स्थिर रहो · शुक्रवार, अक्टूबर 2, 2026

जब विश्वास परखा जाता है

विश्वास और क्षमा

आज 2 मिनट का पठन 4 बाइबिल के अंश

शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए हबक्कूक 3:17-18, उत्पत्ति 4:10, मत्ती 16:15-16 and मत्ती 18:32-33.

☀ सुबह का पल

क्योंकि चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें, और न दाखलताओं में फल लगें, जैतून के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए और खेतों में अन्न न उपजे, भेड़शालाओं में भेड़-बकरियाँ न रहें, और न थानों में गाय बैल हों, (लूका 13:6) तो भी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहूँगा, और अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर के द्वारा अति प्रसन्न रहूँगा

हबक्कूक 3:17-18

हबक्कूक एक-एक करके चीज़ें गिनाता है। अंजीर का पेड़, दाखलता, जैतून, खेत, भेड़-बकरियाँ, गोशाला का पशु। वह यह नहीं कहता कि 'सब कुछ चला जाए तो भी', वह हर एक चीज़ का नाम लेता है, जैसे वह उन्हें आखिरी बार देख रहा हो। यह गिनती आसान नहीं थी, यही तो उसकी रोज़ी-रोटी थी।

यह प्रार्थना ऐसे समय लिखी गई जब बाबुल की सेना द्वार पर खड़ी थी। हबक्कूक ने पहले परमेश्वर से शिकायत की थी, अन्याय क्यों चलता रहता है, हिंसा का जवाब कब मिलेगा। परमेश्वर ने उत्तर दिया कि दंड आएगा, पर रुककर। यह आखिरी अध्याय उस लंबी बहस के बाद का गीत है, जब फसल कटने से पहले ही उसे पता था कि इस बार खलिहान खाली रहेगा।

फिर भी वह यह साहस करता है, कि रोटी न होने पर भी परमेश्वर में आनंद होगा। यह भावना नहीं, निर्णय है। वह अपने हालात को झुठलाता नहीं, बल्कि अपने परमेश्वर को हालात से बड़ा मानता है।

आज की सुबह भी शायद किसी खाली खलिहान जैसी लगे, कोई योजना टूटी हो, कोई उम्मीद अधूरी रह गई हो। हबक्कूक की तरह उसे नाम देना सीखना ही पहला कदम है, फिर उसी साँस में परमेश्वर की ओर मुड़ना।

आज
आज एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिखें जो अभी खाली या अधूरी लगती है, और नीचे यह वाक्य लिख दें, 'फिर भी मैं यहोवा में आनंदित रहूँगा।'

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✦ दोपहर का पल

उसने कहा, “तूने क्या किया है? तेरे भाई का लहू भूमि में से मेरी ओर चिल्लाकर मेरी दुहाई दे रहा है! (इब्रा. 12:24)

उत्पत्ति 4:10

जो सवाल बचाव के लिए पूछा जाता है, वही अक्सर सबसे ज्यादा उजागर कर देता है।

यहोवा ने कायिन से पूछा, तेरा भाई हाबिल कहां है? कायिन का उत्तर था, क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूं? यह सवाल सीधे झूठ से भी ज्यादा खतरनाक था, क्योंकि इसमें छिपकर इनकार था। एक हत्या को प्रश्नचिह्न के पीछे छुपाने की कोशिश।

हाबिल भेड़ चराने वाला था, एक रखवाला। जिस शब्द से उसका काम जाना जाता था, कायिन ने उसी शब्द को ताने की तरह फेंक दिया। मानो कहा हो, भेड़ों का रखवाला तो वही था, मुझे क्यों जिम्मेदार ठहराया जाए। लेकिन यहोवा ने सीधे उसके बचाव को नहीं पकड़ा, बल्कि जमीन से उठती पुकार की बात की। खून बोलता है, तब भी जब मुंह चुप रहे।

यह सवाल आज भी हमारे ऑफिस, हमारे मोहल्ले, हमारी मेज पर गूंजता है। कोई सहकर्मी चुपचाप टूट रहा है और हम सोचते हैं, यह मेरी जिम्मेदारी नहीं। जवाब बनाना आसान है, जिम्मेदारी निभाना कठिन।

आज
दोपहर के इस छोटे विराम में एक नाम याद करो, किसी सहकर्मी या पड़ोसी का जिसकी हालत तुम्हें पता है पर जिसे तुमने नजरअंदाज किया है। अभी उसे एक छोटा संदेश भेजो, बस इतना पूछते हुए, सब ठीक है ना।

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◐ दोपहर का पल

उसने उनसे कहा, “परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?” शमौन पतरस ने उत्तर दिया, “तू जीविते परमेश्वर का पुत्र मसीह है।”

मत्ती 16:15-16

अगर अभी कोई तुमसे पूछे कि तुम्हारे लिए मसीह असल में कौन है, तो क्या तुम्हारे पास अपना कोई जवाब है, या सिर्फ वह जो चर्च में, घर में, किताबों में तुमने सुन रखा है?

