परमेश्वर बोलता है, आशा मिलती है
वाणी और सांत्वना
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए उत्पत्ति 40:8, हबक्कूक 2:2, फिलेमोन 1:17-18 and यशायाह 40:1-2.
☀ सुबह का पल
उन्होंने उससे कहा, “हम दोनों ने स्वप्न देखा है, और उनके फल का बतानेवाला कोई भी नहीं।” यूसुफ ने उनसे कहा, “क्या स्वप्नों का फल कहना परमेश्वर का काम नहीं है? मुझे अपना-अपना स्वप्न बताओ।”
उत्पत्ति 40:8
यूसुफ मिस्र की जेल में पड़ा है, न अपने किसी पाप के कारण, बल्कि एक झूठे आरोप के कारण। भाइयों ने उसे बेचा, मालकिन ने उसे फँसाया, और अब वह भुला दिया गया बंदी है। फिर भी एक सुबह वह दो साथी बंदियों के उदास चेहरों को ध्यान से देखता है और रुक जाता है।
पिलानेवाला और रोटी पकानेवाला फिरौन के सबसे भरोसेमंद अधिकारी थे, राजमहल के भीतर काम करने वाले लोग, जो किसी कारण राजा की नाराज़गी का शिकार बने। मिस्र में सपनों को देवताओं का संदेश माना जाता था, इसलिए उनके चेहरे इतने उदास थे, वे जानते थे कि कुछ कहा गया है पर कोई उसे खोल नहीं पा रहा था।
यूसुफ के पास भी कुछ नहीं था, न पद, न अधिकार, न आज़ादी। फिर भी वह अपनी हालत की ओर नहीं, परमेश्वर की ओर इशारा करता है। एक बंदी, जिसके पास कहने को कुछ नहीं बचा, फिर भी याद दिलाता है कि व्याख्या और उत्तर अंततः किसके हाथ में हैं।
आज रविवार है, वह दिन जब हम घरों से निकलकर एक साथ उपासना के लिए इकट्ठा होते हैं, न इसलिए कि हमारे पास सब उत्तर हैं, बल्कि इसलिए कि हम मानते हैं, समझ और अर्थ परमेश्वर के हाथ में हैं। यूसुफ की तरह हम भी उलझे हालात में अपनी आँखें उसी की ओर उठा सकते हैं, चाहे खुद हमारी स्थिति अभी न बदले।
आज
एक कागज़ पर आज सुबह अपने मन की सबसे बड़ी उलझन लिख लो, और उसके नीचे यह वाक्य ज़ोर से बोल, यह व्याख्या परमेश्वर की है, मेरी नहीं। उस कागज़ को जेब में रखकर कलीसिया में साथ ले चलो।
✦ दोपहर का पल
फिर यहोवा ने मुझसे कहा, “दर्शन की बातें लिख दे; वरन् पटियाओं पर साफ-साफ लिख दे कि दौड़ते हुए भी वे सहज से पढ़ी जाएँ।
हबक्कूक 2:2
घर में एक खिड़की होगी जहाँ से बाहर का रास्ता दिखाई देता है। वहाँ दो पल के लिए रुककर खड़े हो जाइए, बिना कुछ किए।
हबक्कूक नबी ने यहूदा में हिंसा और अन्याय देखा था। उसने चिल्लाकर पूछा था, यह कब तक चलेगा, परमेश्वर कहाँ है। पर उत्तर जल्दी नहीं आया। इसलिए वह अपने पहरे की जगह पर चढ़ गया, एक ऊँची जगह जहाँ से पहरेदार दूर तक देखता था, और वहाँ खड़ा होकर रुका रहा कि यहोवा क्या कहेंगे।
तब उत्तर आया, पर जल्दी का नहीं था। उसे कहा गया कि दर्शन को लिख ले, साफ साफ, क्योंकि वह निश्चित समय पर पूरा होगा। बीच की प्रतीक्षा भी उत्तर का ही हिस्सा थी।
आज रविवार है, वह दिन जब कलीसिया इकट्ठा होती है और खड़ी होकर गाती है। पर आराधना में भी कभी वही प्रतीक्षा छिपी रहती है, कोई प्रार्थना जिसका उत्तर अभी नहीं आया। हबक्कूक का पहरा सिखाता है कि रुकना हार मानना नहीं है। यह देखते रहना है, भरोसे के साथ।
आज
आज किसी खिड़की या दरवाज़े के पास दो मिनट चुपचाप खड़े रहिए, बाहर देखते हुए, और जिस बात का उत्तर अभी नहीं मिला उसे धीरे से शब्दों में कहिए, जैसे किसी पहरेदार को अपनी बात सौंपते हैं।
◐ दोपहर का पल
यदि तू मुझे अपना सहभागी समझता है, तो उसे इस प्रकार ग्रहण कर जैसे मुझे। और यदि उसने तेरी कुछ हानि की है, या उस पर तेरा कुछ आता है, तो मेरे नाम पर लिख ले।
फिलेमोन 1:17-18
अधिकार का सबसे गहरा प्रयोग कभी कभी उसे रोक लेना होता है।
फिलेमोन का एक दास था, उनेसिमुस, जो किसी कारण से भाग गया था। भागे हुए दास के लिए रोमी कानून में कड़ी सजा तय थी, शरीर पर दाग, कभी मृत्यु तक। पर उनेसिमुस की राह पावलुस के पास जा पहुँची, जो तब बंधन में था। वहाँ वह विश्वास में आया, और अब पावलुस उसे अपने बेटे जैसा मानता है।
