से आगे निकल जाता है, इसलिए पहली प्रतिक्रिया अक्सर भाषा का लड़खड़ाना होती है। और ध्यान दीजिए, यह भजन अपनी खुशी पर रुकता नहीं; पद 4 में वही लोग प्रार्थना करते हैं, "हे यहोवा… हमारे बन्दियों को लौटा ले आ!" वापसी हो चुकी थी, फिर भी अधूरी थी। खंडहर, छोटा मन्दिर, कमज़ोर शहर। यही अधूरापन मसीह की ओर इशारा करता है, जिसने इसी भजन के अंत को अपनी शिक्षा में उठा लिया: रोनेवाले हँसेंगे, यह वादा क्रूस और पुनरुत्थान के बाद ही पूरी तरह भरोसेमंद हो पाता है।
दर्पण
ईमानदारी से पूछिए: कौन सी प्रार्थना आपने चुपचाप छोड़ दी है? वह बेटा जो अब फोन नहीं उठाता, वह विवाह जो सालों से ठंडा है, वह रिपोर्ट जो डॉक्टर के पास से आई और सब बदल गया, वह नौकरी जिसकी तलाश इतनी लंबी हो गई कि आपने आवेदन भेजना बंद कर दिया। हम "भरोसा" करना नहीं छोड़ते, हम उम्मीद करना छोड़ देते हैं, और फिर उसे परिपक्वता कह देते हैं। यह भजन उस समझदार निराशा को चुनौती देता है। लौटनेवालों ने अपनी वापसी की योजना नहीं बनाई थी; उन्होंने केवल उसे जिया, और हक्के-बक्के रह गए। आज एक काम करें: कागज़ पर वह एक प्रार्थना लिखिए जिसे आपने छोड़ दिया था, और उसे ज़ोर से, शब्दों में, परमेश्वर के सामने एक बार कह दीजिए।
अंतर्पाठ
लूका 24 में जी उठे यीशु अपने चेलों के बीच खड़े हैं, और लिखा है कि आनंद के मारे वे विश्वास नहीं कर पा रहे थे। यह ठीक वही मनोदशा है जो भजन 126 के पहले पद में है: खुशी इतनी बड़ी कि मन उसे सँभाल न पाए। और प्रेरितों के काम 12 में पतरस जेल से बाहर निकलता है और सोचता है कि वह दर्शन देख रहा है; छूटने के बीचोंबीच वह अपने छूटने पर विश्वास नहीं कर पाता। मैं ये दोनों जगहें इसलिए जोड़ता हूँ क्योंकि वे दिखाती हैं कि "स्वप्न देखनेवाले से हो जाना" कमज़ोर विश्वास का लक्षण नहीं है। यह उस मनुष्य की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जिसके सामने परमेश्वर अपनी शक्ति में अचानक खड़े हो जाते हैं।
प्रश्न
पर कुछ लोग कभी नहीं लौटे। जो बूढ़े बाबेल की मिट्टी में दफ़न हो गए, जिन्होंने सत्तर साल तक सिय्योन के गीत गाए और कभी उसकी दीवार नहीं देखी, उनके लिए यह पद क्या कहता है? भजन इस सवाल का उत्तर नहीं देता, और मैं उसे चिकना करके आपको नहीं परोसूँगा। यह गीत बचे हुए लोगों का गीत है, और हर बचा हुआ जानता है कि उसके साथ कोई नहीं बचा। यही कारण है कि पद 4 की प्रार्थना ज़रूरी है: लौटना शुरू हो चुका है, पूरा नहीं हुआ। विश्वास का अर्थ यह मान लेना नहीं है कि हर कहानी हमारे जीवनकाल में हँसी पर खत्म होगी। अर्थ यह है कि परमेश्वर ने लौटाना शुरू किया है, और वे अधूरा काम छोड़नेवाले नहीं हैं।
विवरण
इब्रानी में पहली पंक्ति में एक ही शब्द दो बार गूँजता है, शूव (shuv), यानी "लौटना"। परमेश्वर लौटनेवालों का लौटना लौटाते हैं। अनुवाद में यह दोहराव भारी लगता है, इसलिए वह अक्सर छिप जाता है, पर वह पूरे पद की धुरी है। यही शब्द भविष्यद्वक्ता तब इस्तेमाल करते हैं जब वे इस्राएल को पश्चाताप के लिए बुलाते हैं, "परमेश्वर की ओर लौट आओ"। यहाँ दोनों अर्थ एक-दूसरे में बुन जाते हैं: लोग लौटते हैं क्योंकि परमेश्वर ने पहले उन्हें लौटाया। हमारा हर कदम उनकी पहल का प्रतिध्वनि है। अनुग्रह का व्याकरण इससे साफ़ कहीं नहीं दिखता, और इसीलिए यह पद आत्म-प्रशंसा की कोई जगह नहीं छोड़ता, केवल चकित हँसी की।
चिंतन
वह कौन सी उम्मीद है जिसे मैंने "व्यावहारिक" होने के नाम पर दफ़ना दिया, और क्या मैं उसे फिर परमेश्वर के सामने रखने को तैयार हूँ?
अगर परमेश्वर ने मेरे जीवन में कुछ लौटाया है, तो क्या मैं उसे अपनी समझदारी का फल मानता हूँ या अब भी उस पर चकित हो पाता हूँ?
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Psalms 126:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Psalms 126 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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