भजन संहिता 126:3
पाठ
तीसरा पद पूरे भजन का वह वाक्य है जिसे गाने वाले दो बार कहते हैं, पर दूसरी बार दूसरे मुँह से। पद 2 में यह बात जाति-जाति के लोगों के मुँह में थी: "यहोवा ने, इनके साथ बड़े-बड़े काम किए हैं।" पद 3 में इस्राएल वही वाक्य अपने होंठों पर उठा लेता है, केवल सर्वनाम बदलकर: "यहोवा ने हमारे साथ बड़े-बड़े काम किए हैं।" बाहर वालों ने जो देखा, उसे भीतर वाले स्वीकार करते हैं, और उसमें एक पंक्ति जोड़ देते हैं जो कोई पड़ोसी नहीं जोड़ सकता था: "और इससे हम आनन्दित हैं।" गवाही पहले बाहर से आई, फिर भीतर उतरकर आनन्द बन गई।
मर्म
ध्यान दीजिए कि इस पद में क्रिया किसकी है। कर्ता एक ही है, यहोवा; इस्राएल केवल वह जगह है जहाँ काम हुआ, "हमारे साथ"। लौटने वालों ने खुद को लौटाया नहीं; उन्होंने कुस्रू को राज़ी नहीं किया, न ही सिय्योन तक का रास्ता अपनी ताक़त से खोला। इसीलिए पद 1 में वे "स्वप्न देखनेवाले" जैसे हैं, यानी जो हो रहा है वह उनके अपने हिसाब-किताब से बड़ा है। यहीं अनुग्रह की व्याकरण दिखती है: परमेश्वर करते हैं, हम अनुभव करते हैं, और फिर आनन्द मनाते हैं। आनन्द यहाँ कोई आज्ञा या कर्तव्य नहीं है, वह परिणाम है। पहले उद्धार का तथ्य, फिर हृदय की प्रतिक्रिया। जो इस क्रम को उलट देता है, वह खुशी को खुद पैदा करने की थकाऊ मेहनत में फँस जाता है।
सूत्र
इस पद का वाक्य इस्राएल का अपना आविष्कार नहीं है। "बड़े-बड़े काम" कहना मिस्र से निकलने की भाषा है; व्यवस्थाविवरण में मूसा इस्राएल से बार-बार यही कहता है कि जो कुछ तेरी आँखों ने देखा, वह परमेश्वर का काम था। बंधुआई से लौटने वाले जब यह वाक्य उठाते हैं, तो वे नए शब्द नहीं गढ़ते, वे पुराने उद्धार की शब्दावली दूसरी बार इस्तेमाल करते हैं। यही परमेश्वर के काम करने का ढंग है: वे एक ही कहानी को नए हालात में दोहराते हैं, हर बार पहले से बड़ी करके। लाल समुद्र, फिर फरात नदी पार, और अन्त में एक खाली कब्र। मसीह का पुनरुत्थान इसी पंक्ति का आख़िरी और सबसे गहरा छोर है, जहाँ लौटना केवल देश में नहीं, मृत्यु से जीवन में होता है।
दर्पण
हम में से बहुत लोग अपने जीवन की गवाही सावधानी से देते हैं। नौकरी बच गई, रिपोर्ट सामान्य आई, टूटा रिश्ता फिर जुड़ा, और हम कहते हैं, "बस, समय पर बात बन गई।" पद 3 इस सतर्क भाषा को तोड़ता है। यह भजन गाने वाले जानते थे कि सिय्योन खंडहर था और लौटना असम्भव जैसा लगता था, फिर भी उन्होंने घटना का श्रेय साफ़ नाम को दिया। दूसरी ओर एक अलग डर भी है: अगर मैं कहूँ कि परमेश्वर ने बड़े काम किए, तो उन दिनों का क्या जब कुछ नहीं हुआ? इसीलिए भजन पद 4 में तुरन्त फिर माँगता है। आनन्द और अधूरापन यहाँ साथ-साथ रहते हैं। आज कागज़ के एक टुकड़े पर वह एक बात लिखिए जो पिछले साल आपके साथ हुई और जो आपकी ताक़त से बाहर थी, और उसके नीचे यह वाक्य ज़ोर से बोलिए: "यहोवा ने हमारे साथ बड़े-बड़े काम किए हैं।"
अन्तर्पाठ
मरियम के गीत में यही वाक्य दोबारा सुनाई देता है। लूका 1 में वह कहती है कि शक्तिमान ने उसके लिए बड़े-बड़े काम किए हैं, और तुरन्त बिखरे हुए घमंडियों, गिराए गए राजाओं और भरे गए भूखों की बात करती है। एक गाँव की लड़की भजन 126 का "हमारे साथ" अपने शरीर पर लागू कर लेती है; बंधुआई से लौटना अब गर्भ में उतर आया है। दूसरी ओर पद 6 के साथ इस भजन में स्वयं लूका 6:21 का संदर्भ दिया गया है, जहाँ यीशु कहते हैं कि जो अब रोते हैं वे हँसेंगे। यानी पद 3 का बीता हुआ काल और पद 5 का भविष्य काल मसीह में एक ही धागे के दो सिरे निकलते हैं: जो हो चुका, वही ज़मानत है उसकी जो अभी होना बाकी है।
श्रोता
जो लोग यह गाते थे, उन्होंने बंधुआई अपनी आँखों से देखी थी या अपने माता-पिता से सुनी थी। उनके लिए "जाति-जाति के बीच" की बात कोरी कविता नहीं थी; वे सचमुच ऐसे लोगों के बीच रहे थे जो पूछते थे कि तुम्हारा परमेश्वर कहाँ है, जिसका मन्दिर जल गया। इसलिए पद 2 में विदेशियों का यह स्वीकार करना कि यहोवा ने कुछ किया है, उनके लिए केवल तारीफ़ नहीं, बल्कि सार्वजनिक बरी होना था। परमेश्वर की इज़्ज़त लौट आई, और उनकी अपनी इज़्ज़त उसी के साथ। जब वे पद 3 में वही वाक्य दोहराते हैं, तो आवाज़ में शायद कुछ काँपता भी है, क्योंकि लौटा हुआ यरूशलेम अब भी छोटा, गरीब और असुरक्षित था।
पृष्ठभूमि
यह गीत "यात्रा का गीत" है, तीर्थ पर चढ़ते हुए गाया जाने वाला। पृष्ठभूमि फारसी काल है, कुस्रू की घोषणा के बाद का समय, जब कुछ हज़ार लोग बाबुल से यहूदिया लौटे। एज्रा की पुस्तक बताती है कि जब मन्दिर की नींव रखी गई तो कुछ लोग जयजयकार कर रहे थे और बुज़ुर्ग ऊँचे स्वर से रो रहे थे, और शोर में दोनों आवाज़ें अलग नहीं की जा सकती थीं। वही मिश्रण इस भजन में है। लौटने वाले किसी साम्राज्य के मालिक नहीं थे, वे एक बड़े राज्य के छोटे प्रान्त में बसे गरीब किसान थे, जिनके पड़ोसी दोस्ताना नहीं थे। उसी हालत में वे कहते हैं कि बड़े काम हो चुके हैं, और अगली साँस में और माँगते हैं।
मनन
आपकी अपनी कहानी में वह कौन-सा काम है जिसे आप "संयोग" कहकर हल्का कर देते हैं, और उसे परमेश्वर का नाम देने में आपको क्या रोकता है?
पद 3 का आनन्द और पद 4 की पुकार एक ही मुँह से निकलते हैं; आप किस अधूरी बात के लिए आज धन्यवाद और विनती दोनों साथ रख सकते हैं?
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