पावलुस के पास अधिकार था। वह प्रेरित था, फिलेमोन के लिए पिता जैसा। वह आदेश दे सकता था, लौटा दो, क्षमा करो। पर वह विनती करता है, प्यार के नाम पर, और कहता है कि अगर उनेसिमुस पर कोई कर्ज़ हो तो वह खुद उसे चुकाएगा। वह अपने नाम का भार नहीं डालता, वह अपना भार डालता है।
पत्र यह नहीं बताता कि फिलेमोन ने आगे क्या किया। यह चुप्पी असहज है। हर बात सुलझकर खत्म नहीं होती, कभी कभी जवाबदारी पाठक पर छोड़ दी जाती है।
आज, प्रभु के दिन, जब विश्वासी एक साथ बैठते हैं, कोई स्वामी नहीं रहता, कोई दास नहीं, केवल भाई बहन मेज़ के एक ही ओर। वह बराबरी मुफ्त में नहीं आई, किसी ने अपना वज़न उठाया।
आज
आज किसी एक व्यक्ति को, जिसके ऊपर तुम्हारा अधिकार है, एक छोटा संदेश लिखो जिसमें आदेश के बदले विनती हो, और उसे अभी भेज दो।
☾ संध्या का क्षण
तुम्हारा परमेश्वर यह कहता है, मेरी प्रजा को शान्ति दो, शान्ति दो! (भज. 85:8, 2 कुरि. 1:4) यरूशलेम से शान्ति की बातें कहो; और उससे पुकारकर कहो कि तेरी कठिन सेवा पूरी हुई है, तेरे अधर्म का दण्ड अंगीकार किया गया है: यहोवा के हाथ से तू अपने सब पापों का दूना दण्ड पा चुका है। (प्रका. 1:5)
यशायाह 40:1-2
पुराने समय में जब कोई दूत राजा की ओर से समाचार लेकर आता था, तो वह शहर की दीवार के पास खड़ा होकर ऊँची आवाज़ में पुकारता था, ताकि दूर तक हर कोई सुन सके। यह कोई धीमी फुसफुसाहट नहीं थी, यह एक सार्वजनिक घोषणा थी, जिसे कोई नकार नहीं सकता था। यशायाह के इन शब्दों में भी वही पुकार है।
यह शब्द बेबीलोन में बंदी बने इस्राएल के लोगों के लिए कहा गया था। उनका शहर गिर गया था, उनका मंदिर खंडहर था, और वे वर्षों से सोचते रहे थे कि परमेश्वर ने उन्हें भुला दिया है। उनका अपराध भारी था, उनका दंड लंबा खिंच गया था। और ऐसे में परमेश्वर स्वयं आदेश देता है, सांत्वना दो, मेरी प्रजा को सांत्वना दो। यह दंड अब पूरा हुआ, यह ऋण चुका दिया गया है।
यह कोई हल्की भावना नहीं है जो आ और जा सकती है। यह एक घोषणा है, जो बदल देती है कि आगे क्या सच है। जो लोग सोचते थे कि उनकी कहानी समाप्त हो गई, उनके लिए यह नई शुरुआत का ऐलान था।
आज, जब दिन की थकान और छोटे-बड़े अपराध मन पर भारी पड़ते हैं, यही शब्द फिर से गूंजता है। परमेश्वर किसी नाराज़ निर्णय से नहीं, बल्कि सांत्वना की घोषणा से बात करता है।
आज
आज रात सोने से पहले किसी एक व्यक्ति को, जिसे तुम जानते हो कि वह थका हुआ या बोझिल है, एक छोटा संदेश भेजो जिसमें केवल इतना लिखो, तुम भुलाए नहीं गए हो, मैं तुम्हारे लिए प्रार्थना कर रहा हूँ।
इन अंशों को IRV Hindi 2019 में पढ़ें
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8उन्होंने उससे कहा, “हम दोनों ने स्वप्न देखा है, और उनके फल का बतानेवाला कोई भी नहीं।” यूसुफ ने उनसे कहा, “क्या स्वप्नों का फल कहना परमेश्वर का काम नहीं है? मुझे अपना-अपना स्वप्न बताओ।”
2फिर यहोवा ने मुझसे कहा, “दर्शन की बातें लिख दे; वरन् पटियाओं पर साफ-साफ लिख दे कि दौड़ते हुए भी वे सहज से पढ़ी जाएँ।
17यदि तू मुझे अपना सहभागी समझता है, तो उसे इस प्रकार ग्रहण कर जैसे मुझे।
18और यदि उसने तेरी कुछ हानि की है, या उस पर तेरा कुछ आता है, तो मेरे नाम पर लिख ले।
1तुम्हारा परमेश्वर यह कहता है, मेरी प्रजा को शान्ति दो, शान्ति दो! (भज. 85:8, 2 कुरि. 1:4)
2यरूशलेम से शान्ति की बातें कहो; और उससे पुकारकर कहो कि तेरी कठिन सेवा पूरी हुई है, तेरे अधर्म का दण्ड अंगीकार किया गया है: यहोवा के हाथ से तू अपने सब पापों का दूना दण्ड पा चुका है। (प्रका. 1:5)
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