स्थिर रहो · शुक्रवार, सितम्बर 18, 2026

आँसुओं में उद्धार का भजन

आँसू और उद्धार

आज 2 मिनट का पठन 4 बाइबिल के अंश

शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए निर्गमन 15:2, यूहन्ना 20:15, यूहन्ना 20:15 and भजन संहिता 51:7.

☀ सुबह का पल

यहोवा मेरा बल और भजन का विषय है, और वही मेरा उद्धार भी ठहरा है; मेरा परमेश्वर वही है, मैं उसी की स्तुति करूँगा, (मैं उसके लिये निवास-स्थान बनाऊँगा), मेरे पूर्वजों का परमेश्वर वही है, मैं उसको सराहूँगा।

निर्गमन 15:2

पैरों के तलवों में अभी भी गीली रेत और नमक की परत लगी थी। रात भर की भागदौड़ के बाद कपड़े अब भी भीगे थे, और पीछे मुड़कर देखने पर दूर किनारे पर मिस्री रथों के पहिये कीचड़ में धँसे दिखते थे। ठीक उसी सुबह, जब अभी कोई तंबू नहीं गड़ा था, कोई रोटी नहीं पकी थी, इस्राएल ने अपना पहला गीत गाया।

यह बाइबल का सबसे पहला दर्ज गीत है। कोई ठहरा हुआ आराधना स्थल नहीं, कोई तैयार धुन नहीं, बस एक कौम जो कल तक गुलाम थी और आज सुबह मुक्त खड़ी है। और वे योजना नहीं बनाते, वे गाते हैं।

गीत का बहाव देखने लायक है। यह मूसा और लोगों की जीत से शुरू नहीं होता, बल्कि यहोवा के बल से शुरू होता है, फिर उद्धार तक पहुँचता है, और अंत में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जुड़ जाता है, 'मेरे पिता का परमेश्वर।' यानी यह गीत केवल आज की राहत नहीं गाता, यह उस विश्वास की डोर को भी थामे रहता है जो पीढ़ियों से चली आ रही है।

आज की सुबह भी वैसी ही हो सकती है, जहाँ रेगिस्तान अभी सामने खड़ा है, पानी अभी नहीं मिला, रास्ता अभी साफ नहीं। पर गीत योजना बनने से पहले भी गाया जा सकता है। यह विश्वास की पहली भाषा है, हिसाब की नहीं।

आज
आज घर से निकलने से पहले, ऊँची आवाज़ में यह एक वाक्य बोल दें, 'यहोवा मेरा बल और गीत है, वही मेरा उद्धार बना है।' इसे लिख भी लें और जेब में रख लें।

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✦ दोपहर का पल

यीशु ने उससे कहा, “हे नारी तू क्यों रोती है? किसको ढूँढ़ती है?” उसने माली समझकर उससे कहा, “हे श्रीमान, यदि तूने उसे उठा लिया है तो मुझसे कह कि उसे कहाँ रखा है और मैं उसे ले जाऊँगी।”

यूहन्ना 20:15

दुःख इतना गहरा हो सकता है कि वह परमेश्वर को भी पहचानने से रोक दे।

मरियम मगदलीनी सुबह अंधेरे में उस बगीचे में आई, जहां यीशु को गाड़ा गया था। यरूशलेम के बाहर वह कब्र एक बगीचे में थी, और सुबह-सुबह वहां माली का दिखना कोई असामान्य बात नहीं थी। इसलिए जब मरियम ने पीछे मुड़कर एक आकृति देखी, तो उसने सबसे स्वाभाविक अनुमान लगाया, यही सोचा कि यह माली होगा। उसकी आंखें आंसुओं से भरी थीं, उसका मन शोक से भारी था। जो सामने खड़ा था, वह जीवित प्रभु था, पर उसकी पीड़ा ने उसकी नज़र को धुंधला कर दिया था।

यह उसका दोष नहीं था। शोक ऐसा ही करता है, वह सबसे स्पष्ट सच्चाई को भी ओझल कर देता है। मरियम ने उसे तब तक नहीं पहचाना जब तक यीशु ने उसका नाम नहीं पुकारा। एक शब्द, और आंखें खुल गईं।

दोपहर का समय ऐसा है जब काम, फोन, बातचीत सब कुछ धुंधला कर सकता है। हो सकता है यीशु आज भी वहीं खड़े हों, जहां हम उन्हें पहचानने की उम्मीद ही नहीं करते।

