प्रेम जो सेवा में दिखता है
प्रेम और सेवा
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए मरकुस 14:8-9, 1 कुरिन्थियों 13:4, निर्गमन 17:12 and 2 राजा 5:3.
☀ सुबह का पल
जो कुछ वह कर सकी, उसने किया; उसने मेरे गाड़े जाने की तैयारी में पहले से मेरी देह पर इत्र मला है। मैं तुम से सच कहता हूँ, कि सारे जगत में जहाँ कहीं सुसमाचार प्रचार किया जाएगा, वहाँ उसके इस काम की चर्चा भी उसके स्मरण में की जाएगी।”
मरकुस 14:8-9
सुबह साढ़े छह बजे, चाय का कप अभी गरम है और मोबाइल पर तीन संदेश बिना पढ़े पड़े हैं। मन पहले से ही हिसाब लगाने लगता है कि दिन में क्या जरूरी है और क्या बाद के लिए छोड़ा जा सकता है।
उस स्त्री के पास जो पात्र था वह संगमरमर जैसे मुलायम पत्थर से बना था, बंद और सीलबंद, जिसमें बहुमूल्य इत्र वर्षों से सुरक्षित रखा गया था। ऐसा इत्र सामान्यतः किसी स्त्री की पूरी जमा पूँजी या दहेज के बराबर होता था, कुछ ऐसा जिसे संभालकर रखा जाता, बूँद बूँद करके इस्तेमाल किया जाता। उसे खोलने का मतलब था उसे तोड़ना, क्योंकि गर्दन सीलबंद थी, और एक बार तोड़ देने पर पूरा इत्र उड़ेलना ही एकमात्र रास्ता बचता था।
यीशु इस पूरी तरह उड़ेल देने को व्यर्थता नहीं कहते। वे कहते हैं, उसने वही किया जो वह कर सकती थी। यह कोई बड़ी घोषणा या योजना नहीं थी, बस एक स्त्री जिसने अपने पास जो सबसे बेशकीमती था, वह खोल दिया।
आज का दिन भी ऐसी ही माँग रख सकता है, कोई समय, कोई शब्द, कोई मदद जो देने में थोड़ा डर लगता है क्योंकि वापस नहीं मिलेगी। वह स्त्री नहीं जानती थी कि उसका यह काम सदियों तक याद रखा जाएगा, वह बस आज के लिए जो कर सकती थी वह कर रही थी।
आज
आज किसी एक व्यक्ति को फोन करके या सामने जाकर दो मिनट में सीधे शब्दों में धन्यवाद कहो, बिना यह सोचे कि समय है या नहीं, बस वह दे दो जो आज तुम्हारे पास है।
✦ दोपहर का पल
प्रेम धीरजवन्त है, और कृपालु है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं।
1 कुरिन्थियों 13:4
कुरिन्थुस की कलीसिया बिखर रही थी। लोग एक-दूसरे पर मुकदमा कर रहे थे, मेज़ पर अमीर और ग़रीब को अलग बिठाया जा रहा था, हर कोई साबित करना चाहता था कि उसका वरदान बड़ा है। पौलुस इसी बिखरी हुई कलीसिया को लिख रहा था जब उसने प्रेम के लिए वह शब्द चुना जो यूनानी भाषा में सबसे भारी था।
यूनानी भाषा में प्रेम के लिए कई शब्द थे। इरोस था, वह खिंचाव जो पाना चाहता है। फिलिया था, मित्रता की गर्मजोशी, जो देना-लेना साझा करती है। पर पौलुस ने चुना अगापे, वह प्रेम जो भावना से नहीं, चुनाव से शुरू होता है। यह वह प्रेम है जो दूसरे की भलाई चाहता है, चाहे बदले में कुछ मिले या न मिले, चाहे मन में गर्मजोशी हो या न हो।
हमारी भाषा में प्रेम एक ही शब्द है, चाहे वह जोश हो, दोस्ती हो, या परिवार का नाता। इसलिए जब हम पढ़ते हैं कि प्रेम धीरजवन्त है, हम आसानी से सोच लेते हैं कि यह किसी अच्छे एहसास की बात है। पर पौलुस का शब्द इससे कहीं ज़्यादा मांग रहा है, यह एहसास नहीं, निर्णय और काम है।
इसी वजह से अगापे किसी भी घड़ी संभव है, चाहे दिल गर्म हो या ठंडा। दफ़्तर में जिस सहकर्मी से मेल नहीं बैठता, उसके लिए भी यह प्रेम चुना जा सकता है, क्योंकि यह एहसास मांगता ही नहीं, चुनाव मांगता है।
आज
दोपहर के भोजन के समय उस एक सहकर्मी को याद करो जिससे तुम्हें मेल-जोल कठिन लगता है। उसके लिए आज कोई छोटी, ठोस भलाई करो, उसके लिए चाय या पानी ले जाओ, या एक वाक्य में मुँह पर उसकी किसी अच्छी बात की तारीफ़ करो।
◐ दोपहर का पल
और जब मूसा के हाथ भर गए, तब उन्होंने एक पत्थर लेकर मूसा के नीचे रख दिया, और वह उस पर बैठ गया, और हारून और हूर एक-एक ओर में उसके हाथों को सम्भाले रहे; और उसके हाथ सूर्यास्त तक स्थिर रहे।
