यीशु कौन है, यह प्रश्न
यीशु की पहचान
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए मत्ती 16:15, यूहन्ना 19:29, लूका 8:25 and प्रेरितों के काम 8:34.
☀ सुबह का पल
उसने उनसे कहा, “परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?”
मत्ती 16:15
यह प्रश्न तुम्हें छुपने नहीं देता।
यीशु अपने चेलों से पहले पूछ चुके थे, लोग मुझे क्या कहते हैं। जवाब आसान था, यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला, एलिय्याह, कोई भविष्यद्वक्ता। दूसरों की राय दोहराना कभी खतरनाक नहीं होता। यह हुआ कैसरिया फिलिप्पी के पास, एक ऐसी जगह जहां पहाड़ी पर मूर्तियों के मंदिर खड़े थे, जहां लोग कई देवताओं को पूजते थे। ठीक वहीं, झूठे उत्तरों की उस भीड़ के बीच, यीशु ने प्रश्न को निजी बना दिया, परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो।
अब बात बदल जाती है। भीड़ की राय से कोई नहीं बंधता, पर अपने ही मुंह से दिया गया उत्तर व्यक्ति को बांध देता है। यीशु किसी से रिपोर्ट नहीं मांग रहे थे, वे एक उत्तर मांग रहे थे जिसमें चेला खुद खड़ा हो।
आज रविवार है, वह दिन जब हम इकट्ठे होकर आराधना करते हैं, गीत गाते हैं, और इस नाम को पुकारते हैं। पर गीत गाने से पहले यह प्रश्न अब भी वहीं खड़ा है, किसी बाहर की आवाज़ में नहीं, तुम्हारे अपने विचार में।
आज
आज सुबह, आराधना के लिए निकलने से पहले, एक कागज़ पर लिख, मसीहा, मैं तुझे कहता हूं। वाक्य को अपने शब्दों में पूरा कर, और उसे जेब में रखकर कलीसिया पहुंच।
✦ दोपहर का पल
वहाँ एक सिरके से भरा हुआ बर्तन धरा था, इसलिए उन्होंने सिरके के भिगाए हुए पनसोख्ता को जूफे पर रखकर उसके मुँह से लगाया। (भज. 69:21)
यूहन्ना 19:29
हर बड़ा काम बड़े औज़ार मांगता है, ऐसा हम मान लेते हैं। जितना गंभीर पल, उतना भारी-भरकम साधन चाहिए। पर पवित्रशास्त्र के दो सबसे भारी क्षणों में, मिस्र की उस रात में और क्रूस की उस दोपहर में, परमेश्वर एक मामूली झाड़ी को चुनता है।
हिज़ोप कोई शानदार पौधा नहीं था। यह पत्थर की दीवारों की दरारों में उगने वाली एक छोटी झाड़ी थी, जिसे लोग देवदार के पेड़ के सामने तुच्छ समझते थे। फिर भी निर्गमन में इसी से लोग दरवाज़ों पर लहू लगाते थे, और वह लहू उनके घरों को मृत्यु से बचाता था। और क्रूस पर, जब यीशु प्यासे थे, एक सिपाही ने सिरके में भीगे स्पंज को इसी मामूली डंडी पर रखकर उनके होठों तक पहुंचाया।
जो पौधा किसी इमारत में, किसी बगीचे में कोई जगह नहीं पाता, उसी से परमेश्वर रक्षा का काम और अंतिम दया का काम दोनों करवाता है। बड़प्पन उसकी शर्त कभी नहीं रही।
यह बात आज भी ठहरती है। जो व्यक्ति तुम्हें अनदेखा लगता है, जो सेवा छोटी लगती है, जो हाथ मामूली समझा जाता है, वही परमेश्वर के हाथ में किसी की रक्षा या किसी की राहत का ज़रिया बन सकता है।
आज
आज कलीसिया में मिलते समय उस एक व्यक्ति के पास जाओ जिसे अक्सर कोई नोटिस नहीं करता, उसका नाम लेकर हाल पूछो, और वहीं खड़े होकर चुपचाप उसके लिए एक वाक्य में प्रार्थना करो।
◐ दोपहर का पल
और उसने उनसे कहा, “तुम्हारा विश्वास कहाँ था?” पर वे डर गए, और अचम्भित होकर आपस में कहने लगे, “यह कौन है, जो आँधी और पानी को भी आज्ञा देता है, और वे उसकी मानते हैं?”
