बुलाहट, आशीष और अपनापन
बुलाहट और अपनापन
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए प्रेरितों के काम 9:5, गिनती 6:24-26, प्रेरितों के काम 9:27 and मरकुस 1:10-11.
☀ सुबह का पल
उसने पूछा, “हे प्रभु, तू कौन है?” उसने कहा, “मैं यीशु हूँ; जिसे तू सताता है।
प्रेरितों के काम 9:5
एक पल रुकिए और साँस को धीमा होने दीजिए।
शाऊल यरूशलेम से निकला था, हाथ में महायाजक के पत्र लिए, दमिश्क की सभाओं में मसीह के अनुयायियों को खोजने और बाँधकर लाने का पूरा अधिकार लेकर। वह उतावला नहीं था, वह निश्चित था। उसे यकीन था कि वह परमेश्वर की सेवा कर रहा है।
फिर रास्ते में, बिना किसी चेतावनी के, आकाश से एक रोशनी उस पर चमकी। वह भूमि पर गिर पड़ा, आँखों ने काम करना बंद कर दिया, और एक आवाज़ ने उसका नाम पुकारा।
ध्यान देने वाली बात यह है कि उस आवाज़ ने यह नहीं कहा, मेरे लोगों को क्यों सता रहे हो। उसने कहा, मुझे क्यों सता रहे हो। यीशु ने खुद को उन साधारण, डरे हुए विश्वासियों से इतना जोड़ लिया था कि उन पर किया गया वार सीधे उस पर पड़ता था। शाऊल एक धर्म से नहीं, एक व्यक्ति से टकरा गया था।
हो सकता है आज आपका दिन भी किसी निश्चितता पर चल रहा हो, किसी पुरानी आदत या पक्की राय पर। यह सुबह याद दिलाती है कि परमेश्वर अचानक रास्ते में आ सकता है, नरमी से, पर पूरी तरह से, और सबसे तेज़ चलने वाले को भी रोक सकता है।
आज
आज जब आप अपना पहला काम शुरू करने बैठें, एक क्षण रुककर धीरे से बोलें, प्रभु, आप कौन हैं, और आज मुझसे क्या चाहते हैं।
✦ दोपहर का पल
“यहोवा तुझे आशीष दे और तेरी रक्षा करे: “यहोवा तुझ पर अपने मुख का प्रकाश चमकाए, और तुझ पर अनुग्रह करे: “यहोवा अपना मुख तेरी ओर करे, और तुझे शान्ति दे।
गिनती 6:24-26
"शान्ति" शब्द पर रुक जाइए। दोपहर के व्यस्त समय में यह शब्द अक्सर बस इतना लगता है कि फोन की घंटी थम जाए, मेज़ पर सन्नाटा छा जाए। पर हारून के मुख से निकलने वाला यह शब्द किसी शांत कमरे की तस्वीर नहीं बनाता।
हिब्रू में यह शब्द किसी चीज़ के पूरे होने की तस्वीर है, किसी बर्तन का बिना दरार के होना, किसी शरीर का कोई अंग टूटा न होना, किसी रिश्ते में कुछ भी अधूरा न रह जाना। यही शब्द गिनती 6 में याजक इस्राएल पर बोलता है, और यशायाह 9 में उस आने वाले राजा के नाम में रखा जाता है जो टूटी हुई दुनिया को जोड़ेगा।
हमारे अनुवाद इसे "शान्ति" लिखते हैं, और यह गलत नहीं, पर यह शब्द शोर के न होने से कहीं आगे जाता है। यह पूछता नहीं कि आसपास कितना शांत है, यह पूछता है कि भीतर, रिश्तों में, काम में कुछ टूटा तो नहीं रह गया।
दोपहर के इस छोटे विराम में यही सवाल उठाने लायक है। हो सकता है सुबह से कोई बात अधूरी रह गई हो, कोई शब्द जो कहा नहीं गया, कोई काम जो अटका पड़ा है। यह शब्द उसी अधूरेपन की ओर उंगली उठाता है, और वहीं जुड़ने का निमंत्रण देता है।
आज
एक कागज़ के टुकड़े पर उस एक बात या रिश्ते का नाम लिखिए जो आज अधूरा या टूटा हुआ महसूस होता है, और उसके ऊपर धीरे से बोल दीजिए, "यहोवा तुझे शान्ति दे।"
◐ दोपहर का पल
परन्तु बरनबास ने उसे अपने साथ प्रेरितों के पास ले जाकर उनसे कहा, कि इसने किस रीति से मार्ग में प्रभु को देखा, और उसने इससे बातें की; फिर दमिश्क में इसने कैसे साहस से यीशु के नाम का प्रचार किया।
प्रेरितों के काम 9:27