निर्गमन 17:12
हम मानते हैं कि विश्वास एक भीतरी चीज़ है, आँखें बंद करके मन में जो चुपचाप पैदा होती है, किसी को दिखाई नहीं देती। यह पाठ उस धारणा में एक दरार डाल देता है। यहाँ विश्वास का चित्र हाथों में है, और वे हाथ अपने आप स्थिर नहीं रहते।
जिस हिब्रू शब्द से हमारा 'आमीन' और 'विश्वासयोग्य' जैसे शब्द निकलते हैं, उसकी मूल तस्वीर है किसी चीज़ को टेक देना, सहारा देना, ताकि वह गिरे नहीं। यह शब्द हबक्कूक में भी आता है, जहाँ धर्मी अपनी इस स्थिरता से जीता है। पर यहाँ निर्गमन में यह शब्द किसी सिद्धांत में नहीं, एक थके हुए शरीर में दिखाई देता है।
मूसा की भुजाएँ ऊँची उठी रहनी थीं जब तक इस्राएल अमालेक से लड़ रहा था। पर भुजाएँ थक गईं। तब हारून और हूर ने उसके दोनों ओर खड़े होकर उसके हाथों को थाम लिया। पाठ यह नहीं कहता कि मूसा का विश्वास मजबूत था, यह कहता है कि उसके हाथ स्थिर रहे, क्योंकि किसी ने उन्हें थाम रखा था।
हमारे अनुवाद में 'विश्वासयोग्यता' एक गुण जैसा लगता है, जैसे हम उसे भीतर से पैदा करते हैं। पर मूल शब्द कहता है कुछ और, कि स्थिरता अक्सर बाहर से आती है, किसी और के हाथों से।
दोपहर की थकान में यही सच्चाई काम की है। तुम्हारे हाथ भी ऊँचे उठे-उठे काँप सकते हैं, और यह विश्वास की कमी नहीं, बस सच्चाई है कि अकेला शरीर इतना ही सह सकता है।
आज
आज किसी ऐसे व्यक्ति को एक संदेश भेजो जिसे तुम जानते हो कि वह थका हुआ है, और लिखो, 'मैं तेरा हाथ थाम लूँगा, बता मुझे कहाँ खड़ा होना है।'
☾ संध्या का क्षण
She said to her mistress, "I wish that my lord were with the prophet who is in Samaria! Then he would heal him of his leprosy."
2 राजा 5:3
एक बंदी लड़की के मुँह से निकला एक छोटा सा वाक्य, एक पूरे सेनापति के जीवन की दिशा बदल गया।
वह इस्राएल से छीनी गई थी, अपने घर से, अपने लोगों से दूर, अराम देश में नामान की पत्नी की सेवा में डाल दी गई थी। उसका हर दिन याद दिलाता होगा कि उसने क्या खोया है। फिर भी जब उसने सुना कि उसके स्वामी नामान कोढ़ से पीड़ित हैं, तो उसके मुँह से कड़वाहट नहीं, एक आशा का शब्द निकला, काश मेरे स्वामी उस भविष्यद्वक्ता के पास होते जो सामरिया में है।
यह साधारण सी बात नहीं थी। उसके पास न पद था, न अधिकार, न कोई कारण कि वह अपने बंधक के भले की चिंता करे। फिर भी उसने अपनी पीड़ा को अपने शब्दों पर हावी नहीं होने दिया।
यहीं कुछ खुलता है आज के लिए भी। शाम ढलते ही हम अक्सर अपने दिन के बोझ, अपनी थकान, अपनी शिकायतों को ही आखिरी शब्द बना लेते हैं। पर यह लड़की दिखाती है कि एक छोटा, दयालु शब्द, चाहे कितनी भी कठिन परिस्थिति में कहा जाए, किसी के लिए चंगाई का द्वार खोल सकता है। उसके पास कुछ देने को बहुत कम था, फिर भी उसने अपना शब्द रोककर नहीं रखा।
आज
आज रात सोने से पहले, किसी एक व्यक्ति को संदेश भेजें या फोन करें और उससे एक सीधी, दयालु बात कहें, भले ही वह आपके जीवन में बहुत छोटा स्थान रखता हो।
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8जो कुछ वह कर सकी, उसने किया; उसने मेरे गाड़े जाने की तैयारी में पहले से मेरी देह पर इत्र मला है।
9मैं तुम से सच कहता हूँ, कि सारे जगत में जहाँ कहीं सुसमाचार प्रचार किया जाएगा, वहाँ उसके इस काम की चर्चा भी उसके स्मरण में की जाएगी।”
4प्रेम धीरजवन्त है, और कृपालु है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं।
12और जब मूसा के हाथ भर गए, तब उन्होंने एक पत्थर लेकर मूसा के नीचे रख दिया, और वह उस पर बैठ गया, और हारून और हूर एक-एक ओर में उसके हाथों को सम्भाले रहे; और उसके हाथ सूर्यास्त तक स्थिर रहे।
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