लूका 8:25
यह प्रश्न तूफान के बीच नहीं, तूफान के थम जाने के बाद पूछा गया है। नाव अब शांत पानी पर डोल रही है, हवा रुक चुकी है, और तभी यीशु चेलों की ओर मुड़कर पूछते हैं, तुम्हारा विश्वास कहाँ है। यह क्रम चौंकाने वाला है। खतरे के क्षण में तो उन्होंने चिल्लाकर मदद माँगी थी, पर प्रश्न ठीक तब उठता है जब डरने का कोई कारण नहीं बचा।
गलील की झील पहाड़ियों से घिरी थी, और वहाँ अचानक तेज़ आँधियाँ उठ आती थीं, मछुआरे इसे अच्छी तरह जानते थे। यीशु उसी नाव में, उसी तूफान में, तकिये पर सोए हुए थे, जब तक चेलों ने उन्हें जगाकर कहा कि वे डूबने वाले हैं। उन्होंने हवा और पानी को डाँटा, और सब कुछ शांत हो गया। शांति लौटने के बाद ही यह सवाल आता है।
कहाँ है, यह शब्द ध्यान देने लायक है। यीशु यह नहीं पूछते कि तुम्हारे पास विश्वास है या नहीं, बल्कि पूछते हैं कि वह कहाँ है, मानो विश्वास कोई वस्तु हो जो कहीं रखी थी और गुम हो गई। चेले इसका उत्तर नहीं देते। उनका ध्यान तुरंत दूसरी ओर चला जाता है, वे आपस में पूछने लगते हैं कि यह कौन है कि हवा और पानी भी उसकी मानते हैं। प्रश्न वहीं खुला छूट जाता है, बिना उत्तर के।
रविवार की दोपहर में, जब आराधना की सुबह बीत चुकी है और घर की शांति लौट आई है, यह सवाल फिर से उठ सकता है। खतरा टल जाने के बाद भी पूछना बनता है कि उस डर के क्षण में विश्वास वास्तव में कहाँ था। उत्तर तुरंत मिलना ज़रूरी नहीं।
आज
आज दस मिनट निकालकर इस सप्ताह के किसी एक डर के पल को याद करो, और कागज़ पर लिखो कि उस क्षण तुम्हारा विश्वास कहाँ था, कहाँ छिपा था या कहीं था भी या नहीं।
☾ संध्या का क्षण
इस पर खोजे ने फिलिप्पुस से पूछा, “मैं तुझ से विनती करता हूँ, यह बता कि भविष्यद्वक्ता यह किसके विषय में कहता है, अपने या किसी दूसरे के विषय में?”
प्रेरितों के काम 8:34
"क्या मैं सच में समझता हूँ जो मैं पढ़ रहा हूँ?" यह सवाल मुझसे आज रात कोई नहीं पूछता, फिर भी यह भीतर कहीं बजता रहता है, जब आँखें शब्दों पर से गुज़रती हैं और मन कहीं और भटकता है।
यही सवाल फिलिप्पुस ने एक अजनबी से पूछा था, एक सुनसान सड़क पर, जहाँ धूल और दोपहर की धूप के सिवा कुछ न था।
वह अजनबी कूश देश की रानी कंदाके का खजांची था, एक बड़ा अधिकारी, जो यरूशलेम में आराधना करके लौट रहा था। अपने रथ में बैठा वह यशायाह भविष्यद्वक्ता का पत्र ज़ोर से पढ़ रहा था, पर समझ नहीं पा रहा था।
फिलिप्पुस का सवाल उसे शर्मिंदा करने के लिए नहीं था। इसने उसके भीतर एक दरवाज़ा खोल दिया, वह कबूल कर सका, "जब तक कोई मुझे न समझाए, मैं कैसे समझूँ?" और उसने फिलिप्पुस को अपने पास रथ में बैठने के लिए बुलाया।
आज रविवार है, वह दिन जब विश्वासी मिलकर वचन सुनते हैं, एक दूसरे के पास बैठते हैं, जैसे फिलिप्पुस उस रथ में बैठा था। समझ अकेले पढ़ने से नहीं आती, वह तब आती है जब कोई साथ बैठकर सुनता और समझाता है।
आज
आज रात बाइबल खोलो, एक पद धीरे-धीरे ज़ोर से पढ़ो, और जो समझ न आए उसे एक कागज़ पर लिख लो।
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15उसने उनसे कहा, “परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?”
29वहाँ एक सिरके से भरा हुआ बर्तन धरा था, इसलिए उन्होंने सिरके के भिगाए हुए पनसोख्ता को जूफे पर रखकर उसके मुँह से लगाया। (भज. 69:21)
25और उसने उनसे कहा, “तुम्हारा विश्वास कहाँ था?” पर वे डर गए, और अचम्भित होकर आपस में कहने लगे, “यह कौन है, जो आँधी और पानी को भी आज्ञा देता है, और वे उसकी मानते हैं?”
34इस पर खोजे ने फिलिप्पुस से पूछा, “मैं तुझ से विनती करता हूँ, यह बता कि भविष्यद्वक्ता यह किसके विषय में कहता है, अपने या किसी दूसरे के विषय में?”
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