जब कोई नया व्यक्ति किसी समूह में आता है, हम मान लेते हैं कि उसे खुद अपनी साख साबित करनी होगी। समय लगेगा, प्रमाण देने होंगे, तब भरोसा बनेगा। पर यरूशलेम की कलीसिया के दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था जिसकी साख खुद के दम पर कभी नहीं बन सकती थी।
यह शाऊल था, वही जिसने कुछ समय पहले तक विश्वासियों को घसीटकर जेल भिजवाया था। अब वह दमिश्क की घटना के बाद यरूशलेम आया था, पर वहां के चेले उससे डरते थे, उसे विश्वास नहीं होता था कि यह वही आदमी अब चेला हो सकता है। उनका डर बेबुनियाद नहीं था।
ठीक इसी बिंदु पर बरनबास बीच में आता है। यही वह व्यक्ति है जिसे पहले अपनी खेत बेचकर सब कुछ बांट देने के लिए जाना जाता था, जिसका नाम ही रखा गया था प्रोत्साहन का पुत्र। अब वह अपनी बनी हुई साख शाऊल के लिए दांव पर लगाता है, उसे अपने साथ लेकर प्रेरितों के पास जाता है और उसकी पूरी कहानी बताता है।
यह सस्ता प्रोत्साहन नहीं था। बरनबास ने शाऊल का अतीत मिटाया नहीं, उसे नकारा नहीं, बस उसे कमरे के भीतर ले आया, जहां और कोई उसे लाने को तैयार नहीं था।
आज
आज किसी एक व्यक्ति का नाम लिखो जिसकी पिछली बातों के कारण लोग उस पर भरोसा करने से हिचकते हैं, और उसके पक्ष में एक वाक्य किसी और से आज ही बोलो या भेज दो।
☾ संध्या का क्षण
और जब वह पानी से निकलकर ऊपर आया, तो तुरन्त उसने आकाश को खुलते और आत्मा को कबूतर के रूप में अपने ऊपर उतरते देखा। और यह आकाशवाणी हुई, “तू मेरा प्रिय पुत्र है, तुझ से मैं प्रसन्न हूँ।”
मरकुस 1:10-11
क्या मैं किसी की नज़र में तब भी प्रिय हूँ जब मैंने आज कुछ खास नहीं किया?
यरदन नदी के किनारे यूहन्ना पापियों को बपतिस्मा दे रहा था, टूटे हुए लोगों की कतार में। यीशु उसी कतार में खड़े हुए, अभी तक कोई चमत्कार नहीं, कोई उपदेश नहीं, कोई चेला नहीं। और ठीक उसी क्षण, जब कुछ भी सिद्ध नहीं हुआ था, आकाश फट गया। मूल भाषा में जो शब्द यहाँ प्रयोग हुआ है, वही शब्द बाद में मन्दिर के पर्दे के फटने के लिए भी आता है, जब यीशु क्रूस पर प्राण त्यागते हैं। मानो शुरुआत और अंत, दोनों जगह परमेश्वर ने कुछ ज़बरदस्ती खोल दिया, जो बन्द रहना चाहिए था।
यह वाणी काम शुरू होने से पहले आई। पिता ने पहले अपना प्रेम बोला, फिर सेवकाई शुरू हुई। दिन की परख से पहले नाम मिला।
आज का दिन शायद ऐसा नहीं रहा जिस पर तुम गर्व से नज़र डाल सको। शाम इस बात की जगह नहीं कि हिसाब बिठाया जाए, यह उस फटे हुए आकाश के नीचे खड़े होने की जगह है, जहाँ आवाज़ काम से पहले आई थी, बाद में नहीं।
आज
एक कागज़ पर आज की एक बात लिखो जो तुम्हें लगता है अधूरी रह गई। फिर धीरे से बोलो, "यह दिन मैं तुझे सौंपता हूँ, तूने मुझे अंक नहीं, नाम दिया है।"
इन अंशों को IRV Hindi 2019 में पढ़ें
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5उसने पूछा, “हे प्रभु, तू कौन है?” उसने कहा, “मैं यीशु हूँ; जिसे तू सताता है।
24“यहोवा तुझे आशीष दे और तेरी रक्षा करे:
25“यहोवा तुझ पर अपने मुख का प्रकाश चमकाए, और तुझ पर अनुग्रह करे:
26“यहोवा अपना मुख तेरी ओर करे, और तुझे शान्ति दे।
27परन्तु बरनबास ने उसे अपने साथ प्रेरितों के पास ले जाकर उनसे कहा, कि इसने किस रीति से मार्ग में प्रभु को देखा, और उसने इससे बातें की; फिर दमिश्क में इसने कैसे साहस से यीशु के नाम का प्रचार किया।
10और जब वह पानी से निकलकर ऊपर आया, तो तुरन्त उसने आकाश को खुलते और आत्मा को कबूतर के रूप में अपने ऊपर उतरते देखा।
11और यह आकाशवाणी हुई, “तू मेरा प्रिय पुत्र है, तुझ से मैं प्रसन्न हूँ।”
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