स्थिर रहो · शनिवार, सितम्बर 19, 2026

हर परिस्थिति में परमेश्वर की उपस्थिति

खोज और भरोसा

कल 2 मिनट का पठन 4 बाइबिल के अंश

शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए लूका 15:8, लूका 1:20, यशायाह 53:3 and नहेमायाह 2:4.

☀ सुबह का पल

“या कौन ऐसी स्त्री होगी, जिसके पास दस चाँदी के सिक्के हों, और उनमें से एक खो जाए; तो वह दीया जलाकर और घर झाड़-बुहारकर जब तक मिल न जाए, जी लगाकर खोजती न रहे?

लूका 15:8

परमेश्वर झाड़ू उठाकर आपके घर का कोना-कोना छानता है।

यह चित्र एक स्त्री का है जिसके पास चांदी के दस सिक्के थे। उन दिनों ऐसे सिक्के अक्सर स्त्री की शादी की पगड़ी या माला में पिरोए जाते थे, यह उसकी पहचान और उसके परिवार की कहानी थी। एक सिक्का खोना सिर्फ पैसे का नुकसान नहीं था, यह मानो उसकी अपनी कहानी का एक टुकड़ा गुम हो जाना था।

अक्सर छूट जाने वाली बात यह है कि वह दिन के उजाले में भी दीया जलाती है। उस ज़माने के घरों में एक ही छोटा दरवाज़ा होता था, शायद ही कोई खिड़की, फर्श मिट्टी का, और हर कोना अंधेरे में डूबा रहता था। सिक्का ढूंढ़ने के लिए उजाले की नहीं, आग की ज़रूरत थी। फिर वह झाड़ू लगाती है, धूल उड़ाती है, हर कोने में हाथ फेरती है, यह इंतज़ार नहीं, मेहनत है।

यही जगह है जहां यह कहानी आज आप तक पहुंचती है। शायद इस हफ्ते किसी का नाम आपके मन के किसी कोने में पड़ा रह गया हो, किसी से बात नहीं हुई, कोई रिश्ता धूल में दब गया हो। परमेश्वर तमाशाई की तरह नहीं देखता, वह दीया जलाकर, झाड़ू उठाकर, मेहनत से ढूंढ़ता है।

आज
आज घर में सचमुच एक कमरा झाड़ू से साफ करें, और जब आप ऐसा करें, उस एक व्यक्ति का नाम ज़ोर से बोलें जिससे आपका संपर्क छूट गया है, और आज ही उसे फोन करें या संदेश भेजें।

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✦ दोपहर का पल

और देख, जिस दिन तक ये बातें पूरी न हो लें, उस दिन तक तू मौन रहेगा, और बोल न सकेगा, इसलिए कि तूने मेरी बातों की जो अपने समय पर पूरी होंगी, विश्वास न किया।”

लूका 1:20

आज दोपहर रसोई की मेज़ पर सब्ज़ी काटते हुए बच्चे कोई सवाल पूछते हैं, और आपके पास जवाब नहीं है, आप सिर्फ हाथ हिला देते हैं, शब्द नहीं आते। ऐसा ही एक पल जकर्याह के जीवन में आया, बस बहुत बड़ा।

जकर्याह याजक था। उस दिन उसकी बारी थी कि वह मंदिर में धूप जलाए, फिर बाहर आकर बाहर खड़ी भीड़ पर वह आशीष कहे जो हर याजक कहता था। यही उसका काम था, एक वाक्य बोलना। लेकिन जब स्वर्गदूत ने उससे बात की और उसने संदेह किया, तो उसकी वही आवाज़ छीन ली गई। वह बाहर आया, हाथ हिलाता रहा, पर एक भी शब्द न निकला।

सोचिए उस पर क्या बीता होगा। महीनों तक वह अपनी बात समझा नहीं सका, अपनी गलती सुधार नहीं सका, प्रार्थना का शब्द बोल नहीं सका। सिर्फ लिख सकता था। और जब आखिर में लिखने का समय आया, बच्चे का नाम लिखने का, तब उसकी ज़बान फिर खुली।

कभी हम भी वहीं फँस जाते हैं जहाँ शब्द काम नहीं करते, सफाई नहीं चलती, सिर्फ इंतज़ार बचता है। जकर्याह की चुप्पी सज़ा से ज़्यादा एक जगह थी, जहाँ उसे बोलने के बदले लिखना और मानना सीखना पड़ा।

आज
आज दोपहर एक कागज़ लें और वह एक बात लिख दें जो आप हफ्तों से समझा नहीं पाए हैं, फिर उसे किसी अपने के सामने रख दें और कहें, यही सच है।