आज
आज दोपहर भोजन के बीच एक मिनट के लिए आंखें बंद करें और अपना नाम धीरे से बोलें, जैसे यीशु आपको बुला रहे हों, और चुपचाप सुनें।

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◐ दोपहर का पल

यीशु ने उससे कहा, “हे नारी तू क्यों रोती है? किसको ढूँढ़ती है?” उसने माली समझकर उससे कहा, “हे श्रीमान, यदि तूने उसे उठा लिया है तो मुझसे कह कि उसे कहाँ रखा है और मैं उसे ले जाऊँगी।”

यूहन्ना 20:15

आंसुओं से धुंधली आँखें एक साये को पहचान नहीं पातीं। मरियम झुककर कब्र में देख चुकी है, वह खाली मिली है, और अब वह बगीचे में खड़े एक पुरुष को देख रही है, माली समझकर। उसके हाथ में शायद फावड़ा नहीं था, बस एक सवाल था जो उसकी अपनी पीड़ा से निकला। कोई शरीर उठा ले गया, और वह उसे वापस चाहती है।

यह कोई साधारण भूल नहीं। जोसेफ का यह बगीचा वही जगह थी जहाँ यीशु को दफनाया गया था, नई कब्र, कभी इस्तेमाल न हुई। बगीचों में माली होते ही हैं, तर्क साफ था। पर उसका दुख इतना गहरा था कि जीवित यीशु उसके सामने खड़ा था और वह उसमें केवल एक अजनबी देख पाई।

यही चीज़ चुभती है। कभी-कभी हम भी किसी को ढूंढ़ते रहते हैं जो हमारे सामने ही खड़ा होता है, बस दूसरे रूप में, दूसरे समय पर, दूसरे तरीके से जिसकी हमने उम्मीद नहीं की थी। दुख अपनी ही तस्वीरें बना लेता है, और असली चेहरा उनके पीछे छिप जाता है।

मरियम की भूल शर्मनाक नहीं थी, वह ईमानदार थी। वह वहीं रुकी रही जब बाकी चले गए। कभी-कभी पहचान भूल के बाद ही आती है, नाम पुकारे जाने के बाद।

आज
आज किसी एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखो जिसे तुमने हाल में गलत समझा या नज़रअंदाज़ किया, और उसके लिए ज़ोर से एक वाक्य में प्रार्थना करो।

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☾ संध्या का क्षण

जूफा से मुझे शुद्ध कर, तो मैं पवित्र हो जाऊँगा; मुझे धो, और मैं हिम से भी अधिक श्वेत बनूँगा।

भजन संहिता 51:7

नातान की बात सुनने के बाद उस रात दाऊद की नींद उड़ गई थी। जो उसने बतशेबा और ऊरिय्याह के साथ किया था, वह भार अब उसकी छाती पर बैठा था, और वह किसी बड़े यज्ञ या भव्य वचन की माँग नहीं करता, वह एक छोटी सी जड़ी-बूटी माँगता है, जूफा।

जूफा कोई शानदार पौधा नहीं है। यह दीवारों की दरारों में, चट्टानों के बीच उगने वाली एक साधारी झाड़ी है, इतनी मामूली कि उसे देवदार के पेड़ के बिलकुल विपरीत गिना जाता था। पर यही मामूली पौधा मिस्र की रात में चुना गया, जब उसके गुच्छे से मेमने का लहू द्वारों की चौखट पर लगाया गया, और वही पौधा उन दिनों शुद्धि के जल को छिड़कने के काम आता था। और सदियों बाद क्रूस पर, यही जूफा वह लकड़ी बनी जिस पर सिरका लगा स्पंज टिका कर यीशु के होंठों तक पहुँचाया गया।

दाऊद इसी पौधे का नाम लेता है क्योंकि वह जानता है, उसकी सफाई किसी बड़े काम से नहीं, परमेश्वर की दया से ही आती है। एक छोटी चीज़, बड़े काम के लिए काफी है, जब वह परमेश्वर के हाथ में हो।

आज
आज रात, जो कुछ भी तुझे भीतर से भारी कर रहा है, उसे शब्दों में कह और अपने हाथ पानी से धो, धीरे धीरे, और मन में यही प्रार्थना दोहरा, मुझे धो, तब मैं हिम से भी उजला हो जाऊँगा।

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