यीशु यह सवाल कहीं भी नहीं पूछते। वे अपने चेलों को कैसरिया फिलिप्पी ले जाते हैं, वह शहर जो एक चट्टान के नीचे बसा था, जहाँ पानी का एक स्रोत फूटता था, और जहाँ रोमियों ने कैसर के सम्मान में मंदिर बनाया था, और उससे पहले वहाँ यूनानी देवता पान की पूजा होती थी। चट्टान में देवताओं के लिए ताखे खुदे हुए थे। ठीक इसी जगह, जहाँ ताकत और सत्ता के कई नाम गूँजते थे, यीशु पहले पूछते हैं कि लोग क्या कह रहे हैं, और फिर मुड़कर सीधे पूछते हैं, तुम क्या कहते हो।

यह कोई परीक्षा का सवाल नहीं है जिसका सही उत्तर रटकर दिया जा सके। यह उस व्यक्ति से माँग करता है जो पूछ रहा है, न कि उन सबसे जो दूसरों ने कह रखा है। दोपहर की इस घड़ी में, जब थकान में हम अक्सर उधार के जवाबों से काम चला लेते हैं, यह सवाल वहीं रुककर खड़ा रहता है।

पतरस जवाब तो देता है, पर कुछ ही पंक्तियों बाद वही पतरस यीशु को डाँटने लगता है जब क्रूस की बात आती है। एक सही अंगीकार भी पूरी समझ नहीं है, वह बस शुरुआत है। मत्ती यहाँ कोई सफाई नहीं देता।

आज
आज किसी कागज़ पर लिख दो, तुम्हारे अपने शब्दों में, यीशु कौन है तुम्हारे लिए, और उसे एक बार ज़ोर से बोलकर भी सुन लो।

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☾ संध्या का क्षण

तब उसके स्वामी ने उसको बुलाकर उससे कहा, ‘हे दुष्ट दास, तूने जो मुझसे विनती की, तो मैंने तो तेरा वह पूरा कर्ज क्षमा किया। इसलिए जैसा मैंने तुझ पर दया की, वैसे ही क्या तुझे भी अपने संगी दास पर दया करना नहीं चाहिए था?’

मत्ती 18:32-33

वह नौकर अभी राजा के दरबार से बाहर निकला है। उसके कानों में अभी भी वे शब्द बज रहे हैं, 'मैंने तेरा सारा कर्ज़ माफ़ कर दिया।' दस हज़ार तोड़े चांदी, एक ऐसी रकम जो उसकी पूरी ज़िंदगी में भी नहीं चुकाई जा सकती थी, पल भर में मिट गई। और थोड़ी ही देर बाद वही नौकर गली में अपने साथी का गला पकड़ लेता है, क्योंकि उस पर केवल सौ दीनार बाकी हैं।

पतरस ने यीशु से पूछा था कि क्षमा की सीमा कहाँ है, सात बार तक। यीशु ने कहा, सत्तर गुणा सात बार। यहूदी सोच में सात पूर्णता की संख्या थी, और सत्तर गुणा सात कोई गिनती नहीं थी, बल्कि गिनती से परे जाने का तरीका था। यीशु यह नहीं कह रहे थे कि 490वीं बार रुक जाओ, वे कह रहे थे कि क्षमा में कोई गिनती ही नहीं होनी चाहिए।

राजा की यह बात इसी को खोलती है। जिसने इतना बड़ा कर्ज़ माफ़ किया गया, वह छोटे कर्ज़ को माफ़ न करे, यह असंगत है। यही वह जगह है जहाँ हम खड़े हैं, बहुत कुछ माफ़ किए गए लोग, जो किसी छोटी बात को पकड़े बैठे हैं।

आज
आज की शाम में, किसी एक नाम को याद करें जिसे आपने दिल से छोड़ा नहीं है। वह नाम कागज़ पर लिख लें और धीरे से, ज़ोर से यह कहें, 'जैसे मुझ पर दया हुई, वैसे ही मैं भी छोड़ता हूँ।'

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