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◐ दोपहर का पल

वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था; वह दुःखी पुरुष था, रोग से उसकी जान-पहचान थी; और लोग उससे मुख फेर लेते थे। वह तुच्छ जाना गया, और, हमने उसका मूल्य न जाना। (मर. 9:12)

यशायाह 53:3

बाज़ार में जब कोई त्वचा के रोग से ग्रस्त व्यक्ति पास से गुज़रता था, तो लोग सिर घुमा लेते थे। आँखें दूसरी तरफ कर लेते थे, कभी नाक-मुँह ढाँक लेते थे, रास्ता बदल लेते थे। यह कोई संयोग नहीं था, यह एक आदत थी, एक तरीका जिससे लोग खुद को उस दुख से दूर रखते थे जिसे वे देखना नहीं चाहते थे।

यशायाह यही शब्द बाबेल में बंधुआई काट रहे इस्राएल को कहता है। एक ऐसे सेवक की बात, जिसका रूप ऐसा था कि लोग उसकी तरफ देखना भी पसंद नहीं करते थे। दुखों से भरा, बीमारी से जाना-पहचाना, और सबसे तीखी बात यह कि लोगों ने खुद अपना मुँह उससे फेर लिया। यह सिर्फ उसका वर्णन नहीं है, यह हमारा कबूलनामा है।

जब यीशु क्रूस पर लटके थे, तो बहुतों ने वैसे ही मुँह फेर लिया। और यह आदत आज भी हमारे भीतर जीती है, जब कोई बीमार, टूटा हुआ, अजीब सा दिखने वाला व्यक्ति सामने आता है और हम आँखें झुका लेते हैं।

यशायाह इस बात को हल नहीं करता, वह सिर्फ उजागर करता है। और यही वह जगह है जहाँ से बदलाव शुरू होता है, वहीं जहाँ हम मानते हैं कि हमने मुँह फेरा था।

आज
आज किसी ऐसे व्यक्ति को फोन करो जिससे तुम अनजाने में बचते रहे हो, उसकी बीमारी या दुख के बारे में सीधे पूछो, और बिना नज़र फेरे उसकी बात सुनो।

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☾ संध्या का क्षण

राजा ने मुझसे पूछा, “फिर तू क्या माँगता है?” तब मैंने स्वर्ग के परमेश्वर से प्रार्थना करके, राजा से कहा;

नहेमायाह 2:4

हम मानते हैं कि सच्ची प्रार्थना के लिए शांत कमरा चाहिए, बंद आँखें, कुछ खाली मिनट। नहेमायाह की एक पंक्ति की प्रार्थना इस धारणा में दरार डालती है, वह राजा के सामने खड़ा है, बातचीत के बीच में, और उसके पास आँखें बंद करने का भी समय नहीं है।

नहेमायाह फारस के राजा अर्तक्षत्र का पिलानेहारा था, एक भरोसे का पद, पर वह यहूदी बंदियों की संतान भी था। यरूशलम की टूटी दीवारों की खबर सुनकर वह दिनों तक रोता और उपवास करता रहा। फिर एक दिन राजा ने उसका उदास चेहरा देख लिया, यह खतरनाक था, क्योंकि राजा के सामने शोक दिखाना जोखिम भरा माना जाता था। राजा ने पूछा, तुझे क्या चाहिए।

उस एक सवाल और नहेमायाह के जवाब के बीच, बस एक साँस जितनी जगह में, वह परमेश्वर से बात करता है। कोई शब्द नहीं बोला गया, कोई घुटना नहीं टिका, फिर भी वह प्रार्थना सच्ची है। यही उसकी हिम्मत है, वह अपने डर और अपनी माँग को उस खाली पल में परमेश्वर के हाथ में रख देता है, इससे पहले कि वह अपने मुख से कुछ कहे।

आज हमारे दिन में भी ऐसे खाली पल छिपे होते हैं, एक सवाल और जवाब के बीच, फोन उठाने से पहले, किसी से आँख मिलाने से पहले। नहेमायाह दिखाता है कि प्रार्थना के लिए अलग कमरे की ज़रूरत नहीं, वह उस दरार में भी समा सकती है जो बातचीत के बीच अचानक खुल जाती है।

आज
आज शाम, जब परिवार या दोस्तों के साथ बैठो और कोई बातचीत शुरू हो, बोलने से ठीक पहले मन में चुपचाप यही कहो, हे स्वर्ग के परमेश्वर, मुझे शब्द दे। किसी को पता न चले, पर तुम जान लोगे कि तुमने पहले परमेश्वर से बात की।

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